अफ्रीका का विभाजन

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
सन १९१३ में अफ्रीका में उपनिवेशों की स्थिति जिसमें वर्तमान समय की राष्ट्रीय सीमाओं को भी दर्शाया गया है।
██ बेल्जियम ██ इतालवी
██ ब्रितानी ██ पुर्तगाली
██ फ्रांसीसी ██ स्पेनी
██ जर्मन ██ स्वतन्त्र

सन १८८१ और १९१४ के बीच यूरोपीय शक्तियों द्वारा अफ्रीकी भूभाग पर आक्रमण करके उस पर अधिकार, उपनिवेशीकरण, और उस भूभाग को हड़प लेने को अफ्रीका का विभाजन (Partition of Africa) कहते हैं। इसको अफ्रीका के लिये हाथापाई (Scramble for Africa) और अफ्रीका पर विजय (Conquest of Africa) भी कहते हैं। इस समयावधि को 'नव उपनिवेशवाद काल' कहते हैं।

सन १८७० में अफ्रीका के केवल १० प्रतिशत भूभाग पर यूरोपीय शक्तियों का अधिकार था किन्तु १९१४ तक उसके ९० प्रतिशत भूभाग पर यूरोप का अधिकार हो गया था। इस समय केवल अबीसिनिया (इथियोपिया) और लाइबेरिया ही स्वतन्त्र बचे थे।

सन १८८४ में सम्पन्न हुए बर्लिन सम्मेलन को प्रायः अफ्रीका के विभाजन का आरम्भिक बिन्दु माना जाता है। १९ शताब्दी के अन्तिम भाग में यूरोपीय साम्राज्यों के बीच जबरदस्त राजनीतिक एवं आर्थिक स्पर्धा होने के बावजूद अफ्रीका को शान्तिपूर्ण ढंग से बाँट लिया और इस बंटवारे ने उन्हें आपस में युद्धरत होने से भी बचा लिया।

अफ्रीका का विभाजन यूरोप के इतिहास की एक अत्यंत रोमांचक घटना मानी गयी है। विभाजन के महत्वपूर्ण कार्य को अत्यंत शीघ्रता से संपादित किया गया। यद्यपि विभाजनकर्ता विभिन्न राष्ट्रों में आपस में अनेक मतान्तर थे किन्तु फिर भी बिना कोई युद्ध लड़े इस कार्य को शांतिपूर्ण ढंग से पूर्ण कर लिया गया।

भूमिका[संपादित करें]

अफ्रीका का विशाल महाद्वीप 19वीं शताब्दी से पूर्व ‘अंध-महाद्वीप’ के नाम से जाना जाता था। यूरोप के अत्यंत समीप होने के बाद भी यूरोपवासी इसके संबंध में कोई ज्ञान नहीं रखते थे और यदि कोई देश अफ्रीका के संबंध में कुछ जानकारी रखते भी थे तो वह न के बराबर ही थी। इस समय तक लोग अफ्रीका महाद्वीप की आंतरिक समृद्धि से अवगत नहीं थे। व्यापारी-वर्ग भी इस महाद्वीप के संबंध में केवल इतना ही जानते थे कि वे यहां से हब्शियों को पकड़कर ले जाते थे और दासों के रूप में उन्हें अमेरिकी किसानों को बेच देते थे। धीरे-धीरे इस स्थिति में परिवर्तन आना प्रारंभ हुआ और यूरोप के लोग अफ्रीका महाद्वीप की ओर आकर्षित होने लगे, जिसके लिए निम्नलिखित कारण व परिस्थितियां उत्तरदायी थीं :

