अखिल कुमार

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Akhil Kumar
Akhil Kumar at Jhalak Dikhla Jaa Bash
Akhil Kumar at Jhalak Dikhla Jaa Bash
जन्म (1981-03-27) मार्च 27, 1981 (आयु 34 वर्ष)
Flag of भारत Faizabad, Uttar Pradesh, India [1]
निवास Rohtak, Haryana, India
राष्ट्रीयता Indian
नागरिकता Indian
व्यवसाय Boxer Bantamweight
कद 168 cm
पदक रिकॉर्ड
Men's Boxing
Flag of India.svg भारत के प्रत्याशी
Commonwealth Games
स्वर्ण 2006 Melbourne Bantamweight
Asian Championships
कांस्य 2007 Ulan Bator Bantamweight

अखिल कुमार एक भारतीय मुक्केबाज हैं जिन्होंने मुक्केबाजी में कई अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय पुरस्कार जीते हैं। वे "ओपन गार्डेड" मुक्केबाजी शैली में पारंगत हैं। 2005 में भारतीय सरकार ने अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी में उनकी उपलब्धियों के लिए उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया। अर्जुन पुरस्कार भारत सरकार द्वारा खिलाड़ियों को दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है।

अखिल कुमार का जन्म 27 मार्च 1981 को उत्तर प्रदेश के फैजाबाद में हुआ था। तेरह साल की उम्र में उन्होंने मुक्केबाजी शुरू की. उनका पहला मुक्केबाजी मुकाबला हरियाणा राज्य के स्कूली स्तर पर था।

करियर[संपादित करें]

2004-2005[संपादित करें]

कुमार ने चीन के गुआंगझू में आयोजित प्रथम एआईबीए एशियन 2004 ओलंपिक क्वालीफाइंग टूर्नामेंट में दूसरा स्थान हासिल कर एथेंस गेम्स के लिए क्वालीफाई किया था। वहां फाइनल में वे उजबेकिस्तान के तुलाशबॉय डॉनियोरोव से हार गए थे। 2004 के ओलंपिक्स में वे पहले दौर में जेरोम थॉमस से हार गए थे।

2005 में कुमार ने स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में चौथे राष्ट्रमंडल संघ मुक्केबाजी मुकाबले में स्वर्ण पदक जीता. उन्होंने 54 किलोग्राम वर्ग के फाइनल में दक्षिण अफ्रीका के बोंगानी महालैंगू को 18-17 के बहुत ही कम अंतर से हराया था।[1]

2006 मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेल[संपादित करें]

2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने बैंटमवेट के 54 किलोग्राम वर्ग में पहले नाइजीरियाई नेस्टर बोलूम को हराया और फिर फाइनल में मॉरिशस के ब्रूनो जूली को हराकर स्वर्ण पदक जीता.

उन्होंने फाइनल के पहले राउंड में विरोधी मुक्केबाज पर ऐसे छह वार किए जिसका वो कोई जवाब नहीं दे सका. दूसरा राउंड कुछ बराबरी पर रहा जिसे कुमार ने 5-4 के अंतर से जीत लिया। तीसरे राउंड में उन्होंने थोड़ा और बेहतर किया और मुकाबले को 6-4 से जीत लिया और आखिरी राउंड में 3-4 से हारने के बावजूद सिंगल पंच से खुद को बचाने में कामयाब रहे जिससे उन्हें पूरा मुकाबला हारना पड़ सकता था।[2]

2008 बीजिंग ओलंपिक[संपादित करें]

बैंकॉक में एशियन बॉक्सिंग क्वालिफाइंग मुकाबले में कई दूसरों के चित करने के अलावा 2004 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक्स में रजत पदक जीतने वाले वोरापोज पेट्चकूम को हराकर कुमार 2008 ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई किया। ओलंपिक मुकाबले में उन्होंने बैंटमवेट 54 किलोग्राम वर्ग में फ्रांसीसी अली हलब को 12-5 के अंकों के आधार पर हराकर दूसरे दौर में जगह बनाई. राउंड-16 के दूसरे राउंड के मुकाबले में 2-6 से पिछड़ने के बावजूद उन्होंने बड़े ही विवादित तरीके[कृपया उद्धरण जोड़ें] से वर्तमान विश्व चैंपियन सर्गेई वोदोप्यानोव को हरा दिया. चौथे राउंड के अंत में स्कोर 9-9 की बराबरी पर था, लेकिन निर्णायकों ने ज्यादा संख्या में पंच मारने की वजह से कुमार के पक्ष में फैसला दिया.[3] 18 अगस्त 2008 को क्वार्टर फाइनल्स में वे मॉलडोवा के वीएसेस्लाव गोजान से 3-10 के अंतर से हार गए।

पुरस्कार[संपादित करें]

2005 में कुमार को अर्जुन अवार्ड मिला.

