अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी समिति

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
Jump to navigation Jump to search

उद्धेश्य[संपादित करें]

अपने आपमें एक अनूठा प्रयास। मौलिक चिंतन। एक आन्दोलन।

स्थापना[संपादित करें]

गांधी, शास्त्री जयन्ती - २ अक्टूबर १९९९ को स्वागत पत्रिका के नाम से लोकसभा सदस्यों को अभिनन्दन रूप में एवं अन्य नेताओं को प्रसाद रूप में अस्मिता का शंखनाद सादर समर्पित करते हुए इस पत्रिका की संपादिका प्रो॰ प्रितपाल 'बल' ने अपने प्राक्कथन में लेख किया : हटाओ और मिटाओ में आकाश-पाताल का अन्तर है। इस अन्तर को न समझ पाने से बहुत से लोग अंग्रेजी हटाओ का नाम सुनते ही आपे से बाहर हो जाते हैं और इस समिति के सदस्यों को पागल की पदवी से सुशोभित करने लगते हैं। अपना पागलपन हमें स्वीकार है। पर यह पागलपन बुद्धि का दिवालियापन न होकर ठीक वैसा है, जिसके बारे में सूफी फकीर ने कहा है- 'पा गल असली, पागल हो जा।'

हम पागल हैं राष्ट्रीयता के लिए, देश की अस्मिता के लिए, देश के नन्हें-मुन्नों की बुद्धि से हो रहे बलात्कार की रोकथाम के लिए, भारत के मस्तिष्क को विदेशी सड़ांघ से बचाने के लिए, देश के स्वतंत्र चिन्तन को न उभरने देने वाले आवरण को हटाने के लिए। हम अंग्रेजी भाषा के या उसे पढ़ाने के विरोधी नहीं हैं। अंग्रेजी की अनिवार्यता के तथा अंग्रेजी माध्यम की अनिवार्यता के और अंग्रेजी के सार्वजनिक प्रयोग के विरोधी हैं। हम अंग्रेजी को हटाना चाहते हैं, मिटाना नहीं चाहते। उस स्थान से हटाना चाहते हैं जहाँ रहकर वह हानि पहुँचा रही है। जहाँ हित कर सकती है वहां आदर पूर्वक रखना चाहते हैं। आज हिन्दुस्तान में उसने जो जगह हथिया रखी है, उसके कारण हिन्दुस्तानी बच्चे के दिमाग को लकवा मार रहा है, हिन्दुस्तानी युवकों का मौलिक चिन्तन ध्वस्त हो रहा है।

हमसे कहा जाता है कि माँ बाप को क्यों नहीं समझाते कि वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में न पढ़ावें। इस बारे में हम इतना ही कहेंगे कि आज अंग्रेजी के साथ इज्जत जुड़ी है, रुतबा जुड़ा है और नौकरी जुड़ी है। अत: कौन माँ-बाप अपनी संतान को इनसे वंचित रखना चाहेगा ? हमारी चोट सरकार की उस दुर्नीति पर है जिसके कारण देशी भाषाओं को अपनाने वाला न प्रतिष्ठा का पात्र बन पा रहा है और न भी माने जाने वाली आजीविका का।

हमसे यह भी कहा जाता है कि जब आप अंग्रेजी माध्यम स्कूलों के विरोधी हैं तो आर्यसमाज, सनातनधर्म, जैनियों, सिक्खों आदि की ओर से बड़े पैमाने पर खोले जा रहे अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों की निन्दा क्यों नहीं करते ? इनके खिलाफ आवाज क्यों नहीं उठाते ?

इस संबंध में हमारा मानना है कि ये सभी स्कूल सरकारी दुर्नीति की उपज हैं। ये संस्थाएँ स्वेच्छा से इन स्कूलों को नहीं खोल रहीं। सरकार की दुर्नीति से उन ईसाई मिशनरियों के स्कूलों को बढ़ावा मिल रहा था जो अंग्रेजी तथा अंग्रेजियत दोनों के पक्ष में हैं। ये स्कूल उन ईसाई स्कूलों के दुष्परिणाम को कम करने के लिए स्थापित किये जा रहे हैं। सरकारी नीति बदलते ही इन सबका माध्यम लोकभाषा हो जायेगा, ऐसा हमें विश्वास है। हम सरकार के नवोदय स्कूलों के अवश्य विरुद्ध हैं क्योंकि ये अंग्रेजी के प्रति रुझान बढ़ा रहे हैं। हम देहरादूनी शैली के अंग्रेजी स्कूलों के घोर विरोधी हैं, क्योंकि ये स्कूल अंग्रेजी और अंग्रेजियत के प्रचारक हैं। हमारे ईसाई भाई अंग्रेजी के साथ अपना रिश्ता जोड़कर अपने आपको गैरहिन्दुस्तानी प्रमाणित कर रहे हैं। ईसा मसीह की भाषा अंग्रेजी नहीं थी। उसने अपना उपदेश अरमैक भाषा में दिया था। आज वह भाषा मर चुकी है पर वह हिन्दुस्तानी भाषाओं के ज्यादा नजदीक थी।

हम अंग्रेजी की पढ़ाई बिल्कुल बंद करना नहीं चाहते। हम चाहते हैं कि अंग्रेजी के साथ रूसी, चीनी, अरबी, फारसी, जर्मदा आदि विदेशी भाषाओं का विकल्प रहे। विद्यार्थी इच्छानुसार विदेशी भाषा चुन सके। विदेशी भाषा की शिक्षा वैज्ञानिक ढंग से तथा यहाँ की लोकभाषाओं के माध्यम से दी जाये। उसमें भाषा ज्ञान अर्थात् समझने समझाने की शक्ति पर बल हो, साहित्य पर नहीं। उसे परीक्षा का माध्यम न बनाया जाये। यहाँ की नौकरी के लिए उसका ज्ञान अपेक्षित न हो।

हम विदेशी भाषाओं को राष्ट्रभवन की खिड़कियाँ मानते हैं। कोईर् भी समझदार गृहस्थ अपने भवन में एक ही खिड़की नहीं बनाता। किन्तु हमारे देश के नेताओं ने इस राष्ट्रभवन में अंग्रेजी के अलावा किसी अन्य खिड़की को बनाया ही नहीं। उन्होंने तो राष्ट्रभाषा की ड्यौढ़ी तथा लोकभाषाओं के दरवाजों को भी बन्द करके अकेली अंग्रेजी की खिड़की के द्वारा ही यहाँ के नागरिकों को गतागत कराने में गौरव समझा है।

आईये इस राष्ट्रीय अभियान में हमारा साथ दीजिए। अपने अपने क्षेत्रों में इस प्रकार के संगठन बनाकर अपने ढंग से अंग्रेजी के दुर्ग को ढाने का प्रयत्न कीजिए।

उन ढोंगी नेताओं को नकारिये जो संसद अथवा विधान सभा में अथवा सार्वजनिक मंच पर अंग्रेजी में बोलने को शान समझते हैं।

प्रकाशित पत्रिका[संपादित करें]

'स्वागत पत्रिका' अस्मिता का शंखनाद, संपादिका : प्रो॰ प्रितपाल 'बल'

पता : अंग्रेजी अनिवार्यता विरोधी समिति, नकोदर - १४४०४० (पंजाब)

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]