अखाड़ा

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महाभारत में वर्णित राजगीर का जरासंध अखाड़ा
इलाहाबाद में कुम्भ मेला के समय गंगा पुल को पार करता साधुओं का अखाड़ा

अखाड़ा शब्द दो अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त होता है-

  1. व्यायामशाला, जहाँ पहलवान कुश्ती आदि करते/सीखते थे, तथा
  2. अखाड़ा साधुओं का वह दल है जो शस्त्र विद्या में भी पारंगत रहता है।[1]

सन्दर्भ[संपादित करें]

आखाड़ा शब्द संस्कृत वर्ण माला का शब्द है। आखाड़ा मुख्य रूप से प्राचीनकाल में भारत के साधू संतों का एक ऐसा समूह होता था जो संकट के समय में राजधर्म के विरुद्ध परिस्थियों में, राष्ट्र रक्षा और धर्म रक्षा के लिए कार्य करता था। इस प्रकार के संकट से राष्ट्र और धर्म दोनो की रक्षा के लिए अखाड़े के साधू अपनी अस्त्र विद्या का उपयोग भी किया करते थे। इसी लिए अखाड़े के अंतर्गत पहलवानों के लिए एक मैदान होता था जिसमें सभी अखाड़े के सदस्य शरीर को सुदृढ़ रखने और संकट के समय में सुरक्षा की दृष्टि से खुद को एक से बढ़कर एक दांव-पेच का अभ्यास किया करते थे। साथ ही अस्त्र विद्या भी सीखते थे। वर्तमान समय में भी आखाड़े होते हैं जो आज भी राष्ट्र को संकट में आने पर ज्ञान आदि से लोगों को सही राह पर लाने के लिए तत्पर रहते हैं।

भारत के सबसे विशाल मेले कुम्भ में ये अखाड़े पूरी तन्मयता से आज भी सम्मलित होते हैं और शाही स्नान किया करते है। इन आखाड़ों का एक अध्यक्ष होता जिसका चुनाव एक जटिल प्रक्रिया के अधीन होता है। कुल 13 अखाड़े हैं।

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