हुमायुन आजाद

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हुमायुन आजाद (२८ अप्रैल, १९४७ - ११ अगस्त २००४) (बांग्ला : হুমায়ুন আজাদ) बांग्लादेश के ढाका शहर में जन्मे एक प्रख्यात उपन्यासकार, कवि एवम आलोचक थे। उन्होने सत्तर से भी ज्यादा किताबें लिखीं जिसमें अधिकतर बांग्लादेश के रूढीवादी समाज, धर्म और सैन्य-शासन के खिलाफ हैं। तसलीमा नसरीन को बांग्लादेश ने केवल देश-निकाला करके बाहर भेज दिया था, परन्तु हुमायुन आजादको पहले धमकियों और बाद में कातिलाना हमलों का शिकार होना पड़ा। आखिरकार २७ अप्रैल २००४ को हुए एक खूनी हमले में वे बुरी तरह से घायल हो गए। हमले के बाद उनकी पत्नी उन्हें इलाज के लिए जर्मनी ले गईं, पर आजाद बच नहीं पाये।

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हुमायुन आजाद

साहित्यिक जीवन[संपादित करें]

सन १९७६ में ढाका विश्वविद्यालय से बांग्ला भाषा में एमए करने के बाद वे एडिनबरा विश्वविद्यालय से भाषाविज्ञान (लिंगुइसटिक्स) मे पीएचडी किये। लौट कर ढाका विश्वविद्यालय में बांग्ला विभाग मे अध्यापन कार्य में योगदान किये। १९७३ से वे कविता लिखना शुरु किये थे। १९९४ से उपन्यास लिखना शुरु किया उनहोने। साथ ही साथ भाषा पर पुस्त्कें भी लिखते रहे एवम समाज, धर्म, राजनीति पर आलोचनाएँ प्रकाशित करते रहे। लिंगुइसटिक्स पर लिखी उनकी पुस्तकें कोलकाता और ढाका सहित बहुत सारे विश्वविद्यालयों में पढ़ायी जातीं हैं। १९८० से जब वे ढाका के इत्तफाक अखवार में स्तम्भ लिखने लगे उनको मौका मिल गया बांग्लादेशी समाज के अन्दरूनी अन्धकार को लोगों के सामने लाकर उस पर आलोक डालने का। बांग्लादेशमें व्यक्ति, खासकर औरतों के हाल पर उनके टिप्पणियों को रूढीवादीयों में उनके शत्रु संख्या बढा दिये। समाज पर धर्मके कुप्रभाव को लेकर उनका लेखन-चिन्तन बहुतही उज्ज्वल और अनोखा था।

कातिलाना हमला[संपादित करें]

सन २००३ में उनके लिखे उपन्यास पाक सर जमिन साद बाद जब इत्तफाक अखवार में प्रकाशित होने लगे, उनके घर पर गुण्डों ने जाकर धम्की दी। परवाह नहीं किये आजाद। वे धारावाहिक लिख्ते गये। फिर २००३ मे वह पुस्तक के आकार में प्रकाशित होते ही कट्टरपंथीयों नें परलियामेन्टमे किताब को बैन करने का आवाज उठाया। रास्ते में दो-तिन बार उनको मारा-पिटा भी गया। फिर भी निडर आजाद उनके मनन-चिन्तन को प्रकाशमें लाना नहीं त्यागें। आखिरकार २७ ऐप्रिल २००४ को ढाका विश्वविद्यालय के बाहर जहां पुस्तक मेला चल रहा था गुण्डों ने उनको चारो तरफ से घेर लिया और शस्त्रों से हम्ला बोल दिया। वे खुन से लतपत होकर गिर पडे। इतने सारे चोट उनको लगे थे कि बांग्लादेश में उनका इलाज नाकम रहा। उनको जर्मनी ले जाया गया जहां वह ११ अगस्त २००४ को चल बसे। उनके हत्या का किनारा पुलिस नहीं कर पाया या करना नहीं चाहा। सन २००६ में जामातुल मुजाहादिन बांग्लादेश के कमान्डर ने रैपिड ऐकशन फोर्स को बताया था कि उनके गुण्डों ने ही हमला करवाया था। आजाद के देहान्त के बाद उनके बराबर का कोइ मनन-चिन्तन करनेवाले बांग्लादेश्में उभरकर नहीं आये।

कृतियां[संपादित करें]

कविता[संपादित करें]

  • अलौकिक इसटिमार (१९७३)
  • ज्वलो चिताबाघ (१९८०)
  • सब किचु नष्टोदेर अधिकारे जाबे (१९८५)
  • जतोइ गभीरे जाइ मधु जतोइ उपरे जाइ नील (१९८७)
  • आमि बेंचेचिलाम अन्यदेर समये (१९९०)
  • हुमायुन आजादेर श्रेष्ठो कविता (१९९३)
  • आधुनिक बांग्ला कविता (१९९४)
  • काफने मोडा अश्रुबिन्दु (१९९८)
  • काव्यसंग्रह (१९९८)
  • चोषा बोइ (१९९९)

उपन्यास[संपादित करें]

  • ५६ हाजार बर्गोमाइल (१९९४)
  • सब किचु भेंगे पडे (१९९५)
  • मानुष हिसाबे आमार अपराधसमूह (१९९६)
  • जादुकरेर मृत्यु (१९९६)
  • पाक सर जमीन साद बाद (२००३)

आलोचना[संपादित करें]

  • भाषा आंदोलन:साहित्यिक पटभूमि (१९९०)
  • नारी (१९९२)
  • प्रतिक्रियाशीलतार दीर्घ चायार निचे (१९९२)
  • निबिड नीलिमा (१९९२)
  • माताल तरणि (१९९२)
  • नरके अनन्त ऋतु (१९९२)
  • जलपाइ रंगेर अन्धकार (१९९२)
  • रबीन्द्र प्रबन्ध/राष्ट्र ओ समाजचिन्ता (१९९३)
  • आमार अबिश्वास (१९९७)
  • आमरा कि एइ बांग्लादेश चेयेचिलाम (२००३)

सन्दर्भ[संपादित करें]

बाह्यसूत्र[संपादित करें]