  • (१) सर्वप्रथम नेपोलियन ने अफ्रीका के महत्व को महसूस किया और अंग्रेजों को परोक्ष युद्ध में हराने के उद्देश्य से उसने मिस्र पर आक्रमण किया था। वस्तुतः मिस्र और सीरिया होकर जो स्थल मार्ग था उस पर अधिकार करके वह अंग्रेजों के पूर्व स्थित साम्राज्य को खतरा पैदा करना चाहता था, इसलिए फ्रांस व इंग्लैण्ड के मध्य लंबे समय तक संघर्ष चलता रहा। इस संघर्ष के कारण यूरोप के राष्ट्रों का ध्यान भी अफ्रीका महाद्वीप की ओर आकर्षित हुआ।
  • (२) यूरोप के विभिन्न देश अपने-अपने औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना के लिए आकांक्षा कर रहे थे, परंतु इस समय तक अधिकांश वे स्थान, जहाँ पर उपनिवेशों की स्थापना संभव थी, एशिया के विभिन्न राष्ट्रों ने अपना-अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। विदेशी राष्ट्र मुनरो सिद्धांत के कारण अमेरिका में प्रवेश नहीं कर पा रहे थे, इसलिए 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में अनेक देशों का ध्यान अफ्रीका की ओर आकर्षित हुआ।
  • (३) अफ्रीका में हीरों व अन्य बहुमूल्य पत्थरों की अनेक खानें थीं, इसलिए यूरोप के विभिन्न राष्ट्र यहां पर अपना आधिपत्य स्थापित करके उसकी धन-संपदा को हस्तगत कराना चाहते थे।
  • (४) विश्व में सैनिक राष्ट्रवाद की भावना का दिन-प्रतिदिन विकास होता जा रहा था। जर्मनी, फ्रांस और इटली जैसे राष्ट्रों ने इंग्लैण्ड व हॉलेण्ड की नीति का अनुसरण करते हुए यह अनुभव करना प्रारंभ कर दिया कि औपनिवेशिक साम्राज्य की स्थापना अत्यंत आवश्यक है, इसलिए प्रत्येक राष्ट्र अपने आत्मसम्मान और गौरव में वृद्धि हेतु उपनिवेशों की स्थापना के लिए लालायित था।
  • (५) यूरोप के कुछ धर्म प्रचारक अफ्रीका महाद्वीप में अपने धर्म व संस्कृति का प्रचार करने के इच्छुक थे। धार्मिक उत्साह से ओतप्रोत धर्म प्रचारकों ने अफ्रीका के इस अंधकारमय द्वीप में अनेक कष्ट उठाते हुए प्रवेश किया और धर्म प्रचार के कार्य में जुट गये।
  • (६) यूरोप का प्रत्येक देश अपनी-अपनी सैनिक शक्ति का प्रदर्शन करने के लिए औपनिवेशिक दौड़ में भाग लेने का इच्छुक था। इंग्लैण्ड को अपनी भारतीय सेना पर गर्व था और जर्मनी ने भी इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए अपनी सेना की संख्या को अत्यधिक बढ़ा लिया था।
  • (७) 1883 के अधिनियम के अनुसार इंग्लैण्ड ने अपने साम्राज्य में दास-व्यापार को अवैध घोषित कर दिया था, इसलिए अब यह व्यापार गुप्त रूप से होना प्रारंभ हो गया, इसलिए इंग्लैण्ड ने अफ्रीका के पश्चिमी समुद्री तट पर अपनी जल सेना की टुकड़ी को तैनात कर दिया था ताकि गुप्त रूप से देश में दास व्यापार चलता न रहे।

अफ्रीका का विभाजन[संपादित करें]

सर्वप्रथम 1876 ई. में बेल्जियम के राजा लियोपोल्ड द्वितीय ने बुसेल्स में यूरोप के राष्ट्रों की एक सभा का आयोजन किया। उसका उद्देश्य अफ्रीका के महत्व पर विचार करना था और अफ्रीकी सम्मेलन का गठन करना था। किंतु इस सम्मेलन के उच्च नैतिक स्तर को अधिक लंबे समय तक नहीं बनाये रखा जा सका और शीघ्र ही प्रत्येक देश ने अफ्रीका महाद्वीप में अपने स्वार्थ के अनुरूप कार्य करना प्रारंभ कर दिया। स्वयं लियोपोल्ड ने स्टैनले के सहयोग से अफ्रीका में एक विशाल कांगो राज्य का गठन किया। अफ्रीका में बेल्जियम के बढ़ते हुए प्रभाव को देखकर यूरोप के अन्य देशों ने भी अफ्रीका में अपने-अपने उपनिवेश स्थापित करने के प्रयास करने प्रारंभ कर दिये। इंग्लैण्ड, फ्रांस, जर्मनी और इटली जैसे देशों ने अफ्रीका में प्रवेश प्राप्त करने के लिए घोषित किया कि अफ्रीका में उनके प्रवेश का मुख्य उद्देश्य वहां की असभ्य जनता को सभ्य बनाना तथा ईसाई धर्म का प्रचार करना है। इस प्रकार अप्रत्यक्ष रूप से यूरोप के विभिन्न राज्यों ने अफ्रीका की लूट के कार्य को प्रारंभ किया।

1884 का बर्लिन सम्मेलन[संपादित करें]

