अत्री गोत्र

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अत्री (अत्री, अत्रे, अत्रेय, आत्रे, आत्रेय आदि) उत्तर प्रदेश, राजस्थान और मध्य प्रदेश में पायी जाने वाली एक ऋषि गोत्र है। इसका उद्भव अत्रि नामक ऋषि से हुआ था।[1] यह गोत्र सबसे ज्यादा ब्राह्माण में होता है, कुछ राजपूतो, जाटों सहित, यादवों में भी पाया जाता है।

सन्दर्भ गोत्र का अर्थ सिर्फ वंशज होना नहीं है, सभी महान ऋषियों के सहायक सभी वर्णों के होते थे, जो अपने वर्ण के अनुसार सेवा करते थे., वह ऋषि उस आश्रम के कुलपति होते थे, और सभी सहायक उस कुल के सदस्य माने जाते थे. इन सब लोगों की पहचान उस ऋषि से होती थी,इन सभी सहायकों का गोत्र उस ऋषि का गोत्र ही माना जाता था. इस प्रकार किसी विशेष ऋषि का वंशज, उनका सेवक, उनका समर्थक, उनका यजमान, उनका भक्त सभी अपनी पहचान उस ऋषि के नाम पर बताते थे, कालांतर में वही उनका गोत्र हो गया, इसलिए सभी ऋषियों के गोत्र सभी जातियों में मिलते हैं. सभी चंद्रवंशी क्षत्रिय ब्रह्मदेव के अवतार अत्रि पुत्र चन्द्र के वंशज है, चन्द्र के पुत्र बुध, उनके पुरुरवा, उनके नहुष, उनके ययाति थे. ययाति के यदु, तुर्वसु, द्रुह्यु, अनु, पुरु, पुत्र थे, यदु से यदु वंश और पुरु से पुरुवंश चला था. पुरु के वंशज कौरव ,पांडव थे. यदु के वंश में कंस , वसुदेव, दोनों ही थे. वसुदेव के पिता शूरसेन थे.शूरसेन के पिता की एक पत्नी क्षत्रिय, दूसरी वैश्य थी, वैश्य पत्नी से नंदजी के पिता थे, शूरसेन के पिता ने राज्य की जिम्मेदारी शूरसेन को दी थी, जबकि गोपालन की जिम्मेदारी नंदजी के पिता को मिली थी, वहां से फिर नंदजी को मिली. नंदजी की गायें चराने वाले सब लोग जो अलग अलग कुलों से थे, नंदजी के साथ जुड़कर यदुवंशी कहलाये, कालांतर में गोपालन करने वाली सभी जातियों ने अपना आराध्य भगवन कृष्ण को बनाया और अपने को यदुवंशी माना, इसमें अहीर, जाट, गुर्जर सहित वे सब लोग आ जाते हैं, जिनका मुख्य कार्य पशु पालन रहा है.[संपादित करें]