अब्दुस सलाम

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अब्दुस सलाम
محمد عبد السلام

Abdus Salam in 1987
जन्म 29 जनवरी 1926
Jhang, Punjab, British India
(now in Punjab, Pakistan)
मृत्यु 21 नवम्बर 1996(1996-11-21) (उम्र 70)
Oxford, United Kingdom
राष्ट्रीयता Pakistani
क्षेत्र Theoretical physics
संस्थान
शिक्षा Government College University
Punjab University
University of Cambridge (PhD)
डॉक्टरी सलाहकार Nicholas Kemmer
अन्य अकादमी सलाहकार Paul Matthews
डॉक्टरी शिष्य
अनु उल्लेखनीय शिष्य
प्रसिद्धि Electroweak theory · Goldstone boson · Grand Unified Theory · Higgs mechanism · Magnetic photon · Neutral current · Pati–Salam model · Quantum mechanics · Pakistan atomic research program · Pakistan space program · Preon · Standard Model · Strong gravity · Superfield · W and Z bosons ·
उल्लेखनीय सम्मान Smith's Prize (1950)
Adams Prize (1958)
Sitara-e-Pakistan (1959)
Hughes Medal (1964)
Atoms for Peace Prize (1968)
Royal Medal (1978)
Nobel Prize in Physics (1979)
Nishan-e-Imtiaz (1979)
Jozef Stefan Medal (1980)
Gold Medal for Outstanding Contributions to Physics (1981)
Lomonosov Gold Medal (1983)
Copley Medal (1990)
Cristoforo Colombo Prize (1992)

अब्दुस सलाम (1926-1996) विख्यात पाकिस्तानी सैद्धांतिक भौतिकविद थे।[3] वह एक अहमदिया थे। नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक डॉक्टर अब्दुस सलाम पाकिस्तान के पहले और अकेले वैज्ञानिक हैं जिन्हे फिज़िक्स के लिए नोबेल पुरस्कार दिया गया है।[4]

सलाम 1960 से 1974 तक पाकिस्तान सरकार के एक शीर्ष स्तर के विज्ञान सलाहकार थे, इस स्थिति से उन्होंने देश के विज्ञान के बुनियादी ढांचे के विकास में एक प्रमुख और प्रभावशाली भूमिका निभाई। सलम न केवल सैद्धांतिक और कण भौतिकी में प्रमुख विकास में योगदान करने के लिए जिम्मेदार था, बल्कि अपने देश में उच्च क्षमता वाले वैज्ञानिक अनुसंधान के विस्तार और गहराई को बढ़ावा देने के लिए भी जिम्मेदार था। [9] वह अंतरिक्ष और ऊपरी वायुमंडल अनुसंधान आयोग (एसयूपीआरसीओ) के संस्थापक निदेशक थे और पाकिस्तान परमाणु ऊर्जा आयोग (पीएएसी) में सैद्धांतिक भौतिकी समूह (टीपीजी) की स्थापना के लिए जिम्मेदार थे। विज्ञान सलाहकार के रूप में, सलम ने परमाणु ऊर्जा के शांतिपूर्ण उपयोग के पाकिस्तान के विकास में एक अभिन्न भूमिका निभाई और 1972 में पाकिस्तान के परमाणु बम परियोजना के विकास के लिए योगदान दिया हो सकता है; इसके लिए उन्हें "वैज्ञानिक पिता " 1974 में, अब्दुस सलाम ने अपने देश से विरोध प्रदर्शन किया, जब पाकिस्तान संसद ने एक विवादास्पद संसदीय विधेयक पारित कर दिया, जो घोषित करते हुए कि अहमदिया आंदोलन के सदस्यों को, जो सलम का था, मुसलमान नहीं थे।[5] 1998 में, देश के परमाणु परीक्षणों के बाद, पाकिस्तान सरकार ने सलाम की सेवाओं का सम्मान करने के लिए "पाकिस्तान के वैज्ञानिक" के एक हिस्से के रूप में एक स्मारक टिकट जारी किया था।