यूरोप का प्रत्येक राष्ट्र अफ्रीका में अपने उपनिवेश स्थापित करना चाहता था इसलिए उनमें परस्पर मतभेदों का जन्म हुआ। अन्ततः बर्लिन में एक अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन बुलाया गया जिसमें विभिन्न देशों की मतान्तरों को दूर किया गया एवं जर्मनी, इंग्लैण्ड और फ्रांस के सीमा संबंधी विवादों का सुलझावा किया गया। उपर्युक्त देशों ने इस अवसर पर 1890 ई. में आपस में एक नवीन संधि भी की। बर्लिन के इस सम्मेलन में अफ्रीका के सांस्कृतिक विकास के प्रश्न पर भी विचार-विमर्श हुआ। शस्त्रों एवं शराब के व्यापार पर भी अनेक प्रतिबंध लगाये गये किन्तु शीघ्र ही कांगो में अफ्रीकावासियों का अत्यधिक शोषण होने लगा। बर्लिन के इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में स्विट्जरलैण्ड के अतिरिक्त यूरोप के सभी देशों और अमेरिका ने भी भाग लिया और यह सम्मेलन नवम्बर 1884 से फरवरी 1885 तक चला।

विभिन्न देशों द्वारा अफ्रीका की लूट[संपादित करें]

कांगो के जो श्रमिक रबर संग्रह करने के कोटे को पूरा नहीं कर पाते थे , दण्ड के रूप में प्रायः उनके हाथ काट दिये जाते थे।

इंग्लैण्ड[संपादित करें]

अफ्रीका की लूट में सबसे अधिक लाभ इंग्लैण्ड को हुआ। उसके अत्यधिक विस्तृत साम्राज्य में केप ऑफ गुडहोप, नेटाल, ट्रांसवल, औरेन्ज नदी का नजदीकी क्षेत्र, रोडेशिया, मिस्र, सूडान का कुछ भाग, ब्रिटिश सोमालीलैण्ड, नाइजीरिया, गौम्बिया, गोल्डकोस्ट तथा सियरा-लियोन आदि सम्मिलित थे।

मिस्र पर इंग्लैण्ड का नियंत्रण

1798 ई. में नेपोलियन ने मिस्र पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था किंतु नील नदी के युद्ध में उसकी पराजय के बाद वहां उसका प्रभाव समाप्त हो गया और इंग्लैण्ड का मिस्र पर प्रभुत्व स्थापित हो गया। मिस्र का इंग्लैण्ड के लिए विशेष महत्व था क्योंकि मिस्र पर किसी अन्य देश का प्रभुत्व स्थापित होने से उसके भारत स्थित साम्राज्य को खतरा उत्पन्न हो जाता था।

