अग्रोहा का निर्माण, पतन एवं पुनर्निर्माण

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अग्रोहा का निर्माण, पतन एवं पुनर्निर्माण[संपादित करें]

अग्रवाल जाति का विकास अग्रोहा से हुआ यह बात निर्विवाद है। इसके लिए किसी इतिहास आदि के प्रमाण की जरूरत नहीं है। अग्रवाल अपने गौत्र को की तरह अपने मूल स्थान को भी पीढ़ी दर पीढ़ी याद रखता है। महाभारत काल में (महाभारत में वर्णित) नकूल और कर्ण द्वारा भारत विजय के आधार पर अग्रोहा का निर्माण कलियुग से 50-60 वर्ष पूर्व का माना जाता है। जिसकी स्थापनामहाराजा अग्रसेन जी ने की थी। महाराजा अग्रसेन का जन्म लगभग 5100 वर्ष पूर्व राजा धनपाल की छठी पीढ़ी में प्रतापनगर के राजा बल्लभ के यहां हुआ था। प्रताप नगर का स्थान राजस्थान के श्री गंगानगर के आसपास का माना जाता है। महाराजा अग्रसेन जब युवा अवस्था में पहुंचे तो उस समय नागराज महीधर ने अपनी कन्या माधवी के लिए स्वयंवर रचाया। भूलोक के अनेक राजाओं के साथ देवराज इंद्र भी इस स्वयंवर में आए। नाग कन्या माधवी ने वरमाला महाराजा अग्रसेन के गले में डाल दी। यह विवाह दो संस्कृतियों का मिलन था।देवराज इंद्र नाग कन्या माधवी पर मोहित था तथा उससे विवाह रचाकर नागवंश को अपने साथ करना चाहता था परंतु इसमें उनको सफलता नहीं मिली। इससे उनके मन में महाराज अग्रसेन के प्रति द्वेष उत्पन हो गया और उनके राज्य में वर्षा बंद कर दी। इससे प्रताप नगर में भयंकर आकाल पड़ गया तथा चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई। इस पर महाराज अग्रसेन ने देवराज इंद्र पर चढ़ाई कर दी। महाराजा अग्रसेन के पास जो नैतिक बल था उसके सामने देवराज इंद्र की सेना नहीं टिक पाई और घबरा कर युद्ध से भाग गया। इस अवस्था में देवराज इंद्र ने देवर्षि नारद को महाराज अग्रसेन के पास संधि के लिए भेजा तथा देवर्षि नारद ने महाराजा अग्रसेन व देवराज इंद्र के बीच संधि करा दी। अकाल की स्थिति में महाराजा अग्रसेन जी ने धन के सारे भंडार प्रजा के लिए खोल दिए। राज्य के अन्य भंडार खाली हो गए। भंडारी ने राजमहल के उपयोग के लिए कुछ भंडार बचा लिया था। भूख से प्रजा का बुरा हाल था। महारानी माधवी को जब स्थिति का पता चला, उन्होंने भंडारी को डांटा और कहा कि राजा पिता के समान होता है और पिता का कर्तव्य है कि स्वयं भूखा रहकर बच्चो की उदर पूर्ति करे। उन्होंने राजमहल की सारी सामग्री अन्न आदि प्रजा में वितरित करा दी। राज परिवार के सदस्यों ने प्रायश्चित हेतु उपवास शुरू कर दिया। महाराजा अग्रसेन एवं महारानी माधवी ने धन-धान्य की देवी लक्ष्मी की अराधना शुरू की। महालक्ष्मी जी ने प्रसन्न होकर उन्हें दर्शन दिए तथा वरदान दिया कि पुत्र मैं तेरे कुल की देवी बनकर रहूंगी तेरे कुल को कभी भी किसी को भी कोई अभाव नहीं रहेगा तथा उन्हें महाप्रतापी होने का आशीर्वाद दिया। महालक्ष्मी जी ने महाराजा अग्रसेन को अपना अलग राज्य स्थापित करने को भी कहा। महालक्ष्मी जी से आशीर्वाद का कवच पहनकर महाराजा अग्रसेन जी ने अपने मंत्री परिषद के साथ भ्रमण किया। उन्होंने देखा कि झाड़ी की ओट में एक सिंहनी बच्चे को जन्म दे रही है। महाराजा अग्रसेन के लावलश्कर को देखकर उसके प्रसव में बांधा पड़ी तथा कुछ ही क्षछ्वाको में सिंहनी के प्राण पखेरू उड़ गए। सिंहनी के जन्मे नवजात शावक ने क्रोधित हो बड़ी तेजी से समीप खड़े हाथी पर प्रहार किया। महाराजा अग्रसेन जी इस दृश्य से काफी प्रभावित हुए तथा उनके दिमाग में यह बात बैठ गई कि निश्चय ही यह वीर भूमि है और यहां जन्म लेने वाले लोग वीर, पराक्रमी एवं साहसी होंगे। इस प्रेरणा से प्रेरित होकर उन्होंने इस भूमि पर अपने राज्य की राजधानी स्थापित करने का निश्चय किया और उसका नाम अग्रोदक रखा जिसे आजकल अग्रोहा के नाम से जाना जाता है। अग्रोदक सवा लाख धरों की सुव्यवस्थित बस्ती थी। महाराजा अग्रसेन ने एक तंत्रीय शाषण प्रणाली को समाप्त कर विश्व में सर्वप्रथम अपने ढंग की अनोखी लोक तंत्रीय शाखा प्रणाली का शुभारंभ किया। सम्राट बनकर अपने राज्य में समाजवाद की प्राण प्रतिष्ठा की। समाजवाद के माने सभी सम्मति समाज की, उन्होंने इसी सिद्धांत को प्रति स्थापित किया। सही माने में वे एक सच्चे प्रथम समाजवादी सम्राट थे। महाराजा अग्रसेन के राज्य में गरीब एवं ऊंचा-नीचा का कोई भेद नहीं था। अपने राज्य में हर नए आने वाले व्यक्ति को एवं मुद्रा एवं ईंट भेंट स्वरूप देने की परंपरा कायम की ताकि सभी समान होकर रहें। इस सभ्यता और संस्कृति ने भारतीय समाज ही नहीं बल्कि विदेशों को भी प्रभावित किया। उनके राज्य में न कोई छोटा न न कोई बड़ा, सब समान थे और समाज में पारस्परिक प्रेम, सहयोग, भाईचारे, त्याग आदि आदर्शों के कारण सुख-सरिता प्रवाहित होती थी। सभी एक-दूसरे के लिए जीते थे। शोषछ्वा का कही नाम नहीं था। वे वास्तव में लोकतंत्र एवं पंचायती शाशन के प्रेरक थे। महाराजा अग्रसेन ने 18 महायज्ञ आयोजित किए। उस युग में यज्ञ करना तथा उसमें सफलता प्राप्त करना सम्मानता का प्रतीक माना जाता है। अंतिम यज्ञ के समय महाराजा अग्रसेन जी ने देखा कि बलि के लिए लाए जा रहे पशु बलि के स्थान पर आगे बढ़ने की बजाय पीछे हट रहे हैं। महाराजा अग्रसेन के मन में पशुओं के प्रति करुणा उत्पन हुई और उन्होंने इस अंतिम यज्ञ में पशु बलि के स्थान पर श्री फल की पूर्ण आहुति दी। यह परंपरा आज भी चालू है। उन्होंने अपने राज्य में पशुवध पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध लगा दिया तथा सभी को अहिंसा का पाठ पढ़ाया। महाराजा अग्रसेन जी के 18 पुत्रथे। महाराजा अग्रसेन जी 18 यज्ञो में राजकुमारों के साथ बैठे। 18 गुरुओं के नाम पर 18 गौत्र को की स्थापना की। आज महाराजा अग्रसेन का अग्रवाल समुदाय इन 18 गौत्र को में विधिवत है। अपने गौत्र को छोड़कर अन्य गौत्र को में विवाह का नियम बनाकर एक सभ्य, सुसंस्कृत और मजबूत मानवीय समाज की आधारशिला रखी। ये 18 गौत्र गीता के 18 अध्यायों की भांति अलग-अलग होकर भी एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। महाराजा अग्रसेन ने अपने राज्य को 18 जनपदों में विभक्त कर अपने एक-एक पुत्रको उसका अधिशासी बनाया तथा विश्व में सर्वप्रथम लोक तांत्रिक प्रणाली का शुभारंभ किया। बिना रक्त की एक बूंद बहाए समाज में समानता लाने तथा वैभव को बांटने का यह प्रयत्न अनुपम है। एक सबके लिए सब एक के लिए, सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय पर आधारित ऐसा आदर्श अत्यंत दुर्लभ है॥ 108 वर्षों तक राज्य करने के पश्चात महाराजा अग्रसेन अपनी कुलदेवी महालक्ष्मी जी की आज्ञा से अपने बड़े पुत्रविभू को राज्य सौंपकर स्वयं वानप्रस्थ को चले गए।

