अहीर (आभीर) वंश के राजा, सरदार व कुलीन प्रशासक

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अहीर ('आभीर' शब्द से व्युत्पन्न)[1][2] एक विशुध्द चंद्रवंशी क्षत्रिय भारतीय जातीय समुदाय है, जो कि 'यादव' नाम से भी जाना जाता है, क्योंकि यादव व अहीर शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची माने गए हैं।[3][4]

अब तक की खोजों के अनुसार अहीर, आभीर अथवा यदुवंश का इतिहास भगवान विष्णु, अत्री, चन्द्र, तारा,बुध, इला, पुरुरवा-उर्वशी इत्यादि से सम्बद्ध है।[5] तमिल भाषा के एक- दो विद्वानों को छोडकर शेष सभी भारतीय विद्वान इस बात से सहमत हैं कि अहीर शब्द संस्कृत के आभीर शब्द का तद्भव रूप है।[6] प्राकृत-हिन्दी शब्दकोश के अनुसार भी अहीर, आभीर व विशुध्द क्षत्रिय जाति के समानार्थी शब्द हैं।[7] हिन्दी क्षेत्रों में अहीर, ग्वाला तथा यादव शब्द प्रायः परस्पर पर्यायवाची रूप में प्रयुक्त होते हैं।[8][9] वे कई अन्य नामो से भी जाने जाते हैं, जैसे [10] घोसी या घोषी अहीर,[11] तथा बुंदेलखंड में दौवा अहीर।[12] ओडिशा में गौड व गौर के नाम से जाने जाते है, छत्तिशगड में राउत व रावत के नाम से जाने जाते है। अहीरों को विभिन्न रूपों से एक जाति, एक वंश, एक समुदाय, एक प्रजाति या नस्ल तथा एक प्राचीन आदिम जाति के रूप में उल्लेखित किया गया है। उन्होंने भारत व नेपाल के अनेक भागों पर राज किया है।[13]

1200 AD मे एशिया, यादव साम्राज्य व पड़ोसी राज्य
2013 मे असीरगढ़ किला

यह महारानी अहिल्या बाई के राज्य महेश्वर के अंतर्गत आता था इसका पहले नाम खरगाव था लेकिन इन राजाओ के वंश को समाप्त होने के बाद विकास होते - होते इस जिले का नाम खरगोन पड़ा इसके पास ही 50 कि.मी. की दूरी पर रावेरखेड़ी गांव है जहाँ मराठा साम्राज्य के साशक बाजीराव पेशवा की मृत्यु हुई थी ईससे करीब 20 की.मी. की दूरी पर उन नाम का गांव है जहाँ माता लक्ष्मी का मंदिर है कहा जाता है कि यहाँ पर देवताओ द्वारा 99 यज्ञ किये गए थे यदि 100 यज्ञ हो जाते तो यह एक तीर्थ बन जाता

अनुक्रम

जम्मू व कश्मीर के अबिसार[संपादित करें]

अबिसार (अभिसार);[14][15] कश्मीर में अभीर वंश का शासक था,[16] जिसका राज्य पर्वतीय क्षेत्रों में स्थित था। डॉ॰ स्टेन के अनुसार अभिसार का राज्य झेलम व चिनाब नदियों के मध्य की पहाड़ियों में स्थापित था। वर्तमान रजौरी (राजापुरी) भी इसी में सम्मिलित था। [17][18][19] प्राचीन अभिसार राज्य जम्मू कश्मीर के पूंच, रजौरी व नौशेरा में स्थित था,[20][21][22]

रेवाड़ी राज्य, हरियाणा (प्राचीन पंजाब)[संपादित करें]

राव रूड़ा सिंह[संपादित करें]

तिजारा के एक अहीर शासक राव रूड़ा सिंह ने मुग़ल शासक हुमायूँ से रेवाड़ी के जंगलों की जागीर अपनी प्रशंसनीय सामरिक मदद के बदले में सन 1555 में हासिल की थी।[23][24][25][26] रूड़ा सिंह ने रेवाड़ी से दक्षिण पूर्व में 12 किलोमीटर दूर बोलनी गाँव को अपना मुख्यालय बनाया।[27] उन्होंने जंगलों को साफ करवा कर नवीन गावों की स्थापना की। [28][29]

राव मित्रसेन अहीर[संपादित करें]

राव मित्रसेन, राव तुलसीराम के पुत्र थे तथा चंद्रवंशी अहीर शासक थे जिन्होंने रेवाड़ी पर राज किया।[30] राव राजा मित्रसेन ने मुस्लिम आक्रमणकारियो, अंग्रेज़ो, जयपुर के कछवाहा व शेखावत राजपूत इत्यादि से युद्ध किया।[31] रेवाड़ी से बदला लेने के उद्देश्य से, सन 1781 के प्रारम्भिक महीनो में जयपुर के राजपूत शासकों ने रेवाड़ी पर हमला बोल दिया, परंतु वे राव मित्रसेन से हार गए और सामरिक दृष्टिकोण से उन्हे भारी नुकसान झेलना पड़ा।[30][32]

गुलाब सिंह[संपादित करें]

गुलाब सिंह राव मित्रसेन अहीर का पुत्र था। गुलाब सिंह ने मुनीम बेग के साथ रेवाड़ी के निकट स्वतंत्र राज्य स्थापित करने की योजना बनाई। गुलाब सिंह ने सिंधिया मराठों से लोहा लिया व 1790 में सिंधिया सेना को पराजित किया था। बाद में सिंधिया व नजफ़ कुली की संयुक्त सेना के हाथों गुलाब सिंह पराजित हुआ व उसे वापस गोकुलगढ़ भागना पड़ा।[33]

राव राम सिंह[संपादित करें]

रूड़ा सिंह के बाद, उनके पुत्र राव राम सिंह (रामोजी) ने रेवाड़ी की गद्दी को सँभाला। उनके राज्य में डाकुओं व लुटेरों के कारण भय व असंतोष का माहौल था। राम सिंह ने बोलनी में एक दुर्ग का निर्माण किया तथा सुरक्षा हेतु उसपर सैनिक तैनात किए। वह एक निडर योद्धा थे अतः एक लंबे संघर्ष के बाद अपराधियों को बेअसर करने में सफल हुये। दो मशहूर डाकुओं को गिरफ्तार करके उन्होंने सम्राट अकबर के हवाले किया। राम सिंह के इस साहसपूर्ण कार्य से प्रसन्न होकर मुग़ल सम्राट ने उन्हें दिल्ली सूबे की रेवाड़ी सरकार का फौजदार नियुक्त कर दिया। राम सिंह अकबर व जहाँगीर के काल में रेवाड़ी की गद्दी पर आसीन रहे।[25][28] सन 1785 में राव राम सिंह ने रेवाड़ी पर मराठा आक्रमण को विफल किया। राव मित्रसेन की मृत्यु के बाद मराठों ने रेवाड़ी पर पुनः आक्रमण किया परंतु वे राव राम सिंह से जीत नहीं पाये।[30] राव राम सिंह लड़ते हुये शहीद हो गए।[32]

राव शाहबाज सिंह[संपादित करें]

राव राम सिंह के बाद उनके पुत्र व उत्तराधिकारी, शाहबाज़ सिंह राजा बने, जो कि शाहजहाँ व औरंगजेब के समकालीन थे।[25] राव एक महान योद्धा थे तथा धाना के बढगुजर, हाथी सिंह नामक डाकू के साथ लड़ते हुये शहीद हो गए।[28]

राव नंदराम व राव मान सिंह[संपादित करें]

शाहबाज सिंह के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र नंदराम राजा बने।[25][28] औरंगजेब ने उनकी जागीर का हक संपादित कर उन्हें "चौधरी" के खिताब से सम्मानित किया।[34] उन्होंने अपना मुख्यालय बोलनी से रेवाड़ी में स्थानांतरित किया। रेवाड़ी में नन्द सागर नामक जल संग्राहक आज भी उनकी स्मृति का द्योतक है। भरतपुर के तत्कालीन राजा ने डाकू हाथी सिंह को अपनी सेवा में लगा लिया था, तथा हाथी सिंह की बढती हुयी शक्ति नंदराम व उनके भाई मान सिंह के लिए असहनीय थी। बाद में दोनों भाइयों ने मिलकर हाथी सिंह को आगरा में मार गिराया तथा अपने पिता की मौत का बदला लिया। नंदराम सन 1713 में मृत्यु को प्राप्त हुये तथा राज्य की बागडोर उनके ज्येष्ठ पुत्र बलकिशन को सौंपी गयी।[28]

राव बाल किशन[संपादित करें]

