अरुंधती

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

सन्ध्या ब्रह्मा की मानस पुत्री थी जो तपस्या के बल पर अगले जन्म में अरुन्धती के रूप में महर्षि वसिष्ठ की पत्‍‌नी बनी। वह तपस्या करने के लिये चन्द्रभाग पर्वत के बृहल्लोहित नामक सरोवर के पास सद्गुरु की खोज में घूम रही थी। सन्ध्या की जिज्ञासा देखकर महर्षि वसिष्ठ वहाँ प्रकट हुए और सन्ध्या से पूछा- कल्याणी! तुम इस घोर जंगल में कैसे विचर रही हो, तुम किसकी कन्या हो और क्या करना चाहती हो? सन्ध्या कहने लगी- भगवन्! मैं तपस्या करने के लिये इस सूने जंगल में आयी हूँ। अब तक मैं बहुत उद्विगन् हो रही थी कि कैसे तपस्या करूँ, मुझे तपस्या मार्ग मालूम नहीं है। परन्तु अब आपको देखकर मुझे बडी शान्ति मिली है। वसिष्ठ जी ने कहा- तुम एकमात्र परम ज्योतिस्वरूप, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष के दाता भगवान विष्णु की आराधना करके ही अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकती हो। सूर्यमण्डल में शंख-चक्र-गदाधारी चतुर्भुज वनमाली भगवान विष्णु का ध्यान करके ॐ नमो वासुदेवाय ॐ इस मन्त्र का जप करो और मौन रहकर तपस्या करो। पहले छ: दिन तक कुछ भी भोजन मत करना, केवल तीसरे दिन रात्रि में एवं छठे दिन रात्रि में कुछ पत्ते खाकर जल पी लेना। उसके पश्चात् तीन दिन तक निर्जल उपवास करना और फिर रात्रि में भी पानी मत पीना। भगवान तुम पर प्रसन्न होंगे और शीघ्र ही तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करेंगे। इस प्रकार उपदेश करके महर्षि वसिष्ठ अन्तर्धान हो गये और वह भी तपस्या की पद्धति जानकर बडे आनन्द के साथ भगवान की पूजा करने लगी। इस प्रकार बराबर चार युग तक उसकी तपस्या चलती रही।

भगवान् विष्णु उसकी भावना के अनुसार रूप धारण करके उसकी आँखों के सामने प्रकट हुए। गरुडपर सवार अपने प्रभु की मनोहर छवि देखकर वह सम्भ्रम के साथ उठ खडी हुई और क्या कहूँ? क्या करूँ? इस चिन्ता में पड गयी। उसकी स्तुति करने की इच्छा जानकर भगवान ने उसे दिव्य ज्ञान, दिव्य दृष्टि एवं दिव्य वाणी प्रदान की। अब वह भगवान की स्तुति करने लगी। स्तुति करते-करते वह भगवान के चरणों पर गिर पडी। भगवान को बडी दया आयी और उन्होंने अमृतवर्षिणी दृष्टि से उसे हृष्ट-पुष्ट कर दिया तथा वर माँगने को कहा। सन्ध्या ने कहा- भगवन्! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो कृपा करके पहला वर तो यह दें कि संसार में पैदा होते ही किसी प्राणी के मन में काम के विकार का उदय न हो, दूसरा वर यह दीजिये कि मेरा पातिव्रत्य अखण्ड रहे और तीसरा यह कि मेरे भगवत्स्वरूप पति के अतिरिक्त और कहीं भी मेरी सकाम दृष्टि न हो। जो पुरुष मुझे सकाम दृष्टि से देखे वह पुरुषत्वहीन अर्थात नपुंसक हो