अवतारवाद

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संसार के भिन्न-भिन्न देशों तथा धर्मों में अवतारवाद धार्मिक नियम के समान आदर और श्रद्धा की दृष्टि से देखा जाता है। पूर्वी और पश्चिमी धर्मों में यह सामान्यत: मान्य तथ्य के रूप में स्वीकृत किया गया है।

हिंदू धर्म में अवतारवाद[संपादित करें]

अवतारवाद की हिदू धर्म में विशेष प्रतिष्ठा है। अत्यंत प्राचीन काल से वर्तमान काल तक यह उस धर्म के आधारभूत मौलिक सिद्धांतों में अन्यतम है। 'अवतार' का शब्दिक अर्थ है - भगवान का अपनी स्वातंत्रय शक्ति के द्वारा भौतिक जगत् में मूर्तरूप से आविर्भाव होना, प्रकट होना। 'अवतार' तत्व का द्योतक प्राचीनतम शब्द 'प्रादुर्भाव' है। श्रीमद्भागवत में 'व्यक्ति' शब्द इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। (१०.२९.१४)। वैष्णव धर्म में अवतार का तथ्य विशेष रूप से महत्वशाली माना जाता है, क्योंकि विष्णु (या नारायण) के पर, व्यूह, विभव, अंतर्यामी तथा अर्चा नामक पंचरूपधारण का सिद्धांत पांचरात्र का मौलिक तत्व है। इसीलिए वैष्णवजन भगवान के इन नाना रूपों की उपासना अपनी रुचि तथा प्रीति के अनुसार अधिकतर करते हैं। शैवमत में भगवान शंकर की नाना लीलाओं का वर्णन मिलता है। (देखें, नीलकंठ दीक्षित का 'शिवलीलार्णव' काव्य) परंतु भगवान् शंकर तथा भगवती पार्वती के मूल रूप की उपासना ही इस मत में सर्वत्र प्रचलित है।

नैतिक संतुलन[संपादित करें]

'ऋत' की स्थिति रहने पर ही जगत की प्रतिष्ठा बनी रहती है और इस संतुलन के अभाव में जगत् का विनाश अवश्यंभावी है। सृष्टि के रक्षक भगवान इस संतुलन की सुव्यवस्था में सदैव दत्तचित्त रहते हैं। 'ऋत' के स्थान पर 'अनृत' की, धर्म के स्थान पर अधर्म की जब कभी प्रबलता होती है, तब भगवान का अवतार होता है। साधु का परित्राण, दुर्जन का विनाश, अधर्म का नाश तथा धर्म की स्थापना इस महनीय उद्देश्य की पूर्ति के लिए भगवान अवतार धारण कहते है। गीता का यह श्लोक अवतारवाद का महामंत्र माना जाता है (४.४):

परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्टकृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।।

परंतु ये उद्देश्य भी अवतार के लिए गौण रूप ही माने जाते हैं। अवतार का मुख्य प्रयोजन इससे सर्वथा भिन्न है। सर्वैश्यर्वसंपन्न, अपराधीन, कर्मकालादिकों के नियामक तथा सर्वनिरपेक्ष भगवान के लिए दुष्टदलन और शिष्टरक्षण का कार्य तो इतर साधनों से भी सिद्ध हो सकता है, तब भगवान के अवतार का मुख्य प्रयोजन श्रीमद्भागवत (१०.२९.१४) के अनुसार कुछ दूसरा ही है:

नृणां नि:श्रेयसार्थाय व्यक्तिर्भगवती भुवि।
अव्ययस्याप्रमेयस्य निर्गुणास्य गुणात्मन:।।

मानवों को साधन निरपेक्ष मुक्ति का दान ही भगवान के प्राकट्य का जागरूक प्रयोजन है। भगवान स्वत: अपने लीलाविलास से, अपने अनुग्रह से, साधकों को बिना किसी साधना की अपेक्षा रखते हुए, मुक्ति प्रदान करते हैं-अवतार का यही मौलिक तथा प्रधान उद्देश्य है।