बालकिशन औरंगजेब की सैन्य सेवा में रहते हुये 24 फरवरी 1739 को करनाल युद्ध में नादिर शाह के विरुद्ध लड़ते हुये मारे गए। उनकी बहादुरी से खुश होकर मोहम्मद शाह ने बालकिशन के भाई गूजरमल को "राव बहादुर" का खिताब दिया तथा 5000 की सरदारी दी।[25] उनके राज्य की सीमा का विस्तार करके उसमें हिसार जिले के 52 गाँव व नारनौल के 52 गाँव जोड़े गए। उनकी जागीर में रेवाड़ी, झज्जर, दादरी, हांसी, हिसार, कनौद, व नारनौल आदि प्रमुख नगर शामिल थे। सन 1743 में 2,00,578 रुपए कि मनसबदारी वाले कुछ और गाँव भी जोड़ दिये गए।[28]

राव गुजरमल सिंह[संपादित करें]

फर्रूखनगर का बलोच राजा व हाथी सिंह का वंशज घसेरा का बहादुर सिंह दोनों राव गूजरमल के कातर शत्रु थे। बहादुर सिंह, भरतपुर के जाट राजा सूरजमल से अलग होकर स्वतंत्र शासन कर रहा था। तब राव गूजरमल ने सूरजमल के साथ मिलकर उसे मुहतोड़ जवाब दिया। गूजरमल का बहादुर सिंह के ससुर नीमराना के टोडरमल से भी मैत्रीपूर्ण सम्बंध था। सन 1750 मे, टोडरमल ने राव गूजरमल को बहादुर सिंह के कहने पर आमंत्रित किया ओर धोखे से उनका वध कर दिया। अहीर परिवार की शक्ति राव गूजरमल के समय में चरम सीमा पर थी। गुरावडा व गोकुल गढ़ के किले इसी काल की देन है। गोकुल सिक्का मुद्रा का प्रचालन इसी काल में किया गया। अपने पिता के नाम स्तूप व जलाशय का भी निर्माण गूजरमल ने करवाया था। उन्होने मेरठ के ब्रहनपुर व मोरना तथा रेवाड़ी में रामगढ़, जैतपुर व श्रीनगर गावों की स्थापना की थी।[28][35]

राव भवानी सिंह[संपादित करें]

राव गूजरमल का पूत्र भवानी सिंह उनके बाद राजा बना। भवानी सिंह आलसी ब नकारा साबित हुआ। उसके राज्य के कई हिस्सों पर फर्रूखनगर के बलोच नवाब, झज्जर के नवाब व जयपुर के राजा का कब्जा हो गया और भवानी सिंह के पास मात्र 22 गाँव ही शेष बचे। उसी के राज्य के एक सरदार ने 1758 में उसका वध कर दिया।[28]

राव तेज़ सिंह[संपादित करें]

अगला राजा हीरा सिंह भी नकारा था और राज काज का नियंत्रण एक स्थानीय व्यवसायी जौकी राम ने हथिया लिया था। दिल्ली के एक बागी सरदार नजफ़ कुली खान ने गोकुलगढ़ किले पर कब्जा जमा लिया था। दिल्ली के सम्राट शाह आलम द्वितीय ने बेगम समरू के साथ मिलकर उसे दंडित करने की ठान ली। 12 मार्च 1788 को, भाड़ावास में शाह आलम ने डेरा डेरा जमाया व रात के समय नजफ़ कुली पर हमला बोल दिया जिसमें नजफ़ कुली को भरी नुकसान पहुँचा। बेगम समरू के तोपखाने के असर से कुली खान समझौते के लिए मजबूर हो गया।[28]

जौकी राम की प्रभुता पूरे राज्य के लिए असहनीय थी। तब रेवाड़ी के राव के एक रिश्तेदार तेज़ सिंह जो कि तौरु के शासक थे, राव राम सिंह कि माता के अनुरोध पर सामने आए। उन्होंने रेवाड़ी पर हमला किया व जौकी राम को मौत के घाट उतार दिया और खुद की सत्ता स्थापित की।[28][36]

बाद में, 1803 में तेज सिंह व उनका सम्पूर्ण राज्य ब्रिटिश हुकूमत ने अपने कब्जे में ले लिया और तेज़ सिंह के पास मात्र 58 गाँव ही शेष बचे। 1823 में उनकी मौत के बाद उनकी सम्पत्ति उनके तीन पुत्रों पूरन सिंह, नाथु राम व जवाहर सिंह के हाथों में आयी। जवाहर सिंह के कोई संतान नहीं थी। पूरन सिंह व नाथु राम के बाद उनके राज्य के उत्तराधिकारी उनके पुत्र तुलाराम व गोपाल देव बने।[28]

राव तुलाराम सिंह[संपादित करें]

रेवाड़ी नरेश राव तुलाराम

राजा राव तुलाराम सिंह( 9 दिसंबर 1825 – 1863), एक अहीर शासक थे,[37][38] वह ॰हरियाणा में 1857 की स्वतन्त्रता क्रांति के प्रमुख नायक थे।[39] अस्थायी रूप से ब्रिटिश शासन की जड़ें वर्तमान के दक्षिण पश्चिम हरियाणा से उखाड़ फेकने तथा दिल्ली के क्रांतिकारियों की तन, मन, धन से मदद का श्रेय तुलाराम को ही दिया जाता है। 1857 की क्रांति के बाद उन्होंने भारत छोड़ दिया व भारत की आज़ादी के युद्ध हेतु अफगानिस्तान, ईरान के शासकों व रूस के जारों की मदद मांगी। परंतु उनकी यह योजना 23 सितम्बर 1863 में 38 वर्ष कि अल्पायु में उनकी मृत्यु के कारण असफल रही। [40]

राव गोपाल देव[संपादित करें]

राव गोपाल देव, रेवाड़ी

राव गोपाल देव रेवाड़ी में 19वी शताब्दी के क्रांतिकारी थे,[41] जिन्होंने अपने चचेरे भाई तुला राम[42] के साथ मिलकर, 1857 की क्रांति में अंग्रेज़ों से लोहा लिया।[43]

राव किशन गोपाल[संपादित करें]

राव तुला राम के अनुज राव किशन गोपाल उनकी रेवाड़ी की सेना के सेनापति थे।[28] वह ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी में भी अधिकारी थे।[44] अहीर वीर राव किशन गोपाल के नेत्रत्व में मेरठ में स्वतन्त्रता संग्राम आरंभ हुआ था तथा नसीबपुर के युद्ध में उन्होने ही जनरल टिमले को मारा था।[45]

जूनागढ़ का चूड़ासम साम्राज्य[संपादित करें]

"चूड़ासम" समुदाय मूल रूप से सिंध प्रांत के अभीर समुदाय के वंशज माने जाते हैं।[46] इस वंश के रा गृहरिपु को हेमचन्द्र रचित द्याश्रय काव्य में अभीर और यादव कहा गया है।[47]

भारतीय इतिहासकार विदर्भ सिंह के अनुसार चूड़ासम लोग सिंध प्रांत के नगर समाई के सम्मा यादवों के वंशज हैं जो संभवतः 9वी शताब्दी में सिंध से पलायन करके यहाँ आ बसे थे।[48]

हराल्ड तंब्स लीच (Harald Tambs-Lyche) का मानना है कि प्रचलित दंत कथाओं पर आधारित इस बात के साक्ष्य उपलब्ध हैं कि गुजरात के सौराष्ट्र क्षेत्र के जूनागढ़ में चूड़ासम साम्राज्य था। चूड़ासम वंश 875 CE में पारंपरिक रूप से स्थापित किया गया था और 1030 में अहीर समुदाय से मदद लेकर गुजरात के एक राजा पर विजय प्राप्त करके पुनः सत्तासीन हुआ। चूड़ासम प्रायः 'अहिरनी रानी' से भी सम्बोधित होते हैं और हराल्ड तंब्स लीच (Harald Tambs-Lyche) के विचार से- "चूडासम राज्य अहीर जाति व एक छोटे राजसी वंश के समागम से बना था जो कि बाद में राजपूतों में वर्गीकृत किया गया।" [49] इस वंश के अंतिम शासक मंडुलक चुडासम ने 1470 में महमूद बघारा के प्रभाव में इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया।[50] बघारा ने गिरनार नामक चूडासम राज्य पर कई बार आक्रमण किया था।[51]

जूनागढ़ किले में देवत बोदार का स्मारक

रा नवघन[संपादित करें]

जोहल, सोनल व देवत बोदर की रा नवघन को बचाने हेतु अपने पुत्र का वध करने का चित्रण (पेंटिंग)

'द्याश्रय' व 'प्रबंध चिंतामणि' महाकाव्यों में वामनस्थली के राजा को 'अहीर राणा' कहा गया है और चूड़ासम राजकुमार नवघन के लिए अहीर राणा शब्द का प्रयोग उचित है क्योंकि अहीरों की मदद से ही वह राजगद्दी पर आसीन हुआ था।[52][53]

