अहिबरन

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अहिबरन
श्री श्री 1008 श्री अहिबरन महाराज
शासनावधि३८००. BC से ८८६ AD
पूर्ववर्तीमहाराजा श्री परमाल जी
उत्तरवर्तीमहाराजा श्री भद्रवाह जी
समाधि
बरन, उत्तर प्रदेश
संगिनीमहारानी श्रीमती वरणावती जी
घरानासूर्यवंशी
पितामहाराजा श्री परमाल जी
मातामहारानी श्रीमती भद्रावती देवी जी

महाराजा अहिबरन बरन शहरके राजा थे जिसका बर्तमान नाम बुुुुलंदशहर है। वह एक सूर्यवंशी राजा थे। वर्तमान मे बरनवालों को महाराजा अहिबरन का वंशज कहा जाता है।

जीवन परिचय[संपादित करें]

महाराज अहिबरन जी बरनवाल जाती के आदि पुरुष और शहर बरन ( बुलंदशहर ) के जन्म दाता का संक्षिप्त परिचय :-

बरनवाल जाती के आदि पुरुष महाराज अहिबरन सुर्यवंश की २१वीं पीढ़ी में होने वाले चक्रवर्ती सम्राट महाराज मान्धाता के तृतीय पुत्र राजा अम्बरिस के वंशज थे , जिन्होंने चन्द्रावती में राज्य स्थापित किया था | राजा अम्बरिस के वंशज राजा धर्मपाल की सातवी पीढ़ी में राजा समाधिर के दो पुत्र राजा गुणाधि व राजा मोहनदास हुए | मोहनदास की दशवी पीढ़ी में अग्रवाल जाती के आदि पुरुष महाराज अग्रसेन पैदा हुए और अपना अलग राज्य स्थापित किया बड़े पुत्र गुणाधि अपने प्राचीन राज्य के स्वामी रहे | उनके दो लड़के राजा धर्मदत व राजा सुभंकर थे | राजा धर्मदत की संतानों ने अपना अलग-२ राज्य स्थापित किया जिनकी संताने आजकल वैश्य राजपूत कहलाती है | इन्हीं के वंश में एतिहशिक ख्याति प्राप्त राजा हर्षवर्धन हुए थे |

भारतेंदु हरिश्चंद्र की 1871 ई० में प्रकाशित पुस्तक ‘ अग्रवालो की उत्पत्ति ‘ मे जनश्रुतियों एवं प्राचीन से संग्रहित वंशावली परम्परा का वर्णन है जिसका विशेष भाग श्री महालक्ष्मी व्रत कथा से लिया गया है | प्रस्तुत वंश परम्परा मे समाधी के दो पुत्रों यथा गुणाधीश से बरन ( बरनवालो के पूर्व पुरुष ) तथा मोहन से अग्रसेन ( अग्रवालों के पूर्व पुरुष ) कि उत्पत्ति दिखाई गयी है |


ज्येष्ठ पुत्र सुभंकर की संतान अपने पैत्रिक राज्य चन्द्रावती में राज्य करती रही | इन्हीं की संतान राजा तेंदुमल तथा इनके वंशज महाराज वाराक्ष हुए जो महाभारत के युद्ध में धर्म का पक्ष ले पांड्वो के पक्षपाती बनकर वीरगति को प्राप्त हुए | शेष लोग चन्द्रावती में तूफ़ान आ जाने के कारण चन्द्रावती छोड़कर उतर भारत चले आये | महाराज वाराक्ष के वंशजो ने हाश्तिनापूर के सम्राट की अधिन्स्थता में ‘ अहार ‘ नामक स्थान में अपने राज्य की नीव डाली | महाराज वाराक्ष की पीढ़ी में राजा परमाल हुए | राजा परमाल से महाराज अहिबरन हुए | महाराज अहिबरन का विवाह अन्तव्रेदी में इक्षुमती नदी के पशिमी भाग में स्थित वरण वृक्षों के सघन वन में निवास करने वाले खाण्डवो की पुत्री वरणावती से हुआ |