पुराणों में अवतारवाद का हम विस्तृत तथा व्यापक वर्णन पाते हैं। इस कारण इस तत्व की उद्भावना पुराणों की देन मानना किसी भी तरह न्याय्य नहीं है। वेदों में हमें अवतारवाद का मौलिक तथा प्राचीनतम आधार उपलब्ध होता है। वेदों के अनुसार प्रजापति ने जीवों की रक्षा के लिए तथा सृष्टि के कल्याण के लिए नाना रूपों को धारण किया। मत्स्यरूप धारण का संकेत मिलता है शतपथ ब्राह्मण में (२.८.१। १), कूर्म का शतपथ (७.५.१.५) तथा जैमिनीय ब्राह्मण (३। २७२) में, वराह का तैत्तिरीय संहिता (७.५.१.१) तथा शतपथ (१४.१.२.११) में नृसिंह का तैत्तिरीय आरण्यक में तथा वामन का तैत्तिरीय संहिता (२.१.३.१) में शब्दत: तथा ऋग्वेद में विष्णुओं में अर्थत: संकेत मिलता है। ऋग्वेद में त्रिविक्रम विष्णु को तीन डगों द्वारा समग्र विश्व के नापने का बहुश: श्रेय दिया गया है (एको विममे त्रिभिरित् पदेभि:-ऋग्वेद १.१५४.३)। आगे चलकर प्रजापति के स्थान पर जब विष्णु में इस प्रकार अवतारों के रूप, लीला तथा घटनावैचित्रय का वर्णन वेद के ऊपर ही बहुश: आश्रित है।

भागवत के अनुसार सत्वनिधि हरि के अवतारों की गणना नहीं की जा सकती। जिस प्रकार न सूखनेवाले (अविदासी) तालाब से हजारों छोटी छोटी नदियाँ (कुल्या) निकलती हैं, उसी प्रकार अक्षरय्य सत्वाश्रय हरि से भी नाना अवतार उत्पन्न होते हैं-अवतारा हासंख्येया हरे: सत्वनिधेद्विजा:। यथाऽविदासिन: कुल्या: सरस: स्यु: सहस्रश:। पाँचरात्र मत में अवतार प्रधानत: चार प्रकार के होते हैं-व्यूह (संकर्षण, प्रद्युम्न तथा अनिरुद्ध), विभव, अंतर्यामी तथा अर्यावतार। विष्णु के अवतारों की संख्या २४ मानी जाती है (श्रीमद्भागवत २.६), परंतु दशावतार की कल्पना नितांत लोकप्रिय है जिनकी प्रख्यात संज्ञा इस प्रकार है-दो पानीवाले जीव (वनजौ, मत्स्य तथा कच्छप), दो जलथलचारी (वनजौ, वराह तथा नृसिंह), वामन (खर्व), तीन राम (परशुराम, दाशरथि राम तथा बलराम), बुद्ध (सकृप:) तथा कल्कि (अकृप:)-

वनजौ वनजौ खर्वस्त्रिरामी सकृपोऽकृप:।
अवतारा दशैवेते कृष्णास्तु भगवान स्वयम्।।

महाभारत में दशावतार में 'बुद्ध' को छोड़ दिया गया है और 'हँस' को अवतार मानकर संख्या की पूर्ति की गई है। भागवत के अनुसार 'बलराम' की दशावतार में गणना हें, क्योंकि श्रीकृष्ण तो स्वयं भगवान ठहरे। वे अवतार नहीं, अवतारी हैं; अंश नहीं, अंशी हैं। श्रीमद्भागवत के अनुसार परमेश्वर प्रकृति और प्रकृतिजन्य कार्य का नियमन प्रवर्तनादि कार्य करते हैं और माया से मुक्त रहते हुए भी माया से संबद्ध प्रतीत होते हैं एवं सर्वदा चिच्छक्तितयुक्त होकर पुरुष कहलाते हैं जिनसे भिन्न भिन्न अवतारों की अभिव्यक्ति होती है। इस प्रकार अवतारों के भेद हैं--पुरुषावतार, गुणावतार, कल्पावतार, मन्वंतरावतार, युगावतार, स्व्ल्पावतार, लीलावतारआदि। कहीं कहीं आवेशावतार आदि की भी चर्चा मिलती है, जैसे परशुराम। इस प्रकार अवतारों की संख्या तथा संज्ञा में पर्याप्त विकास हुआ है। उपर्युक्त विवेचन के आधार पर यह कहा जा सकता है कि अवतार वस्तुत: परमेश्वर का वह आविर्भाव है जिसमें वह किसी विशेष उद्देश्य को लेकर किसी विशेष रूप में, किसी विशेष देश और काल में, लोकों में अवतरण करता है।