1994-2004[संपादित करें]

कुमार 1999 में पहली बार अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी मुकाबले में शामिल हुए थे और छठे वाईएमसीए जूनियर अंतर्राष्ट्रीय बॉक्सिंग चैंपिनयशिप में स्वर्ण पदक जीता था। 2001 में उन्होंने रूस में इंटरनेशनल इनविटेशनल बॉक्सिंग चैंपियनशिप में एक और स्वर्ण पदक जीता. 2003 में उन्होंने फ्लाईवेट वर्ग में विलितियो एम पायला (पीएचपी) को 20-16 के अंतर से हराकर स्वर्ण पदक जीता. बारह स्वर्ण, एक रजत और चार कांस्य पदकों के अलावा वे तीन बार सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज का अवार्ड भी जीत चुके हैं।

2004-2006[संपादित करें]

2004 ओलंपिक्स में वे जेरोम थॉमस से पहले राउंड के मुकाबले में ही हार गए थे। 2005 में स्कॉटलैंड के ग्लास्गो में चौथे राष्ट्रमंडल मुक्केबाजी चैंपियनशिप्स में उन्होंने स्वर्ण पदक जीता था। 54 किलोग्राम वर्ग में उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के बोनगानी महालैंगू को 18-17 के बहुत कम अंतर से हराया था। कुमार को 2005 में अर्जुन पुरस्कार मिला.

2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में उन्होंने बैंटमवेट के 54 किलोग्राम वर्ग में नाइजीरियाई नेस्टर बोलूम को हराया और फिर फाइनल में मॉरिशस के ब्रूनो जूली को हराकर स्वर्ण पदक जीता.

2008 बीजिंग ओलंपिक और एआईबीए विश्व कप

बैंकॉक में एशियन बॉक्सिंग क्वालिफाइंग मुकाबले में कई दूसरों को चित करने के अलावा 2004 के ग्रीष्मकालीन ओलंपिक्स में रजत पदक जीतने वाले वोरापोज पेट्चकूम को हराकर कुमार 2008 ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई किया।

ओलंपिक मुकाबले में उन्होंने बैंटमवेट 54 किलोग्राम वर्ग में फ्रांसीसी अली हलब को 12-5 के अंकों के आधार पर हराकर दूसरे दौर में जगह बनाई. राउंड-16 के दूसरे राउंड के मुकाबले में 2-6 से पिछड़ने के बावजूद उन्होंने वर्तमान विश्व चैंपियन सर्गेई वोदोप्यानोव को हरा दिया. चौथे राउंड के अंत में स्कोर 9-9 की बराबरी पर था, लेकिन निर्णायकों ने ज्यादा पंच मारने की वजह से कुमार के पक्ष में फैसला दिया. 18 अगस्त 2008 को क्वार्टर फाइनल्स में वे मॉलडोवा के वीएसेस्लाव गोजान से 3-10 से हार गए।

2008 में मॉस्को में हुए एआईबीए विश्व कप में कुमार ने क्वार्टर फाइनल्स में 15-6 के बड़े अंतर से जर्मनी के मार्सेल शिंडर को हराया. सेमीफाइनल्स में अंतिम स्कोर 4-4 था, लेकिन इस बार निर्णायकों ने उनके विरोधी के पक्ष में फैसला सुनाया. कुमार को कांस्य से संतोष करना पड़ा.[4]

उपलब्धियां[संपादित करें]

टूर्नामेंट, स्थान, प्रदर्शन चैम्पियंस ऑफ चैम्पियन टूर्नामेंट फरवरी 2009; चीन; कांस्य

वर्ल्ड एमेच्योर मैन बॉक्सिंग चैंपियनशिप; इटली; सितम्बर 2009 भाग लिया

विश्व कप 2008; मास्को; कांस्य

बीजिंग ओलंपिक मुक्केबाजी 2008; चीन; क्वार्टर फाइनल

बीजिंग ओलंपिक बॉक्सिंग क्वालीफाइंग; फरवरी 2008; बैंकाक; स्वर्ण (सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज)

