आदर्शवाद (अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्ध)

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फ्रांसीसी क्रांति (1789) व अमेरिकी क्रान्ति (1776) को अन्तरराष्ट्रीय सम्बन्धों में आदर्शवादी उपागम (Idealist Approach) की प्रेरणा माना गया है। इसके प्रमुख समर्थक रहे हैं - कौण्डरसैट, वुडरो विल्सन, बटन फिल्ड, बनार्ड रसल आदि। इनके द्वारा एक आदर्श विश्व की रचना की गई है जो अहिंसा व नैतिक आधारों पर आधारित होगा व युद्धों को त्याग देगा।

मूल मान्यताएँ[संपादित करें]

इस दृष्टिकोण की मूल मान्यताएँ निम्नलिखित हैं-

  • (क) मानव स्वभाव जन्म से ही बहुत अच्छा व सहयोगी प्रवृत्ति का रहा है।
  • (ख) मानव द्वारा दूसरों की मदद करने एवं कल्याण की भावना ने ही विकास को सम्भव बनाया है।
  • (ग) मानव स्वभाव में विकार व्यक्तियों के कारण नहीं बल्कि बुरी संस्थाओं के विकास के कारण आता है। मानव युद्ध की ओर भी इन संस्थाओं के कारण प्रेरित होता है।
  • (घ) युद्ध अंतर्राष्ट्रीय राजनीति की सबसे खराब विशेषता है।
  • (ङ) युद्धों को रोकना असम्भव नहीं है, अपितु संस्थागत सुधारों के माध्यम से ऐसा करना सम्भव है।
  • (च) युद्ध एक अंतर्राष्ट्रीय समस्या है, अतः इसका हल भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ही खोजना होगा, स्थानीय स्तर पर नहीं।
  • (छ) समाज को अपने आप को इस प्रकार से संगठित रखना चाहिए कि युद्धों को रोका जा सके।

विशेषताएँ[संपादित करें]

इस दृष्टिकोण की निम्नलिखित विशेषताएँ स्पष्ट रूप से प्रकट होती हैं-

  • (१) इस दृष्टिकोण के अंतर्गत नैतिक मूल्यों पर बल दिया गया है। अतः यह मानती है कि राज्यों के मध्य अच्छे संबंधों हेतु शक्ति की नहीं बल्कि नैतिक मूल्यों की आवश्यकता होती है। इसके अंतर्गत राज्यों के बीच भेदभाव समाप्त होंगे तथा परस्पर सहयोग का विकास होगा।
  • (२) इसके अंतर्गत वर्तमान शक्ति व प्रतिस्पर्धा पर आधारित विश्व संस्था को छोड़कर एक शान्ति व नैतिकता पर आधारित विश्व सरकार बनानी चाहिए। इसमें संघात्मकता व नैतिक मूल्यों के आधार पर विश्व सरकार का गठन कर शक्ति की राजनीति को समाप्त करना चाहिए।
  • (३) इसके अंतर्गत यह माना गया है कि युद्धों को कानून द्वारा रोका जा सकता है। कई अच्छे कानूनों द्वारा युद्ध करने सम्भावनाओं को कानूनी रूप से अवैध घोषित किया जा सकता है। इस दृष्टिकोण का मानना है कि अंतर्राष्ट्रीय कानून के पालन द्वारा किसी भी प्रकार के युद्धों के संकट से बचा जा सकता है।
  • (४) इस दृष्टिकोण के द्वारा हथियारों की हौड़ को समाप्त करने की बात कही गई है। उनका मानना है कि हथियारों का होना भी युद्धों की प्रवृत्तियों को जन्म देने में सहायक होता है। इसके अंतर्गत भावी हथियारों के साथ-साथ वर्तमान हथियारों की व्यवस्था को घटाकर अंततः समाप्त करने की बात कही गयी है।
  • (५) इस दृष्टिकोण में किसी भी प्रकार की निरंकुश प्रवृत्तियों पर रोक लगाने की बात पर बल दिया गया है। आदर्शवादियों का मानना है कि टकराव हमेशा निरंकुशवादियों एवं प्रजातांत्रिक पद्धति में विश्वास रखने वालों के बीच होता है।
  • (६) आदर्शवादियों का मानना है कि शान्तिपूर्ण विश्व की स्थापना हेतु राजनैतिक के साथ-साथ आर्थिक विश्व व्यवस्था को भी बदलना होगा। इस सन्दर्भ में राज्यों को आत्मनिर्णय के सिद्धान्त के साथ आर्थिक स्वतन्त्राता भी प्राप्त होती है।
  • (७) इस दृष्टिकोण के अंतर्गत एक आदर्श विश्व की कल्पना की गई है जिसमें हिंसा, शक्ति, संघर्ष आदि का कोई स्थान नहीं होगा।
  • (८) इस दृष्टिकोण के अंतर्गत राज्य किसी शक्ति अथवा युद्धों की देन नहीं है, बल्कि राज्य का क्रमिक विकास हुआ है। यह विकास धीरे-धीरे मानव कल्याण व सहयोग पर आधारित है।