बौद्ध तथा अन्य धर्म (पारसी, सामी, मिस्री, यहूदी, यूनानी, इसलाम)[संपादित करें]

बौद्ध धर्म के महायानपंथ में अवतार की कल्पना दृढ़ मूल है। 'बोधिसत्व' कर्मफल की पूर्णता होने पर बुद्ध के रूप में अवतरित होते हैं तथा निर्वाण की प्राप्ति के अनंतर बुद्ध भी भविष्य में अवतार धारण करते हैं यह महायानियों की मान्यता है। बोधिसत्व तुषित नामक स्वर्ग में निवास करते हुए अपने कर्मफल की परिपक्वता की प्रतीक्षा करते हैं और उचित अवसर आने पर वह मानव जगत में अवतीर्ण होते हैं। थेरवादियों में यह मान्यता नहीं है। बौद्ध अवतारतत्व का पूर्ण निदर्शन हमें तिब्बत में दलाईलामा की कल्पना में उपलब्ध होता है। तिब्बत में दलाईलामा अवलोकितेश्वर बुद्ध के अवतार माने जाते हैं। तिब्बती परंपरा के अनुसार ग्रेदैन द्रुप (१४७३ ई.) नामक लामा ने इस कल्पना का प्रथम प्रादुर्भाव किया जिसके अनुसार दलाईलामा धार्मिक गुरु तथा राजा के रूप में प्रतिष्ठित किए गए। ऐतिहासिक दृष्टि से लोजंग-ग्या-मत्सो (१६१५-१६८२ ई.) नामक लामा ने ही इस परंपरा को जन्म दिया। तिब्बती लोगों का दृढ़ विश्वास है कि दलाईलामा के मरने पर उनकी आत्मा किसी बालक में प्रवेश करती है जो उस मठ के आसपास ही जन्म लेता है। इस में अवतार की कल्पना मान्य नहीं थी। चीनी लोगों का पहला राजा शंगती सदाचार और सद्गुण का आदर्श माना जाता था, परंतु उसके ऊपर देवत्व का आरोप कहीं भी नहीं मिलता।

पारसी धर्म में अनेक सिद्धांत हिंदुओं और विशेषत: वैदिक आर्यों के समान हैं, परंतु यहाँ अवतार की कल्पना उपलब्ध नहीं है। पारसी धर्मानुयायियों का कथन है कि इस धर्म के प्रौढ़ प्रचारक या प्रतिष्ठापक जरथुस्त्र अहुरमज्द के कहीं भी अवतार नहीं माने गए हैं। तथापि ये लोग राजा को पवित्र तथा दैवी शक्ति से संपन्न मानते थे। 'ह्रेनारह' नामक अद्भूत तेज की सत्ता मान्य थी, जिसकाप निवास पीछे अर्दशिर राजा में तथा सस्नवंशी राजाओं में था, ऐसी कल्पना पारसी ग्रंथों में बहुश: उपलब्ध है। सामी (सेमेटिक) लोगों में भी अवतारवाद की कल्पना न्यूनाधिक रूप में विद्यमान है। इन लोगों में राजा भौतिक शक्ति का जिस प्रकार चूडांत निवास था उसी प्रकार वह दैवी शक्ति का पूर्ण प्रतीक माना जाता था। इसलिए राजा को देवता का अवतार मानना यहाँ स्वभावत: सिद्ध सिद्धांत माना जाता था। प्राचीन बाबुल (बेबिलोनिया) में हमें इस मान्यता का पूर्ण विकास दिखाई देता है। किश का राजा 'उरुमुश' अपने जीवनकाल में ही ईश्वर का अवतार माना जाता था। नरामसिन नामक राजा अपने में देवता का रक्त प्रवाहित मानात था इसलिए उसने अपने मस्तक पर सींग से युक्त चित्र अंकित करवा रखा था। वह 'अक्काद का देवता' नाम से विशेष प्रख्यात था।