24वां सीनियर एशियाई मुक्केबाजी चैम्पियनशिप जून 2007; मंगोलिया; कांस्य

15वां एशियाई खेल दिसंबर 2006; दोहा; भाग लिया

सैफ (SAF) खेल दिसंबर 2006; कोलंबो; स्वर्ण

18वां राष्ट्रमंडल खेल मार्च 2006; मेलबोर्न; स्वर्ण

13वां विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप नवम्बर 2005; चीन; भाग लिया

4था राष्ट्रमंडल मुक्केबाजी चैम्पियनशिप अगस्त 2005; स्कॉटलैंड; स्वर्ण

एथेंस ओलंपिक अगस्त 2004; एथेंस; भाग लिया

पूर्व, ओलंपिक अगस्त-मई 2004; एथेंस; कांस्य

"चाइना यूनिकॉम" मार्च 2004 (एथेंस ओलंपिक बॉक्सिंग क्वालीफाइंग); चीन; सिल्वर

पहला एफ्रो (AFRO)- एशियाई खेल नवम्बर 2003; हैदराबाद; स्वर्ण

तीसरा राष्ट्रमंडल मुक्केबाजी चैंपियनशिप सितम्बर 2003; मलेशिया; कांस्य

12वीं विश्व मुक्केबाजी चैम्पियनशिप जुलाई 2003; थाईलैंड; भाग लिया

सीनियर अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी चैम्पियनशिप; उजबेकिस्तान; स्वर्ण

सेकेंड एडॉर्डो गार्सिया अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट जून 2003; क्यूबा; स्वर्ण (सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज)

36वीं गेराल्डो कॉर्डोबा कार्डिन मुक्केबाजी टूर्नामेंट मई 2003; क्यूबा; भाग लिया

फेलिका स्टाम अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट अप्रैल 2002; पोलैंड; भाग लिया

रेगाटा मुक्केबाजी चैम्पियनशिप सितम्बर 2002; सेशेल्स; स्वर्ण (सर्वश्रेष्ठ मुक्केबाज)

21वीं एशियाई मुक्केबाजी चैम्पियनशिप जून 2002; मलेशिया; भाग लिया

25वीं किंग्स कप अप्रैल 2002; थाईलैंड; भाग लिया

प्रो॰ डॉ॰अनवर चौधरी कप मार्च 2002; अज़रबैजान; भाग लिया

11वीं अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी टूर्नामेंट सितंबर 2002; रूस; स्वर्ण

4थी ब्रंडेनबर्ग कप अगस्त 1999; जर्मनी; कांस्य

6वीं वाई.एम.सी.ए. अंतर्राष्ट्रीय मुक्केबाजी चैम्पियनशिप मार्च 1999; दिल्ली; स्वर्ण (ref: http://www.akhilkumarboxer.com/achi.htm)


कुमार ने एक बार कहा था, "जीत के लिए हो सकता है कि आपको अपने विरोधी को ज्यादा और जोर से मारना पड़ता हो, लेकिन चोट आपको भी लगती है।..यानी जीत हो या हार, दोनों ही दर्द के साथ मिलती है".

रिंग के बाहर कुमार एक बेहद ही सामान्य जीवन जीते हैं। दुनिया के सर्वश्रेष्ठ बैंटमवेट बॉक्सर को हराने के बाद कुमार को भारत में काफी लोकप्रियता मिली, भले ही वे अगला ही मैच हार गए थे। जीत के बाद उन्होंने जो एक बात कही थी उससे कई लोग काफी प्रभावित हुए थे, उन्होंने कहा था, "सपने वे नहीं हैं जो हम सोते हुए देखते हैं। सपने तो वे हैं जो हमें सोने ही न दें."(1) वे क्वार्टरफाइनल्स में हार गए, लेकिन उनकी लोकप्रियता वैसी ही बनी रही. ओलंपिक खत्म होने के कुछ हफ्तों के बाद कुमार ने स्वीकार किया कि वे अब भी उस हार का दर्द महसूस करते हैं और इससे विश्वास बना रहता है। उन्होंने कहा कि वे जिस शख्स को आदर्श मानते हैं वह वे खुद हैं। कुमार कहते हैं कि हालांकि उन्होंने भारत के लोगों का दिल तो जीत लिया, लेकिन "सच तो ये है कि मैं एक हारा हुआ व्यक्ति हूं, मैं स्वर्ण नहीं जीत सका". कुमार के मुताबिक इसकी भरपाई की शुरुआत आने वाले राष्ट्रमंडल खेलों और विश्व चैंपिनयशिप्स में स्वर्ण पदक जीतने से ही हो सकता है: "ये सिर्फ एक ही मेडल है जिसे काफी मेहनत से हासिल किया जाता है – स्वर्ण. दूसरे पदक तो किस्मत और भाग्य के सहारे जीते जाते हैं". उन्होंने कहा कि यही सबसे बड़ी वजह है कि अभिनव बिंद्रा एक भारतीय हीरो हैं। हार के बाद भी सकारात्मक रहने के बारे में वह कहते हैं, "मैं काफी सोच-समझ कर अपने आसपास के लोगों और कंपनियों के बारे में सूचनाएं प्राप्त करता हूं. इससे काफी फर्क पड़ता है ". उन्होंने कहा कि उनमें एक खासियत है कि वे गैरजरूरी चीजों को अलग करने में कामयाब रहते हैं। कुमार का कहना है, "मैं प्रेरणादायक और समर्पित कहानियां देखना और पढ़ना पसंद करता हूं. किसी चीज को देखने का मेरा यही नजरिया है".