रा नवघन , 1025–1044 CE में गुजरात के जूनागढ़ में वामनस्थली का चूड़ासम शासक था। वह रा दिया का पुत्र था तथा सोलंकी राजा की कैद से बचा के एक दासी ने उसे देवत बोदार अहीर को सौंप दिया था। अहीर चूडासम राजाओं के समर्थक थे, इन्हीं अहीर समर्थकों से साथ मिलकर नवघन ने सोलंकी राजा को पराजित करके वामनस्थली का राज्य पुनः हासिल किया। [54]

जूनागढ़ में रा नवघन ने कई वर्षों तक शासन किया। उसके शासन काल में ही उसकी धर्म बहन जाहल अहीर का सिंध प्रांत के हमीर सुमरो ने अपहरण कर लिया था। रा नवघन ने हमीर सुमरो को मार कर अपनी बहन की रक्षा की थी।[55] रा नवघन, रा खेंगर के पिता थे।[54] दयाश्रय व कुमार प्रबंध आदि प्रसिद्ध महाकाव्यों में रा नवघन, रा खेंगर दोनों को ही 'अहीर राणा' या 'चरवाहा राजा' के नाम से संबोधित किया गया है। [54][56][57]

आपा देवायत बोदर[संपादित करें]

रा नवघन प्रथम जूनागढ़ शासक रा दियास का पुत्र था। रा दियास सोलंकी राजा के साथ युद्ध में पराजित हुआ व मारा गया। एक साल से भी कम आयु के पुत्र रा नवघन को अकेला छोड़ कर रा दियास की पत्नी सती हो गयी। सोलंकी राजा रा दियास के पुत्र को मारना चाहता था तथा उसकी सोलंकी राजा से रक्षा हेतु रा नवघन को देवत बोदार नामक विश्वसनीय अहीर को सौप दिया गया। [58][59] देवत बोदार ने नवघन को दत्तक पुत्र स्वीकार किया व अपने पुत्र की तरह पाला पोसा। परंतु किसी धोखेबाज़ ने इसकी खबर राजा सोलंकी को दे दी और इस खबर को गलत साबित करने हेतु देवत बोदार ने अपने स्वयं के पुत्र का बलिदान देकर नवघन को बचाया। कालांतर में देवत बोदार ने सोलंकी राजा के विरुद्ध युद्ध लड़ने की ठान ली।[60] बोदार अहीरो व सोलंकी राजा के बीच घमासान युद्ध हुआ।[61][62] अंत में अहीर जीत गए और चूड़ासम वंश की पुनर्स्थापना हुयी व रा नवघन राजा बनाया गया।[54][63][64][65]

रा गृह रिपु[संपादित करें]

रा गृह रिपु एक चूड़ासम शासक था,[66] वह विश्वारह का उत्तराधिकारी था। उसके कच्छ के फूल जडेजा के पुत्र लाखा व अन्य तुर्क राजाओं से मधुर संबंध थे।[67]

गृहरिपु को द्याश्रय काव्य में अहीर व यादव के रूप में वर्णित किया गया है।[47]

पावागढ़, गुजरात[संपादित करें]

महाराष्ट्र के पवार राजपूतों के इतिहास में वर्णित है कि गुजरात के पावागढ़ में अनेक वर्षों तक यादव राजाओं का राज्य स्थापित था व मुस्लिम आक्रमण काल में, खिलजियों ने पावागढ़ के शासक यादव राजा पर आक्रमण किया था। [68]

आभीर कोट्टाराजा, गुजरात[69][संपादित करें]

वात्स्यायन के अनुसार दक्षिण पश्चिम भारत में आभीर व आंध्र वंश के लोग साथ साथ शासक थे। उन्होने गुजरात के कोट्टा के राजा, आभीर कोट्टाराजा[70] का वर्णन किया है जिसका उसके भाई द्वारा काम पर रखे गए एक धोबी ने वध कर दिया था।

"अभिराम ही कोट्टाराजम पर भाफनागतम भात्री प्रजुक्ता राजको जघाना"[71]

उदरामसर, बीकानेर[संपादित करें]

बीकानेर के महाराजा अनुपसिंह के शासन कालीन सन 1685 व 1689 के अभिलेखों में उदरामसर गाँव के अहीर वंश के सामंतों सुंदरदास व कृष्णदास के दक्षिण युद्धों में रणभूमि में मारे जाने व उनकी पत्नियों के सती होने का वर्णन है।[72]

खानदेश[संपादित करें]

खानदेश को "मार्कन्डेय पुराण" व जैन साहित्य में अहीरदेश या अभीरदेश भी कहा गया है। इस क्षेत्र पर अहीरों के राज्य के साक्ष्य न सिर्फ पुरालेखों व शिलालेखों में, अपितु स्थानीय मौखिक परम्पराओं में भी विद्यमान हैं।[73]

राजा नन्दा[संपादित करें]

नंदरबार(खानदेश) परम्पराओं में अहीर राजा नन्दा का वृतांत मिलता है जिसका तुर्कों के साथ युद्ध हुआ था। स्थानीय मुल्लाओं के पास उक्त राजा से संबन्धित अन्य विस्तृत जानकारी भी संरक्षित है तथा नंदरबार में आज भी युद्ध का स्थान देखा जा सकता है।[73]

वीरसेन अहीर[संपादित करें]

तीसरी शताब्दी के बाद खानदेश के नासिक[74] व जलगांव पर अहीर राजा वीरसेन[75] का शासन रहा है।[76] सहयाद्रि पर्वत श्रंखलाओ में, पूर्व की ओर धुले (महाराष्ट्र) में कई असामान्य नामो वाले किले हैं जैसे कि, डेरमल, गालना, पिसोल, कंकराला, लालिंगा, भामेर,सोंगिर आदि। 5वी शताब्दी में इस इलाके पर गवली राजा वीरसेन अहीर का शासन रहा था।[77] दक्षिण-पश्चिम नासिक में त्रिंबक के निकट आंजनेरी के किले में वीरसेन अहीर की राजधानी थी।[78]

असीरगढ़ का आसा अहीर[संपादित करें]

1856 मे असीरगढ़ किला

15वी शताब्दी के प्रारम्भ में असीरगढ़ के किले का निर्माण अहीर वंश के शासक आसा अहीर द्वारा कराया गया था।[79][80][81] फेरिश्ता और 'खानजादा अमीरा' के अनुसार किले का नाम असीरगढ़ आसा अहीर के नाम पर पड़ा।[82] आसा अहीर निमाड़ के असीरगढ़ का शासक था। इन्ही व्रतान्तो के अनुसार आसा अहीर बेशुमार दौलत का मालिक था।[83] और यह पहाड़ी इलाके 7 शतब्दियों से आसा अहीर परिवार के कब्जे में रहे। बाद में नासिर खान के सैनिकों ने आसा अहीर का धोखे से वध कर दिया था।[84]

प्रचलित अनुश्रुतियों के अनुसार, मालिक नासिर खान(1399-1437) का मुख्य उद्देश्य असीरगढ़ को हथियाना था। आसा अहीर पहले ही मालिक नासिर के पिता की अधीनता स्वीकार कर उसकी प्रभुता स्थापित करने में उसकी मदद कर रहा था। एक बार मालिक नासिर ने आसा को सूचना भेजी की वह मुसीबत में है अतः आसा के पास अपने परिवार के सदस्यो को हिफाजत के लिए भिजवा रहा है और आसा से उनकी रक्षा हेतु निवेदन किया। आसा ने अपने परिवार के साथ नासिर खान द्वारा भेजे गए डोलो का स्वागत किया परंतु डोलो में नासिर के परिवार की औरते नहीं, उसके सैनिक निकले जिन्होने आसा को उसके पुत्रो सहित मौत के घाट उतार दिया और असीरगढ़ किले पर कब्जा कर लिया।[85]

जावाजी व गोवाजी अहीर, थालनेर[संपादित करें]

अहीर वंश के शासन काल में गवली या अहीर राजाओं जावाजी व गोवाजी ने थालनेर की समृद्धि चरम सीमा पर पहुंचायी थी।[86]

लक्ष्मीदेव, भंभागिरि[संपादित करें]

सिंहन के अम्बा शिलालेख (1240 AD) के अनुसार,भंभागिरि के अभीर राजा लक्ष्मीदेव को परास्त कर, अहीर राजाओं की बहादुर नस्ल को मटियामेट करने का श्रेय सेनापति खोलेश्वर को जाता है।[87]

कान्ह-देव[संपादित करें]

अम्बा शिलालेख (1240 AD) में यादव राजा कान्ह-देव को 'जंगल में आग की तरह' की संज्ञा दी गयी है। साथ ही "आभीर कुल".... अपूर्ण रूप में शिलालेख में वर्णित है।[87]

नासिक (महाराष्ट्र) शिलालेखों में वर्णित अहीर शासक[संपादित करें]

महाक्षत्रप ईश्वरदत्त[संपादित करें]

