आधे अधूरे

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मोहन राकेश द्वारा लिखित हिंदी का प्रसिद्ध नाटक पुस्तकीय रूप में
आधे अधूरे  
[[चित्र:|]]
लेखक मोहन राकेश
देश भारत
भाषा हिंदी
विषय साहित्य - नाटक

आधे अधूरे मोहन राकेश द्वारा लिखित हिंदी का प्रसिद्ध नाटक है। यह मध्यवर्गीय जीवन पर आधारित नाटक है। इसमें तीन स्त्री पात्र हैं तथा पाँच पुरुष पात्र। इनमें से चार पुरुषों की भूमिका एक ही पुरुष पात्र निभाता है। हिंदी नाटक में यह अलग ढंग का प्रयोग है। इस नाटक का प्रकाशन १९६९ ई. में हुआ था। यह पूर्णता की तलाश का नाटक है।

कथानक[संपादित करें]

नाटक में कहानी एक परिवार के इर्द गिर्द घूमती नजर आती है जिसमे सावित्री जो कि काम काजी औरत की भूमिका में नजर आती है उसका पति महेंद्रनाथ जो कि बहुत दिन से काम काज नही कर रहा और बहुत दिन से यू ही निठल्ला पड़ा रहता है बस अपनी कमाई कमाई से घर का कुछ सामान खरीद के बहुत दिन बैठा है , घर की बड़ी लड़की बिन्नी है जो शादी शुदा है जिसने मनोज के साथ भाग कर शादी कर ली थी , छोटी लड़की किन्नी है और घर का सब से आलसी पुरुष अशोक-घर का लड़का ।

सावित्री:- एक कामकाजी मध्यवर्गीय शहरी स्त्री

  1. काले कपड़ों वाला पुरुष चार रूपों में १-महेंद्रनाथ(सावित्री का पति),२-सिंघानिया(सावित्री का बॉस),३-जगमोहन,४-जुनेजा
  2. बिन्नी :- सावित्री की बड़ी बेटी
  3. अशोक:- सावित्री का बेटा
  4. किन्नी:- सावित्री की छोटी बेटी
  5. मनोज:- बिन्नी का पति (मात्र संवादों में उल्लेखनीय)

विशेषताएं[संपादित करें]

इस नाटक में मध्यवर्गीय परिवार के वैवाहिक जीवन की विडंबनाओं का चित्रण किया गया है।[1] इसमें परिवार का प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने ढंग के संत्रास का भोग करता है। यह आम बोलचाल की भाषा में लिखा गया नाटक है।

मंचन[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]

  1. सं. डॉ. नगेन्द्र (2016). हिंदी साहित्य का इतिहास. नई दिल्ली: मयूर पेपरबैक्स.

भूिमका 'आधे-अधर ूे' नाटक म¤मोहन राकेश के द्वारा आज के मानव की तथाकिथत आधिनकता ु म¤िघर आयेअधर ूेपन, अिनिIJतता तथा एकरसता म¤मानव Óयिक्तÂव की सÌपू णर्ता खोजनेका उपक्रम ह।ै इसम¤आज के मनÕयु की अिनयित्रत ं और अÆतहीन यं त्रणाओं के गभर् म¤नारी-मिक्तु की भावना, वैवािहक सबं ं धŌ की िवडÌबना पŁषु के अधर ूेपन तथा िवघटनशील जीवन-मÐयŌ ू का प्रकषर्ह।ै सÌपू णर्नाटक घर और घर म¤रहनेवालेलोगŌ के अधर ूेपर ही कथा Óयं िजत करता ह।ै इसका कÃय इस बात को रेखां िकत करता हैिक पित-पÂनी के बीच िकसी ऐसेसामं जÖय, सं तु लन अथवा समीकरण की कोई सं भावना नहीं हो सकती, िजसम¤येपरÖपर िकरोधी पात्र साथ-साथ रह सकतेहŌ। इस िवडÌबनापणूर् िÖथित की सबसेबड़ी त्रासदी यह हैिक येअलग भी नहीं हो सकते। वÖततु: 'आधे-अधर ूे' हमारेसमाज केऐसेतमाम लोगŌ की अिभशĮ िजÆदगी का प्रामािणक दÖतावेज ह, ै िजÆहŌने जीवन की तमाम इ¸छाओ, ं आकां क्षाओं और उपलिÊधयŌ को भौितक सखु -सिवधाओ ु ंसेजोड़ िलया और इस मगृ भरीिचका म¤फँसकर पािरवािरक सं बं धŌ की सहज, प्राĮ आÂमीयता, उपमा, भावाÂमक सरक्षा ु तथा आिÂमक शिक्त को परी ू तरह सेखो िदया। नाटककार मोहन राकेश ने 'आधे-अधर ूे' नाटक म¤वतर्मान को अतीत के माÅयम सेमखिरत ु करनेका मोह छोड़कर वतर्मान सेसीधा साक्षाÂकार िकया ह।ै Öवतं त्रता केपIJात्मÅयवगर्म¤आिथर्क िवषमताओंनेक्रमश: पािरवािरक िबखराव मानिसक तनाव और नैितक पतन को बढ़ावा िदया ह।ै 'आध-ेअधर ूे' म¤एक मÅयवगीर्य पिरवार की िÖथित को लेकर कथा-वÖतुकी सिĶृ की गयी ह, ै पित-पÂनी के गहृ कलह को आधार बनाकर नाटककार पÂनी की काम कुÁठाओं तथा पित के आÂम िवĵास रिहत एक बेरोजगार Óयिक्तÂव का िवĴेषण प्रÖततु करतेहुए बताया हैिक िकस प्रकार येकुÁठाएँ पािरवािरक जीवन को क्लशपे ू णर्एवं असहनीय बना दती े ह।ैपिरवार का प्रÂयेक सदÖय पिरवार सेऊब चका ु हैऔर घर म¤ रहतेहुए घटनु का अनभवु करता ह।ै 'आधे-अधर ूे' की सािवत्री का पित महÆद्रनाथ े की बेरोजगारी के कारण उसेनौकरी करना पड़ता ह।ै सािवत्री मÅयवगीर्य पिरवार की नौकरी पेशा नारी ह।ैनौकरी करतेसमय सािवत्री को कई पŁषŌ ु सेिमल जलकर ु रहना पड़ता ह।ैहमेशा िकसी नयेÓयिक्त को घर लाया करती ह।ै सािवत्री को अपना घर-घसरा ु पित हमेशा छेड़ता रहता ह।ै िफर भी सािवत्री को अपने बेटेकी नौकरी और बेटी के सखु की िचं ता ह।ै अपनेबेटेअशोक को नौकरी िदलवानेके िलए वह अपनेबॉस िसं घािनया सेअनैितक सं बं ध भी रखती ह।ै बेटेके पछनू ेसेजवाब दती े ह§िक-- "अगर कुछ खास लोगŌ के साथ सं बं ध बनाकर रखना चाहती हूँतो अपनेिलए नहीं तमु लोगŌ केिलए।लौट आएंगे रात तक हर शुक्र-शनिचर यही सब होता है यहां

