अवव्याख्यावाद

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डेकार्ट का दावा था कि प्राणियों को समझने के लिये उन्हें अवव्याख्यावादी विधि से मशीनों की तरह उनके अलग-अलग अंगों को समझ लेना पर्याप्त है

दर्शनशास्त्र में अवव्याख्यावाद (Reductionism) ऐसी विचारधारा होती है जो यह दावा करे कि किसी भी जटिल परिघटना को समझने के लिये केवल उस से सम्बधित सबसे सरल भौतिक भागों के गुणों व व्यवहारों की समझने की ही आवश्यकता है। मसलन अवव्याख्यावादी मनोवैज्ञानिक यह कहते हैं की समाजशास्त्र का अध्ययन काफ़ी हद तक व्यर्थ है और केवल मानवों के मस्तिष्क व मनोवैज्ञानिक गुणों के अध्ययन ही सभी समाजिक विषयों को समझने के लिए पर्याप्त है क्योंकि समाज मनुष्यों से बना हुआ होता है। अवव्याख्यावाद के विरोधी यह कहते हैं कि समाज को केवल व्यक्तियों के मनोविज्ञान से नहीं समझा जा सकता और उसके साथ-साथ समाजिक तंत्रों का भी अध्ययन करना आवश्यक है।[1][2][3][4]

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Jones, Richard H. (2013), Analysis & the Fullness of Reality: An Introduction to Reductionism & Emergence. Jackson Square Books.
  2. Laughlin, Robert (2005), A Different Universe: Reinventing Physics from the Bottom Down. Basic Books.
  3. Rosenberg, Alexander (2006), Darwinian Reductionism or How to Stop Worrying and Love Molecular Biology. University of Chicago Press.
  4. Eric Scerri The reduction of chemistry to physics has become a central aspect of the philosophy of chemistry. See several articles by this author.