अजमेर जिला

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
(अजमेर जिले से अनुप्रेषित)
Jump to navigation Jump to search
अजमेर
—  जिला  —
समय मंडल: आईएसटी (यूटीसी+५:३०)
देश Flag of India.svg भारत
राज्य राजस्थान
जिलाधीश भवानीसिंह देथा
नगर निगम अध्यक्ष Dharmendra ji Gahlot
जनसंख्या
घनत्व
25,83,052 (2011 के अनुसार )
• 292/किमी2 (756/मील2)
क्षेत्रफल
ऊँचाई (AMSL)
8,841 km² (3,414 sq mi)
• 870 मीटर (2,854 फी॰)
आधिकारिक जालस्थल: ajmer.nic.in/index.html

निर्देशांक: 26°16′N 74°25′E / 26.27°N 74.42°E / 26.27; 74.42

अजमेर भारतीय राज्य राजस्थान का एक जिला है। राजस्थान राज्य का हृदयस्थल अजमेर जिला राजस्थान राज्य के मध्य में 25 डिग्री 38’ से 26 डिग्री 50’ उतरी अक्षांश एवं 73 डिग्री 54’ से 75 डिग्री 22’ पूर्वी देशान्तर के मध्य स्थित हैं। अजमेर उत्तर-पश्चिमी रेल्वे के दिल्ली-अहमदाबाद मार्ग पर स्थित हैं जो जयपुर के दक्षिण-पश्चिम में लगभग 135 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। अजमेर तारागढ़ की पहाड़ी, जिसके शिखर पर किला है, निचली ढलानों पर यह शहर स्थित है। पर्वतीय क्षेत्र में बसा अजमेर अरावली पर्वतमाला का एक हिस्सा है, जिसके दक्षिण-पश्चिम में लूणी नदी व पूर्वी हिस्से में बनास की सहायक नदियाँ बहती हैं। मुग़लों की बेगम और शहजादियाँ यहाँ अपना समय व्यतीत करती थी। इस क्षेत्र को इत्र के लिए प्रसिद्ध बनाने में उनका बहुत बड़ा हाथ था। कहा जाता है कि नुरजहाँ ने गुलाब के इत्र को ईजाद किया था। कुछ लोगों का मानना है यह इत्र नूरजहाँ की माँ ने ईजाद किया था। अजमेर में पान की खेती भी होती है। इसकी महक और स्वाद गुलाब जैसी होती है।

चित्र:अजमेर में आनासागर झील.JPG
अजमेर में आनासागर झील

परिचय[संपादित करें]

तारागढ़ की कहानी[संपादित करें]

जावेद शाह की जुबानी । बेऔलादों को औलाद और कुंवारों को मिलता है जीवनसाथी राजस्थान के अजमेर शहर में तारागढ़ की पहाड़ी पर हजरत मीर हुसैन सय्यद खिंग सवार रह0 की मजार है । यह मज़ार अजमेर की सबसे ऊंची जगह पर है । अजमेर शहर राजस्थान का ह्रदय है और तारागढ़ पहाड़ अजमेर का दिल है । गरीब नवाज की दरगाह से दक्षिण दिशा में आसमान से बातें करता ये पहाड़ जमीन से करीब 3 हजार फीट की ऊँचाई पर अरावली की चोटी पर स्थित है। इतिहासकार इसे अरावली का अरमान भी कहते है। तारागढ़ नाम तो बहुत बाद में सन 1505 में रखा गया । चित्तौड़ के राजा राणा साँगा के भाई पृथ्वीसिंह सिसोदिया ने अपनी पत्नी ताराबाई के लिए यहां महल और किला बनवाया । इस रानी के नाम से इस पहाड़ का वर्तमान नाम मशहूर हुआ। अजमेर के पहले शासक अजय सिंह चौहान ने सन 1113 ईसवी में 'गढ़ बिठली' नामक इस पहाड़ पर किला बनवाया जिसका नाम पहाड़ी के नाम से 'गढ़ -बिठली' रखा ।

