हिन्दी की साहित्यिक प्रवृत्तियाँ

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यहाँ पर हिंदी (खड़ी बोली) की साहित्यिक प्रवृत्तियों का विवरण है।

कविता[संपादित करें]

खड़ी बोली का आधुनिक साहित्य भारतेंदुयुग (1857-1900 ई.) में आविर्भूत हुआ। मध्यकालीन भक्ति और शृंगार की भाषा ब्रजभाषा ही रही किंतु जनजागरण, समाजसुधार संबंधी काव्य खड़ी बोली में लिखा गया। 18वीं शताब्दी से ही प्रचलित सधुक्कड़ी खड़ी बोली में रचित सीतल और भगवतरसिक, सहचरीशरण आदि संतों की वाणी और 19वीं शताब्दी के रितालगिरि, तुकनगिरि, रूपकिशोर आदि लावनीकारों की लावनी परंपरा में भी इस युग में लावनी, गजल और उद्बोधनात्मक कविताएँ लिखी गई, फिर भी खड़ी बोली का यह प्रयोगयुग था और भारतेंदु को यह शिकायत थी कि खड़ी बोली में कविता जमती नहीं।

द्विवेदीयुगीन काव्यधारा[संपादित करें]

भारतेंदुयुग के अंत में (1886-87) यह काव्यभाषा खड़ी हो या ब्रज, इस विवाद में श्रीधर पाठक के एकांतवासी योगी (1886 ई.) ने खड़ी बोली की काव्योपयुक्तता सिद्ध कर दी। अत: द्विवेदीयुगीन द्वितीय काव्यधारा में (1900-1920) खड़ी बोली में मुक्तक और प्रबंधकाव्यों की रचना हुई। रंग में भंग, जयद्रथवध, (1912), प्रियप्रवास (1912), रामचरितचिंतामणि, पथिक (1917), मिलन (1925) आदि प्रबंधकाव्यों में प्राचीन, नवीन वीरों का चरित गायन हुआ। "प्रियप्रवास" में भगवान् कृष्ण को जननायक रूप में चित्रित किया गया और पथिक में देशभक्ति की अनुपम झाँकी प्रस्तुत की गई। रीतिकालीन नायिकाभेद, उद्दाम शृंगार, उद्दीपनपरक प्रकृतिचित्रण और कवित्त, सवैयों के स्थान पर, आर्यसमाज और नवराष्ट्रजागरण के कारण मर्यादामय प्रेम, प्रकृति के आलंबनगत चित्रण, नवीन गीतिका, हरगीतिका आदि छंदों, संस्कृत के वर्णवृत्तों का प्रयोग, समाजसुधारात्मक तथा इतिवृत्तात्मक पद्यों की रचना, इस युग की प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं। महावीरप्रसाद द्विवेदी, मैथिलीशरण गुप्त, रामचरित उपाध्याय, बालमुकुंद गुप्त, सियारामशरण गुप्त, नाथूराम शर्मा "शंकर", अयोध्यासिंह उपाध्याय, रूपनारायण पांडेय, लोचनप्रसाद पांडेय और श्रीधर पाठक के प्रयत्न से खड़ी बोली की काव्योपयुक्तता का निर्णय हो गया। प्रियप्रवास और भारतभारती इस युग की विशिष्ट कृतियाँ मानी जाती हैं। शैली की दृष्टि से यह युग अभिधावादी ही रहा, उद्गार और उद्बोधनात्मक काव्य में सूक्ष्म कला का विकास संभव न हो सका।

छायावाद तथा रहस्यवाद[संपादित करें]

