आयशा अल-बाउनिया
| आयशा अल-बाउनिया | |
|---|---|
| जन्म |
लगभग 1460 ई. दमिश्क, मामलुक सल्तनत |
| मौत |
1517 ई. (922 हिजरी) दमिश्क |
| राष्ट्रीयता | सीरियाई |
| पेशा | सूफी विदुषी, कवयित्री, न्यायविद, लेखिका |
| प्रसिद्धि का कारण | अरबी साहित्य का सृजन, सूफीवाद पर लेख |
| धर्म | इस्लाम (सूफीवाद) |
आयशा अल-बाउनिया (अरबी: عائشة الباعونية; निधन: 1517 ई.) मध्यकालीन इस्लामी जगत की एक सूफी लेखिका, कवयित्री और विदुषी थीं। ऐतिहासिक रिकॉर्ड के अनुसार, 20वीं शताब्दी से पूर्व की महिलाओं में अरबी भाषा में सर्वाधिक साहित्यिक रचनाएं उनके नाम दर्ज हैं। उनका साहित्य मुख्य रूप से सूफीवाद, ईश्वर-प्रेम और पैगंबर मुहम्मद पर केंद्रित है। उन्हें एक इस्लामी न्यायविद (फ़कीह) के रूप में भी जाना जाता है, जिन्हें फ़तवा (कानूनी राय) जारी करने और शिक्षा देने की आधिकारिक अनुमति (इज़ाज़ा) प्राप्त थी।[1]
परिवार और शिक्षा
[संपादित करें]आयशा का जन्म दमिश्क (Damascus) में हुआ था। उनका संबंध 'बाउनी' परिवार से था। यह परिवार मूल रूप से जॉर्डन के अजलुन क्षेत्र के बाउना गाँव से दमिश्क आकर बसा था। 15वीं शताब्दी के दौरान बाउनी परिवार के कई सदस्य दमिश्क में काज़ी (न्यायाधीश), विद्वान और प्रशासक रहे थे। उनके पिता, यूसुफ अल-बाउनी, भी दमिश्क में एक न्यायाधीश थे।[2]
पारिवारिक पृष्ठभूमि के कारण आयशा को बचपन से ही शैक्षणिक वातावरण मिला। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार, उन्होंने आठ वर्ष की आयु में कुरान कंठस्थ कर लिया था। उन्होंने अपने पिता और परिवार के अन्य सदस्यों से हदीस, इस्लामी न्यायशास्त्र (फ़िक़्ह) और अरबी साहित्य का अध्ययन किया।[3]
सूफीवाद और आध्यात्मिक यात्रा
[संपादित करें]इस्लामी कानून के अध्ययन के अतिरिक्त, आयशा का रुझान सूफीवाद की ओर हुआ। वे 'क़ादिरिया' (Qadiriyya) सूफी सिलसिले से जुड़ गईं। उन्होंने जमाल अल-दीन इस्माइल अल-हवारी और उनके उत्तराधिकारी याह्या अल-उरमावी को अपना आध्यात्मिक मार्गदर्शक चुना। आयशा ने अपनी रचनाओं में मक्का की अपनी तीर्थयात्रा और वहां के अपने आध्यात्मिक अनुभवों (visions) का उल्लेख किया है, जिनमें उन्होंने पैगंबर मुहम्मद के दर्शन होने का वर्णन किया है।[4]
काहिरा प्रवास और इज़ाज़ा
[संपादित करें]आयशा का विवाह अहमद इब्न मुहम्मद इब्न ज़ायदान से हुआ था। 1513 ईस्वी में, पति के निधन के बाद, वह अपने पुत्र अब्द अल-वहाब के साथ मिस्र की राजधानी काहिरा चली गईं। काहिरा में उन्होंने तत्कालीन मामलुक सल्तनत के इस्लामी विद्वानों के साथ विमर्श किया। उनके अध्ययन और ज्ञान के आधार पर, उन्हें कई विद्वानों द्वारा 'इज़ाज़ा' (शिक्षा देने और फतवा जारी करने का अधिकार) प्रदान किया गया। मध्यकालीन इस्लामी इतिहास में किसी महिला को यह दर्जा प्राप्त होना सामान्य नहीं था।[5]
काहिरा प्रवास के दौरान उनकी भेंट मिस्र के शासक अल-अशरफ कान्सुह अल-गौरी से हुई। 1516 ईस्वी में, जब उस्मानिया (Ottoman) साम्राज्य के सुल्तान सेलिम प्रथम ने सीरिया पर अधिकार किया, तब आयशा ने अलेप्पो शहर में सुल्तान सेलिम से भी मुलाकात की थी।