सलम की प्रमुख और उल्लेखनीय उपलब्धियों में पैटी-सलम मॉडल, चुंबकीय फोटॉन, वेक्टर मेसन, ग्रांड यूनिफाइड थ्योरी, सुपरसमीमिति पर काम और सबसे महत्वपूर्ण बात, इलेक्ट्रोविक सिद्धांत शामिल हैं, जिसके लिए उन्हें भौतिक विज्ञान में सबसे प्रतिष्ठित पुरस्कार - नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। सलम ने क्वांटम फील्ड थियरी में और इंपीरियल कॉलेज लंदन में गणित की उन्नति में एक बड़ा योगदान दिया। अपने छात्र के साथ, रियाजुद्दीन, सलम ने न्यूट्रीनों, न्यूट्रॉन तारे और ब्लैक होल पर आधुनिक सिद्धांत में महत्वपूर्ण योगदान दिया, साथ ही साथ क्वांटम यांत्रिकी और क्वांटम फील्ड थ्योरी के आधुनिकीकरण पर काम किया। एक शिक्षक और विज्ञान के प्रमोटर के रूप में, सलाम को राष्ट्रपति के मुख्य वैज्ञानिक सलाहकार के रूप में अपने कार्यकाल के दौरान पाकिस्तान में गणितीय और सैद्धांतिक भौतिकी के संस्थापक और वैज्ञानिक पिता के रूप में याद किया गया था। सलाम ने दुनिया में भौतिक विज्ञान के लिए पाकिस्तानी भौतिकी के उदय में भारी योगदान दिया। यहां तक ​​कि उनकी मृत्यु के कुछ समय पहले भी, सलम ने भौतिकी में योगदान जारी रखा और तीसरी दुनिया के देशों में विज्ञान के विकास के लिए अधिवक्ता बने।

  2014 में मलाला युसूफजई के नोबेल पुरस्कार जीतने से पहले केवल एक ही पाकिस्तानी ने यह सम्मान हासिल किया था-  साइंटिस्ट अब्दुस सलाम. लेकिन आज तक पाकिस्तान में अपने ही महान साइंटिस्ट की उपलब्धियों को दफन करके रखा गया है. हालांकि, नेटफ्लिक्स पर आई एक नई डॉक्युमेंट्री 'सलाम, द फर्स्ट ****** नोबेल लॉरेट' से सलाम की लीगेसी पर पाकिस्तान में चर्चा होने लगी है.


अब्दुस सलाम को 1979 में भौतिकी के क्षेत्र में नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था. नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले पाकिस्तानी होने के बावजूद उनकी ऐतिहासिक उपलब्धि का जश्न उनके अपने ही देश में नहीं मनाया गया बल्कि उनकी धार्मिक पहचान को लेकर उन्हें हमेशा हाशिए पर रखा गया.


सलाम को 1979 में शेल्डन ग्लासहाउ और स्टीवेन वीनबर्ग के साथ इलेक्ट्रोवीक यूनिफिकेशन थिअरी में योगदान के लिए भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था.


इस नेटफ्लिक्स फिल्म के को-प्रोड्यूसर उमर वंडल और जाकिर थावेर दो युवा पाकिस्तानी वैज्ञानिक हैं जिन्हें अमेरिका में रहने के दौरान सलाम के बारे में पता चला. वंडल अलजजीरा से बातचीत में कहते हैं, हम दोनों साइंस के छात्र थे लेकिन दुर्भाग्य से हमें सलाम की महत्वपूर्ण खोज और उनकी कहानी के बारे में पाकिस्तान छोड़ने के बाद ही पता चला. उनकी कहानी उनके अपने घर में पूरी तरह मिटा दी गई है. वह लोगों के बीच चर्चा का हिस्सा ही नहीं हैं.

     सलाम की इस गुमनामी के पीछे उनकी धार्मिक पहचान यानी उनका अहमदी अल्पसंख्यक समुदाय से होना है. अहमदिया इस्लाम की एक ऐसी शाखा है जिसे पाकिस्तान व पूरी मुस्लिम दुनिया में प्रताड़ना का शिकार होना पड़ता है.
   सलाम 1926 में ब्रिटिश शासन के दौरान झांग शहर में पैदा हुए, लाहौर की यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की और उसके बाद स्कॉलरशिप पर यूके की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया. पढ़ाई पूरी करने के बाद वह गणित के प्रोफेसर के तौर पर अपने देश लौटे लेकिन 1953 में लाहौर में अहमदियों के खिलाफ दंगे भड़कने की वजह से सलाम ने देश छोड़ने का फैसला किया. वह वापस यूके की कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी गए और उसके बाद इम्पीरियल कॉलेज लंदन गए जहां पर उन्होंने थियोरेट्रिकल फिजिक्स डिपार्टमेंट की स्थापना में मदद की.

सलाम ने भले ही पाकिस्तान छोड़ दिया था लेकिन वह अपने देश की महत्वपूर्ण वैज्ञानिक परियोजनाओं से करीबी से जुड़े रहे. 1961 में उन्होंने पाकिस्तान के अंतरिक्ष कार्यक्रम की शुरुआत की और 1970 में विवादित तौर पर परमाणु हथियार बनाने के कार्यक्रम में भी उनका नाम सामने आया.