1652 ई. में डच लोगों ने, जिन्हें ‘बोअर’ भी कहा जाता था, केप कॉलोनी में अपने उपनिवेश की स्थापना कर ली थी जो सुदूर दक्षिणी अफ्रीका के सुदूर में पड़ता था। वे अपने धार्मिक मामले में अत्यंत कठोर थे और अंग्रेजों को घृणा की दृष्टि से देखते थे। 1815 ई. के लगभग अंग्रेजों ने भी केप कॉलोनी में आकर बसना प्रारंभ कर दिया था और धीरे-धीरे वहां पर उनकी संख्या काफी बढ़ गयी। प्रारंभ में दोनों के संबंध परस्पर मधुर बने रहे किन्तु अंग्रेजों की उत्तरोत्तर बढ़ती हुई संख्या के कारण डच लोगों के हृदय में संदेह की भावना जाग्रत हुई जिसके कारण उन्होंने केप कॉलोनी को छोड़कर औरेन्ज फ्री स्टेट, ट्रान्सवाल और नेटाल में निवास करना प्रारंभ कर दिया। किंतु 1879 ई. में अंग्रेजों ने ट्रान्सवाल पर आक्रमण कर दिया, जिसके कारण अंग्रेजों और बोअर जाति के लोगों के आपसी संबंध तनावपूर्ण हो गये और युद्ध की ज्वाला धधक उठी। इस युद्ध में अंग्रेजों को पराजय का मुंह देखना पड़ा और बोअरों की स्वतंत्रता को सभी लोगों ने स्वीकार कर लिया तथा ट्रान्सवाल को स्वतंत्र घोषित कर दिया गया। 1881 ई. में ट्रान्सवाल में सोने की कुछ खानों की जानकारी प्राप्त हुई जिससे प्रभावित होकर अंग्रेजों ने ट्रान्सवाल में प्रवेश करना प्रारंभ कर दिया और कहीं-कहीं पर उनकी संख्या मूल निवासी बोअरों से भी अधिक हो गई इससे बोअरों की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो गया। बोअर अंग्रेजों से घृणा करते थे और उन्हें 'विदेशी' कहकर पुकारते थे। इन विदेशियों का मुख्य नेता सेसिल रोड्स था। वह दक्षिणी अफ्रीका में ब्रिटिश शासन की स्थापना पर विशेष बल दे रहा था और थोड़े समय में ही उसने अफ्रीका के बहुत बड़े भाग पर अधिकार कर लिया, जो रोडेशिया कहलाया। 1890 ई. में वह केप कॉलोनी का प्रधानमंत्री चुना गया और 1896 ई. तक वह इस पद पर बना रहा। उसकी यह भी धारण थी कि अंग्रेजों को ट्रान्सवाल तथा औरेन्ज फ्री स्टेट पर भी अधिकार स्थापित कर लेना चाहिए। इंग्लैण्ड भी बोअरों के विरूद्ध अपनी पराजय का बदला लेने के लिए अवसर की प्रतीक्षा में था। 1899 ई. में उसने औरेन्ज फ्री स्टेट व ट्रान्सवाल के विरूद्ध युद्ध प्रारंभ कर दिया। प्रारंभिक युद्ध में बोअरों को कुछ सफलता प्राप्त हुई किन्तु अधिक समय तक वह अपने विजय-क्रम को बनाये रखने में सफल नहीं हो सके और अन्ततः पराजित हुए। 1902 ई. में दोनों के मध्य एक संधि हो गयी जिसके अनुसार ट्रान्सवाल तथा औरेन्ज फ्री स्टेट पर अंग्रेजों के अधिकार को स्वीकार कर लिया गया।

इस संधि के बाद बोअरों को कई सुविधाएं प्रदान की गयीं किंतु इसके बाद भी उनके असंतोष का अंत नहीं हुआ। अंततः इंग्लैण्ड की उदार सरकार ने ट्रान्सवाल व औरेन्ज फ्री स्टेट को क्रमशः 1906 ई. व 1907 ई. में स्वायत्तता प्रदान कर दी तथा ट्रान्सवाल, औरेन्ज फ्री स्टेट, केप कॉलोनी व नेटाल को ‘दक्षिण अफ्रीका संघ’ के नाम से संगठित कर दिया।

फ्रांस[संपादित करें]

फ्रांस, अफ्रीका के महत्वपूर्ण प्रदेशों, यथा मिस्र, अल्जीरिया, ट्यूनिस और मोरक्को पर अपना नियंत्रण स्थापित करना चाहता था किंतु इंग्लैण्ड ने उसका विरोध किया तथा मिस्र पर उसका अधिकार स्थापित नहीं होने दिया, क्योंकि मिस्र का इंग्लैण्ड के भारत स्थित साम्राज्य के लिए अत्यधिक महत्व था। किंतु धीरे-धीरे फ्रांस ने दक्षिण अफ्रीका के कई महत्वपूर्ण उपनिवेशों पर अधिकार स्थापित कर लिया। 1847 ई. में अल्जीरिया पर अधिकार करने के बाद फ्रांस की आंखें ट्यूनिस के प्रदेश पर लगी हुई थीं जो अल्जीरिया के पूर्व में स्थित था। इटली भी ट्यूनिस के प्रदेश की ओर लालची आंखों से निहार रहा था, किन्तु फ्रांस ने 1881 ई. में बिस्मार्क से प्रोत्साहन प्राप्त करने के बाद इस पर अधिकार कर लिया। साथ ही उसने गुआना, आइवरी कोस्ट, फ्रेंच कांगो और सहारा के नखलिस्तान पर भी संरक्षण स्थापित कर लिया। 1904 ई. में इंग्लैण्ड व फ्रांस ने मोरक्को के प्रश्न पर आपस में एक संधि कर ली और इस प्रकार फ्रांस, अफ्रीका के उत्तर-पश्चिमी प्रदेशों में एक विशाल औपनिवेशिक साम्राज्य स्थापित करने में सफल रहा।

जर्मनी[संपादित करें]

