आक्रामकता

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आक्रामकता[संपादित करें]

आक्रामकता हमारे दैनिक जीवन का एक हिस्सा है, लेकिन मनोवैज्ञानिक आक्रामकता को सिर्फ एक अर्थ से बाँधना मुश्किल है। आक्रामकता विविध रूप ले सकती हैं, और हो सकता है यह दोनों शारीरिक रूप और / या मौखिक रूप से या गैर मौखिक रूप से व्यक्त की जा सकती हैं।

आक्रामकता लैटिन शब्द ऐग्ररैसियो (हमले) से आता है।

शास्त्रीयों द्वारा आक्रामकता का अध्ययन इस लिये किया जाता है क्योंकि इसका संबंध जानवरों पारस्परिक मेल तथा प्राकृतिक पर्यावरण में विकास संबंधित है।

आक्रामकता की परिभाषा: संज्ञा 1. बल द्वारा विशेष रूप से उसके क्षेत्रीय अधिकार; दूसरे राज्य, के अधिकारों का उल्लंघन करने में एक राज्य की कार्रवाई एक अकारण आक्रामक, हमला, आक्रमण सेना किसी भी विदेशी आक्रमण को रोकने के लिए तैयार है। किसी भी आक्रामक कार्रवाई, हमले, या प्रक्रिया; एक अतिक्रमण: किसी के अधिकारों पर कोई आक्रमण

आक्रामकता के प्रकार[संपादित करें]

प्रभावशाली आक्रामकता: कुछ प्राप्त करने के लिए आदेश से हानि पहुचाँना।

भावनात्मक आक्रामकता: अपने लिए हानि पहुचाँना।

आक्रामकता का सिद्धान्त:[संपादित करें]

आक्रामकता शारीरिक रूप से एवं मनोवैज्ञानिक कारणों से हो सकती हैं। शारीरिक आनुवंशिक या सहज इरादों और मनोवैज्ञानिक किसी स्थिति में होने के कारण या लिंग भेद होने के कारण हो।

आक्रामकता सहज प्रवृत्ति के रूप में[संपादित करें]

कई लोगों को लगता है कि आक्रामकता मूल प्रवृत्ति है। भले ही शायद लोगों ने फ्रायड की मौत-वृत्ति के विषय में पढ़ा नहीं है। और अगर पढ़ा भी है तो शायद ही मौत-वृत्ति की धारणा को स्वीकार करें। लोकप्रिय स्तर पर आक्रामकता को एक जन्मजात आंतरिक रूप से निर्देशित विनाशकारी प्रवर्ती का एक बाह्य विस्थापना के रूप में इतना नहीं देखा जाता है, बल्कि एक सार्वभौमिक बाह्य र्निदेशित प्रवर्ती, संभवतः एक उत्तरजीविता प्रवृत्ति से जुड़ा एक गुण के रूप, में जो जानवरों को मानव जाति के साथ एकजुट करती है। कई लोगों का मानना है कि मानव आक्रामकता को स्पष्ट समझने के लिए गैर मानव पशु दुनिया का अध्ययन लाभदायक हो सकता है। कोर्नाड़ लोऱैंज़, जिनकी १९६६ में आक्रामकता पर लिखी किताब ने प्रमुख प्रभाव बनाया। लोऱैंज़ का अध्ययन विभिन्न पशु प्रजातियों, विशेष रूप से मछली और पक्षियों और थोड़ा गैर मनुष्य-सदृश जानवर पर आधारित है। लोऱैंज़ ने इन विभिन्न प्रजातियों में एक प्रवृत्ति देखी, की वह अपनी ही प्रजाति के दूसरे समूहों से अतिक्रमण की कोशिश से क्षेत्र की रक्षा करते हैं, अपनी प्रजाति की मादा को पाने के लिए प्रतिद्वंद्वी को हराना और अपनी प्रजाति के नवजात एवं युवा आयू और रक्षाहीन सदस्यों की रक्षा करना। लोऱैंज़ यह पातें हैं कि ऐसी आक्रामकता उस उपलब्ध पर्यावरण पर उसी प्रजाति के जानवरों में 'संतुलित वितरण' का कार्य करती है। और यह जीन-पूल को लगातार मज़बूती प्रदान करती है ओर लगातार सुधारती है, और नवजात एवं युवा सदस्यों के अतिजीवन की संभावना को बढ़ाती है। इन तीन तरीकों से, आक्रामकता प्रजातियों को नियमित रूप से इसे यह पर्यावरण के लिए अधिक अनुकूल एवं सुधारनें में मदद करती है। लोऱैंज़ इस के अलावा आक्रामकता को, सामाजिक संरचना के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका के लिए भी श्रेय देते हैं। आक्रामकता एक प्रवृत्ति को मानने वाले भेदक प्रभाव को आक्रामकता की अभिव्यक्ति का कारण मानते हैं। अनुभवजन्य अनुसंधान, हालांकि, इस पर शक डालता है। दुर्भाग्य से भेदक प्रभाव के सिद्धांत को मानने वाले गलत सिद्ध हुऐ। वह दम्पति जो आपस में बहस करतें हैं उन में हिंसक बनने की प्रवृत्ति अधिक होने की संभावना होती है। जो पति अपनी पत्नियों को धक्का देते हैं उन में अपनी पत्नियों को थप्पड़ और मुक्का मारने की सबसे अधिक संभावना रहती हैं। आपराधिक हिंसा के एक व्यक्ति की इस साल हिंसा करने की संभावना का सबसे अच्छा भविष्यवक्ता उसके पिछले साल के आपराधिक हिंसा का इतिहास है। हिंसा से हिंसा पैदा हो रही है बजाय इसके की वह कम हो।