छायावाद और रहस्यवाद (1920-35) तृतीय काव्यधारा है। 19वीं और 20वीं शताब्दी में अंग्रेजी शिक्षा संस्थाओं के कारण अंग्रेजी के स्वच्छंदतवादी काव्य का प्रभाव प्रत्यक्षत: और अप्रत्यक्षत: बँगला के माध्यम से हिंदी काव्य पर पड़ा। अत: तृतीय धारा के छायावादी तथा रहस्यवादी काव्य में द्विवेदीयुगीन स्थूल मर्यादावाद, प्रवचनात्मकता और विवरणात्मक प्रकृतिचित्रण के स्थान पर स्वच्छंद प्रेम की पुकार, प्रेयसी का देवीकरण, अंतरराष्ट्रीयता और विश्वमानववाद, प्रकृति और प्रेयसी के माध्यम से निजी आशानिराशाओं का वर्णन, प्रकृति पर चेतना का आरोप, सौंदर्य अनुसंधान, अलौकिक से प्रेम के कारण द्विवेदीयुगीन स्थूल संघर्ष से पलायन, गीतात्मकता, लक्षण, विशेषणविपर्यय तथा भाषा का कोमलीकरण प्रत्यक्ष और प्रमुख प्रवृत्तियाँ हैं। प्रसाद (आँसू, लहर, झरना, कामायनी), सुमित्रानंदन पंत (पल्लव, गुंजन), निराला (जुही की कली, गीतिका के गीत आदि) और महादेवी ने परोक्ष सत्ता को प्रेम का विषय बनाकर प्रकृति में उसके आभास, आत्मनिवेदन और संयोगवियोग की कलात्मक अभिव्यक्तियों द्वारा काव्य को अलंकृत, लाक्षणिक, गीत्यात्मक और सूक्ष्म बनाया। द्विवेदीयुगीन राष्ट्रीयता की गूँज इन कवियों में यत्र तत्र मिलती है, विशेषकर निराला के बादलराग, जागो फिर एक बार आदि कृतियों में। पुनर्जागरण का पौरुषपरक रूप निराला में (राम की शक्तिपूजा), और सांस्कृतिक रूप उपनिषदों के ब्रह्मवादी दर्शन में मिला। कामायनी तृतीय धारा की सर्वोत्कृष्ट कृति है जिसमें रहस्यमय सत्ता की प्राप्ति के आवरण में पुरुष नारी, राजा प्रजा, प्रकृति पुरुष और मानवीय वृत्तियों में सामरस्य स्थापित करने का संदेश प्रस्तुत किया गया। तृतीय धारा में निराला ने मुक्त छंदों, पंत ने संस्कृत वर्णवृत्तों के स्थान पर हिंदी के छंदों, महादेवी और प्रसाद ने गेय गीतों का प्रयोग किया। प्रकृति और प्रेम के भव्य, मार्मिक चित्रण इस युग की विशिष्ट उपलब्धियाँ हैं। अंगरेजी के शेली, कीट्स और बँगला के कवींद्र रवींद्र से प्रभावित होने पर हिंदी का छायावादी रहस्यवादी काव्य अपनी विशिष्टता की दृष्टि से मौलिक और मार्मिक है। कामायनी में चिंता, आशा, वासनादि मनोवृत्तियों, निराला के तुलसीदास और राम की शक्तिपूजा में मानसिक अंतर्द्वद्वों, महादेवी के गीतों में मीरा जैसी विरह वेदना और पंत के प्रकृतिचित्रण में सौंदर्यविधान इतना आकर्षक हुआ है कि यह युग हिंदी काव्य का स्वर्णयुग कहा जाता है। भाषा का शृंगार और सांकेतिक शक्ति का विकास अपनी चरम सीमा पर इसी युग में पहुँचा।

हालावाद तथा मांसलवाद[संपादित करें]

छायावाद के उत्तरकाल (1930 के पश्चात्) में छायावादी सूक्ष्म, लाक्षणिक रहस्यवादी अभिव्यक्ति के विरुद्ध हालावाद (बच्चन की मधुशाला, मधुबाला 1933-35) और मांसलवाद (अंचल की अपराजिता 1930, मधूलिका आदि) का प्रवर्तन हुआ। बच्चन की हालावादी रचनाओं में फारसी उर्दू के सूफ़ियाना काव्य की मस्ती, दीवानगी, मर्यादावाद का विरोध और भोगवादी दृष्टिकोण व्यंजित हुआ है। मांसलवाद में वासना की घोषणा ही प्रधान होती गई। नरेंद्र शर्मा (प्रवासी के गीत) में क्षयी रोमांसवाद की निराशा और भगवतीचरण वर्मा में आत्मविज्ञप्ति अधिक मिलती है। हालावाद और मांसलवाद एक ओर तो द्विवेदीयुगीन संयमवाद और परंपरागत नैतिकतावाद के विरुद्ध था और दूसरी ओर इसमें छायावाद की अस्पष्ट, धूमिल, गहन प्रेमानुभूति के स्थान पर अभिधामय आत्मविज्ञान अधिक था। उर्दू की "तरजे अदायगी" की ये रचनाएँ युवकों में अधिक प्रिय हुई।

प्रगतिवाद[संपादित करें]