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

आधे-अधूरे

आधे अधूरे कथावस्तु[संपादित करें]

'आधे अधूरे' नाटक की कथावस्तु

v ।, आ यूर कक ।।1ु

কलर- आपे अभरे । ।। क । क है। इस नाटक को ब श है इ ही पाप गार परिवार के द्वारा चार] पुरुष का करता है। यह पति पुरुष एक पुरुष दो पुरुष तीन और पुरुष चार के मव करवाया उपसा होता पोसान इस प्रकार है नाटककारनपारधनहा यह स्पष्ट कर दिया है कि काले मोला सिजी भार पुरुषों कामका निभाता है, उसको आ तगभग मा-पचस वर्ष है। ह पुरुष एक की भूमिका में প कीर पुरुष दो के रूप में न र बद गले का को, पुरुष तीन] के रूप में पून और रूस पुरुष चार के मेरे पति के साप पुरानो कार का लम्बा कोट पहने. दिल देा है। की- है ी आय याम कार्य के दगमग है। उसके चेहरे मे न को मिट बहै, किन द न त मिट सको है। उसकी बढ़़ी लड़की लगभग बीस वर्ष की है और संपर्क का अवगत के मु र सा दे जा सकता है। शटी सड़की क अ र् की में भाव है।लंका भभ क का है, उसके य चेहपर क रई रई है।

।।। -11 पर स दे जरा अनुमान लगाया जा स ह ।। पह म- वि रता गेउ म-वो र पर है। धर में आ हे ऐसी टीटगिग रैकलकऔर ैपि कुछ मा -पुरातो का का एक शेदक औ पडते की क मेड कसी भी है। पर्दा उठने पर पासेनाप पीने के कद माइनिंग टैकल ा टा टी-सेंट अवलौकित होता है, - र र टूटी कमरिया आदमी से होता हुआ प्रकाश सीमा के उस भाग पर कोन्द्रित हो जाता है, जहाँ बै हुआ काने सट दमो सिगार के कश ाच रहा है। काले सूट वाला व्यक्ति स्वयमेव वड है-फिर एक बार फिर से वही शुरूआत । इसके बाद वह सोफे पर में उठ खा हाता है और बताता ४ है मे नहीं जानता आप क्या समझ रहे है, मकान है, और क्या आशा कर रहे हैं, मैं क हने जा रहा हूँ ? आप शायद सोचते होंगे कि मैं इस नाटक में कोई एक निश्चित इकाई अभिनेता प्रस्तुतकर्ता व्यवस्थापक या कुछ और। परन्तु अपने सम्बना में निश्चित रू भी कह सकता- उसी तरह जैसे इस नाटक के सम्बन्ध में नहीं कह सकता। काले सूट वाला व्यक्ति बताता है कि यह नाटक अनिश्चित है और अनिश्चित क्यों है,