डा॰ भगवान लाल के अनुसार आभीर या अहीर राजा ईश्वरदत्त उत्तर कोंकण से गुजरात में प्रविष्ट हुआ, क्षत्रिय राजा विजयसेन को पराजित करके ईश्वरदत्त ने अपनी प्रभुता स्थापित की।[88] पतंजलि के 'महाभाष्य' में अभीर राजाओं का वर्णन किया गया है। अभीर सरदार सक राजाओं के सेनापति रहे। दूसरी शताब्दी में एक अहीर राजा ईश्वरदत्त 'महाक्षत्रप' बना था। तीसरी शताब्दी में सतवाहनों के पतन में अभीरों ने प्रमुख भूमिका निभाई थी।[89]

बापक[संपादित करें]

उत्तरी कठियावाढ के ई॰ 181 के एक शिलालेख में आभीर जाति के एक सेनापति बापक व उसके पुत्र रुद्रभूति का उल्लेख मिलता है।[90]

रुद्रभूति[संपादित करें]

गुंडा के एक गुफा अभिलेख में क्षत्रप रुद्र सिंहा (181 AD) व उसके आभीर (अहीर) सेनापति रुद्रभूति का वर्णन है। सभी अभीरों के नाम ईश्वर, शिव, रुद्र आदि से प्रतीत होता है कि अभीरों का भगवान शिव से आस्थिक सम्बंध था। इसी तथ्य को लेकर 'रेगनाल्ड ई॰ एंथोवेन' ने इस मत से इंकार किया कि आभीर कृष्ण के वंशज है, क्योंकि ये दोनों देव पौराणिक प्रतिद्वंदी माने जाते हैं।[88][91] गुंडा अभिलेख में सेनपति रुद्रभूति द्वारा एक तालाब बनवाने का भी वर्णन है।[92]

ईश्वरसेन[संपादित करें]

नासिक के गुफा अभिलेख के अनुसार वहाँ ईश्वरदत्त के पुत्र अभीर राजकुमार ईश्वरसेन का शासन रहा है।[88][91] नासिक अभिलेख में ईश्वरसेन माधुरीपुत्र का उल्लेख है। ईश्वरसेन अभीर शासक ईश्वरदत्त का पुत्र था। यह राजवंश (अभीर या अहीर) 249-50 AD में प्रारम्भ हुआ था, इस काल को बाद में कलचूरी या चेदी संवत के नाम से जाना गया।[93] ईश्वरसेन (सन 1200) में एक अहीर राजा था।[94] सतपुड़ा मनुदेवी मंदिर, आदगाव एक हेमंदपंथी मंदिर है इसकी स्थापना वर्ष 1200 में राजा ईश्वरसेन ने की थी।[95] कलचूरी चेदी संवत जो कि 248 AD में प्रारभ होती हे, ईश्वरसेन ने इसकी स्थापना की थी। [96]

माधुरीपुत्र[संपादित करें]

माधुरीपुत्र यादव राजपूत वंश का एक अहीर राजा था।[97] मानव वैज्ञानिक कुमार सुरेश सिंह के अनुसार पूर्व में अहीर कहे जाने वाले राजा कालांतर में यादव राजपूतों में विलीन हो गए।[98][99]

वाशिष्ठिपुत्र[संपादित करें]

महाराष्ट्र के पुणे में प्रचलित दंत कथा के अनुसार, नाम 'वाशिष्ठिपुत्र', सतवाहन वाशिष्ठिपुत्र सतकर्णी का ध्योतक है। परंतु उसकी महाक्षत्रप की पदवी से प्रतीत होता है कि वह सतवाहन राजा नहीं था, अपितु अहीर वंश के शासक ईश्वरसेन के सिक्कों पर उसने महाक्षत्रप की उपाधि ग्रहण की हुयी है। अतः वाशिष्ठिपुत्र को सकारक अभीर वाशिष्ठिपुत्र के रूप में पहचाना जाता है।[100]

नईगांव रीवाई, बुंदेलखंड, उत्तर मध्य भारत[संपादित करें]

ठाकुर लक्ष्मण सिंह[संपादित करें]

ठाकुर लक्ष्मण सिंह मूलतः जैतपुर के एक दौवा अहीर सरदार थे, 1807 में उन्हे अंग्रेज़ी हुकूमत से बुंदेलखंड के नइगाव रिवाई इलाके पर शासन करने की सनद प्राप्त हुयी। [101]

कुँवर जगत सिंह[संपादित करें]

ठाकुर लक्ष्मण सिंह की मृत्यु के बाद उनके पुत्र कुँवर जगत सिंह 1808 में राजा बने और 1838 तक सत्तासीन रहे। 1838 में उनकी मृत्यु हो गयी।[101]

ठकुराइन लरई दुलइया[संपादित करें]

पति जगत सिंह की मृत्यु के बाद ठकुराइन लरई दुलया 1839 में सिंहासन पर आसीन हुयी। उन्हें प्रमुख शासक का दर्जा व 6 घुड़सवार, 51 पैदल सैनिक व 1 तोप का सम्मान प्राप्त था।[101] ठकुराइन लड़ई दुलईया यादव को बुंदेलखंड की सुयोग्य प्रशासिकाओं में गिना जाता है।[102]

उत्तर भारत (वर्तमान उत्तर प्रदेश व उत्तराखंड)[संपादित करें]

आदि राजा, अहिच्छत्र[संपादित करें]

सन 1430 में, 'अहिच्छत्र' पांचाल देश की राजधानी था। यहाँ के प्राचीन दुर्ग पर 'अहिच्छेत्र' व 'अहिच्छत्र' दोनों शब्द अंकित है, परंतु स्थानीय लोक कथाओ में सोते हुये अहीर राजा आदि के सिर पर नाग के फन के छत्र से यह प्रतीत होता है अहिच्छत्र सही शब्द है। इस वृहद व प्राचीन किले का निर्माण एक अहीर, आदि राजा[103] द्वारा कराया गया था। ऐसा कहा जाता है कि नाग के फन की छाया में सोते हुये आदि राजा के लिए गुरु द्रोण ने भविष्यवाणी की थी। इस किले का एक नाम 'आदिकोट' (राजा आदि का किला) भी है।[104]

भद्रसेन आभीर, मथुरा[संपादित करें]

पद्मावती के आभीर सामंत भद्रसेन ने मथुरा के कुषाण शासक दीमित पर आक्रमण कर मथुरा से उखाड़ फेंका था। 10 वर्ष के कालांतर में दीमित के पुत्र धर्मघोष ने भद्रसेन को पराजित कर पुनः कुषाण साम्राज्य स्थापित किया। मथुरा में "पंच वृष्णि वीर" मंदिर जिसे "लहुरा वीर" भी कहा जाता है, की स्थापना भी भद्रसेन ने ही कराई थी।[105]

कुलचन्द्र, मथुरा[संपादित करें]

डा॰ प्रभु दयाल मित्तल के अनुसार संवत 1074 में महमूद गजनवी ने मथुरा के यादव राजा कुलचन्द्र के खिलाफ आक्रमण किया व इस भयानक युद्ध में राजा कुलचन्द्र मारा गया। बाद में मथुरा के यादवों का नेत्रत्व कुलचन्द्र के पुत्र विजयपाल ने किया।[106]

रुद्रमूर्ति अहीर,अहिरवाड़ा[संपादित करें]

रुद्र मूर्ति अहीर झाँसी के अहिरवाड़ा इलाके का सेनापति था।[107][108]

ऐतिहासिक रूप से, अहीर बाटक (अहरोरा) व अहिरवाड़ा अहीरों द्वारा स्थापित किए गए थे। रुद्रमूर्ति अहीर, नामक सेनापति जो बाद में राजा बना तथा उसके बाद माधुरीपुत्र, ईश्वरसेन व शिवदत्त आदि मशहूर अहीर राजा हुये जो कालांतर में यादव राजपूत जाति में मिलते गए।[109]

दिलीप सिंह अहीर, अहिरवाड़ा[संपादित करें]

1720-30 में खीची चौहान राजा जयसिंह अहीरों से लडाई में मारा गया था। दिलीप सिंह अहीर, ओंदी, अहिरवाड़ा का शासक था जो 1801 में खीची चौहानों के हाथों पराजित हुआ व मारा गया था तथा ओंदी पर दुरजनसाल ने अधिकार जमा कर अपनी राजधानी बनाया व ओंदी का नाम बदलकर बहादुरगढ़ रख दिया था।[110]bharatsingh230596.bs@gmail.com Bhashkar Bharat Hindi

राजा बुध, बदायूँ[संपादित करें]