बाह्य रूप उत्तेजित आक्रामकता[संपादित करें]

आक्रामकता का दूसरा सिद्धांत जन्मजात पूर्ववृत्ति से हट के बाह्य रूप की उत्तेजनाओं को आक्रामकता के स्रोतों के रूप में मानता है। केंद्रीय कल्पना यह है कि आक्रामकता परिभाषित उत्तेजनाओं, परिभाषित उत्तेजना जिसे हताशा कहते है। शास्त्रीय ग्रंथों में इस विषय में डोलार्ड और उनके सहयोगियों ने शुरू में साहसिक दो भागी अभिकथन की रचना की, जिसमें यह कहा 'आक्रामक व्यवहार की घटना का कारण हमेशा हताशा का होना माना गया', और यह कि ' हताशा का होना हमेशा आक्रामकता को किसी न किसी रूप में जन्म देता है। "मानव व्यवहार जटिल और बहुआयामी है; कोइ भी उत्तेजना की हमेशा एक विशिष्ट व्यवहारिक प्रतिक्रिया होगी या विशिष्ट व्यवहारिक प्रतिक्रिया से पहले वही खास उत्तेजना घटी यह कल्पना करना असामान्य और साहसी है। और, वास्तव में, डोलार्ड और उनके सहयोगि इस मत पर शुरुआत से आलोचना के लिए तैयार थे। डोलार्ड और उनके सहयोगि हताशा को इस रूप में परिभाषित करतें हैं "व्यवहार क्रम में उचित समय पर एक उकसाया लक्ष्य-प्रतिक्रिया की घटना के साथ एक हस्तक्षेप”। संभव है कि हम "उकसावे द्द्वारा लक्ष्य प्रतिक्रिया" जैसी भाषा से परिचित नहीं हो। हम आसानी से अपने संघर्षों के अनुभवों से समझ सकते है – थके हारे काम से घर आने के पश्चात भोजने ना मिलना, जिसकी वह हकदार हो वह पदोन्नति नहीं मिलना, वो बच्चा जिसे स्कूल में खेल के मैदान पर खेलने से बाहर रखा गया हो। बरकोविटज़ दो बदलने वाले व्यवधानों क्रोध और व्याख्या का इस्तेमाल करतें है। वह यह प्रस्ताव रखते है कि "हर हताशा आक्रामकता को और उकसावा प्रदान करती है और बढ़ाती है, लेकिन इस उकसावे को यहाँ क्रोध के रूप में परिभाषित किया है, और क्रोध केवल आक्रामकता को जन्म देगा "जब उपयुक्त संकेत या कारण मौजूद हौं। यहाँ, बरकोविटज़ इस बात कि अनुमति देता है व्यक्ति यह सीख लेते हैं कि क्रोध को आक्रमकता द्वारा व्यक्त करना अनुचित है और इसलिए जब हताशा का प्रोत्साहन तीव्र हो तब भी आक्रमकता की संभावना कम हो जाती है। मानविय हिंसा करने की क्षमता का प्राथमिक स्रोत कुंठा-आक्रामकता होना जान पड़ता है। जरूरी नहीं की हताशा ही हिंसा का कारण हो, कुछ व्यक्तियों के लिए लाभ की उम्मीदें हिंसा करने को प्रेरित करतीं हैं। हालांकि कारण ख्‍याल किए बिना हताशा से, प्रेरित गुस्सा, व्यक्तियों को आक्रामक होने को प्रेरित करता है, यदि कुंठा पर्याप्त रूप से लंबे समय तक रहे या तेजी से महसूस कि जाए, तो यदि निश्चित नहीं तो आक्रामकता घटित होने की काफी संभावना रहेगी। इस मायने में कुंठा-आक्रामकता की क्रियाविधि गुरुत्वाकर्षण के समरूप है: कुंठित व्यक्तियों में हिंसा करने जन्मजात प्रकृति की तीव्रता उनकी हताशा के अनुपात में होती है। कई कारण हैं जो व्यक्तियों के व्यवहार को विभिन्न परिस्थितियों में प्रभावित करतें हैं: व्यक्तियों के लिए उनके विश्वासों, आस्थओं, संकोच और सामाजिक वातावरण। वस्तुओं के लिए गुरुत्वाकर्षण, ऊर्जा और माध्यम के गुण जिसमें वे स्थित हैं। लेकिन उन व्यक्तियों के गुण के सन्दर्भ विचार करना भी कम संभव लगता है जो राजनीतिक हिंसा के लोगों को उत्तेजित करते हैं। ठीक उसी तरह जिस तरह वायुयान के निर्माण के लिए गुरुत्वाकर्षण सिद्धांत की अनदेखी करना।