इसका कारण बताइए वह बेकार समझता है। अपने विषय में वह बताता है कि- अपने बारे में इतना कह देना ही काफी है कि सड़क के फुटपाथ पर चलते समय आप अचानक जिस आदमी से टकरा जाते हैं, वह आदमी में ही है। मतलब यह है कि वह आदमी दर्शकों के लिए यद्यपि महत्वपूर्ण नहीं है, किन्तु फिर भी उसकी स्थिति को दर्शक स्वीकार करें, यही वह चाहता है। वहबताता है कि विपावित कर नकिमीनाan indiरएकतिऔर वही कारण है कि नाटक के बाहर से पादरी को एक f। । है।इसी करक और नाटक में भार दर्शक ।क त कहकर ह ।ा जाता है। प प र सह पका। हो है। क क शि । पर ह ।।।। दिखाई देता है। सामने fa m il का ओला ु दिखाई देता है, जिसमें आपी कापियाँ और पुस्तके बाहर बिखरी हुई हैसोको पर एकदा पुराना पत्रिकाएं और कुछ कर अपनी जानी रखी है। एक क की पार हुमा पाजामा गुनासा तभी नायिका कुछ सामान पाले मारोती है और सामान को "साया का मकान-भरी आँखों मे कमरे को देखने लगती है। पर किसी को देखकर ऐसे निराशा होती है। अपनी बेटी लड़की कोकिनी' कहकर पुकारती है कि जबमा में कोई है ही नहीं तो जवाब कहाँ से आये। किनी की फटी किता देखकर द्वाा ी है। इसी समय यह मत होता है कि कमरे में जोजावर कारकर रखी गयी है. सहक अशोक कुमारी औरवहतरवार एलिजावेग टेलर, आदिवासी आदि विदेशी अभिनेत्रियों को है। तभी पाजामा देखकर बार फिर सस्ता उगी है और पाजामे को तहाने लगती है। मनपर पहे, चाय के बर्तनों को देखकर पाजामे को पटक देती है और ध्यालि को र तगती है। ग को इस बात का आ ही है । उसके पति । हो , क ।। को रसोईघर में नहीं रख सके। उसी समय पुरुष ए, जो क उ पति है, पर जाता है और उसरी क है आज । प। ।े दी के आ ?।।। ।ह स। हिट आ है और दी है कि वह कहां चला गया गा? पुरुष एका बताता है कि अह ी देर के लिए यादगार चला गया ।ा। पाजामे को पकडकर । करती है कि इस तरह की में सामान विखे अच्छे आदत नहीं है। इस या. पुरुष ह बढ़ाकर पानामा पाँगता है। स्वी पाजाम को झाड़कर तहाती हुई कहता है कि अब ओपया दै ? पहले भी तो यह देख सकता था। इतना कहकर वह गुस्से से कराई सोलतो है । पाजामा सामस देती है। इसके बाद स्त्री पूजा है कि चाय किस-किस पी मो तो पुरुष अपरा र में उ है कि चाय केवल जरी ने पी ी। ी जब पह है ।। । लड़की किसी को दूध दिया था या नहीं, तो पुरुष बताता है कि उसने उसे देा हो नहों है । स्त्री बताती है कि आज उसका बास सिपानिया आने वाला है, पर पर पुरुष पता है कि जया उसी ने उसे बुलाया, तो स्त्री कहती है कि बाँस होने के नाते उसे घर पर बलाना उसका कर्तव्य तथा पुरुष एक तू है कि यह किस समय आयेगा? सिंधानिया को सेकर और पुरुष में काफी देर तक वाद-विवाद होता रहता है, कि पुरुष एका यह नहीं चाहता है कि उस पर सिंघानिया जैसे लोग क्या करें। इसीलिए वह बताता है कि उसजनेना के यहाँ जाना है। वास्तव में यह सिपानिया के सामने पर में नहीं रहना चाहता है, इसलिए बहाना बनाता है। जुनेजा पुरुष एक कामित्रह रखा उस चिढ़ता है। वह यह मानती है कि व्यापार में पुरुष एक को जो भी हानि उठानी पड़ी और इसके कारण आज की जो दयनीय स्थिति हो गयी है, समें नेजा का ही हाथ था। यहां पर यह भी स्पष्ट हो जाता है कि पुरुष एक का परिवार उन दिनों विलासपूर्ण जीवन बिताता था, चार-सौ रुपये महीने का मकान या टैक्सियों में आना-जाना होता था, किशोर पर फ्रिज खरीदा गया था, लड़के-लड़कियों की कोर्ट की फोसें जाती थी, शराब आती थीआधे-अधूरे-मोहन राकेश ।

और द ी व। पुरुष एक ५र । पाला रहता] है गहाँ फिर उनकी झड़प हो हैं। री कहती है कि जैसे वह तोन-तो दिन बाहर रहता है, उी प्रक का लड़का भी अन से बाहर रहने लग है। पुरुष एक भी कह देता है कि जसकी दी भी तो अपनी मक रण-िच पर चलकर कि कि ा घर से भाग हो गयी, स दो?