मिस्री मान्यता भी कुछ ऐसी ही थी। वहाँ के राजा 'फराऊन' नाम से विख्यात थे जिन्हें मिस्री लोग दैवी शक्ति से संपन्न मानते थे। मिस्रनिवासी यह भी मानते थे कि 'रा' नामक देवता रानी के साथ सहवास कर राजपुत्र को उत्पन्न करता है, इसीलिए वह अलौकिक शक्तिसंपन्न होता है। यहूदी भी ईश्वर के अवतार मानने के पक्ष में हैं। बाइबिल में स्पष्टत: उल्लेख है कि ईश्वर ही मनुष्य का रूप धारण करता है और इसके पर्याप्त उदाहरण भी वहाँ उपलब्ध होते हैं। यूनानियों में अवतार की कल्पना आर्यो के समान नहीं थी परंतु वीर पुरुष विभिन्न देवों के पुत्ररूप माने जाते थे। प्रख्यात योद्धा हरक्यूलीज ज्यूस का पुत्र माना जाता था, लेकिन देवता के मनुष्यरूप में पृथ्वी पर जन्म लेने की बात यूनान में मान्य नहीं थी।

इसलाम के शिया संप्रदाय में अवतार के समान सिद्धांत का प्रचार है। शिया लोगों की यह मान्यता कि अली (मुहम्मद साहब के चचेरे भाई) तथा फ़ातिमा (मुहम्मद साहब की पुत्री) के वंशजों में ही धर्मगुरु (खलीफ़ा) बनने की योग्यता विद्यमान है, अवतार के पास तक पहुँचती है। 'इमा' की कल्पना में भी यह तथ्य जागरूक जा सकता है। वे मुहम्मद साहब के वंशज ही नहीं, प्रय्तुत उनमें दिव्य ज्योंति की भी सत्ता है और उनकी श्रेष्ठता का यही कारण है।[1][2] [3]

ईसाई धर्म[संपादित करें]

आधारभूत विश्वास है कि ईश्वर मनुष्य जाति के पापों का प्रायश्चित्त करने तथा मनुष्यों को मुक्ति के उपाय बताने के उद्देश्य से ईसा में अवतरित हुआ।

बाइबिल के निरीक्षण से पता चलता है कि किस प्रकार ईसा के शिष्य उनके जीवनकाल में ही धीरे-धीरे उनके ईश्वरत्व पर विश्वास करने लगे। इतिहास इसका साक्षी है कि ईसा के मरण के पश्चात् अर्थात् ईसाई धर्म के प्रारंभ से ही ईसा को पूर्ण रूप से ईश्वर तथा पूर्ण रूप से मनुष्य भी माना गया है। इस प्रारंभिक अवतारवादी विश्वास के सूस्रीकरण में उत्तरोत्तर स्पष्टता आती गई है। वास्तव में अवतारवाद का निरूपण विभिन्न-विभिन्न भ्रांत धारणाओं के विरोध से विकसित हुआ। उस विकास के सोपान निम्नलिखित हैं:

(१) बाइबिल में अवतारवाद का सुव्यवस्थित प्रतिपादन नहीं मिलता, फिर भी इसमें ईसाई अवतारवाद के मूलभूत तत्व विद्यमान हैं। एक ओर, ईसा का वास्तविक मनुष्य के रूप में चित्रण हुआ है-उनका जन्म और बचपन, तीस वर्ष की उम्र तक बढ़ई की जीविका, दु:खयोग और मरण, यह सब ऐसे शब्दों में वर्णित है कि पाठक के मन में ईसा के मनुष्य होने के विषय में संदेह नहीं रह जाता। दूसरी ओर, ईसा ईश्वर के अवतार के रूप में भी चित्रित हैं। तत्संबंधी शिक्षा समझने के लिए ईश्वर के स्वरूप के विषय में बाइबिल की धारणा का परिचय आवश्यक है। इसके अनुसार एक ही ईश्वर में, एक ही ईश्वरी तत्व में तीन व्यक्ति हैं-पिता, पुत्र और आत्मा; तीनों समान रूप से अनादि और अनंत हैं (विशेष विवरण के लिए देखिए, 'त्रित्व')। बाइबिल में इसका अनेक स्थलों पर स्पष्ट शब्दों में उल्लेख हुआ है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, जो पिता की भांति पूर्ण रूप से ईश्वरीय है।

