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अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया

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अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया
जन्मअज्ञात
निधन995 ई॰ (385 हिजरी)
काहिरा, मिस्र
जीवनसंगीख़लीफ़ा अल-मुइज़ ली-दीन अल्लाह
संतानख़लीफ़ा अल-अज़ीज़ बिल्लाह
धर्मइस्लाम (शिया इस्माइली)

अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया (अरबी: السيدة المعزية; निधन: 995 ई॰) फ़ातिमी ख़िलाफ़त (Fatimid Caliphate) के इतिहास में एक अत्यंत प्रभावशाली, धनी और प्रमुख महिला थीं। वे चौथे फ़ातिमी ख़लीफ़ा अल-मुइज़ ली-दीन अल्लाह की सम्मानित पत्नी और पाँचवें ख़लीफ़ा अल-अज़ीज़ बिल्लाह की माता थीं। मिस्र में फ़ातिमी साम्राज्य के प्रारंभिक विकास, उसकी सांस्कृतिक समृद्धि और वास्तुकला के संरक्षण में उनका योगदान अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। मध्यकालीन इस्लामी इतिहास में उन्हें शाही महिलाओं के सशक्तिकरण और कला के विकास का एक प्रमुख प्रतीक माना जाता है।[1]

प्रारंभिक जीवन और राजनीतिक उत्कर्ष

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ऐतिहासिक दस्तावेज़ों और स्रोतों में अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया को 'दुरज़ान' (Durzan) और 'तगरीद' (Taghrid) जैसे अन्य नामों से भी जाना जाता है। विद्वानों के अनुसार, वे मूल रूप से शाही दरबार में एक उपपत्नी (Concubine) के रूप में आई थीं। हालाँकि, अल-मुइज़ के उत्तराधिकारी और भविष्य के ख़लीफ़ा, अल-अज़ीज़ बिल्लाह को जन्म देने के पश्चात्, शाही परिवार में उनके सम्मान और अधिकार में अभूतपूर्व वृद्धि हुई।[2]

दसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में, जब ख़लीफ़ा अल-मुइज़ ने अपनी राजधानी को उत्तरी अफ़्रीका (इफ़रीकिया) से नव-स्थापित शहर काहिरा (Cairo) में स्थानांतरित करने का ऐतिहासिक निर्णय लिया, तो अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया भी उस विशाल शाही काफिले का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा थीं। मिस्र में बसने के बाद, उन्होंने राज्य की राजनीति और संस्कृति में एक सक्रिय भूमिका निभानी प्रारंभ कर दी।

वास्तुकला का संरक्षण और कराफ़ा मस्जिद

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अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया का सबसे बड़ा और स्थायी ऐतिहासिक योगदान इस्लामी वास्तुकला (Islamic Architecture) के क्षेत्र में उनके द्वारा दिया गया संरक्षण है। उन्होंने काहिरा के प्रसिद्ध 'कराफ़ा' (Qarafa) कब्रिस्तान क्षेत्र में एक अत्यंत विशाल और भव्य मस्जिद का निर्माण करवाया था, जिसे 'कराफ़ा मस्जिद' (Mosque of the Qarafa) के नाम से जाना जाता है।[3][4]

यह वास्तुकला केवल एक इबादतगाह तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह एक विशाल परिसर था जिसमें सुंदर शाही उद्यान, फव्वारे, एक मंडप और स्वयं उनके लिए एक शाही निवास स्थान शामिल था। उनके इस दूरदर्शी कदम ने कराफ़ा क्षेत्र को केवल एक कब्रिस्तान से बदलकर मिस्र के निवासियों के लिए एक प्रमुख सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र बना दिया।[5] उनके इस भव्य निर्माण कार्य ने फ़ातिमी साम्राज्य की शाही महिलाओं के लिए एक नया मार्ग प्रशस्त किया। उन्होंने यह प्रमाणित किया कि शाही महिलाएँ भी अपने स्वतंत्र आर्थिक संसाधनों का उपयोग करके कला और वास्तुकला की महान संरक्षक (Patron) बन सकती हैं।[6][7]