ऐसी पुष्ट मान्यता है कि बदायूं शहर की स्थापना एक अहीर राजकुमार बुध ने की थी और उसी के नाम पर शहर का नाम बदायूं पड़ा।[111][112] अहीर राजकुमार बुध ने 905 ई॰ में बदायूं शहर का निर्माण कराया व उन्ही के नाम पर शहर का नामकरण हुआ। इसका उल्लेख इस्लामी इतिहास में भी मिलता है कि 1202 ई॰ में कुतुबुद्दीन ऐबक ने बदायूं के किले को विजित किया था।[113]

महोबा के आल्हा ब ऊदल[संपादित करें]

महोबा का वीर, आल्हा

आल्हा व ऊदल, मूलतः जंगलों में पाये जाने के कारण 'बनाफर' नामित समुदाय के दसराज के पुत्र थे, दसराज चंदेल राजा परमल का सेनापति था।[114] आल्हा की माता देवकी अहीर जाति की थी। अहीर मूलतः प्राचीन कालीन चरवाहा परंपरा की किसान जाति है, जो कि राजपूत मूल्यों का अनुसरण करते हैं, परंतु जो लोग वंशानुगत लालसाओं को उपलब्धियों से बढकर मानते हैं, वे अहीरों को 'कल्पित राजपूत' कहते हैं।[115] बनाफ़रों की माता ही नहीं अपितु उनकी दादी भी बक्सर की अहीर जाति की थी।[115]

मशहूर महाकाव्य आल्हखण्ड में पृथ्वीराज चौहान के दत्तक पुत्र चौड़ा अहीर व भागलपुर के भगोला अहीर की वीरता का भी वर्णन किया गया है।[116]

राजा दिग्पाल अहीर, महाबन, मथुरा[संपादित करें]

दिग्पाल एक अहीर राजा था जिसने महाबन पर शासन किया।[117] महाबन शहर का अधिकांश भाग पहाड़ी क्षेत्र है जो कि 100 बीघा जमीन पर फैला हुआ है। यहीं पर एक प्राचीन किला है जिसका निर्माण राणा कटेरा ने कराया था। राणा कटेरा, दिग्पाल के बाद महाबन का राजा बना था।[118]

राणा कटेरा, महाबन[संपादित करें]

उत्तर प्रदेश के मैनपुरी जिले में प्रचलित परम्पराओं के अनुसार, राणा कटेरा जो कि फाटक अहीरों के पूर्वज थे, ने महाबन के किले का निर्माण कराया था। राणा कटेरा दिग्पाल अहीर के बाद महाबन के राजा बने थे। जलेसर के किले का निर्माण भी राणा कटेरा ने ही कराया था।[117][118] मुस्लिम आक्रमण के कारण चित्तौड़ से भागकर राणा कटेरा ने राजा दिग्पाल के यहाँ शरण ली थी।[119][120]

राजा डाल देव,डालमऊ (राय बरेली)[संपादित करें]

डालमऊ में गंगा किनारे राजा डाल देव का किला आज भी मौजूद है, जहाँ डाल व बाल दो भाई राज करते थे। फाल्गुन के महीने में बाल देव अत्यधिक मदिरा पान करता था। जौनपुर के शारकी राजा ने डालमऊ किले पर आक्रमण किया व डाल व बाल दोनों भाइयों का वध कर दिया। दोनों भाइयों की पत्नियों ने दैवीय शक्ति से आक्रमण के प्रत्युत्तर में शारकी राजा को मारकर अपने पतियों की मौत का बदला लिया। शारकी राजा का मकबरा भी माकनपुर में विद्यमान है।[121]

बदना अहीर, हमीरपुर[संपादित करें]

लोक कथाओं के अनुसार हमीरपुर की स्थापना राजपूत राजा हमीरदेव ने की थी, जिसने अलवर से भागकर बदना नामक अहीर के यहाँ शरण ली थी। बाद में हमीरदेव ने बदना अहीर को निष्कासित करके हमीरपुर में एक किले का निर्माण कराया।[122] बदना का नाम पड़ोस के एक गाँव बदनपुर के रूप में अब भी जीवित है जहाँ एक प्राचीन खंडहर भी विद्यमान है।

अमर सिंह, अमरिया[संपादित करें]

'उत्तर प्रदेश, गजेट्टीयर, पीलीभीत, के अनुसार अमर सिंह नमक अहीर राजा ने पीलीभीत के इलाकों पर राज किया। इस इलाके को इसके राजा अमर सिंह के नाम पर 'अमरिया' नाम से जाना जाता है।[123]

हीर चंद यादव, जौनपुर[संपादित करें]

जौनपुर के इतिहास में लिखा है कि हिन्दू शासन काल मे, जौनपुर पर अहीर राजाओं का राज था। हीर चंद यादव जौनपुर का पहला अहीर शासक था। इस वंश के शासक 'अहीर" उपनाम का प्रयोग किया करते थे। चंदवाक व गोपालपुर में अहीरों ने दुर्गों का निर्माण कराया था। ऐसा माना जाता है कि 'चौकीया देवी' के मंदिर का निर्माण कुलदेवी के रूप में अहीरों द्वारा किया गया था।[124]

सुमरा अहीर, सिकंदरा[संपादित करें]

अलीगढ़ जिले के सिकंदरा परगना में स्थित कोयल में सुमरा नामक अहीर राजा का शासन था। धीर सिंह व विजय सिंह ने कोयल पर आक्रमण किया जिसमे सुमरा अहीर परास्त हुआ। बाद में सुमरा अहीर शासित इलाके नाम बादल कर विजयगढ़ रख दिया गया।[125]

छिद्दू सिंह , भिरावटी[संपादित करें]

भिरावटी के चौधरी छिद्दू सिंह यादव को ब्रिटिश शासन काल में चार तोपों व 10,000 सैनिक सेना का अधिकार प्राप्त था।[126]

चंदा, बंदा अहीर, देओली, मैनपुरी[संपादित करें]

देओली ब्रिटिश शासन काल में इटावा के चौहान राजा के अधीन था इसका नेत्रत्व चंदा व बंदा नामक दो अहीर सरदारों के हाथ में था। इन्होने देओली को स्वायत्त अपने कब्जे में ले लिया व यहाँ एक ऊंची मीनार का निर्माण किया जिस पर मशाल जला कर वह अपने जाति भाइयों को सशस्त्र सतर्क हो जाने का संकेत दिया करते थे। बाद में चौहान राजा ने इनसे छुटकारा पाने हेतु अपनी ससुराल दिल्ली के बैस राजपूतों से मदद मांगी। भारी सैन्य बल द्वारा देओली को अहीर अधिकार से मुक्त कराया गया।[127]

रूपधनी (एटा)[संपादित करें]

नारायण सिंह[संपादित करें]

एटा जनपद की भूमि व्यवस्थापन रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटिश शासन काल में आवा के राजा पिरथी सिंह व रूपधनी के नारायण सिंह सबसे वृहद क्षेत्रों के व्यक्तिगत मालिक थे।[128]

चौधरी गजराज सिंह यादव[संपादित करें]

नारायण सिंह के वंश में बाद में रूपधनी पर चौधरी गजराज सिंह यादव, उनके बेटे चौधरी कृपाल सिंह यादव काबिज रहे।[129]

चौधरी कृपाल सिंह यादव[संपादित करें]

चौधरी कृपाल सिंह यादव, चौधरी गजराज सिंह यादव के पुत्र थे।[129]

अहि बरन, बुलंदशहर[संपादित करें]

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट 1862-1884 के अनुसार, बुलंदशहर की नींव अहीर राजा अहि बरन ने रखी थी।[130][131][132]

अहद, संकरा, बुध गंगा[संपादित करें]

बुध गंगा पर संकरा शहर की स्थापना अहद नामक अहीर राजा ने की थी। कुछ मान्यताओं के अनुसार, राजा अहद, अहिबरन व आदि नाम एक ही राजा को संबोधित करते हैं जिसने पूरे इलाके पर शासन किया था।[130][131][132]

वेन चक्रवर्ती[संपादित करें]

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की रिपोर्ट 1862-1884 के अनुसार, प्रसिद्ध पारंपरिक राजा "वेन चकवा" अथवा "वेन चक्रवर्ती" संभवतः अहीर जाति का था जिसने उत्तर भारत के कई इलाकों पर राज किया था।[130][131][132]

सभाल अहीर, रोहिला, फ़र्रुखाबाद[संपादित करें]

सभाजीत चंदेल राजपूत व भोगांव निवासी सभाल अहीर ने मिलकर किल्मापुर, मोहम्मदाबाद के पास के 27 गावों से भरों को खदेड़ कर कब्जा कर लिया था,। इनमें से 10 गावों पर चंदेल काबिज हुये व 13वीं शताब्दी तक प्रभुत्व में रहे। सहयोगी सभाल अहीर ने रोहिला पर अधिकार जमाया व पीढ़ियों तक इस क्षेत्र पर अहीरों का अधिकार रहा।[133]