सी कही है कि वह बड़े लोगों को इसलिए पर पर बुलाती है, ताकि किी की सं्तुति

मे लड़का नौकरी पर लग जाप। इस पर ु एक यय करता हुआकहता है कि हा, सिरपानिया त जरूर लग।ा देगा। की के दिकने पर पुरुष एक बताता है कि स्तरी हमेश ही ऐसे नये-नये आदमयों को बुलाती रहती है। कभी जगमोहन आता गा, फिर मनोज आने तगा और कभी को और । इन दोनो में कहा-सुनो हो ही रही थी कि बाहर से उनकी बड़ी लड़की आती है, जो अपने पति मनीज के पर से भाग आया है। उसके साथ सामान न देखकर और ऑख सूजी हुई देखकर पुरुष एक कहा है कि यह सवत: फिर भागकर आयी है। यह कहत है कि जिस मनोज की वह इती प्रशंस किया करती थी, वही शह पाकर लड़की को ले उड़ा और अब तड़की बीना इस तरह भाग आयो है। यह जी को उकसाता है कि यह बीना से पूछे कि वह क्यों आयो है ? भन उन दोनों को अपनी ओर घूरते देखकर पूछता है कि ये दोनों उसे क्यों पूर रहे है ? उससे पूछती है कि यह बार-बार ये इस प्रकार चली आती है। सहकी बतातो है कि मनोज हर प्रकार से अ है, किन्तु वह इस दर से कोई ऐसी चीज अपने साथ ले गयी है, जो उसको सभाविक नहीं रहने देती। ोई ऐसा चीज क्या है, इसका पता मुझे अपनें अन्दर से, अयवा इसे पर के अन्दर से ही धस सकता है, मनोज रवय भी इस विपय में क नहीं बता सकता। पुरुप एक ने दोनो की आातों में दखल देता है तो स्त्री के साथ उसकी फिर झप हो जाती है। तैश में पुर ५ए पिर जगमोहन के प्रसंग ले बैठा है और बताता है कि उसका स्थानान्तरण फिर दिन्ी में हो हो गया है। एक दिन कट एलेस में मिलने पर ह बता रहा था कि कभी उनके घर य। स्वरा और मढ़ी लड़को (बो) दोनों हो उसे खोज उ. हैं। उसी समय छेटो लड़को किन्नी चाहर के दरवाजे से आती है और उन तौनों को खीझा हुआ देकर अचानक ठिठक जाती है। छोटी लड़की सफाई देती हुई कहती है कि जब यह स्कूल से आयी थी तो कर पर कोई भी नहीं था, इसलिए वह सवयं भी भाहर चली गयी थी और अब लौटकर आया है तो माँ, आप और बहिन तीनों है, पर सभी बुप साधे हुए हैं। स्त्री उससे पूछती है कि वह स्वयं कहाँ चली गयी थी तो छोटी लड़की किन्नी टोठ होकर कहती है कि कहीं भी चली गयी यी, घर पर तो कोई ा नहीं, जिसके पास वह बैठ तो। यह अपने दूध के विपय में पूछी है कि र्म ुआ या नहीं और पुरुष एक स्त्री की त्यौरियाँ चढ़ी देखकर स्वंध गर्म करने चला जाता है किनी अपनी स्वाली वस्तुओं की मांग करती है और माँ के द्वारा फटकारे जाने पर गुरसे में आकर काहतो है कि अशोक की तरह उसे भी स्कूल भेजना बंद क्यों नहीं कर देते ? तभी पुरुप एक आकर व्यंगपूर्णक बीता को पता है कि तुम्हारो माँ से मिलने आज नया आदमी आने वाला है-सिंधानिया। इस व्यंग्य को सुनकर स्त्री को पहने तो हो आती है; तभी अन्दर से चीखती हुई किन्नी बाहर आठी है जो अशोका से लड़ रही है। अशोक आकर बताता है कि किडनी की उम्र अभी केवल बारह-तेरह वर्ष की है और यह अभी से गन्दी पुस्तकें पढ़ने लगी है। किन्नी प्रत्युत्तर में बताती है कि पुस्तक अशोक की ही है, जिसे वह छिपकर देख रही थी। पुरुष देखना चाहता है, किन्तु लड़का नहीं दिखाता। इस अपसान से तिलमिलाकर10 आलोचना भाग