'गौत्राधिपति ऋषि गौत्र वेद शाखा प्रवर सूत्र[संपादित करें]

  • पुष्पदेव गर्ग गर्ग युजर्वेदी माधुनी पंथ कात्यायनी
  • [[गेंदुमल ]] गोभिल गोयल ’’ ’’ त्रिप्रवर ’’
  • करणचंद कश्यप कुच्छल सामवेदी कोत्थमी ’’ गोभिल
  • मणिपाल कौशिक कंसल यजुर्वेदी माधुनी ’’ कात्यायनी
  • वृंददेव वशिष्ठ बिंदल ’’ ’’ ’’ ’’
  • ठावणदेव धौम्य धारण ’’ ’’ ’’ ’’
  • सिधुपति शांडिल्य सिंघल सामवेदी कोत्थमी ’’ गौतम
  • जैत्रसंघ जैमिनी जिंदल जुर्वे माधुनी ’’ कात्यायनी
  • मंत्रपति मैत्रय मित्तल ’’ ’’ ’’ ’’
  • तम्बोलकर्ण ताड़व तिगंल ’’ ’’ ’’ ’’
  • ताराचंद तैतिरेय तायल कृष्णयजूर आयुस्तभ ’’ ’’
  • वीरभान वत्स बंसल सामयजुर कोत्थमी ’’ गोभिल
  • वासुदेव धन्यास भंदल युर्जवेदी माधुनी ’’ कात्यायनी
  • नारसेन नागेंद्र नांगल सामवेद कोत्थमी ’’ गोभिल
  • अमृतसेन मांडव्य मंगल यजुर्वेदी शाकल्य ’’ अश्वालायन
  • इंद्रमल और्व ऐरण ’’ माधुनी ’’ कात्यायनी
  • माधवसेन मुद्गल मधुकुल ’’ शाकल्य ’’ अश्वालायन
  • गोधर गौतम गोयन ’’ माधुनी ’’ कात्यायनी