साहित्यिक कृतियाँ
[संपादित करें]आयशा अल-बाउनिया ने कविता और गद्य दोनों विधाओं में लेखन किया। उनके साहित्य पर इब्न अरबी और इब्न अल-फ़रीद जैसे पूर्ववर्ती सूफी विचारकों का प्रभाव दिखाई देता है। उन्होंने सूफी सिद्धांतों, ईश्वरीय प्रेम और रहस्यवाद पर ग्रंथ लिखे हैं। उनकी कुछ ज्ञात रचनाएँ निम्नलिखित हैं:[6]
- अल-मवरिद अल-अहना फी मवलिद अल-असना (al-Mawrid al-ahnā fī ’l-mawlid al-asnā): यह पैगंबर मुहम्मद के जीवन पर आधारित एक काव्य रचना है।
- दीवान फैज़ अल-फज़्ल व-जम अल-शमल (Dīwān Fayḍ al-faḍl wa-wa-jamʻ al-shaml): यह उनकी कविताओं का संकलन (दीवान) है।
- द प्रिंसिपल्स ऑफ सूफीज्म (The Principles of Sufism): आयशा उन चुनिंदा मध्यकालीन महिलाओं में से हैं जिन्होंने सूफीवाद के सिद्धांतों पर स्वतंत्र ग्रंथ लिखे। इस पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद थॉमस एमिल होमरिन (Th. Emil Homerin) ने किया है।[7]
आधुनिक शोधकर्ताओं ने उनके कार्यों का विश्लेषण मध्यकालीन दर्शन के संदर्भ में किया है।[8] 1517 ईस्वी में दमिश्क में उनका निधन हुआ। उनके द्वारा रचित अरबी साहित्य का उपयोग आधुनिक सूफी अध्ययन में किया जाता है।
इन्हें भी देखें
[संपादित करें]सन्दर्भ
[संपादित करें]- ↑ Qutbuddin, Tahera (2006). "Women Poets". In Meri, Josef W. (ed.). Medieval Islamic Civilisation: An Encyclopedia (PDF). Vol. 2. Routledge. pp. 865–867. मूल से (PDF) से 7 फ़रवरी 2014 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 20 मार्च 2026.
- ↑ Khalidi, W. A. S. (1960). "AL-BĀ'ŪNĪ". In Gibb, H. A. R. (ed.). The Encyclopaedia of Islam. Vol. 1. Brill. p. 1109.
- ↑ Homerin, Th Emil (2003). "Living Love: The Mystical Writings of 'A'ishah al-Ba'uniyah". Mamlūk Studies Review. डीओआई:10.6082/M18W3BFC. आईएसएसएन 1947-2404.
- ↑ Homerin, Th. Emil. "Writing Sufi Biography: The Case of 'Ā'ishah al‐Bā'ūn?yah (d. 922/1517) 1". The Muslim World (अंग्रेज़ी भाषा में). 96 (3): 389–399. डीओआई:10.1111/j.1478-1913.2006.00135.x. आईएसएसएन 0027-4909.
- ↑ Stewart, Devin J. (2006). "Degrees, or Ijaza". In Meri, Josef W. (ed.). Medieval Islamic Civilization: An Encyclopedia. Vol. 1. Routledge. pp. 201–204.
- ↑ Homerin, Th. Emil (2009). "ĀʾISHAH al-Bāʿūniyyah". In Lowry, Joseph Edmund; Stewart, Devin J. (eds.). Essays in Arabic Literary Biography II: 1350–1850. Harrassowitz. pp. 21–27. ISBN 978-3-447-05933-6.
- ↑ "The Principles of Sufism". NYU Press (अमेरिकी अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2026-03-20.
- ↑ "Before the canon: the non-European women who founded philosophy". Aeon. मूल से से 19 जनवरी 2020 को पुरालेखित।. अभिगमन तिथि: 2021-10-19.