खड़ी बोली की चतुर्थ धारा प्रगतिवाद (1936 के पश्चात्) है। छायावादयुग में ही रूसी राज्यक्रांति के प्रभाववश साम्यवादी धारणाओं का प्रचार हो चुका था। 1935-36 में प्रगतिशील लेखकसंघ की स्थापना हुई। प्रगतिवाद कवि मार्क्सवाद से प्रभावित कवि थे। पंत जी के युगांत, युगवाणी, निराला की "वह तोड़ती पत्थर," "बादलरांग", "कुकुरमुत्ता", "अणिमा", "नए पत्ते" आदि द्वारा इसका रूप स्पष्ट हुआ। यह आंदोलन सामंतवादी - पूँजीवादी तत्वों और साहित्यक्षेत्र में प्रतिक्रियावादी प्रवृत्तियों के विरुद्ध क्रांति लेकर उपस्थित हुआ। जनता के दारिद्र्य, पूँजीपतियों के विरुद्ध आक्रोश, इतिहास, धर्म, संस्कृति, कला की भौतिकवादी व्याख्या, ब्रह्मवाद का विरोध तथा छायावादी अलंकृत शैली के विरुद्ध अभिधावादी शैली का प्रयोग इस धारा की प्रमुख विशेषताएँ हैं। छायावाद में शृंगार तथा प्रगतिवाद में करुण, वीर, रौद्र रसों को अधिक अभिव्यक्ति मिली। किंतु द्विवेदीयुग के सदृश इस युग में पुन: स्थूलता का आगमन हुआ, इसमें कला कम गर्जन तर्जन, उद्गार अधिक मिलते हैं। रांगेय राघव (पिघलते पत्थर, आक्रमण), दिनकर (हुंकार), केदारनाथ अग्रवाल, शिवमंगलसिंह सुमन (जीवन के गान), नागार्जुन, भगवतीचरण वर्मा (भैंसागाड़ी) शमशेर, पंत जी (ग्राम्या), गजानन, मुक्तिबोध, रामविलास शर्मा, उदयशंकर भट्ट, अंचल, नरेंद्र शर्मा आदि ने प्रगतिवादी काव्य की सृष्टि की। प्रेमचंद का "हंस" इस साहित्य का मुखपत्र था। प्रगतिवादियों ने छायावादियों के विरुद्ध जीवन के यथार्थ को वाणी दी। प्रकृति को रेमानी दृष्टि से न देखकर उसे जीवन की वास्तविकता के संदर्भ में रखकर देखा है। प्रगतिवादी काव्य में व्यंग्य का सर्वाधिक विकास हुआ है। प्रगतिवाद आज भी एक जीवंत काव्यधारा है, उसने अब हुंकारात्मक रूप छोड़कर अधिक सूक्ष्म और कलामय रूप अपनाया है।

प्रयोगवाद[संपादित करें]