जब पाकिस्तान ने अपने पहले मुस्लिम नोबेल विजेता को ही नहीं माना मुसलमान9/12 थावेर कहते हैं, पाकिस्तान में लगभग सारे साइंटिफिक एंटरप्राइज सलाम की ही देन हैं. 1974 में अहमदियों को गैर-मुस्लिम घोषित करने वाला एक कानून अस्तित्व में आ गया. यही वह पल था जब सलाम ने पाकिस्तानी सरकार के साथ अपने सारे संबंध तोड़ लिए. जब 1979 में सलाम ने नोबेल पुरस्कार जीता तो उन्होंने कुरान की आयतें पढ़ीं. पूरी दुनिया ने उन्हें नोबेल पुरस्कार जीतने वाले पहले मुसलमान के तौर पर देखा लेकिन उनके अपने देश ने उन्हें कोई तवज्जो नहीं दी. 1984 में पाकिस्तान में अहमदी मुस्लिमों की धार्मिक आजादी पर प्रतिबंध लगाने वाला एक और कानून पास हो गया.


जब पाकिस्तान ने अपने पहले मुस्लिम नोबेल विजेता को ही नहीं माना मुसलमान10/12 शोध के अलावा सलाम वंचित तबके के बच्चों को वैज्ञानिक बनने के लिए प्रोत्साहित कर रहे थे. 1964 में सलाम ने इटली में इंटरनेशनल सेंटर फॉर थियोरेट्रिकल फिजिक्स की स्थापना की ताकि विकासशील देशों के वैज्ञानिकों को मदद मिल सके.

उमर सलाम कहते हैं, वह बहुत ही जोशीले, उदार और मजाकिया थे. वह सुबह 4 बजे उठ जाते थे और कभी थकते नहीं थे. वह लगातार घूमते रहते थे. वह कोई आदर्श पिता नहीं थे लेकिन वह वह जो अंदर से थे, वही बाहर से भी थे. वह लोगों में यकीन करते थे और दूसरों से भी यही चाहते थे.

सलाम का पाकिस्तान के लिए समर्पण कभी कम नहीं हुआ जबकि उन्हें ब्रिटेन और इटली की नागरिकता का ऑफर मिला था. उन्होंने हमेशा अपने पास पाकिस्तानी पासपोर्ट रखा. उन्होंने पाकिस्तान में अपने साथ हुए बर्ताव की आलोचना की और ना ही कभी किसी तरह का असंतोष जाहिर किया.

जब पाकिस्तान ने अपने पहले मुस्लिम नोबेल विजेता को ही नहीं माना मुसलमान11/12 1996 में जब सलाम की मौत हुई तो उन्हें पाकिस्तान के राबवाह शहर में दफनाया गया. इस शहर में अहमदी मुसलमान की आबादी बड़ी संख्या में बसती है. उनकी कब्र पर लिखे पत्थर पर लिखा था- पहला मुस्लिम नोबेल लॉरेट. लेकिन जल्द ही स्थानीय अधिकारियों ने उनकी कब्र से मुस्लिम शब्द मिटा दिया.

जब पाकिस्तान ने अपने पहले मुस्लिम नोबेल विजेता को ही नहीं माना मुसलमान12/12 अहमदिया मुस्लिम एसोसिएशन यूके के प्रेस सेक्रेटरी बशरत नजीर कहते हैं, सलाम पाकिस्तान से बहुत मोहब्बत करते थे. उन्हें पूरी दुनिया से सम्मान मिला लेकिन आज भी उनके अपने देश ने उन्हें प्यार नहीं दिया. सलाम के हिस्से में कभी भी सुकून नहीं आया.

दुनिया भर में 200 अलग-अलग देशों में 1 करोड़ अहमदी मुस्लिम रहते हैं लेकिन सबसे ज्यादा आबादी (40 लाख) पाकिस्तान में ही बसती है. आज भी पाकिस्तान में उन्हें तमाम तरह की प्रताड़नाएं झेलनी पड़ती हैं. नेटफ्लिक्स की इस फिल्म को पाकिस्तान में खूब देखा जा रहा है और इस महान साइंटिस्ट की विरासत को लेकर वहां एक बहस भी छिड़ गई है.

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Gordon Fraser, Cosmic Anger: Abdus Salam — The First Muslim Nobel Scientist, Oxford University Press, 2008, p. 119.
  2. Ashmore, Jonathan Felix (2016). "Paul Fatt. 13 January 1924 – 28 September 2014". Biographical Memoirs of Fellows of the Royal Society. London. 62: 167–186. आइ॰एस॰एस॰एन॰ 0080-4606. डीओआइ:10.1098/rsbm.2016.0005.
  3. "30 साल बाद पाकिस्तान को याद आए सलाम".
  4. "'अहमदिया मुसलमान पाकिस्तान के लिए ख़तरा'".
  5. "पाकः अहमदिया का नोबेल क़बूल मगर जात नहीं".

इन्हें भी देखें[संपादित करें]