इश्क़िया
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| इश्क़िया | |
|---|---|
![]() इश्किया का पोस्टर | |
| निर्देशक | अभिषेक चौबे |
| पटकथा |
विशाल भारद्वाज, सबरीना धवन, अभिषेक चौबे |
| निर्माता | विशाल भारद्वाज |
| अभिनेता |
नसीरुद्दीन शाह, अरशद वारसी, विद्या बालन, सलमान शाहिद, |
प्रदर्शन तिथियाँ |
२९ जनवरी, २०१० |
| देश | भारत |
| भाषा | हिन्दी |
इश्क़िया २०१० में बनी हिन्दी भाषा की चलचित्र है।
संक्षेप
[संपादित करें]कहानी का आरंभ कृष्णा वर्मा द्वारा अपने पति विद्याधर वर्मा को आत्मसमर्पण हेतु समझाने से होता है। विद्याधर, जो एक स्थानीय अपराध-नायक है, सहमत हो जाता है, किन्तु शीघ्र ही एक गैस-विस्फोट में उसका निधन हो जाता है। दो अपराधी—इफ़्तिख़ार उर्फ़ ख़ालूजान और रज़्ज़ाक़ हुसैन उर्फ़ बब्बन—एक असफल कार्य के पश्चात् अपने स्वामी मुश्ताक़ से पलायन करते हैं, जो उन्हें जीवित दफ़न करने का इरादा रखता है। वे शरण हेतु विद्याधर वर्मा के गृह, गोरखपुर पहुँचते हैं।
वहाँ उन्हें उसकी विधवा कृष्णा मिलती है, जो उन्हें आश्रय देती है और अपने गुप्त उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्हें रिझाने का प्रयास करती है। वह एक लघु व्यापारी कमलकांत कक्कड़ उर्फ़ के.के. के अपहरण का प्रस्ताव देती है। दोनों सहमत होते हैं, क्योंकि वे मुश्ताक़ से बचना चाहते हैं। इसी बीच ख़ालूजान और बब्बन को कृष्णा के प्रति आकर्षण होने लगता है, परन्तु वे एक-दूसरे से अपने भाव प्रकट नहीं करते। अंततः बब्बन कृष्णा को रिझा लेता है और वे शारीरिक संबंध स्थापित करते हैं। ख़ालूजान अपने भाव प्रकट करने का निश्चय करता है, परन्तु कृष्णा और बब्बन को एकत्र नृत्य करते देख क्रुद्ध हो उठता है, किन्तु मौन रहता है। जब अपहरण योजना विफल होती है, तब दोनों में संघर्ष आरंभ हो जाता है।
इसी बीच कृष्णा के.के. को यातना देती है और उससे पूछती है कि उसका पति कहाँ छिपा है, जिससे ज्ञात होता है कि वर्मा संभवतः जीवित है। के.के. अंततः वर्मा को फ़ोन करता है। बब्बन और ख़ालूजान को ज्ञात होता है कि कृष्णा ने उन्हें केवल साधन के रूप में प्रयोग किया। वे उसका सामना करते हैं, जहाँ कृष्णा उद्घाटित करती है कि के.के. और वर्मा अवैध व्यापार में साझेदार थे और वर्मा जीवित है। दोनों के.के. के कारख़ाने पहुँचते हैं और वर्मा को देखकर चकित रह जाते हैं। वर्मा के अनुचर उन्हें नेत्रबन्ध कर एक निर्जन स्थान पर ले जाते हैं। नेत्रबन्ध हटने पर बब्बन को नंदू (आलोक कुमार) नामक बालक, जिसे वह पूर्व में मिला था, बंदूक़ ताने हुए दिखाई देता है। नंदू उन्हें जीवित छोड़ देता है और सम्पूर्ण कथा स्पष्ट करता है—वर्मा ने अपराध-जीवन त्यागने का कोई विचार नहीं किया था, अपितु उसने अपने मृत्युभाव का अभिनय किया ताकि दो लाभ प्राप्त कर सके: पत्नी से मुक्ति और पुलिस से बचकर नवीन पहचान के साथ जीवन आरंभ करना।
ख़ालूजान और बब्बन शीघ्र कृष्णा के गृह लौटते हैं, जहाँ उन्होंने उसे कुर्सी से बाँध रखा था। इस बीच कृष्णा गैस सिलिंडर की नली खोलकर रिसाव उत्पन्न कर देती है। वर्मा वहाँ पहुँचता है और कृष्णा उन्हें मारने हेतु लाइटर जलाने का प्रयास करती है। वर्मा कृष्णा पर आक्रमण करता है, तभी दोनों वहाँ पहुँचते हैं। शीघ्र ही पुलिस भी घटनास्थल पर पहुँचती है। वर्मा के अनुचर गोलीबारी में मारे जाते हैं और वर्मा गैस-विस्फोट में मृत्यु को प्राप्त होता है। दोनों कृष्णा को बचाते हैं और तीनों जलते गृह से दूर जाते हैं।
उन्हें ज्ञात नहीं कि मुश्ताक़ उन पर बंदूक़ ताने हुए है। तभी मुश्ताक़ की पत्नी का फ़ोन आता है। तीनों अब भी मुश्ताक़ की बंदूक़ की दृष्टि में हैं, जिससे उनका भविष्य अनिश्चित प्रतीत होता है, यद्यपि यह अनुमान किया जा सकता है कि मुश्ताक़ ने उन्हें जीवित छोड़ दिया।
चरित्र
[संपादित करें]मुख्य कलाकार
[संपादित करें]- नसीरुद्दीन शाह - ख़ालूजान
- अरशद वारसी - बब्बन हुसैन
- विद्या बालन - कृष्णा वर्मा
- सलमान शाहिद - मुश्ताक