संपत्ति, प्रभाव और अंतिम वर्ष

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अपने पुत्र ख़लीफ़ा अल-अज़ीज़ बिल्लाह के शासनकाल (975–996 ई॰) के दौरान, अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया का राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव अपने चरम पर था। वे एक अत्यंत कुशाग्र और दूरदर्शी महिला थीं। यद्यपि वे पर्दे के पीछे से कार्य करती थीं, परंतु राज्य के कई महत्त्वपूर्ण मामलों में उनके पुत्र द्वारा उनकी सलाह को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाती थी। ऐतिहासिक प्रमाण दर्शाते हैं कि उनके पास अपार संपत्ति और व्यक्तिगत धन था, जिसे उन्होंने अत्यंत बुद्धिमत्ता के साथ प्रबंधित किया।[8]

अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया का निधन 995 ई॰ (385 हिजरी) में काहिरा में हुआ। उनका निधन फ़ातिमी साम्राज्य के लिए एक बड़ी क्षति थी। ख़लीफ़ा अल-अज़ीज़ बिल्लाह ने अपनी माता के सम्मान में एक अत्यंत विशाल और भव्य अंतिम संस्कार का आयोजन किया था।[9] उन्हें उसी कराफ़ा कब्रिस्तान में अत्यंत सम्मान के साथ दफ़नाया गया, जहाँ उन्होंने वह प्रसिद्ध मस्जिद बनवाई थी।[10]

उनकी मृत्यु के पश्चात्, उनके द्वारा छोड़ी गई विपुल संपत्ति (जिसमें बड़ी मात्रा में स्वर्ण दीनार, बहुमूल्य रत्न, आभूषण, शाही वस्त्र और हज़ारों दास शामिल थे) उनके पुत्र को विरासत में प्राप्त हुई। इस विशाल संपत्ति ने फ़ातिमी राज्य के खजाने को और अधिक समृद्ध कर दिया।[11] अल-सय्यिदा अल-मुइज़िया द्वारा स्थापित की गई शक्तिशाली और स्वतंत्र महिला की इस परंपरा का अनुसरण भविष्य में 'सित्त अल-मुल्क' (Sitt al-Mulk) जैसी अन्य महान फ़ातिमी रानियों ने भी किया।

सन्दर्भ

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  1. "Splendour of Fatimid architectural legacy in Egypt remains vibrant". the.ismaili (अंग्रेज़ी भाषा में). अभिगमन तिथि: 2026-03-21.
  2. Hasan, Masudul; Waheed, Abdul (1974). An Introduction to the Study of Islam: 1001 Questions & Answers (अंग्रेज़ी भाषा में). Ferozsons.
  3. Bloom, Jonathan M. (1986). "THE MOSQUE OF THE QARAF A IN CAIRO". Muqarnas Online. 4 (1): 7–20. डीओआई:10.1163/22118993-90000205. आईएसएसएन 0732-2992.
  4. Bloom, Jonathan M. (2007). Arts of the City Victorious: Islamic Art and Architecture in Fatimid North Africa and Egypt (अंग्रेज़ी भाषा में). Yale University Press. ISBN 978-0-300-13542-8.
  5. Grabar, Oleg (1987). Muqarnas: An Annual on Islamic Art and Architecture (अंग्रेज़ी भाषा में). BRILL. ISBN 978-90-04-08155-0.
  6. Reassessing the Roles of Women as 'Makers' of Medieval Art and Architecture (अंग्रेज़ी भाषा में). BRILL. 2012-05-07. ISBN 978-90-04-22832-0.
  7. Cortese 2006, p. 167.
  8. Pomerantz & Shahin 2015, p. 99.
  9. Bloom, Jonathan M. (1983). "The Mosque of al-Ḥākim in Cairo". Muqarnas. 1: 15. डीओआई:10.2307/1523069.
  10. Cortese 2006, p. 168.
  11. Pomerantz & Shahin 2015, p. 100.

ग्रंथ सूची

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विस्तृत पठन

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