जाये। भगवान ने कहा कि चार अवस्थाएँ होती हैं-बाल्य, कौमार्य, यौवन और बुढापा। इनमें तीसरी अवस्था अथवा दूसरी अवस्था के अन्त में लोगों में काम उत्पन्न होगा। तुम्हारी तपस्या के प्रभाव से आज मैंने यह मर्यादा बना दी कि पैदा होते ही कोई प्राणी कामयुक्त नहीं होगा। त्रिलोकी में तुम्हारे सतीत्व की ख्याति होगी अैार तुम्हारे पति के अतिरिक्त जो भी तुम्हें सकाम दृष्टि से देखेगा वह तुरन्त नपुंसक हो जायगा। तुम्हारे पति बडे भाग्यवान्, तपस्वी, सुन्दर और तुम्हारे साथ ही सात कल्पतक जीवित रहनेवाले होंगे। तुमने मुझसे जो वर माँगे थे वे दे दिये। अब जो तुम्हारे मन में बात है वह बताता हूँ। तुमने पहले आग में जलकर शरीर त्याग करने की प्रतिज्ञा की थी सो यहीं चन्द्रभागा नदी के किनारे महर्षि मेधातिथि बारह वर्ष का यज्ञ कर रहे हैं, उसी में जाकर शीघ्र ही अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो, वहाँ ऐसे वेश से जाओ कि मुनिलोग तुम्हें देख न सकें। मेरी कृपा से तुम अगिन्देव की पुत्री हो जाओगी। जिसे तुम पति बनाना चाहती हो, मन से उसका चिन्तन करते-करते अपना शरीर त्याग करो। यह कहकर भगवान ने अपने करकमलों से सन्ध्या के शरीर का स्पर्श किया और तुरन्त ही उसका शरीर पुरोडाश (यज्ञ का हविष्य) बन गया। इसके बाद सन्ध्या अदृश्य होकर उस यज्ञमण्डप में गयी। भगवान की कृपा से उस समय उसने अपने मन में मूर्तिमान् ब्रह्मचर्य और तपश्चर्या के उपदेशक वसिष्ठ को पति के रूप में वरण किया और उन्हीं का चिन्तन करते-करते अपने पुरोडाशमय शरीर को अगिन्देव को समर्पित कर दिया। अगिन्देव ने भगवान की आज्ञा से उसके शरीर को जलाकर सूर्यमण्डल में प्रविष्ट कर दिया। सूर्य ने उसके शरीर के दो भाग करके अपने रथ पर देवता और पितरों की प्रसन्नता के लिये स्थापित कर लिया। उसके शरीर का ऊपरी भाग जो दिन का प्रारम्भ यानी प्रात:काल है, उसका नाम प्रात:सन्ध्या और शेषभाग दिन का अन्त सायं सन्ध्या हुआ और भगवान ने उसके प्राण को दिव्य शरीर और अन्त:करण को शरीरी बनाकर मेधातिथि के यज्ञीय अगिन् में स्थापित कर दिया। इसके पश्चात् मेधातिथि ने यज्ञ के अन्त में उस स्वर्ण के समान सुन्दरी सन्ध्या को पुत्री के रूप में प्राप्त किया। उस समय यज्ञीय अ‌र्घ्यजल में स्नान कराकर वात्सल्य स्नेह से परिपूर्ण और आनन्दित होकर उसे गोद में उठा लिया और उसका नाम अरुन्धती रखा। अरुन्धती चन्द्रभागा तट पर स्थित तापसारण्य नामक आश्रम में पलने लगी। पाँचवें वर्ष में पदार्पण करने पर ही उसके सद्गुणों से सम्पूर्ण तापसारण्य पवित्र हो गया। एक दिन अरुन्धती चन्द्रभागा के जल में स्नान करके अपने पिता मेधातिथि के पास ही खेल रही थी, स्वयं ब्रह्माजी पधारे और उसके पिता से कहा कि अब अरुन्धती को शिक्षा देने का समय आ गया है, इसलिये