बताता है कि विभाजित होकर म किसी न किसी अंश में आप में से हर एक व्यक्ति हूँ और यही कारण है कि नाटक के बाहर हो या अन्दर, मेरी कोई एक निश्चित भमिका नहीं है। इसी प्रकार को कुछ बाते करके और नाटक में कई बार दर्शकों से भेंट होने की बात कहकर वह चला जाता है। मंच पर कुछ देर तक अन्धकार जाता है, फिर वह प्रकाशित हो उठता है। कमरे के प्रकाशित होने पर वह खाली दिखाई देता है सामने तिपाई पर एक विद्यार्थी का झोला खुला दिखाई देता है, जिसमें से आधी कापियाँ और पुस्तक बाहर बिखरी हुई हैं, सोफे पर एक-दो पुरानी पत्रिकाएं और कुछ कटी-अधकटी तस्वीरें रखी है। एक कुर्सी की पीठ पर उतरा हुआ पाजामा झूल रहा है। तभी नायिका कुछ सामान संभाले बाहर से आती है और सामान को कुर्सी पर रखकर थकान-भरी आँखों से कमरे को देखने लगती है। घर में किसी को न देखकर उसे निराशा होती है। वह अपनी छोटी लड़की को 'किन्नी' कहकर पुकारती है, किन्तु जब घर में कोई है ही नहीं, तो जबाव कहाँ से आये। किन्नी की फटी किताबें देखकर वह झल्ला उठती है। इसी समय यह ज्ञात होता है कि कमरे में जो तस्वीरें काटकर रखी गयी हैं, उसके लड़के अशोक ने काटी है और वह तस्वीरें एलिजाबेथ टेलर, आहे हेबर्न आदि विदेशी अभिनेत्रियों की है। तभी पाजामा देखकर वह फिर झल्ला उठती है और पाजामे को तहाने लगती है। मेज पर पड़े चाय के बर्तनों को देखकर वह पाजामे को वहाँ पटक देती है और प्यालियों को रे में रखने लगती है। स्त्री को इस बात का अफसोस होता है कि उसके पति ने चाय तो पी, किन्तु बर्तनों को रसोईघर में नहीं रख सके। उसी समय पुरुष एक, जो कि उसका पति है. वहाँ पर आ जाता है और उससे कहता है कि आज वह ऑफिस से जल्दी कैसे आ गयी ? स्त्री यह सुनकर ठिठक जाती है और उससे पूछती है कि वह कहाँ चला गया था ? पुरुष एक बताता है कि वह थोड़ी देर के लिए बाजार चला गया था। स्त्री उसके पाजामे को पकड़कर झल्लाती हुई कहती है कि इस तरह कमरे में सामान बिखेरना अच्छी आदत नहीं है। इस पर पुरुष हाथ बढ़ाकर पाजामा माँगता है। स्त्री पाजामे को छोड़कर नहाती हुई कहती है कि अब उसे क्यों दूं ? पहले भी तो वह देख सकता था। इतना कहकर वह गुस्से से कवर्ड खोलती है और पाजामा उसमें ठूस देती है। इसके बाद स्त्री पूछती है कि चाय किस-किसने पी थी, तो पुरुष अपराधी स्वर में बताता है कि चाय केवल उसी ने पी थी। स्त्री जब यह पूछती है कि छोटी लड़की किन्नी को दूध दिया था या नहीं, तो पुरुष बताता है कि उसने उसे देखा ही नहीं है। स्वी बताती है कि आज उसका बॉस सिंघानिया आने वाला है, घर पर। पुरुष पूछता है कि क्या उसी ने उसे बुलाया है, तो स्त्री कहती है कि बॉस होने के नाते उसे घर पर बुलाना उसका । कर्तव्य था। पुरुष एक पूछता है कि वह किस समय आयेगा? सिंघानिया को लेकर स्त्री और पुरुष में काफी देर तक वाद-विवाद होता रहता है, क्योंकि परुष एक यह नहीं चाहता है कि उसके घर सिंघानिया-जैसे लोग क्या करें। इसलिए वह बताता है कि उसे जुनेजा के यहाँ जाना है। वास्तव में वह सिंघानिया के सामने घर में नहीं रहना चाहता है, इसलिए बहाना बनाता है। जुनेजा पुरुष एक का मित्र है और स्त्री उससे चिढ़ती है। वह यह मानती है कि व्यापार में पुरुष एक को, जो भी हानि उठानी पड़ी और इसके कारण आज उसकी जो दयनीय स्थिति हो गयी है, उसमें जनेजा का ही ह र REDMI NOTE PRO एक का परिवार उन दिनों विलासपूर्ण जीवन बताता था, चा CAMERA था, टैक्सियों में आना-जाना होता था, किस्तों पर फ्रिज खरीदा गया था, लड़के-लड़की की कॉन्वेंट की फीसें जाती थीं, शराब आती थी

