रजनीश

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श्री रजनीश (जन्मतः चंद्र मोहन जैन, ११ दिसम्बर १९३१ - १९ जनवरी १९९०), जिन्हें क्रमशः आचार्य रजनीश, भगवान श्री रजनीश, ओशो,[1] या केवल रजनीश के नाम से जाना जाता था,ओशो’, यह शब्द लैटिन भाषा के ‘ओशनिक’ शब्द से लिया गया है जिसका अर्थ है सागर में विलीन हो जाना। अपने संपूर्ण जीवन में आचार्य रजनीश ने बोल्ड शब्दों में रूढ़िवादी धर्मों की आलोचना की, जिसकी वजह से वह बहुत ही जल्दी विवादित हो गए और ताउम्र विवादित ही रहे। एक भारतीय विचारक थे [2] और रजनीश आंदोलन के प्रणेता-नेता थे। अपने जीवनकाल के दौरान उन्हें विवादास्पद रहस्यदर्शी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक के रूप में देखा गया। १९६० के दशक में उन्होंने पूरे भारत में एक सार्वजनिक वक्ता के रूप में यात्रा की और वे समाजवाद, महात्मा गाँधी,[3][4][5] और हिंदू धार्मिक रूढ़िवादी के प्रखर आलोचक रहे।[6] उन्होंने मानव कामुकता के प्रति एक ज्यादा खुले रवैया की वकालत की, हालांकि समय के साथ-साथ उनका यह दृष्टिकोण अधिक स्वीकार्य हो गया।[7]

रजनीश 'ओशो'
जन्म चन्द्र मोहन जैन
११ दिसम्बर १९३१
कुचवाडा ग्राम, रायसेन ज़िला भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत
मृत्यु जनवरी 19, १९९०(१९९०-01-19) (उम्र 58)
पुणे,भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
अन्य नाम भगवान, ओशो
शिक्षा सागर विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर (1957)
व्यवसाय गुरु, रहस्यदर्शी दर्शनिक
पदवी आचार्य भगवान ओशो
प्रसिद्धि कारण अध्यात्मिक जगत मे क्रांति

जीवन[संपादित करें]

चन्द्र मोहन जैन का जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन शहर के कुच्वाडा गांव में हुआ था। ओशो शब्द की मूल उत्पत्ति के सम्बन्ध में कई धारणायें हैं। एक मान्यता के अनुसार, खुद ओशो कहते है कि ओशो शब्द कवि विलयम जेम्स की एक कविता 'ओशनिक एक्सपीरियंस' के शब्द 'ओशनिक' से लिया गया है, जिसका अर्थ है 'सागर में विलीन हो जाना। शब्द 'ओशनिक' अनुभव का वर्णन करता है, वे कहते हैं, लेकिन अनुभवकर्ता के बारे में क्या? इसके लिए हम 'ओशो' शब्द का प्रयोग करते हैं। अर्थात, ओशो मतलब- 'सागर से एक हो जाने का अनुभव करने वाला'। १९६० के दशक में वे 'आचार्य रजनीश' के नाम से एवं १९७० -८० के दशक में भगवान श्री रजनीश नाम से और ओशो १९८९ के समय से जाने गये। वे एक आध्यात्मिक गुरु थे, तथा भारत व विदेशों में जाकर उन्होने प्रवचन दिये। वर्ष 1957 में संस्कृत के लेक्चरर के तौर पर रजनीश ने रायपुर विश्वविद्यालय जॉइन किया। लेकिन उनके गैर परंपरागत धारणाओं और जीवन यापन करने के तरीके को छात्रों के नैतिक आचरण के लिए घातक समझते हुए विश्वविद्यालय के कुलपति ने उनका ट्रांसफर कर दिया। अगले ही वर्ष वे दर्शनशास्त्र के लेक्चरर के रूप में जबलपुर यूनिवर्सिटी में शामिल हुए। इस दौरान भारत के कोने-कोने में जाकर उन्होंने गांधीवाद और समाजवाद पर भाषण दिया, अब तक वह आचार्य रजनीश के नाम से अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे।

वे दर्शनशास्त्र के अध्यापक थे। उनके द्वारा समाजवाद, महात्मा गाँधी की विचारधारा तथा संस्थागत धर्म पर की गई अलोचनाओं ने उन्हें विवादास्पद बना दिया। वे काम के प्रति स्वतंत्र दृष्टिकोण के भी हिमायती थे जिसकी वजह से उन्हें कई भारतीय और फिर विदेशी पत्रिकाओ में "सेक्स गुरु" के नाम से भी संबोधित किया गया।[7]

