आर्केबस
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| आर्केबस (Arquebus) | |
|---|---|
| प्रकार | मज़ल-लोडेड आग्नेयास्त्र |
| उत्पत्ति का मूल स्थान | यूरोप / ओटोमन साम्राज्य |
| सेवा इतिहास | |
| युद्ध | इतालवी युद्ध, जापानी सेंगोकू काल, स्पेनिश विजय |
| निर्दिष्टीकरण | |
आर्केबस (अंग्रेज़ी: Arquebus, जिसे Harquebus या Hackbut भी कहा जाता है) 15वीं से 17वीं शताब्दी के दौरान उपयोग किया जाने वाला एक प्रारंभिक 'मज़ल-लोडेड' आग्नेयास्त्र था। यह इतिहास के सबसे पहले ऐसे हथियारों में से एक था जिसे कंधे या छाती से लगाकर दागा जा सकता था और जिसमें फायर करने के लिए एक ट्रिगर तंत्र मौजूद था। आर्केबस ने मध्यकालीन 'हैंड कैनन' की जगह ली और बाद में यह अधिक उन्नत और भारी 'मस्केट' के रूप में विकसित हुआ।[1]
आर्केबस की सबसे बड़ी तकनीकी छलांग इसकी मैचलॉक फायरिंग प्रणाली थी। इससे पहले के आग्नेयास्त्रों में सैनिक को एक हाथ से बंदूक पकड़नी पड़ती थी और दूसरे हाथ से जलता हुआ कोयला या बत्ती बारूद पर लगानी पड़ती थी, जिससे निशाना लगाना लगभग असंभव था। मैचलॉक तंत्र ने इस समस्या को हल कर दिया:
- बंदूक के किनारे एक S-आकार का धातु का लीवर लगा होता था, जिसे सर्पेन्टाइन कहा जाता था। इसमें एक धीमी गति से जलने वाली रस्सी फंसी होती थी।
- बंदूक के बैरल के पिछले हिस्से में एक छोटा सा प्याला होता था, जिसे फ्लैश पैन कहते थे। इसमें प्राइमर गनपाउडर भरा जाता था।
- जब सैनिक ट्रिगर दबाता था, तो सर्पेन्टाइन नीचे गिरकर जलती हुई रस्सी को फ्लैश पैन के बारूद से छुआ देता था।
- फ्लैश पैन का बारूद जलकर एक छोटे छेद के माध्यम से बैरल के मुख्य बारूद को प्रज्वलित करता था, जिससे सीसे की गोली अत्यधिक दबाव के साथ बाहर निकलती थी।
इस तंत्र ने सैनिक को अपने दोनों हाथों से बंदूक को मजबूती से पकड़ने और निशाना लगाने की सुविधा दी।[2]
आर्केबस की मारक क्षमता ने युद्ध के मैदान पर गहरा प्रभाव डाला। 1525 के पाविया के युद्ध में, स्पेनिश आर्केबसियर्स की एक छोटी टुकड़ी ने फ्रांसीसी सेना के सबसे भारी और कुलीन कवचधारी शूरवीरों को पूरी तरह से नष्ट कर दिया। एक साधारण सीसे की गोली, जो तेज़ गति से दागी गई हो, स्टील के सबसे मोटे कवच को भी भेद सकती थी।
इसके अलावा, इसने युद्ध का लोकतंत्रीकरण किया। एक कुशल तीरंदाज को प्रशिक्षित करने में वर्षों (अक्सर जीवन भर) का समय लगता था, जबकि एक साधारण किसान को आर्केबस चलाना और उसे लोड करना कुछ ही हफ्तों में सिखाया जा सकता था।[3][4]
वैश्विक प्रसार और 'वाली फायर' रणनीति
[संपादित करें]यह तकनीक बहुत तेज़ी से पूरी दुनिया में फैल गई।
- ओटोमन साम्राज्य: ओटोमन जेनिसेरीज ने 15वीं सदी में ही बड़े पैमाने पर आर्केबस का उपयोग शुरू कर दिया था, जिसने उन्हें मध्य पूर्व और यूरोप में अजेय बना दिया था।
- जापान: 1543 में पुर्तगाली व्यापारियों के माध्यम से आर्केबस जापान (तनेगाशिमा द्वीप) पहुँचा। जापानी लोहारों ने इसे तुरंत कॉपी किया और इसे तनेगाशिमा नाम दिया। 1575 के नागाशिनो के युद्ध में, जापानी सामंत ओडा नोबुनागा ने 3,000 आर्केबसियर्स का उपयोग करके एक नई वाली फायर रणनीति का प्रदर्शन किया। इसमें सैनिक तीन पंक्तियों में खड़े होते थे; जब पहली पंक्ति फायर करती थी, तो दूसरी और तीसरी पंक्ति अपनी बंदूकें लोड कर रही होती थीं। इसने आर्केबस की धीमी फायरिंग रेट की समस्या को खत्म कर दिया और समुराई घुड़सवार सेना को पूरी तरह से नष्ट कर दिया।[5][6]
सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Needham, Joseph (1986). Science and Civilisation in China: Military Technology, The Gunpowder Epic. Cambridge University Press. pp. 425–430. ISBN 978-0521303583.
- ↑ Chase, Kenneth (2003). Firearms: A Global History to 1700. Cambridge University Press. pp. 60-65. ISBN 978-0521822749.
- ↑ Parker, Geoffrey (1996). The Military Revolution: Military Innovation and the Rise of the West, 1500-1800. Cambridge University Press. pp. 15-22. ISBN 978-0521479585.
- ↑ Matchlock firearms of the Ming Dynasty
- ↑ Perrin, Noel (1979). Giving Up the Gun: Japan's Reversion to the Sword, 1543-1879. David R. Godine Publisher. pp. 18–25. ISBN 978-0879237738.
- ↑ "La diffusione delle armi da fuoco nel dominio visconteo (secolo XIV)"