लेकिन आम जनता ने राजा अजयसिंह के नाम से इस पहाड़ को अजयमेरु कहा जिसका मतलब अजय का पहाड़ होता है।इस तरह इस इलाके का नाम अजयमेरु पड़ गया जो बाद में अजमेर हुआ।

1192 में पृथ्वीराज चौहान को हराने के बाद मोहम्मद गौरी ने तारागढ़ किले का किलेदार हजरत मीर हुसैन सैयद खिंग सवार को बना दिया। हजरत मीर हुसैन के घोड़े का नाम खिंग था। इसलिए उन्हें खिंग(घोड़ा) सवार भी कहते है।

सन 1210 में लाहौर में पोलो खेलते समय कुतुबुद्दीन ऐबक की मौत हो गई । हारे हुए काफिरों ने मौका देखकर तारागढ़ को हासिल करने के लिए बेवक़्त हमला कर दिया । अचानक हुए हमले में हजरत मीर हुसैन सय्यद खिंग सवार जंग करते हुए अपने घोड़े और साथियों सहित शहीद हो गए। 

गरीब नवाज को शहादत की खबर लगी। आपने मीर हुसैन को तारागढ़ की सबसे ऊंची जगह पर दफ़्न किया और बाकी साथियों को नीची जगह। उनके घोड़ों को भी शहीद हो जाने पर दफ़नाया गया। सारे हिंदुस्तान में घोड़े की मजार सिर्फ तारागढ़ पहाड़ी पर ही मिलेगी। यहां एक पत्थर भी है जिसे बाबा ने अपनी उंगली , घोड़े के चाबुक और घोड़े के घुटने से रोक दिया था , आज भी वो पत्थर तारागढ़ पहाड़ी पर मौजूद है और उस पर इन 3 चीजों के निशान भी घटना की याद दिलाते है। हजरत मीर हुसैन सैयद के उर्स 16 से 18 रजब तक मनाए जाते है । उर्स में रंग के दौरान हजरत मीर सय्यद बाबा की मजार की दीवारें फ़ज़र के वक्त शहादत की जलाल से हिलती है और पहाड़ पर घोड़े की टापों की आवाज़ें भी सुनाई देती है। मीर हुसैन बाबा की दरगाह के सहन में 700 साल पुराना एक लाल गोंदी का पेड़ हैं । जिसे सय्यद मीरां बाबा ने सदा हरा-भरा और फलदार रहने की दुआ दी । दुआ की वजह से यह पेड़ सालभर फलों से लदा रहता है । कुदरत का कमाल है इस फल को जो भी बेऔलाद महिला खा ले उसकी सुनी गोद भर जाती है । मीर बाबा की दरगाह की मेहंदी अगर कुंवारे लड़के-लड़कियां लगा लेते है और दुआ करते है । करिश्माई रूप और अल्लाह के करम से उनके रिश्ते हो जाते है। सय्यद मीरां बाबा की ये 2 करामातें बहुत मशहूर है। एक मर्तबा एक किन्नर ने गोंदी का फल खाकर गरीब नवाज से औलाद की दुआ की। उस किन्नर को औलाद हुई। उस किन्नर की मजार भी अजमेर में है। बहुत से करिश्में तारागढ़ से जुड़े है। इंदिरा गांधी ने आपातकाल के बाद मन्नत मांगी थी कि कांग्रेस की वापसी पर तारागढ़ जाने वाला रास्ता पक्का बनवा दूंगी । इंदिरा गांधी ने जीतने के बाद रास्ता बनवाकार कुछ हद तक वादा भी निभाया। कहते है कांग्रेस का चुनाव चिन्ह पंजा इन्ही पंजतन की निशानी है । तारागढ़ की पहाड़ी से नीचे की तरफ नज़र दौड़ाने पर किले की दीवारें भारत के नक्शे जैसी दिखाई देती है । 900 साल पहले बनी दीवारों में भारत का नक्शा अपने आप में एक रहस्य और अजूबा है। ये दीवारें मैंने (जावेद शाह ) देखी है। अगली बार जब भी अजमेर जाए इन करिश्मों को देखना न भूले। आपको मेरा ये लेख कैसा लगा मेसेज करके जरूर बताएं। अजमेर शहर का नाम अजयमेरू के नाम पर पड़ा हैं। जिसकी स्थापना 1113 ई. में चौहान राजा अजयराज ने की थी। [1] अजमेर से 10 किलोमीटर दूर स्थित अजयपाल का मंदिर आज भी अजमेर के संस्थापक की याद दिलाता हैं। अजमेर नगर घुुुुघरा घाटी को केंद्र मानकर बसाया गया।12 वीं शताब्दी में चौहान राजा अजयराज के समय यह एक महत्त्वपूर्ण नगर बन गया था। अजमेर का वास्तविक संस्थापक अजयराज चौहान को माना जाता हैं। चौहान राजा अजयराज ने 1113 ई. में अजमेर नगर की स्थापना की थी । अजयराज ने अपनी राजधानी का नाम अजयमेरु रखा । जबकि अजयपाल ने 7 वी सदी में बिठली पहाड़ी पर एक क़िला गढ़-बिठली नाम से बनवाया था। जो बाद में अजयराज के द्वारा स्थापित 1113 ई. में अजमेर नगर के नाम से अजयमेरु कहलाया । जिसे कर्नल टाड ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रंथ में राजपूताने की कुँजी कहा है। पर ये चोहनो की कुँजी है जिसका मुख्यालय अजमेर है।जिसका क्षेत्रफल - 8841 वर्ग कि॰मी॰ है। 2011 की जनगणना के अनुसार जनसंख्या 2584913 है।