आधे-अधूरे-मोहन राकेश 1।

और देवता उड़ती था। पुरुष एक भर से चला जाना चाहता है। यहाँ पर फिर उनकी झडप हो जाती है। री कहती है कि जैसे वह तीन-तीन दिन बाहर रहता है, उसी प्रकार उसका लड़का भी अब धर से बाहर रहने लगा है। पुरुष एक भी कह देता है कि उसकी लडकी भी तो अपनी माँ चरण चिहो पर चलकर किसी के साथ घर से भाग हो गयी, उसे किसने सीख दी ? स्त्री कहती है कि वह बड़े लोगों को इसलिए घर पर बुलाती है, ताकि किसी की संस्तुति से लड़का नौकरी पर लग जाए। इस पर पुरुष एक व्यंग्य करता हुआ कहता है कि हॉ. सिंघानिया तो जरूर लगवा देगा। देवी के छिड़कने पर पुरुष एक बताता है कि स्त्री हमेशा ही ऐसे नये-नये आदमियों को बुलाती रहती है। कभी जगमोहन आता था, फिर मनोज आने लगा और कभी कोई और। इन दोनों में कहा-सुनी हो ही रही थी कि बाहर से उनकी बड़ी लड़की आती है, जो अपने पति मनोज के घर से भाग आयी है। उसके साथ सामान न देखकर और औरों सूजी हुई देखकर । पुरुष एक कहता है कि यह संभव फिर भागकर आयी है। वह कहता है कि जिस मनोज की वह । इतनी प्रशंसा किया करती थी.वही शह पाकर लड़की को ले उड़ा और अब लड़की बीना इस तरह भाग आयो है। वह सो को उकसाता है कि वह बीना से पूछे कि वह क्यों आयौ है ? बोना उन दोनों को अपनी ओर घूरते देखकर पूछती है कि वे दोनों उसे क्यों पूर रहे है ? तब स्त्री उससे पूछती है कि वह बार-बार क्यों इस प्रकार चली आती है। लड़की बताती है कि मनोज हर प्रकार से अच्छा है, किन्तु वही इस घर से कोई ऐसी चीज अपने साथ ले गयी है, जो उसको स्वाभाविक नहीं रहने देती। कोई ऐसी चीज क्या है, इसका पता मुझे अपने अन्दर से, अथवा इस घर के अन्दर से ही चल सकता है, मनोज स्वयं भी इस विषय में कुछ नहीं बता सकता। पुरुष एक इन दोनों की बातों में दखल देता है तो स्त्री के साथ उसकी फिर झड़प हो जाती है। तैश में आकर पुरुष एक फिर जगमोहन का प्रसंग ले बैठता है और बताता है कि उसका स्थानान्तरण फिर दिल्ली में ही हो गया है। एक दिन कनॉट प्लेस में मिलने पर वह बता रहा था कि कभी उनके घर । आयेगा। स्त्री और बड़ी लड़की (बोना) दोनों ही इससे खीझ उठती है। । उसी समय छोटी लड़की किन्नी बाहर के दरवाजे से आती है और उन तीनों को खीझा हुआ देखकर अचानक ठिठक जाती है। छोटी लड़की सफाई देती हुई कहती है कि जब वह स्कूल से आयी थी तो घर पर कोई भी नहीं था, इसीलिए वह स्वयं भी बाहर चली गयी थी और अब लौटकर आयी है तो माँ, आप और बहिन तीनों है, पर सभी चुप साधे हुए हैं। स्त्री उससे पूछती है कि वह । स्वयं कहाँ चली गयी थी तो छोटी लड़की किनी ढीठ होकर कहती है कि कहीं भी चली गयी थी, घर पर तो कोई था नहीं, जिसके पास वह बैठती। वह अपने दूध के विषय में पूछती है कि गर्म हुआ या नहीं और पुरुष एक स्त्री को त्यौरियाँ चढ़ी देखकर स्वयं दूध गर्म करने चला जाता है। किन्नी अपनी स्कूली वस्तुओं की मांग करती है और माँ के द्वारा फटकारे जाने पर गुस्से में आकर कहती है कि अशोक की तरह उसे भी स्कूल भेजना बन्द क्यों नहीं कर देते ? तभी पुरुष एक आकर व्यंग्यपूर्वक बीना को बताता है कि तुम्हारी माँ से मिलने आज नया आदमी आने वाला है-सिंपानिया। इस व्यंग्य को सुनकर स्त्री रो पड़ने को हो आती है: तभी अन्दर से चीखती हुई किन्नी बाहर आती है जो अशोक से लड़ रही है। अशोक आकर बताता है कि किडनी की उम्र अभी केवल बारह-तेरह वर्ष की है और यह अभी से गन्दी पुस्तकें पढ़ने लगी है। किन्नी प्रत्युत्तर में बताती है कि पुस्तक अशोक की ही है, जिसे वह छिपकर देख रहीकुछ ही देर बाद छोटी लड़की किन्नी को अन्दर धकता हुआ अशोक आता है। किन्नी अपने को बचाकर बाहर भाग जाना चाहती है, पर वह उसे बाँह से पकड़े हुए । बीना यह सब देखकर संग्राम में पड़ जाती है कि यह क्या हो रहा है ? किन्नी बीना से सहायता की याचना करती हुई, झटके से बह छुड़ाने का प्रयत्न करती है, किन्तु अशोक उसे सख्ती से खींचकर अन्दर ले आता हा बीना पास आकर किन्नी की बाँह छुड़ाती है। अशोक खुला हुआ डिब्बा बीना को थमाते । हुए कहता है कि इससे पूछ यह बाहर क्या बातें कर रही थी ? वास्तव में किन्नी बाहर अपनी सहेली से यह कह रही थी कि औरत और मर्द किस प्रकार परस्पर सम्भोग करते हैं और वह भी पति-पत्नी नहीं, वरन पति किसी अन्य स्त्री से और पत्नी किसी अन्य पुरुष से। किन्नी इस बात से इन्कार । /करती है कि वह