शिकोहाबाद, मैनपुरी (वर्तमान फ़िरोज़ाबाद) जनपद की रियासतें[संपादित करें]

ब्रिटिश शासन काल में मैनपुरी की अनेक रियासतों पर अहीर क़ाबिज़ थे।

  • चौधरी श्याम सिंह यादव, उरावर रियासत- इन्होने वर्ष 1916 में शिकोहाबाद में अहीर कालेज की स्थापना की व कालेज के लिये अपने लगान से 700 रुपये अनुदान मंजूर किया।[129]
  • चौधरी महाराज सिंह यादव, भारौल, मैनपुरी रियासत- भारौल पर अहीरों का कब्ज़ा पूर्व से ही चला आ रहा था। 18वीं शताब्दी में अहीरों का मैनपुरी के चौहान राजा के साथ सैन्य संघर्ष भी हुआ था जिसमें अनेक अहीर चौहान सैनिकों के हाथों मारे गए।[134][135] अंततः कालांतर में अहीर विजयी हुये व मैनपुरी के राजा तेज़ सिंह चौहान को खदेड़ने में कामयाब हुये। राजा तेज सिंह को ब्रिटिश शासन के समक्ष समर्पण करना पड़ा।[136][137]
  • चौधरी प्रताप सिंह यादव, गंगा जमुनी रियासत, मैनपुरी

मैनपुरी इलाके में उपरोक्त के अलावा 19 अन्य अहीर रियासतें थीं। इन्ही अग्रणी अहीरों ने अन्य प्रदेशों के अहीर शासकों के साथ मिलकर देश के अन्य हिस्सों के पिछड़े अहीरों के उत्थान व कल्याण हेतु अखिल भारतीय यादव महासभा की स्थापना की, जिसका पहला अधिवेशन वर्ष 1912 में शिकोहाबाद में ही हुआ था।[129]

भोला सिंह यादव, नौनेर, मैनपुरी[संपादित करें]

मैनपुरी से 8 मील पश्चिम में बसे नौनेर के राजा भोला सिंह अहीर को इतिहास में आज भी याद किया जाता है। उन्होने 17वीं शताब्दी में कई कुओं व तालाबों का निर्माण कराया था। यहाँ के यादवों की लोक संस्कृति में भोला सिंह का नाम गर्व से लिया जाता है।[138] भोला सिंह के बाद नौनेर पर चौहानों का आधिपत्य स्थापित हुआ तथा बाद में नौनेर अवा के राजा ने हथिया लिया था।[139] भोला के संबंध में नौनेर में ये लोक गीत प्रसिद्ध है-

नौ सौ कुआं, नवासी पोखर, भोला तेरी अजब गढ़ी नौनेर।[140]:

नेपाली शासक[संपादित करें]

नेपाल के इतिहास में गोपाल राजवंश व अहीर राजवंश के शासन का उल्लेख किया गया है। अहीर वंश के आखिरी शासक भुवन सिंह को किरात वंश के यालम्बर ने पराजित कर नेपाल में अहीर शासन का अंत किया था।[141] "राम प्रकाश शर्मा (मिथिला का इतिहास)" के अनुसार-

नृप तृतीय आभीर पड़ा रण कर किरात से,
थी गद्दी नेपाल रिक्त नरपति निपात से,
कर प्रवेश पुर लिया विजेता ने सिंहासन,
किया वहाँ उनतीस पीढ़ियों तक था शासन।[142]

भकतामान अहीर[संपादित करें]

भक्तामन अहीर नेपाल की काठमांडू घाटी का प्रथम शासक था।[143] भक्तामन ने ही सर्वप्रथम स्वयं "गुप्त" की उपाधि धारण की। इन्होने अट्ठासी वर्ष तक राज किया। नेपाल देश का नम्म "नेपाल" इनके ही शासन काल में रखा गया था। पशुपतिनाथ मंदिर का निर्माण भी इनके ही शासन काल में हुआ। इनके वंश ने कुल पाँच सौ इक्कीस वर्ष नेपाल पर शासन किया।[144]

यक्ष गुप्त[संपादित करें]

भक्तामन नामक गोपाल वंश के राजा ने 'गुप्त' की उपाधि ग्रहण कर ली थी तथा उसने 88 वर्ष तक राज् किया। उसके बाद के सभी राजाओं ने अपने नामों के साथ 'गुप्त' उपाधि जोड़ी थी। 521 वर्ष तथा 8 पीढ़ियों तक इस वंश ने राज किया तथा यक्ष गुप्त इस वंश का अंतिम शासक हुआ जिसके पश्चात अहीर वंश का प्रादुर्भाव हुआ।[145] कहा जाता है कि यक्षगुप्त के कोई पुत्र नहीं था जो उसका उत्तराधिकारी बनता। तब भारत के मैदानी इलाके से आया हुआ एक अहीर, बारा सिंहा नेपाल का राजा बना।[146]

बारा सिंह[संपादित करें]

किराटी शासकों से पहले नेपाल पर, भारत के मैदानी इलाकों से आए बारा सिंह नाम के एक अहीर का शासन था।[147]

जयमती सिंह[संपादित करें]

जयमती सिंह, नेपाल में अहीर वंश का एक प्रमुख शासक था।[148]

भुवन सिंह[संपादित करें]

स्वामी प्रपणाचार्य के अनुसार, नेपाल पर अहीर राजवंश की 8 पीढियों ने शासन किया और भुवन सिंह (महिषपाल) इस राजवंश का आखिरी शासक था जो किराट राजा यालम्बर के हाथों पराजित हुआ था।[143][149]

मालवा तथा मध्य भारत के अन्य क्षेत्र[संपादित करें]

मालवा की समृद्धि में शताब्दियों से भागीदार रही कृषक व पशुपालक जाति आभीर या अहीर को यादव भी कहा जाता है। गुप्त काल व उससे पूर्व मालवा में अभीरों का राज्य था।[150]

पूरनमल अहीर[संपादित करें]

पूरनमल अहीर[151][152] वर्ष 1714-1716 (A.D.) में मालवा क्षेत्र का एक अहीर सरदार था।[153] 1714 में, जयपुर का राजा सवाई सिंह मालवा में व्याप्त असंतोष को काबू करने में सफल रहा था।[154] अफगान आक्रमणकरियों ने अहीर मुखिया पुरनमल की सहायता से सिरोंज पर कब्जा कर लिया था।[155] अहीर देश (अहिरवाड़ा) ने अपने मुखिया पूरनमल के नेत्रत्व में विद्रोह कर दिया और सिरोंज से कालाबाग तक का रास्ता बंद कर दिया व अपने मजबूत गढ़ो रानोड व इंदौर से अँग्रेजी हुकूमत को परेशान करना जारी रखा।[156] अप्रैल 1715 में राजा जय सिंह सिरोंज पहुंचा और अफगान सेना को पराजित किया। शांति स्थापना की यह कोशिश ज्यादा कामयाब नहीं हो सकी, नवम्बर 1715 में पूरनमल अहीर ने मालपुर में नए सिरे से लूट-पाट शुरू कर दी। रोहिला,गिरासिया, भील, अहीर व अन्य हिन्दू राजा एक साथ चारों तरफ विद्रोह के लिए खड़े हो गए। हुकूमत की कोई भी ताकत इस परिस्थिति को काबू करने में नाकाम रही।[157]

लल्ला जी पटेल[संपादित करें]

लल्ला जी पटेल, ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ मालवा में 1853 की क्रांति का अहीर जाति का एक प्रमुख नेता था। हुकूमत ने उसे बागी घोषित कर दिया था और लल्ला जी ने स्वयं को चमत्कारी राजा घोषित कर दिया था। लल्ला जी के पास 5000 पैदल सैनिकों व हजारों घुड़सवारों की सेना थी। लल्ला जी ने यह दावा भी किया था कि वह अँग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकेगा व सम्पूर्ण देश पर अपना राज स्थापित करेगा। वह ब्रिटिश हुकूमत के साथ सैन्य संघर्ष में मारा गया था।[158]

बीजा सिंह अहीर (बीजा गवली), निमाड़[संपादित करें]

नरनाल किला
पूर्व मे अहीर शासित खरगाँव का किला
बीजा सिंह अहीर (बीजा गवली) का बीजागढ़ दुर्ग, मध्य प्रदेश, भारत
गवलीगढ़ दुर्ग

बीजा गवली (बीजा सिंह अहीर)[159] चौदहवी शताब्दी में निमाड़ में काबिज रहा था। मेथ्यूज टेलर के अनुसार-

अहीर अथवा ग्वाले राजाओं ने गोंडवाना के जंगली इलाकों तथा खानदेश व बेरार भागों पर शासन किया था। असीरगढ़, गवलीगढ़,नरनाल के किले व कई पहाड़ियों पर उनका कब्जा था।[160]