राज्याभिषेक के पश्चात् आर्य नरेश महाराज अहिबरन ने खाण्डव वन को कटवा कर ‘ वरण ‘ नाम का नगर बसाया | इक्षुमती नदी को तब से वरणावती नदी कहा जाने लगा | वरणावती नदी के पश्चिम वरण वृक्षों का सघनक्षेत्र वरणाः जनपद कहलाने लगा | इसे ही अपनी राजधानी बनाकर महाराज अहिबरन ने चन्द्रावती राज्य का विस्तार किया फिर चन्द्रावती से वरणावती तक और वर्तमान काली नदी से भद्रावती तक का क्षेत्र ‘ बरन ‘ नगर नामक राजधानी से संचालित होता था | बरनवाल वंश के अग्रज राजा परमाल ने एक नया शहर आबाद किया था जिसके अंश अबतक बुलंदशहर जेलखाने के १५०गज की दूरी पर देखे जा सकते है | काली नदी के आस पास की भूमि से वह स्थान काफी ऊँचा था अतैव साधारण जन समुदाय ने उस समय ऊँचा नगर ( कोट ) के नाम से प्रशिद्ध हो गया |

मुग़ल शासन काल में बरन शहर का फारशी नाम बुलंदशहर कर दिया गया किन्तु अदालत में आज भी बरन शहर ही लिखा जाता है | महाराज अहिबरन ने उस समय एक दुर्ग किला भी बनवाया था | जहाँ वर्तमान समय में कलेक्टर साहेब की कोठी बनी है |

शहर ‘ बरन ‘ ( बुलंदशहर ) में महाराज अहिबरन की संतानो ने 3800 सौ वर्षो तक राज्य किया | दशवीं शताब्दी के अन्त में समय ने पलटा खाया | हिन्दुओ में चहुँदिशि द्वेषानल प्रज्ज्वलित हो उठी जिसका अंतिम परिणाम हिन्दू राज्यों का पतन हुआ |मुग़ल के प्रबलय तथा तैमुर लंग द्वारा निर्ममता से बध कराये जाने एवं क्रूरतापूर्वक धर्म परिवर्तन कराये जाने से बाध्य होकर धर्म एवं मान – सम्मान की रक्षा हेतु वंश के कुछ लोगो ने अपना सर्वस्व वही छोड़कर देश के अन्य भागो में विशेषकर पूर्व की तरफ वह भी सुदूर देहाती क्षेत्रो में विस्थापित होने को विवश हुए और सब कुछ अपना छुट जाने के कारण तराजू उठाने को मजबूर होना पड़ा और इन्हें समाज द्वारा वैश्य कहा जाने लगा | अपने ही वंश के जिन लोगो ने इश्लाम धर्म को कुबूल कर लिया वे अपने को बरनि मुश्ल्मान कहते है | जिनके वंशज आज भी बुलंदशहर में देखे जा सकते है |

कुछ काल के पश्चात् शांति होने पर आस पास के छिपे बरनवाल ( बरन शहर के निवासी ) बंधु पुनः वापस चले आये और कुछ राज्य कर्मचारी बन गए तथा कुछ वाणिज्य कार्य में लग गए जिनकी एक अच्छी संख्या बुलंदशहर में है |

बुलन्दशहर के राजा[संपादित करें]

बुलन्दशहर का प्राचीन नाम बरन था। इसका इतिहास लगभग 1200 वर्ष पुराना है। इसकी स्थापना अहिबरन नाम के राजा ने की थी। बुलन्दशहर पर उन्होंने बरन टॉवर की नींव रखी थी। राजा अहिबरन ने एक सुरक्षित किले का भी निर्माण कराया था जिसे ऊपर कोट कहा जाता रहा है इस किले के चारों ओर सुरक्षा के लिए नहर का निर्माण भी था, जिसमें इस ऊपर कोट के पास ही बहती हुई काली नदी के जल से इसे भरा जाता था राजा अहिबरन ने इस सुरक्षित परकोटे में अपनी आराध्या कुलदेवी माँ काली के भव्य मंदिर की भी स्थापना की थी।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Singh, Kumar Suresh (2008). People of India, Volume 16, Part 1 (1st संस्करण). India: Anthropological Survey of India. पृ॰ 131. आई॰ऍस॰बी॰ऍन॰ 81-7046-302-5. मूल से 4 जनवरी 2014 को पुरालेखित. अभिगमन तिथि 16 मई 2011.