नहीं, बल्कि सुरेखा ही बता रही थी और अशोक को पीछे खड़े होकर बाते सुनते देखकर वह भागने लगी थी कि अशोक ने उसे पकड़ लिया। बीना अशोक को चुप रहने को कहती है और किडनी से पूछती है कि ठीक-ठीक बता क्या बात थी? किन्नी के मुख से उसी समय अशोक की भी पोल खुल जाती है कि वह किस प्रकार किन्नी को जन्मदिन पर मिली चूड़ियाँ और फाउण्टेन पेन उद्योग-सेन्टर वाली वर्णा को दे आया है और उसके पीछे जूतियाँ चटखाता फिरता है। अशोक उसे मारने दौड़ता है तो वह बाहर की ओर भाग जाती है। तभी अशोक उसके पीछे बाहर जाने लगता है कि अचानक स्त्री को अन्दर आते देखकर ठिठक जाता है। स्त्री को देखकर बीना चाय बनाने को कहती है, किन्तु स्त्री उपेक्षा से अस्वीकार कर देती है और कहती है कि उसे चाय के लिए किसी के साथ बाहर जाना है। जब उसे यह ज्ञात होता है कि उससे बात करने को जुनेजा आने वाला है तो वह कह देती है कि उससे कह देना कि वह घर पर नहीं है और पता नहीं कब लौटे ? लड़की बीना के पूछने पर वह कहती है कि जुनेजा से कह दो कि जगमोहन आया था और उसके साथ गयी है। अशोक उसी समय घर चला जाता है। स्त्री बीना से कहती है कि अब शायद वह इस घर । में कभी नहीं लौटेगी और वह अब जगमोहन के साथ ही रहेगी। बीना कुछ समय तक सोचती रहती है, फिर अन्दर को चली जाती है। स्त्री कभी इस सामान को उठाती है, कभी उस सामान को संभालती विक्षिप्त-सी बड़बड़ाती रहती है। चेहरे की झुर्रियों को क्रीम-लोशन आदि से ढकती हुई स्वयं को सजाती है और कंघी से सफेद बालों को ढकने लगती है। तभी पुरुष तीन उर्फ जगमोहन कमरे में प्रवेश करता है। स्त्री की दृष्टि ज्यों ही उस पर पड़ती है, उसकी आँखों में चमक भर जाती है। वह बड़े द्रवित स्वर में उससे कहती है कि आज उसकी अतीव आवश्यकता थी वह उसे बाहर चलकर बातें करने को कहती है जगमोहन तैयार हो जाता है, वे दोनों घर से बाहर चले जाते हैं। इसी समय पुरुष चार उर्फ जुनेजा घर में प्रवेश करता है। वह बताता है कि अशोक उसी के पर अपने डैडी से मिलने गया है। यह जानकर कि स्त्री अर्थात् सावित्री जगमोहन के साथ गयी है, वह उलझन में पड़ जाता है। वह बताता है कि पुरुष एक अर्थात् महेन्द्रनाथ सावित्री को बहुत प्यार करता है और सावित्री की गलत हरकतों के कारण ही उसका जीवन नरक बन गया है। वह यह भी बताता है कि महेन्द्र के कहने पर ही वह सावित्री को समझाने आया है। अगर जुनेजा यहाँ न आता तो महेन्द्र स्वयं आ जाला, जबकि ब्लड प्रेशर (रक्त-चाप) का मरीज होने के कारण वह इस समय स्वस्थ है। उसी समय स्त्री बाहर से आती है और जुनेजा से उलझ जाती है उसे यह जानकर भी अपने पति महेन्द्र के प्रति सहानुभूति नहीं उपजती कि वह इस समय जुनेजा के घर अस्वस्थ पड़ा है। वह जुनेजा के सम्मुख महेन्द्र नाथ की आलोचना करती हुई कहती है-आदमी होने के लिए क्या यहजाना है, मैंने हमेशा हर चीज के लिए उसे किसी न किसी का सहारा दैवते पाया है। खास तौर से आपको यह करना चाहिए या नहीं-जुनेजा से पूछ लूँ। यहाँ जाना चाहिए या नहीं-जुनेजा को पसन्द से, कोई बड़े से बड़ा खतरा उठाना है तो भी जुनेजा की सलाह से, यहाँ तक कि मुझसे ब्याह करने का फैसला भी कैसे किया उसने जुनेजा के हामी भरने पर, जो जुनेजा सोचता है, जो जुनेजा चाहता है, जो जुनेजा करता है. वही वह चाहता है, वही उसे भी करना है, क्योंकि जुतेजा तो एक पूरा आदमी है अपने में, और वह खुद ? वह खुद एक पूरे आदमी का आधा-चौ्याई भी नहीं है। पुरुष चार उर्फ जुनेजा स्त्री के सभी आरोपों को सुनता रहता है और अपने पक्ष को प्रबल बनाने का प्रयत्न करता है, किन्तु स्त्री अर्थात् सावित्री उसके सभी तकों को काटती हुई न केवल महेन्द्र की, वरन् जुनेजा की भी कटु आलोचना करती हुई कहती है-पर आपके महेन्द्र के लिए जिन्दगी का मतलब रहा है, जैसे सिर्फ कुछ दूसरों के खाली खाने भरने की ही वह एक ैन है। वह (सावित्री) नफरत करती है इस सबसे-इस आदमी के ऐसा होने से। वह एक पूरा आदमी चाहती है, अपने लिए। गला फाड़कर वह यह बात कहती है। जुनेजा भी तैश में आ जाता है और सावित्री को उसके विगत जीवन की याद दिलाता हुआ कहता है कि इसका उत्तरदायित्व स्वयं सावित्री पर ही है, क्योंकि आज से बीस साल पहले भी एक बार लगभग ऐसी ही बातें मैं तुम्हारे मुँह से सुन चुका हूँ। तुम्हें याद है ? मेरे घर में हुई थी, वह बात। तुम बात करने के लिए ही खास