फैजाबाद में जन्मे खिलाड़ी का कहना है कि मुक्केबाजी एक लत है, लेकिन नतीजे के साथ: "जीत के लिए हो सकता है कि आपको अपने विरोधी मुक्केबाज को अधिक और जोर से मारना पड़ता हो, लेकिन चोट आपको भी लगती है। जीत हो या हार, दोनों ही दर्द के साथ मिलती है". भारतीय दल के सीनियर मुक्केबाज होने के नाते अखिल कुमार बुरे समय में भी अपना जोश बनाए रखते हैं: "मैं जिस तरह का बर्ताव करता हूं, मेरे जूनियर अवाश्य ही उसका अनुकरण करते होंगे." वे इस बात से काफी खुश हैं कि आखिरकार भारतीय मुक्केबाजों ने मेडल जीतना शुरु कर दिया है। जीतेंदर और विजेंदर जैसे युवा मुक्केबाजों को वे कहते हैं: "मेडल सिर्फ जीतो नहीं, उन्हें छीन लो". भारत में मुक्केबाजी ने नया आयाम हासिल किया है। कुमार बताते हैं, "चूंकि हममें से ज्यादातर लोग दूर-दराज के इलाके से आते हैं, ऐसे में कोई भी ये नहीं जानता है कि हमारी काबीलियत क्या है".

कुमार ने बताया कि वह इस बात से काफी खुश हैं कि 2012 के लंदन ओलंपिक्स में महिला मुक्केबाजी को भी शामिल कर लिया गया है। कुमार ने कहा, "महिला मुक्केबाजी में हमारे पास बहुत अच्छी खिलाड़ी हैं और लंदन गेम्स में मेडल की उम्मीद की जा सकती है।..लेकिन महिलाओं को शामिल करने के लिए हम पुरुषों को चार वर्गों की कुर्बानी देनी पड़ी है".

स्कोरिंग सिस्टम में हुए बदलाव को लेकर कुमार खुश नहीं है और वे सोचते हैं कि इससे ये खेल आसान हो जाएगा और इसका आकर्षण भी कम होगा. "पहले मुक्केबाजी को इसके महान खिलाड़ियों (जैसे मुहम्मद अली) की शैली और शान के लिए याद किया जाता था, लेकिन बदलाव के बाद अब मुकाबले के दौरान सभी को अत्यंत सावधानी बरतनी पड़ेगी."

हाल ही में शूटिंग के ट्रायल सिस्टम (बिंद्रा) को लेकर हुए विवाद के बारे में जब उनसे पूछा गया तो कुमार ने कहा कि अपने-अपने तर्कों पर दोनों ही पक्ष सही थे। "ट्रायल हमेशा से ही महत्त्वपूर्ण है, यह कम लोकप्रिय खिलाड़ियों को भी अपनी काबिलियत दिखा कर राष्ट्रीय टीम में जगह बनाने का मौका देता है, लेकिन बिंद्रा का मामला थोड़ा अलग था, वह एक ओलंपिक चैंपियन हैं और वे अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लगातार अच्छा प्रदर्शन कर रहे थे, इसलिए आप उन्हें टीम के लिए नजरअंदाज नहीं कर सकते हैं".

बाह्य कड़ियां[संपादित करें]

संदर्भ[संपादित करें]