सीखी हुई आक्रामकता[संपादित करें]

इस स्कूल की दलील को यह स्वीकार नहीं है कि आक्रामकता स्वाभाविक रूप से हताशा की वजह से है, बलकि आक्रामकता मोटे तौर पर एक सीखा हआ व्यवहार है। इस स्कूल के अनुयायि यह मानते हैं कि कई समाजों में आक्रामकता काफी हद तक अनुपस्थित है या आक्रामक व्यवहार नक़ल से होती है जबकी वहाँ कोई उत्तेजना निराशा नहीं है।

अल्बर्ट बानडुरा आक्रामकता के सामाजिक अधिगम सिद्धांत के एक प्रमुख शोधकर्ता, विचारक और नवोन्मेष है। उदाहरण के लिए उनके प्रयोग ने दिखाया है, कि बच्चों को जो आक्रामक वयस्क मॉडल का देखते हैं वे भी इस व्यवहार की नकल एक बिलकुल नई स्थिति में भी करते हैं। दूसरी तरफ नियंत्रित समूह के बच्चे ऐसा नहीं करते हैं, और पुन: इस ही प्रकार होगा जब मॉडल फ़िल्म पर होंगे। अल्बर्ट और वाल्टर्स इस ही तरह का अवलोकन एवं अध्ययन सामाजिक और व्यक्तित्व विकास (1963) में रिपोर्ट किया है। इस स्कूल का आक्रामकता पर सोच के निष्कर्ष को इस तरह अभिव्यक्त किया गया है: "मानव आक्रामकता एक सीखा आचरण है, जैसे कि, अन्य तरह के सामाजिक व्यवहार, उत्तेजना, सुदृढीकरण, के अंतर्गत है और संज्ञानात्मक नियंत्रण."

लोगों ने कैसे सीखा की आक्रामक नहीं होना चाहिये? पेट्रीसिया ड्रेपर द्वारा प्रस्तुत उनके विचार में एक मॉडल कुंग कालाहारी रेगिस्तान के बच्चे पालन की प्रथाओं के हैं। ड्रेपर उस पर्यावरण में जिसमें बच्चों को आक्रामक प्रतिक्रियाएं से निरुत्साहित करने के कम से कम तीन पहलुओं को इंगित करतीं हैं:

1. "जब दो छोटे बच्चे बहस या लड़ना शुरू करते हैं, वयस्क उन्हें सज़ा या, सीख नहीं देते; वे बच्चों को अलग कर प्रत्येक बच्चे को एक विपरीत दिशा में ले जाते हैं। वयस्क उनको शांत करने की कोशिश करते हैं और विचलित बच्चे को अन्य चीजों में दिलचस्पी दिखाने के लिए प्रोत्साहित करते हैं।" इसी तरह का हस्तक्षेप युक्ति द्वारा बड़े बच्चों के साथ प्रयोग किया जाता है, गुट का नेता को दूर बुला के या वयस्क बड़े बच्चों समूह में शामिल हो जाते हैं।

2. “बड़े पैमाने में वयस्क शारीरिक दंड, और आक्रमक मुद्रा उपयोग नहीं करते और वयस्क समाज द्वारा आक्रमक मुद्रा के उपयोग से परहेज व उसका अवमूल्यन किया जाए”

3. " वयस्कों के द्वारा बच्चे ke गुसे के विस्फोट की लगातार अनदेखी अगर यह नुकसान नहीं करता है तब। ऐसे समय में एक बच्चे की हताशा तीव्र, होती है, लेकिन वह सीखता है कि क्रोध का प्रदर्शन वयस्क की ध्यान या सहानुभूति प्राप्त करने के लिए नहीं है।"

जिस तरह से हताशा-आक्रामकता परिकल्पना का संशोधित संस्करण एक व्यक्ति को आक्रामकता के जवाब में मध्यस्थता करना सीखने में कुछ प्रभाव डालता है। इसलिए सामाजिक शिक्षा सिद्धांतकारों का यह मानना है कि जिस व्यक्ति आक्रामक प्रतिक्रियाओं सीखा है उस ही व्यक्ति का उन्हें इस्तेमाल करेना कि अधिक संभावना है। असल में, वे हताशा को आक्रामक व्यवहार को भड़कानेवाला एक संभवित कारण के रूप में देखते हैं, लेकिन इस बात पर जोर देते हैं कि आक्रामकता सामाजिक व्यवहार से सीखी जाती है बजाय इसके कि आक्रामकता या किसी भी अन्य प्रोत्साहन के लिए एक स्वत: प्रतिक्रिया है। अंत में, हमने समाज में अक्सर होती आक्रामकता के तीन विशिष्ट रूपों की पहचान की है। इस सदी के शुरू में आक्रामकता में एक असामान्य वृद्धि हुई है, जिस के परिणाम स्वरूप माना जा रहा है आतंकी गतिविधियों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि देखी गई है।