इतिहास[संपादित करें]

राजपुताना व बंबई गजट के अनुसार अजमेर पर 700 वर्षों तक चौहान वंश के चेची गुर्जरों का राज था। [1] अजमेर में 1153 ई में प्रथम गुर्जर नरेश बीसलदेव चौहान ने एक मन्दिर बनवाया था, जिसे 1192 ई. में मुहम्मद ग़ोरी ने नष्ट करके उसके स्थान पर अढ़ाई दिन का झोंपड़ा नामक मस्जिद बनवाई थी। कुछ विद्वानों का मत है, कि इसका निर्माता कुतुबुद्दीन ऐबक था। कहावत है, कि यह इमारत अढ़ाई दिन में बनकर तैयार हुई थी, किन्तु ऐतिहासिकों का मत है, कि इस नाम के पड़ने का कारण इस स्थान पर मराठा काल में होने वाला अढ़ाई दिन का मेला है। इस इमारत की क़ारीगरी विशेषकर पत्थर की नक़्क़ाशी प्रशंसनीय है। इससे पहले सोमनाथ जाते समय (1124 ई.) में महमूद ग़ज़नवी अजमेर होकर गया था। मुहम्मद ग़ौरी ने जब 1192 ई. में भारत पर आक्रमण किया, तो उस समय अजमेर पृथ्वीराज के राज्य का एक बड़ा नगर था। पृथ्वीराज की पराजय के पश्चात दिल्ली पर मुसलमानों का अधिकार होने के साथ अजमेर पर भी उनका क़ब्ज़ा हो गया और फिर दिल्ली के भाग्य के साथ-साथ अजमेर के भाग्य का भी निपटारा होता रहा। 1193 में दिल्ली के ग़ुलाम वंश ने इसे अपने अधिकार में ले लिया। मुग़ल सम्राट अकबर को अजमेर से बहुत प्रेम था, क्योंकि उसे मुईनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा में बड़ी श्रृद्धा थी। एक बार वह आगरा से पैदल ही चलकर दरग़ाह की ज़ियारत को आया था। मुईनुद्दीन चिश्ती 12वीं शती ई. में ईरान से भारत आए थे। अकबर और जहाँगीर ने इस दरग़ाह के पास ही मस्जिदें बनवाई थीं। शाहजहाँ ने अजमेर को अपने अस्थायी निवास-स्थान के लिए चुना था। निकटवर्ती तारागढ़ की पहाड़ी पर भी उसने एक दुर्ग-प्रासाद का निर्माण करवाया था, जिसे विशप हेबर ने भारत का जिब्राल्टर कहा है। यह निश्चित है, मुगलकाल में अजमेर को अपनी महत्त्वपूर्ण स्थिति के कारण राजस्थान का नाक़ा समझा जाता था। अजमेर के पास ही अनासागर झील है, जिसकी सुन्दर पर्वतीय दृश्यावली से आकृष्ट होकर शाहजहाँ ने यहाँ पर संगमरमर के महल बनवाए थे। यह झील अजमेर-पुष्कर मार्ग पर है। 1878 में अजमेर क्षेत्र को मुख्य आयुक्त के प्रान्त के अजमेर-मेरवाड़ रूप में गठित किया गया और दो अलग इलाक़ों में बाँट दिया गया। इनमें से बड़े में अजमेर और मेरवाड़ उपखण्ड थे तथा दक्षिण-पूर्व में छोटा केकरी उपखण्ड था। 1956 में यह राजस्थान राज्य का हिस्सा बन गया। वर्तमान में अजमेर की जिला प्रमुख वंदना नोगिया है। भाजपा के जिला महामंत्री और समाज कल्याण बोर्ड के सदस्य सुदर्शन सबलानिया और भाजपा के जिला प्रवक्ता मोतीलाल सोलंकी यहाँ के मशहूर राजनेता है , दोनों ही चूरू ज़िले से सम्बन्ध रखते है।