(२) प्रथम तीन शताब्दियों में बाइबिल के इस अवतारवाद के विरुद्ध कोई महत्वपूर्ण आंदोलन उत्पन्न नहीं हुआ। अनेक भ्रांत धाराणाओं का प्रवर्तन अवश्य हुआ था, किंतु उनमें से कोई भी धारण आधिक समय तक प्रचलित नहीं रह सकी। प्रथम शताब्दी में दो परस्पर विरोधी वादों का प्रतिपादन किया गया था-एबियोनितिस्म के अनुसार ईसा ईश्वर नहीं थे और दोसेतिस्म के अनुसार वह मनुष्य नहीं थे। दोसेतिस्म का अर्थ है प्रतीयमानवाद, क्योंकि इस वाद के अनुसार ईसा मनुष्य के रूप में दिखाई तो पड़े, किंतु उनकी मानवता वास्तविक ने होकर प्रतीयमान मात्र थी। उक्त मतों के विरोध में काथलिक धर्मतत्वज्ञ बाइबिल के उद्धरण देकर प्रमाणित करते थे कि ईसाई धर्म के सही विश्वास के अनुसार ईसा में ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों ही विद्यमान थे।

(३) चौथी शताब्दी ई. में आरियस ने त्रित्व और अवतारवाद के विषय में एक नया मत प्रचलित करने का सफल प्रयास किया जिससे बहुत समय तक समस्त ईसाई संसार में अशांति व्याप्त रही। आरियस के अनुसार ईश्वर का पुत्र तो ईसा में अवतरित हुआ किंतु पुत्र ईश्वरीय न होकर पिता की सृष्टि मात्र है (देखिए, 'अरियस')। इस शिक्षा के विरोध में ईसाई गिरजे की प्रथम महासभा ने घोषित किया-पिता और पुत्र तत्वत: एक हैं अर्थात् दोनों समान रूप से ईश्वर हैं। इस महासभा का आयोजन ३२५ ई. में निसेया नामक नगर में हुआ था।

(४) आरियस के बाद अपोलिनारिस ने ईसा के अपूर्ण मनुष्यत्व का सिद्धांत प्रतिपादित किया। उनके अनुसार ईसा के मानव शरीर तथा प्राणधारी जीव (ऐनिमल सोल) था, किंतु उनके बुद्धिसंपन्न आत्मा (रैशनल सोल) नहीं थी; ईश्वर का पुत्र मानवीय आत्मा का स्थान लेता था। कुस्तुंतुनिया की महासभा ने ३८१ ई. में अपोलिनारस के विरुद्ध घोषित किया कि ईसा के वास्तविक मानव शरीर में एक बुद्धिसंपन्न वास्तविक मानवीय आत्मा विद्यमान थी।

(५) पाँचवीं शताब्दी में कुस्तुंतुनिया के बिशप नेस्तोरियस ने अवतारवाद संबंधी एक नई धारणा का प्रचार किया जिसके फलस्वरूप काथलिक गिरजे की तृतीय महासभा का आयोजन एफेसस में ४३१ ई. में हुआ था। नेस्तोरियस के अनुसार ईसा में दो व्यक्ति विद्यमान थे-एक मानव व्यक्ति था और एक ईश्वरीय व्यक्ति (ईश्वर का पुत्र), जो ईश्वरीय स्वभाव से संपन्न था। अत: ईश्वर मनुष्य नहीं बना प्रत्युत उसने एक स्वत:पूर्ण मनुष्य में निवास किया है। एफेसस की महासभा ने नेस्तोरियस को पदच्युत किया तथा उनकी शिक्षा के विरोध में घोषित किया कि ईसा में केवल एक ही व्यक्ति अर्थात् ईश्वर का पुत्र विद्यमान है। अनादिकाल से ईश्वरीय स्वभाव से संपन्न होकर ईश्वर के पुत्र ने मानवीय स्वभाव (शरीर और आत्मा) को अपना लिया और इस प्रकार एक ही व्यक्ति में ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों का संयोग हुआ।

(६) नेस्तोरियस के मत के प्रतिक्रियास्वरूप कुछ विद्वानों ने ईसा में न केवल एक ही व्यक्ति प्रत्युत एक ही स्वभाव भी मान लिया है। इस वाद का नाम मोनोफिसितिस्म अर्थात् एकस्वभाववाद है; यूतिकेस इसका प्रवर्त्तक माना जाता है। इस वाद के अनुसार अवतरित होने के पश्चात् ईसा का ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों इस प्रकार एक हो गए कि एक नया स्वभाव, एक नवीन तत्व उत्पन्न हुआ, जो न पूर्ण रूप से ईश्वरीय और न पूर्णरूप से मानवीय था। दूसरों के अनुसार ईसा का मनुष्यत्व उनके ईश्वरत्व में पूर्णतया लीन हो गया जिससे ईसा में ईश्वरीय स्वभाव मात्र शेष रहा। इस एकस्वभाववाद के विरुद्ध चतुर्थ महासभा (कालसेदोन, ४५९ ई.) ने परंपरागत अवतारवाद की पूर्ण रक्षा करते हुए ठहराया कि ईसा में ईश्वरत्व और मनुष्यत्व दोनों अक्षुण्ण और पृथक् हैं।