१९७० में ओशो कुछ समय के लिए मुंबई में रुके और उन्होने अपने शिष्यों को "नव संन्यास" में दीक्षित किया और अध्यात्मिक मार्गदर्शक की तरह कार्य प्रारंभ किया। अपनी देशनाओं में उन्होने सम्पूूूर्ण विश्व के रहस्यवादियों, दार्शनिकों और धार्मिक विचारधारों को नवीन अर्थ दिया। १९७४ में "पूना " आने के बाद उन्होनें अपने "आश्रम" की स्थापना की जिसके बाद विदेशियों की संख्या बढ़ने लगी।

१९८० में ओशो "अमेरिका" चले गए और वहां सन्यासियों ने "रजनीशपुरम" की स्थापना की।

बचपन एवं किशोरावस्था[संपादित करें]

ओशो का मूल नाम चन्द्र मोहन जैन था। वे अपने पिता की ग्यारह संतानो में सबसे बड़े थे। उनका जन्म मध्य प्रदेश में रायसेन जिले के अंतर्गत आने वाले कुचवाडा ग्राम में हुआ था। उनके माता पिता श्री बाबूलाल और सरस्वती जैन, जो कि तारणपंथी दिगंबर जैन थे, ने उन्हें अपने ननिहाल में ७ वर्ष की उम्र तक रखा था। ओशो के स्वयं के अनुसार उनके विकास में इसका प्रमुख योगदान रहा क्योंकि उनकी नानी ने उन्हें संपूर्ण स्वतंत्रता, उन्मुक्तता तथा रुढ़िवादी शिक्षाओं से दूर रखा। जब वे ७ वर्ष के थे तब उनके नाना का निधन हो गया और वे "गाडरवारा"

अपने माता पिता के साथ रहने चले गए।[8][9]

रजनीश बचपन से ही गंभीर व सरल स्वभाव के थे ,

गाडरवारा में उनके जीवन काल के शरारती दिन बीते है़ ,वे शासकीय आदर्श उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में पढा करते थे ,आज भी उस विद्यालय में उनकी सीट विद्मान है जिस पर कि रजनीश बैठा करते थे आज भी उस विद्यालय में विदेशी दर्शनार्थी आते हैं, जो कि वहां अत्यंत शांति का अनुभव करते हैं , आदर्श विद्यालय की अपनी एक गरिमा है और हो भी क्यों न? जिस विद्यालय ने भगवान ओशो को शिक्षा दीक्षा दी है,बचपन से ही रजनीश विरोधी प्रवृत्ति के व्यक्ति थे, जिन्होंने कभी परंपराओं को नहीं अपनाया। किशोरावस्था तक आते-आते रजनीश नास्तिक बन चुके थे। उन्हें ईश्वर में जरा भी विश्वास नहीं था।वह शक्कर नदी आज भी कल-कल वह रही है भले ही आज उसमें उतना पानी न हो जितना की अोशो के उछल कूद करते समय हुआ करता था, शक्कर नदी में ओशो ने बहुत मस्ती की है, वहां लगे आस पास के पेड पौधे भी शायद आज तक ओशो को भुला नहीं पाए होगें आप भी कभी ओशो की नगरी गाडरवारा जाइएगा तो आदर्श विद्यालय और शक्कर नदी जरूर जाइएगा।वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम और राष्ट्रीय स्वयंसेवक दल में भी शामिल हुए थे।


ओशो की आलोचना[संपादित करें]

ओशो की आलोचना विभिन्न प्रकार से की जाती है, उन पर कई आरोप भी लगे। कहा जाता है कि ओशो फ्री सेक्स का समर्थन करते थे और उनके आश्रम में हर संन्यासी एक महीने में करीब 90 लोगों के साथ सेक्स करता था। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि ओशो ने धर्म को एक व्यापार बनाया और खुद सबसे बड़े व्यापारी बन बैठे। उन्होंने अपने जीवन में कई पुस्तकें लिखी, जिनमें से ‘संभोग से लेकर समाधि तक’ नामक पुस्तक ने उन्हें विवादों के चरम पर पहुंचाया।

वे केवल अमीर लोगों के समीप रहते थे, उन्होंने पूंजीवाद को भी बढ़ावा दिया। आंकड़ों के अनुसार उनके पास करीब 90 रॉल्स रॉयस गाड़ियां थीं। ओशो बेहतरीन तर्कशास्त्री थे और अपने तर्कों द्वारा सही को गलत और गलत को सही कर देते थे।

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Gordon 1987, पृष्ठ 26–27
  2. Mehta 1993, पृष्ठ 83–154
  3. सन्दर्भ त्रुटि: <ref> का गलत प्रयोग; FF1-77 नाम के संदर्भ में जानकारी नहीं है।
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  6. Mehta 1993, पृष्ठ 150
  7. Joshi 1982, पृष्ठ 1–4
  8. Mullan 1983, pp. 10–11
  9. Joshi 1982, pp. 22–25, 31, 45–48