इसे अब सती साध्वी स्त्रियों के पास रखकर शिक्षा दिलवानी चाहिये; क्योंकि कन्या की शिक्षा पुरुषों द्वारा नहीं होनी चाहिये। स्त्री ही स्त्रियों को शिक्षा दे सकती है; किन्तु तुम्हारे पास तो कोई स्त्री नहीं है, अतएव तुम अपनी कन्या को बहुला और सावित्री के पास रख दो। तुम्हारी कन्या उनके पास रहकर शीघ्र ही महागुणवती हो जायगी। मेधातिथि ने उनकी आज्ञा शिरोधार्य की और उनके जाने पर अरुन्धती को लेकर सूर्यलोक में गये। वहाँ उन्होंने सूर्यमण्डल में स्थित पद्मासनासीन सावित्रीदेवी का दर्शन किया। उस समय बहुला मानस पर्वत पर जा रही थी, इसलिये सावित्रीदेवी भी सूर्यमण्डल से निकलकर वहीं के लिये चल पडी। बात यह थी कि प्रतिदिन वहाँ सावित्री, गायत्री, बहुला, सरस्वती एवं द्रुपदा एकत्रित होकर धर्मचर्चा करती थी और लोक-कल्याणकारी कामना किया करती थी। महर्षि मेधातिथि ने उन माताओं को पृथक्-पृथक् प्रणाम किया और सबको सम्बोधन करके कहा कि यह मेरी यशस्विनी कन्या है। यहीं इसके उपदेश का समय है। इसी से मैं इसे लेकर यहाँ आया हूँ। ब्रह्मा ने ऐसी ही आज्ञा की है। अब यह आपके पास ही रहेगी। माता सावित्री और बहुला आप दोनों इसे ऐसी शिक्षा दें कि यह सच्चरित्र हो। उन दोनों ने कहा- महर्षे! भगवान विष्णु की कृपा से तुम्हारी कन्या पहले से ही सच्चरित्र हो चुकी है; किन्तु ब्रह्मा की आज्ञा के कारण हम इसे अपने पास रख लेती हैं। यह पूर्वजन्म में ब्रह्मा की कन्या थी। तुम्हारे तपोबल से और भगवान की कृपा से यह तुम्हारी पुत्री हुई है। अरुन्धती कभी सावित्री के साथ सूर्य के घर जाती तो कभी बहुला के साथ इन्द्र के घर जाती। स्त्रीधर्म की शिक्षा प्राप्त करके वह अपनी शिक्षिका सावित्री और बहुला से भी श्रेष्ठ हो गयी। एक दिन मानस पर्वत पर विचरण करते-करते अरुन्धती मूर्तिमान् ब्रह्मचर्य महर्षि वसिष्ठ को देखा। उनके मुखमण्डल से प्रकाश की किरणें निकल रही थीं। अरुन्धती इस रूप पर मुग्ध हो गई। जगन्माता सावित्री को इस बात का पता लगा। इसके बाद मेधातिथि ने महर्षि वसिष्ठ से इस कन्या को पत्‍‌नी के रूप में स्वीकार करने का निवेदन किया। विवाह के अवसर पर ब्रह्मा, विष्णु आदि के द्वारा स्नान कराते समय जो जलधाराएँ गिरी थीं, वही गोमती, सरयू, सिप्रा, महानदी आदि सात नदियों के रूप में हो गयीं, जिनके दर्शन, स्पर्श, स्नान और पान से सारे संसार का कल्याण होता है। विवाह के पश्चात् वसिष्ठजी अपनी धर्मपत्‍‌नी के साथ विमान पर सवार होकर देवताओं के बतलाये हुए स्थान पर चले गये। वे जब जहाँ जिस रूप में रहकर तपस्या करते हुए संसार के कल्याण में संलगन् रहते हैं, तब तहाँ उन्हीं के अनुरूप वेश में रहकर अरुन्धती उनकी सेवा किया करती हैं। आज भी वह सप्तर्षि मंडल में स्थित वसिष्ठ के पास ही दीखती हैं।