इंदौर गजेटीर के अनुसार, 14वी शताब्दी में बीजा गवली निमाड़ का राजा था। "आइन-इ-अकबरी" में बीजागढ़ के खरगाव किले का उल्लेख मिलता है।[160]

15वी शताब्दी में, अनेक गवली या अहीर सरदारों ने बीजागढ़ समेत दक्षिणी निमाड़ में छोटे-छोटे राज्य स्थापित कर लिए थे। गजेटियर के अनुसार अहीरों का उद्भव विवादास्पद है परंतु अहीरों का राज निस्संदेह एक सच्चाई है।[160]

विस्वसनीय प्रचलित परम्पराओं के अनुसार चौदहवीं शताब्दी में निमाड़ के बड़े भाग पर अहीर या गवली राजाओं का शासन था। तेरहवीं या चौदहवी शताब्दी में इसी वंश के राजा बीजा ने बीजागढ़ दुर्ग का निर्माण कराया था। इन अहीर राजाओं की उत्पत्ति भ्रामक है, वह देवगिरि के यादवों या अहीरवाड़ा के अहीरों के वंशज थे।[161]

गौतमी अहीर, निमाड[संपादित करें]

मुस्लिम शासन काल से पूर्व, चौदहवीं शताब्दी में नर्मदा घाटी में मांडू व कटनेरा पर गौतमी अहीर का शासन रहा है। निमाड के पश्चिमी हिस्से बीजागढ़ राज्य में थे तथा इन पर बीजा सिंह अहीर का शासन था।[159]

देवगढ़ के अहीर सरदार रणसुर व घमसुर[संपादित करें]

गोंड आगमन से पूर्व, छिंदवाड़ा में गवली राज स्थापित था। छिंदवाड़ा के पठारों में देवगढ़, गवली राज की अखिरी गद्दी मानी जाती है। प्रचलित लोक कथाओं के अनुसार, गोंड वंश के संस्थापक जेठा ने रणसुर व घमसूर नाम के राजाओं को कत्ल करके उनके राज्य पर अधिकार जमा लिया था।[162]

केमोर या केमोरी(जबलपुर)[संपादित करें]

गोंड इतिहास में अहीरों का नाम बार-बार आता है।[163][164] मांडला, जबलपुर, होशंगाबाद, छिंदवाड़ा, सिवनी, बालाघाट, बेतूल व नागपुर के समस्त इलाके गोंड साम्राज्य के कब्जे में आ गए थे, जो कि पहले नागवंशियों, अहीर राजाओं व कुछ अन्य राजपूतों के कब्जे में थे।[165]

चूरामन अहीर[संपादित करें]

चूरामन अहीर, गोंड दुर्ग का सेनापति था जो बाद में मध्य भारत के वर्तमान जबलपुर जिले में केमोर के पास 22 गावों की रियासत का राजा बना। यह जागीर उसे गढ़ मंडला के राजा नरेन्द्र सा (A.D. 1617–1727) ने भेंट की थी।[166][167]

हमीर देव[संपादित करें]

गोंड साम्राज्य के नरेंद्र शाह के शासन काल में जबलपुर के कटंगी में एक सैनिक चौकी थी, जिसके सेनापति चूरामन अहीर की सैनिक उपलब्धियों के उपलक्ष में उसे कमोर या क्य्मोरी के पास के 22 गाँव की सनद दी गयी थी, यहाँ पर चूरामन ने सन 1722 में अपने पुत्र हमीरदेव को स्थापित किया। बाद में चूरामन ने अपना प्रभुत्व देवरी (सागर जिला) तक बढ़ा लिया था जहाँ उसने 1731 तक शासन किया। सन 1731 में नरेंद्र शाह ने देवरी चूरामन से छीन लिया था।[168]

कैमोरी में चूरामन की दस पीढ़ियों तक कब्जा बरकरार रहा।[169]

उज्जैन (अवन्ती)[संपादित करें]

प्रसिद्ध यादव समुदाय के हैहय वंश की अवन्ती शाखा के नाम पर इस राज्य का नामकरण हुआ था। बाद में अवन्ती का शासन हैहय वंश की दूसरी शाखा वितिहोत्र के हाथों में आया व 6ठी शताब्दी ईसा पूर्व में प्रद्योत वंश सत्तासीन हुआ।[170] आभीर, शक राजाओं के विश्वसनीय सेनापति थे जिनकी व्यापकता 7वीं शताब्दी ईसा पूर्व में सिंधुदेश व 6ठी शताब्दी ई॰ पू॰ में अवन्ती में वर्णित की गयी है।[171]

महासेन प्रद्योत के 23 वर्षीय शासन के बाद इस वंश में 4 राजा और हुये- पालक, विशाखयूप,आर्यक या आजक व नंदीवर्धन जिन्होने क्रमशः 25,50,21 व 20 वर्ष अवन्ती पर शासन किया। अतः पुराणों में वर्णित 138 वर्ष के प्रद्योत वंश के 5 राजाओं का शासन काल संभवतः 236-396 ई॰ पू॰ आँका गया है।[172]

आभीर पुनिका[संपादित करें]

तालजंग वितिहोत्र शासक को मारकर आभीर सेनापति पुनिका ने अपने पुत्र महासेन चंद प्रद्योत को अवन्ती का राजा बना दिया था, इसके प्रतिशोध में, कालांतर में तालजंगों ने प्रद्योत के छोटे भाई कुमारसेन का महाकाल मंदिर में वध किया था। महासेन प्रद्योत, बिंबिसार व बुद्ध का समकालीन था।[173] तिब्बती स्रोतों के अनुसार प्रद्योत वितिहोत्र राजा का पुत्र था परंतु यह सत्य प्रतीत नहीं होता क्योंकि वाण रचित हर्ष चरित में आभीर पुनिका के पुत्र प्रद्योत को पौनाकी (पुनिका का पुत्र) नाम से भी संबोधित किया गया है।[174]

महासेन प्रद्योत[संपादित करें]

महासेन प्रद्योत ने अवन्ती में प्रद्योत वंश का उदय किया। प्रद्योत ने मगध पर आक्रमण की योजना बनायी पर शायद आक्रमण नहीं किया किन्तु वह तक्षशिला के राजा पुष्कर्सारिण के साथ संघर्षरत रहा था। मगध के बिंबिसार व मथुरा के शूरसेन यादवों से उसके मधुर संबंध थे।[171] प्र्द्योत ने मथुरा से वैवाहिक संबंध भी स्थापित किये। मथुरा के तद्कालीन राजा का नाम आवंतीपुत्र इस बात का परिचायक है कि वह अवन्ती की राजकुमारी का पुत्र था।[175]

पालक व गोपाल[संपादित करें]

पालक व गोपाल प्रद्योत के पुत्र थे। पालक, गोपाल को प्रतिस्थापित कर अवन्ती का राजा बना था। परंतु वह एक क्रूर शासक साबित हुआ जिसे संभवतः गोपाल के पुत्र आर्यक ने मार कर स्वयं को राजा घोषित किया था।[171]

आर्यक[संपादित करें]

'सूद्रक' द्वारा रचित "मृच्छकटिकम्" के अनुसार, आर्यक या आजक (ऐतिहासिक नाम-इंद्रगुप्त)[176] नामक अहीर तत्कालीन राजा को मार कर उज्जैन के सिंहासन पर आसीन हुआ।[177] आर्यक को उज्जैन के तत्कालीन राजा ने बंदी बना कर कारावास में डाल दिया था, जहाँ से वह भाग निकालने में सफल हुआ। बाद में सभी विपत्तियों व विरोधों पर विजय प्राप्त कर वह स्वयं उज्जैन का राजा बना। आर्यक एक ग्वाले का पुत्र था। अहीरों को क्षत्रिय मानने के विवादित संदर्भ में यह भी दृढ़ता से कहा जाता है कि यदि वह क्षत्रिय न होता तो उन परिस्थियों में उज्जैन में उसका राजा बनाना स्वीकार ही नहीं किया जा सकता था। [178] आर्यक चूंकि राजा महासेन प्रद्योत के पुत्र गोपाल का पुत्र था अतः उसे "गोपाल पुत्र" कहा गया।[171]

ठाकुर हरज्ञान सिंह, खल्थौन, ग्वालियर[संपादित करें]

1864 में जन्मे, हिन्दू क्षत्रिय यादव जाति के ठाकुर हरज्ञान सिंह, 1883 में खल्थौन की राजगद्दी पर आसीन हुये। लगभग 8000 हिन्दू आबादी वाला उनका राज्य 5 वर्ग मील में फैला हुआ था। ठाकुर को 15 घुडसवारों व 50 पैदल सैनिकों की सेना का अधिकार प्राप्त था।[179][180]

सागर के अहीर राजा[संपादित करें]