1870-1890 ई. तक बिस्मार्क जर्मनी में चान्सलर के पद पर कार्य करता रहा। अपने प्रधानमंत्री-काल के प्रारंभिक वर्षों में वह उपनिवेश-स्थापना का घोर विरोधी था क्योंकि वह इंग्लैण्ड के साथ अपने संबंधों को खराब करना नहीं चाहता था। इंग्लैण्ड उस प्रत्येक देश को अपना शत्रु समझता था जो औपनिवेशिक दौड़ में भाग लेता था और अपनी जल-शक्ति के विस्तार का प्रयास करता था। बिस्मार्क जर्मनी को एक आत्म-संतुष्ट देश कहा करता था किन्तु बाद में निम्नलिखित कारणों से प्रेरित होकर उसने उपनिवेश-स्थापना की ओर ध्यान देना प्रारंभ कर दिया था :

  • (१) जर्मनी के औद्योगिक विकास के लिए उपनिवेश प्राप्त करना नितांत आवश्यक था।
  • (२) अपनी बढ़ती हुई जनसंख्या को बसाने के लिए उसे अतिरिक्त भूमि की आवश्यकता थी।
  • (३) जर्मनी के राष्ट्रीय गौरव के लिए उपनिवेशों की स्थापना अत्यंत आवश्यक थी।

प्रसिद्ध इतिहासकार गूच ने इस संदर्भ में लिखा है कि अफ्रीका की लूट के कारण जर्मनी की उपनिवेश-स्थापना की भूख में अत्यधिक वृद्धि हो गयी थी और बिस्मार्क को अन्ततः इस भूख को शांत करना ही पड़ा। औपनिवेशिक दौड़ में विलम्ब से भाग लेने के कारण बिस्मार्क अफ्रीका की लूट में समय पर सम्मिलित नहीं हो सका लेकिन फिर भी 1884 ई. से 1890 ई. तक उसने तोगोलैण्ड, कैमरून, पूर्वी अफ्रीका और दक्षिण-पश्चिम अफ्रीका मेंं कुछ उपनिवेश स्थापित किये। इस प्रकार बिस्मार्क जैसा कुशल राजनीतिज्ञ भी समय की पुकार को नहीं टाल सका और उसे भी उपनिवेश-स्थापना की दौड़ में भाग लेना पड़ा, जिसका वह प्रारंभ में घोर विरोधी था।

स्पेन[संपादित करें]

स्पेन ने अफ्रीका के दक्षिण-पश्चिमी समुद्र-तट पर अपने कुछ उपनिवेश स्थापित किये। 1908 ई. में उसने जिब्राल्टर द्वीप के सामने कुछ प्रदेशों पर भी अपना अधिकार स्थापित कर लिया।

इटली[संपादित करें]

इटली ट्यूनिस के प्रदेश पर अधिकार करना चाहता था, परन्तु फ्रांस द्वारा वहां अपना आधिपत्य स्थापित कर लिये जाने के कारण उसने 1883 ई. में लाल सागर के किनारे के प्रदेश इरीट्रिया पर एवं पूर्वी सोमालीलैण्ड के कुछ भाग पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। इटली अबीसीनिया पर अधिकार करना चाहता था किन्तु अडोवा के युद्ध में उसे पराजय का मुंह देखना पड़ा। तत्पश्चात् इटली ने त्रिपोली तथा उसके आस-पास के प्रदेश पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया और उसे कालान्तर में लीबिया का नाम प्रदान किया।

पुर्तगाल[संपादित करें]

पुर्तगाल ने अंगोला पर अपना अधिकार स्थापित कर लिया। वह बेल्जियम कांगो के दक्षिण में स्थित था। कालान्तर में पुर्तगाल ने मोजम्बिक पर अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया, जिसे पुर्तगालवासी 'पूर्वी अफ्रीका' के नाम से पुकारते थे।

इस प्रकार यूरोप की महाशक्तियों ने सम्पूर्ण अफ्रीका का आपस में विभाजन कर लिया। विभाजन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण अंश यह था कि यह कार्य अत्यंत शांतिपूर्ण ढंग से संपादित किया गया। यद्यपि कई अवसरों पर कटुता बढ़ जाने के कारण युद्ध की संभावनाएं अत्यधिक बढ़ गयीं किंतु वार्तालाप और कूटनीति के द्वारा मतान्तरों को शांतिपूर्ण ढंग से हल कर दिया गया। विभाजन का एक उल्लेखनीय तथ्य यह था कि विभाजन अत्यंत धीमी गति से और क्रमानुसार किया गया था।