आलोचना[संपादित करें]

आदर्शवादी सिद्धान्त की कुछ बिन्दुओं को लेकर आलोचना भी की गई है जो निम्न प्रकार से है-

  • (१) सर्वप्रथम यह सिद्धान्त कल्पना पर आधारित है जिसका राष्ट्रों की वास्तविक राजनीति से कोई लेन देन नहीं होता। इस काल्पनिक विश्व के आधार पर यह मान लेना कि सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है गलत होगा।
  • (२) इस उपागम में नैतिकता पर जरूरत से अधिक बल दिया गया है। यह सत्य है कि नैतिकता का समाज में अपना महत्व है, परन्तु राष्ट्रों के मध्य राष्ट्रीय हितों के संघर्ष में शक्ति व कानून दोनों का विशेष स्थान होता है। बिना कानूनी व्यवस्था के राष्ट्रों को एक विश्व में बांधना बड़ा कठिन है। तथा वास्तविकता की धरातल पर शक्ति के महत्व को भी नकारा नहीं जा सकता।
  • (३) अंतर्राष्ट्रीय राजनीति कोरी आदर्शवादिता पर भी नहीं चलाई जा सकती। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के सम्यक अध्ययन हेतु शक्ति, युद्ध आदि वास्तविक तत्वों को अपनाना अपरिहार्य है। इन मूल यथार्थ प्रेरणाओं की उपेक्षा के कारण ही आदर्शवादी दृष्टिकोण अंतर्राष्ट्रीय राजनीति के विश्लेषण में विशेष सहायक नहीं रहा है। राष्ट्र संघ की असफलता इसका प्रत्यक्ष परिणाम है।
  • (४) आदर्शवाद के अनुसार अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संघात्मक व्यवस्था अथवा विश्व सरकार बनने की सम्भावनाएं बहुत कम प्रतीत होती है। इसका सबसे बड़ा कारण राष्ट्रों द्वारा अपने राष्ट्रीय हितों हेतु अडिग रवैय्या अपनाना रहा है। आज के इस युग में कोई भी राष्ट्र अपने राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करना चाहता तथा न ही वह अपने राष्ट्रीय हितों के एवज में किसी अन्य राष्ट्र के उद्देश्यों की पूर्ति हेतु तैयार है।

यद्यपि इस उपागम में कई कमियाँ अवश्य है, परन्तु यह सत्य है कि नैतिकता व्यक्ति, राष्ट्र व सम्पूर्ण विश्व के कल्याण हेतु लाभकारी होती है। यद्यपि वर्तमान स्वार्थी हितों की पूर्ति के सन्दर्भ में इसे लागू करना अति कठिन है, परन्तु इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि यह अंतर्राष्ट्रीय राजनीति हेतु अहितकर है।