खड़ी बोली काव्य की पंचम धारा प्रयोगवाद कहलाती है (1943 ई. के पश्चात्)। स. ही. वा. अज्ञेय ने, जो प्रगतिवादी भी रह चुके थे, 1943 में प्रथम तारसप्तक में मुख्यत: प्रगतिवादी कवियों की नए ढंग की प्रयोगात्मक रचनाएँ प्रकाशित की। 1951 में द्वितीय सप्तक प्रकाशित हुअ। इसके पश्चात् इस धारा को "नई कविता" नाम मिला। प्रयाग की "नई कविता", हैदराबाद की "कल्पना" और दिल्ली की "कृति" नामक पत्रिकाओं के अतिरिक्त अज्ञेय, गिरिजाकुमार माथुर, नरेश मेहता, प्रभाकर माचवे, डा. देवराज, शंभुनाथ सिंह, जगदीश गुप्त, धर्मवीर भारती, रघुवीर सहाय, शमशेर, बालकृष्ण राव, लक्ष्मीकांत वर्मा आदि के काव्यसंग्रहों और स्फुट रचनाओं से प्रयोगवाद या नई कविता का रूप स्पष्ट हुआ। यह काव्य मुख्यत: छायावादी रोमानी दृष्टि और अलंकृति तथा प्रगतिवादी अनगढ़ता के विरुद्ध "रूपवादी आंदोलन है। छायावाद का प्रेरणास्रोत अंग्रेजी का रोमांटिक काव्य और प्रयोगवाद का प्रेरणास्रोत यूरोप का प्रतीकवाद (फ्रांस), अतियथार्थवाद, अस्तित्ववाद तथा आधुनिक चित्रकलावाद था। प्रगतिशील प्रयोगवादियों पर योरोपीय प्रभाव केवल शिल्प की दृष्टि से ही है किंतु प्रयोगवादी कथ्य के विरोधी प्रयोगवादियों पर उक्त प्रभाव अधिक घनीभूत है; इसमें व्यक्ति की अस्तित्व आशंका, अनास्था, अवसाद, निराशा, भ्रमनाश, सामाजिकता के विरुद्ध व्यक्तिवाद, महत्ता के स्थान पर "लघुतावाद" अवचेतनस्थित कुंठा, आदि को प्रतीकात्मक और बिंबात्मक शैली में व्यक्त किया गया है। "रस" के स्थान पर बुद्धिवाद, कथ्य को प्रतीकों और बिंबों द्वारा यथावत् प्रस्तुत करने की चेष्टा, भाषा के नवीन प्रयोग, वार्तालापात्मक और वक्तव्यपरक शैली पर बल, गूढ़ और अब तक अछूते विषयों की अभिव्यक्ति इस धारा की विशेषतएँ हैं। प्राचीन आख्यानों का नवीन प्रश्नों को प्रस्तुत करने के लिए प्रयोग किया गया है। छंदों की दृष्टि से यह धारा पूर्ण स्वच्छंद है। "छंदगंध" मात्र ही इस नए काव्य में अधिक है। शब्दलय के स्थान पर अर्थलय के प्रयोग पर अधिक बल दिया गया है, यद्यपि बहुत से कवि गद्यात्मकता के साथ साथ मुक्त छंदों का भी प्रयोग करते हैं। चित्रकला के प्रभाववाद, भविष्यवाद, यथादृश्यवाद तथा टी. एस. इलियट, एज़रा पौंड, बॅदलेयर, मलामें, रिल्के, रिंबों आदि कावियों की कला से नई कविता अत्यधिक प्रभावित है। लोकजीवन से प्रभावित कविताएँ भी लिखी गई हैं। घोर व्यक्तिवाद, क्षण में अनुभूत अनुभूतियों की बिंबात्मक अभिव्यक्ति से जहाँ नवीनता की सृष्टि अधिक हुई हैं - विशेषकर नूतन अप्रस्तुत विधान के क्षेत्र में, वहीं भाषा की अव्यवस्थता, अभिव्यक्ति की अस्पष्टता, धूमिल संकेतात्मकता, भावदारिद्र्य, छंदद्रोह और बौद्धिक आग्रह इस काव्य के दोष हैं।

नवगीतवाद[संपादित करें]

खड़ी बोली की षष्ठ धारा है नवगीतवाद। बच्चन, नीरज, वीरेंद्र मिश्र, शंभुनाथ सिंह, रंग, रमानाथ अवस्थी, ठाकुरप्रसाद सिह, अंचल, सुरेंद्र तिवारी, सोम, कमलेश, केदारनाथ सिंह, गिरधर गोपाल, रामावतार त्यागी, गिरजाकुमार माथुर, कैलास वाजपेयी, राही, सुमन और नेपाली आदि गीतकारों ने प्रेम, प्रकृति और समाज के विषय में नूतन अप्रस्तुत विधान द्वारा पदार्थछवियों और भावनाओं को वाणी दी है। अपेक्षाकृत सरल और स्पष्ट भाषा का प्रयोग, अहंसापेक्ष अनुभूतियों को अहंनिरपेक्ष करने का चाव और कविसम्मेलनों में अधिकाधिक जनप्रियता पाने की इच्छा, इन कवियों की विशेषता है। नई कविता की परिपाटी पर "नए गीत" भी आज के काव्य की उपलब्धि है।

इन नवीन धाराओं के अतिरिक्त परंपरागत शैली में प्रबंधकाव्य भी लिखे जाते हैं। तक्षशिला (उदयशंकर भट्ट), नूरजहाँ, (गुरुभक्त सिंह), उर्मिला (नवीन), सिद्धार्थ और वर्द्धमान (अनूप शर्मा), दैत्यवंश (हरदयालुसिंह), छत्रसाल (लालधर त्रिपाठी "प्रवासी") पार्वती (रामानंद तिवारी) आदि ऐसे ही काव्य हैं। इधर गांधी, प्रेमचंद, मीरा आदि पर भी प्रबंधकाव्य लिखे गए हैं। दिनकर की "उर्वशी" पुरानी शैली में एक उल्लेखनीय उपलब्धि है जिसमें कामायनी और पार्वती के समान मानवमन के शाश्वत अंतर्विरोध का आकर्षक वर्णन है। किंतु नवीनतावादियों की तुलना में परंपरागत प्रबंधकाव्यों का सम्मान कम हो रहा है।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]