तौर से आयी थी वहाँ और मेरे कन्धे पर सिर रखे देर तक रोती रही थी। उस दिन भी बिल्कुल इसी तरह तुमने महेन्द्र को मेरे सामने तोड़ा था। कहा था कि । वह बहुत लिजलिजा और चिपचिपा-सा आदमी है। पर उसे वैसा बनाने में नाम तब दूसरों के थे। एक नाम था, उसकी माँ का और दूसरा उसके पिता का। किन्तु जुनेजा का नाम तब नहीं था, ऐसे । लोगों में । क्यों नहीं था, कह दू न यह भी? बहुत पुरानी बात है, कह देने में कोई हर्ज नहीं है। मेरा नाम इसलिए नहीं था कि एक आदमी के तौर पर मैं महेन्द्र से, तुम्हारी नजर में, कुछ बेहतर था। मुझसे उस वक्त तुम क्या चाहती थी, मैं ठीक-ठीक नहीं जानता। लेकिन तुम्हारी बात इतना जरूर जाहिर था कि महेन्द्र को तुम तब भी वह आदमी नहीं समझती था, जिसके साथ तुम जन्द काट सकती (इसीलिए) पहले कुछ दिन जुनेजा एक आदमी था तुम्हारे सामने, जला बाद जिससे तुम चकाचौंध रहीं अर्थात् प्रभावित रहीं, वह था शिवजीत। एक बड़ी डिग्री, यो शब्द और पूरी दुनिया घूमने का अनुभव, पर असल चीज यही कि वह जो भी था और था-महेन्द्र नहीं था। पर जल्द ही तुमने पहचानना शुरू किया कि वह निहायत दोगला ि आदमी है। हमेशा दो तरह की बातें करता है। उसके बाद सामने आया-जगमोहन। ॐँ T, जुबान की मिठास, टिप-टॉप रहने की आदत और खर्च की दरिया दिली पर तीर नोक फिर उसी जगह पर थी कि उसे जो कुछ भी था, जगमोइन का-सा था-महेन्द्र क था। असल बात इतनी ही कि महेन्द्र की जगह इनमें कोई भी आदमी होता तुम्हारी जिन् साल-दो-साल बाद फिर तुम यही महसूस करती कि तुमने एक गलत आदमी से शादी कर उस जिन्दगी में भी ऐसे कोई महेन्द्र, जुनेजा कोई शिवजीत या कोई जगमोहन होते, जिस से तुम वही सब सोची, यही सब महसूस करती। क्योंकि तुम्हरि लिए जीने का मत हा है-कितना कुछ एक साथ होकर, कितना कुछ एक साथ पाकर और कितना कुछ ओढ़कर जीना। वह उतना कुछ कभी तुम्हें किसी एक जगह मिल पाता इसलिए जि अपने लग रहे इन को सरकार स्थाई-गरी रसी हेमने लगती है और बलवा करता जाता है-आ महोतद क-ते काला आदमी है। पर क ा. जब वह सचमुच है ा. क्योकि तथ पने को इतना नहीं समझता था। मोन मे जमने बहन आशाएमाधी मा पर तुम एकदम रा गरबा तो पाया कि उतने वा ता आदमी तुम्ारी सड़कों को पसेका रातो-रात इस पर से चला गया। इसके बाद तुमने अन्धाधुन्ध कोशिश शुरू की-कधी महेन्द्र को हो और झकोरा की कभी अशोक को ही जावक लगाने की। ऐ में ला जगह सीट आई है। आगे के रास्ते बन्द पाकर तम फिर की तरफ देखना चारा और आज जगमोहन ने भी अपनी असमर्थता व्यक्त कर दी। उसकी जगह में होता, तो मैने भी तुमसे यह सब कहा होता। जुनना इस सचाई-भरी फटकारो मुनकर सावितरों चोर पड़ी-मय के सव एक से वक्सएकआपसवसागा अलग-अलग मारे पर चेहरा-देहरा सकका एक ही। और जाने ना जब यह कहता कि यह महेन्द्र नाथ को मुक्त क्यों नहीं कर देता,तासा हैकि मुझे उस माहरे को बिल्कुल भी जरूरत नही है जो खुद न चलता है, नकिसी और को चलने देता है। इस पर तेजा करपलपचाप उसे देखता रहता है और फिर हताशा भरे निर्णय के स- ता है-तो जाकर वह नहीं आएगा। वह कमजोर है, मगर इतना कमलार नहीं है। तुमसे । है, मगर इतना जाना इतना सहारा भी नहीं है, ितना पने को समझता है, वह में देख सेकसी एक पूरी दुनिया है उसके आस-पासा म कोशिश कगा कि । लकर देभक उसे| जाने जाने को तत्पर होता ही क्या हर से अशोक आ जाता है। उसकामेहरा काफी उत। है। जून के यह प पर से क्या चला आया, अशोक उत्तर देता है कि महेन्द्र नाम स्वयं वापस आ गया है और उसका विपत काफी खराब है, इसलिए हड़ी के सहारे उसे बाहर खड़े क्या-रिक्शा से मारकर लाना है। बीना आश्चर्य से पूछती है- लोट आये है जो भी आश्चर्य ए का है तो आ गया वह आखिर इस पर अशोक मुरझाये स्वर में कहता है-तो, आ ही गये है। जुनेजा के मुख पर व्यथा रखए उभर आए हैं और उसकी ऑँखे स्त्री से मिलकर सक বा । ी एक कुआं को पीट यामे चुप खड़ी रहती है तभी बाहर से ऐसा शब्द सुनाई देता है. जैसे फसल जाने से किसी दरवाजे का सहारा लेकर अपनी रक्षा को हो। अशोक भागकर वहां पर जाता है और महेन्द्रनाथ को सहारा देवर लाने लगता है। स्त्री अर्थात् सावित्रो स्थिर आखें से बाहर की तरफ आहिस्ता से देखतो कुर्सी पर बैठ जाती है, तभी लगभग अंधेरे में लड़के की बाँह थामे पुरुष एक अर्थात् महेन्द्रनाथ की धुंधलो आकृति अन्दर आती दिखाई देती है और बाजीगर समाप्त हो जाता है।