(७) बाद में एकस्वभाववाद का परिवर्तित रूप प्रचलित हुआ। यह नया वाद ईसा का ईश्वरत्व तथा मनुष्यत्व दोनों को स्वीकार करते हुए भी मानता था कि उनका मनुष्य पूर्णतया निष्क्रिय था, यहाँ तक कि उसमें मानवीय इच्छाशक्ति का भी अभाव था। ईसा का समस्त कार्य कलाप उनकी ईश्वरीय इच्छाशक्ति से प्रेरित था। इस मत के विरोध में कुस्तुंतुनिया की एक नई महासभा ने ६८० ई. ईसा का पूर्ण मनुष्यत्व प्रतिपादित करते हुए घोषित किया कि ईसा में ईश्वरीय इच्छाशक्ति तथा कार्यकलाप के अतिरिक्त एक मानवीय इच्छशक्ति तथा कार्यकलाप का पृथक् अस्तित्व था।

(८) इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रारंभिक अवतारवादी विश्वास की पूर्ण रक्षा करते हुए इसके सैद्धांतिक सूत्रीकरण का शताब्दियों तक विकास होता रहा। अंततोगत्वा यह माना गया कि ईश्वर के पुत्र ने पूर्णतया ईश्वर रहते हुए मनुष्यत्व अपना लिया है, अत: एक ही ईश्वरीय व्यक्ति में दो स्वभावों का-ईश्वरत्व और मनुष्यत्व का संयोग हुआ। उनका मनुष्यत्व वास्तविक और पूर्ण था-एक ओर उनका शरीर और उसका दु:ख वास्तविक था, दूसरी ओर उनकी मानवीय आत्मा की अपनी बुद्धि तथा इच्छाशक्ति का पृथक् अस्तित्व और सक्रियता थी। ईसाई अवतारवाद की प्राय: इन्कार्नेशन' कहा जाता है; वास्तव में यह ईश्वर द्वारा मनुष्यत्व का ग्रहण ही है। उसका मानव रूप में प्रादुर्भाव।

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Abdul Haq Vidyarthi, “Muhammad in World Scriptures,” Adam Publishers, 1990. (includes chapters on Zoroastrian and Hindu Scriptures)
  2. A.H.Vidyarthi and U. Ali, “Muhammad in Parsi, Hindu & Buddhist Scriptures,” IB.
  3. "Muhammad in Hindu scriptures". Milli Gazette. http://www.milligazette.com/Archives/2005/01-15Feb05-Print-Edition/011502200574.htm. अभिगमन तिथि: 2014-11-06. 

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • भांडारकर : वैष्णाविज्म, शैविज्म ऐंड माइनरसेक्ट्स, पूना १९२८;
  • गोपीनाथ कविराज : भक्तिरहस्य नामक लेख ('कल्याण, हिंदू संस्कृति अंक);
  • बलदेव उपाध्याय : भागवत संप्रदाय, काशी, १९५३;
  • मुंशीराम शर्मा: भक्ति का विकास, काशी, १९५८
  • बार्थ: रिलिजन्स ऑव इंडिया, लंदन, १८९१;
  • वोडेल: बुद्धिज्म ऑव तिब्बत;
  • वीडेमन: दी एनशैंट इजिप्शियन डॉक्टिन ऑव दि इम्मार्टेलिटी ऑव सोल
  • डब्ल्यूं. ड्रम : क्रिस्टोलाजी (एनसइक्लोपीडिया अमेरिकाना);
  • दि बिगिनिंग्ज़ ऑव क्रिश्चियानिटी, १९१६;
  • एस. माइकेल : इनकार्नेशन (डिक्शनरी ऑव थियोलाजी कैथोलिन)

इन्हें भी देखें[संपादित करें]