रजनीश

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भगवान श्री रजनीश
चित्र:Osho.jpg
जन्म चन्द्र मोहन जैन
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कुचवाडा गाँव, रायसेन ज़िला, भोपाल राज, ब्रिटिश भारत (वर्तमान मध्य प्रदेश, भारत)
मृत्यु Not recognized as a date. Years must have 4 digits (use leading zeros for years < 1000). (उम्र 58)
पुणे, महाराष्ट्र
राष्ट्रीयता भारतीय
प्रसिद्धि कारण अध्यात्म
प्रसिद्ध कार्य लगभग 600 अधिक प्रवचनों का पुस्तकाकार प्रकाशन
आंदोलन जीवन-जागृति आन्दोलन; नव सन्यास

श्री रजनीश (जन्मनाम: चन्द्र मोहन जैन; ११ दिसम्बर १९३१ - १९ जनवरी १९९०), आचार्य रजनीश अथवा ओशो[1]या केवल रजनीश, एक भारतीय आध्यात्मिक गुरु और स्वयं को ईश्वर घोषित करने वाले[2] तथा रजनीश आंदोलन के नेता थे। अपने जीवनकाल में इन्हें रहस्यवादी, गुरु और आध्यात्मिक गुरु के विभिन्न विवादास्पद रूपों में देखा गया। साठ के दशक में, उन्होंने भारत का भ्रमण किया और एक वक्ता के रूप में वे समाजवाद, गांधी,[3][4][5] और हिन्दू रूढ़िवाद के प्रखर आलोचक रहे।[6] मानव कामुकता के प्रति उनके खुले विचारों के कारण उन्हें भारतीय, और बाद में, अंतर्राष्ट्रीय प्रेस में एक "सेक्स गुरु" के रूप में देखा गया, हालाँकि, समय के साथ उनके दृष्टिकोण को बेहतर स्वीकृति मिली।[7]

जीवन[संपादित करें]

चन्द्र मोहन जैन का जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन शहर के कुच्वाडा गांव में हुआ था ओशो शब्द लैटिन भाषा के शब्द ओशोनिक से लिया गया है, जिसका अर्थ है सागर में विलीन हो जाना। १९६० के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' के नाम से एवं १९७० -८० के दशक में भगवान श्री रजनीश नाम से और ओशो १९८९ के समय से जाने गये। वे एक आध्यात्मिक गुरु थे, तथा भारत व विदेशों में जाकर उन्होने प्रवचन दिये।

वे दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। उनके द्वारा समाजवाद, महात्मा गाँधी की विचारधारा तथा संस्थागत धर्म पर की गई अलोचनाओं ने उन्हें विवादास्पद बना दिया। वे काम के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण के भी हिमायती थे जिसकी वजह से उन्हें कई भारतीय और फिर विदेशी पत्रिकाओ में "सेक्स गुरु" के नाम से भी संबोधित किया गया।[7]

१९७० में ओशो कुछ समय के लिए मुंबई में रुके और उन्होने अपने शिष्यों को "नव संन्यास" में दीक्षित किया और अध्यात्मिक मार्गदर्शक की तरह कार्य प्रारंभ किया। अपनी देशनाओं में उन्होने सम्पूूूर्ण विश्व के रहस्यवादियों, दार्शनिकों और धार्मिक विचारधारों को नवीन अर्थ दिया। १९७४ में "पूना " आने के बाद उन्होनें अपने "आश्रम" की स्थापना की जिसके बाद विदेशियों की संख्या बढ़ने लगी।

१९८० में ओशो "अमेरिका" चले गए और वहां सन्यासियों ने "रजनीशपुरम" की स्थापना की।

बचपन एवं किशोरावस्था[संपादित करें]

ओशो का मूल नाम चन्द्र मोहन जैन था। वे अपने पिता की ग्यारह संतानो में सबसे बड़े थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश में रायसेन जिले के अंतर्गत आने वाले कुचवाडा ग्राम में हुआ था। उनके माता पिता श्री बाबूलाल और सरस्वती जैन, जो कि तेरापंथी जैन थे, ने उन्हें अपने ननिहाल में ७ वर्ष की उम्र तक रखा था। ओशो के स्वयं के अनुसार उनके विकास में इसका प्रमुख योगदान रहा क्योंकि उनकी नानी ने उन्हें संपूर्ण स्वतंत्रता, उन्मुक्तता तथा रुढ़िवादी शिक्षाओं से दूर रखा। जब वे ७ वर्ष के थे तब उनके नाना का निधन हो गया और वे "गाडरवाडा" अपने माता पिता के साथ रहने चले गए।[8][9]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Gordon 1987, पृष्ठ 26–27
  2. Mehta 1993, पृष्ठ 83–154
  3. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; FF1-77 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
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  6. Mehta 1993, पृष्ठ 150
  7. Joshi 1982, पृष्ठ 1–4
  8. Mullan 1983, pp. 10–11
  9. Joshi 1982, pp. 22–25, 31, 45–48

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]