मध्य प्रदेश के सागर का 1022 AD से पूर्व का इतिहास अज्ञात है परंतु 1022 AD के बाद के सभी ऐतिहासिक दस्तावेज़ उपलब्ध हैं। सर्वप्रथम, सागर पर अहीर राजाओं का शासन था तथा गढ़पहरा उनकी राजधानी थी। 1023 AD में राजा निहाल सिंह ने अहीर राजाओं को पराजित किया और उसके बाद उसके ही उत्तराधिकारियों ने सागर पर राज किया।[181]

पाण्डू गवली[संपादित करें]

पाण्डू गवली, देवगढ़ का शासक था, मालवा के गोंड शासक पाण्डू गवली व उसके उत्तराधिकारियों के अधीनस्थ थे। [182]

बिहार में अहीर राजा[संपादित करें]

रति राऊत, उत्तर बिहार[संपादित करें]

रति राऊत ग्वाला अहीर थे जो किसी समय उत्तर बिहार के रति परगना के प्रमुख थे। उन्हे भूमिहारों के जेठरिया समुदाय का पूर्वज बताया गया है। बिहार में बेतिया आदि कई इलाकों के राजा भूमिहारों के जेठरिया समुदाय के थे।[183]

साहाबाद[संपादित करें]

साहाबाद के शासक ईश्वर साही द्वारा एक स्थानीय अहीर राजा को हराने का वृतांत मिलता है। बाद में ईश्वर साही ने अपनी शांति व एकीकरण की नीति के तहत इस परास्त राजा को सम्मानित भी किया था।[184]

रुईदास, पटना[संपादित करें]

खारिया जन जाति के लोग मूल रूप से रुईदास, पटना में निवास करते थे। खारिया राजा मोरेंग अत्यंत धनवान व विशाल पशुधन का मालिक था। एक अहीर राजा (गोपालक) द्वारा खारिया जन जाति के लोगों व राजा मोरेंग पर आक्रमण किए जाने के कारण उन्हें वहाँ से विस्थापित होना पड़ा, बाद में यह लोग छोटा नागपुर में आ बसे।[185]

मालदा[संपादित करें]

बिहार व ओड़ीशा गजेटीर पटना के अनुसार, 18वी शताब्दी के पूर्वान्श में मालदा, राजगीर तथा आस-पास के इलाकों पर अहीर शासन स्थापित था। एक प्राचीन बाभन (भूमिहार) परिवार ने, इस इलाके पर विद्यमान अहीर शासन का अंत करके स्वयं की जमींदारी स्थापित की थी।[186]

दक्षिण भारत[संपादित करें]

वीर अझगू मुतू कोणे

वासूसेन, नागार्जुनकोंडा[संपादित करें]

भारतीय इतिहासकार उपेंद्र सिंह का मत है कि नागार्जुनकोंडा के शिलालेख में चौथी शताब्दी के अभीर राजा वासूसेन का उल्लेख है, जिसने भगवान विष्णु कि मूर्ति के स्थापना समारोह में एक यवन राजा को आमंत्रित किया था। ऐसे सभी शिलालेखों से यह प्रतीत होता है कि यवन अत्यंत दानवीर थे।[187] दक्षिण भारत के उत्तर-पश्चिम सीमा से लेकर आंध्र के गुन्टूर जनपद तक के इलाके अभीर राजा वासुसेन ने जीत लिए थे। नागार्जुकोंडा शिलालेख संभवतः 248 AD का बना माना जाता है। वासुसेन के सामन्तों की 'महग्रामिक', 'महातलवार' व 'महादण्डनायक' इत्यादि उपाधियों का उल्लेख इस शिलालेख में किया गया है।[188]

वीर अझगू मुतू कोणे[संपादित करें]

वीरन अझगू मुत्तू कोणे (1681-1739 A.D.) (जिन्हें अझगू मुत्तू कोणार व सर्वइकरार के नाम से भी जाना गया है), तिरुनेल्वेल्ली क्षेत्र के इट्टयप्पा के पोलीगर राजा इट्टयप्पा नाइकर के एक यादव सेनापति थे व तमिलनाडू के मदुरै क्षेत्र के प्रथम स्वतन्त्रता सेनानी थे जिनहोने ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के खिलाफ बगावत की थी।

सेऊना (यादव) शासक[संपादित करें]

देवगिरि किला

यदुवंशी अहीरों के मजबूत गढ़, खानदेश से प्राप्त अवशेषों को बहुचर्चित 'गवली राज' से संबन्धित माना जाता है तथा पुरातात्विक रूप से इन्हें देवगिरि के यादवों से जोड़ा जाता है। इसी कारण से कुछ इतिहासकारों का मत है कि 'देवगिरि के यादव' भी अभीर(अहीर) थे।[189][190] यादव शासन काल में अने छोटे-छोटे निर्भर राजाओं का जिक्र भी मिलता है, जिनमें से अधिकांश अभीर या अहीर सामान्य नाम के अंतर्गत वर्णित है, तथा खानदेश में आज तक इस समुदाय की आबादी बहुतायत में विद्यमान है।[191]

सेऊना राजवंश खुद को उत्तर भारत के यदुवंशी या चंद्रवंशी समाज से अवतरित होने का दावा करता है।[192][193] सेऊना मूल रूप से उत्तर प्रदेश के मथुरा से बाद में द्वारिका में जा बसे थे। उन्हें "कृष्णकुलोत्पन्न (भगवान कृष्ण के वंश में पैदा हुये)","यदुकुल वंश तिलक" तथा "द्वारवाटीपुरवारधीश्वर (द्वारिका के मालिक)" भी कहा जाता है।[194] अनेकों वर्तमान शोधकर्ता, जैसे कि डॉ॰ कोलारकर भी यह मानते हैं कि यादव उत्तर भारत से आए थे। [195] निम्न सेऊना यादव राजाओं ने देवगिरि पर शासन किया था-

  • दृढ़प्रहा [196]
  • सेऊण चन्द्र प्रथम [196]
  • ढइडियप्पा प्रथम [196]
  • भिल्लम प्रथम [196]
  • राजगी[196]
  • वेडुगी प्रथम [196]
  • धड़ियप्पा द्वितीय [196]
  • भिल्लम द्वितीय (सक 922)[196]
  • वेशुग्गी प्रथम [196]
  • भिल्लम तृतीय (सक 948)[196]
  • वेडुगी द्वितीय[196]
  • सेऊण चन्द्र द्वितीय (सक 991)[196]
  • परमदेव [196]
  • सिंघण[196]
  • मलुगी [196]
  • अमरगांगेय [196]
  • अमरमालगी [196]
  • भिल्लम पंचम [197]
  • सिंघण द्वितीय [198][199]
  • राम चन्द्र [200][201]

त्रिकुटा अभीर[संपादित करें]

त्रिकुटा राजा दाहरसेन के सिक्के. From Rapson "Catalog of Indian coin of the British Museum", 1908.

सामान्यतः यह माना जाता है कि त्रिकुटा अभीरों का एक अन्य वर्ग था।[202][203] और इसीलिए इतिहास में इन्हे अभीर - त्रिकुटा भी कहा गया है।[204] इदरदत्त, दाहरसेन व व्यग्रसेन इस राजवंश के प्रमुख राजा हुये हैं।[205] त्रिकुटाओं को उनके वैष्णव संप्रदाय के लिए जाना जाता है, जो कि खुद को हैहय वंश का यादव होने का दावा करते थे।[206] तथा दहरसेन ने अश्वमेघ यज्ञ भी किया था।[207] इसमें निम्न प्रमुख शासक हुये-

  • महाराज इंदरदत्त
  • महाराज दहरसेन
  • महाराज व्याघ्रसेन[208]

कलचूरी राजवंश[संपादित करें]

'कलचूरी साम्राज्य' का नाम 10वी-12वी शताब्दी के राजवंशों के उपरांत दो राज्यों के लिए प्रयुक्त हुआ, एक जिन्होंने मध्य भारत व राजस्थान पर राज किया तथा चेदी या हैहय (कलचूरी की उत्तरी शाखा) कहलाए। [209] और दूसरे दक्षिणी कलचूरी जिन्होंने कर्नाटक भाग पर राज किया, इन्हें त्रिकुटा-अभीरों का वंशज माना गया है।[210]

दक्षिणी कलछुरियों (1130–1184) ने वर्तमान में दक्षिण के उत्तरी कर्नाटक व महाराष्ट्र भागों पर शासन किया। 1156 और 1181 के मध्य दक्षिण में इस राजवंश के निम्न प्रमुख राजा हुये-

  • कृष्ण
  • बिज्जला
  • सोमेश्वर
  • संगमा

1181 AD के बाद चालूक्यों ने यह क्षेत्र हथिया लिया।[211] धार्मिक दृष्टिकोण से कलचूरी मुख्यतः हिन्दुओं के पशुपत संप्रदाय के अनुयाई थे।[212]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

दक्षिण भारतीय शिलालेखों मे वर्णित अभीर(अहीर)

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