यातायात और परिवहन[संपादित करें]

अजमेर पहुँचने के लिए सबसे बेहतर विकल्प रेल मार्ग है। दिल्ली से दिल्ली-अहमदाबाद एक्सप्रेस द्वारा आसानी से अजमेर पहुँचा जा सकता है। रेलमार्ग के अलावा राष्ट्रीय राजमार्ग 8 से निजी वाहन द्वारा भी बेहरोड और जयपुर होते हुए अजमेर पहुँचा जा सकता है।

कृषि और खनिज[संपादित करें]

अजमेर में कृषि मुख्य व्यवसाय है और मुख्यतः मक्का, गेहूँ, बाजरा, चना, कपास, तिलहन, मिर्च व प्याज़ उगाए जाते हैं। यहाँ पर अभ्रक, लाल स्फटिक घातु और इमारती पत्थर की खुदाई होती है।

उद्योग और व्यापार[संपादित करें]

सड़क व रेल मार्गों से जुड़ा अजमेर नमक, अभ्रक, कपड़े व कृषि उत्पादों का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र है और यहाँ पर तिलहन, होज़री, ऊन, जूते, साबुन व दवा निर्माण से जुड़े छोटे-छोटे अनेक उद्योग हैं। अजमेर कपड़ों की रंगाई व बुनाई तथा अपने हस्तशिल्प के लिए प्रसिद्ध है।

प्रमुख दर्शनीय स्थल[संपादित करें]

दौलत बाग, आनासागर झील, दरगाह शरीफ, अजमेर के क़रीब तीर्थराज पुष्कर है। कहा जाता है कि यह वही स्थान है जहाँ सुफी संत हजरत ख़्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती ने आख़िरी बार विश्राम किया था। जहाँ लोग दूर-दूर से दर्शन के लिए आते हैं। मकबरा हजरत ख्वाजा हुसैन चिश्ती (औलाद-ए-ख़्वाजा), मकबरा हजरत अलाउद्दीन चिश्ती (औलाद-ए-ख़्वाजा), सोनी जी की नस्सिया, नारेली तीर्थ, अढाई दिन का झोपडा, फोयसागर, अकबर का किला। अकबर की मैजीन इसी को कहा जाताहै

beawer

बाहरी कड़ियां[संपादित करें]

अजमेर

सन्दर्भ[संपादित करें]