आज हमारे सामने नशा रूपी दानव सबसे बड़ी सामाजिक समस्या बनकर उत्पन्न हो रहा है, युवाओं के नशे का शिकार होना , जो कल के होने वाले देश के जांबाज कर्णधार हैं आज वही सबसे ज्यादा नशे के शिकार हैं। जिनको देश की उन्नति में अपनी ऊर्जा लगानी थी वो आज अपनी अनमोल शारीरिक और मानसिक ऊर्जा चोरी, लूट-पाट और हत्या जैसी सामाजिक कुरीतियों में नष्ट कर रहे हैं, आज का 90 प्रतिशत युवा नशे का शिकार है, जिस तरह से टेक्नोलॉजी विकसित हुई है, ठीक उसी तरह से नशे के सेवन में भी नई टेक्नोलॉजी विकसित हुई है। आज का युवा शराब और हैरोइन जैसे मादक पदार्थों का नशा नहीं बल्कि कुछ दवाओं का इस्तेमाल नशे के रूप में कर रहा है, इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि इस तरह की दवाएं आसानी से युवाओं की पहुँच में हैं, और इनके सेवन से घर या समाज में किसी को एहसास भी नहीं होता कि व्यक्ति ने किसी भी मादक पदार्थ का सेवन किया है ।
हमारे देश में इस समय नशे का समान धड़ल्ले बिक रहा हैं जिससे इस कारोबार को करने वाले रातोरात करोड़ पति बन रहे हैं नशे का समान बेचकर अपने जिंदगी को एशो-आराम से बिता रहे हैं, पर कई हजार घरों को उजाड़ रहे हैं तथा हर वर्ष कई जिंदगियां नशे में जान गवां रही हैं इसकी रोकथान के सारे उपाय अभी तक निष्फल साबित हो रहे हैं. स्मैक जैसे खतरनाक नशे का सामान धड़ल्ले से बिकता हैं जो भी व्यक्ति इस नशे का एक बार आदी हो गया, उसको जिंदगी भर यह नशा पीछा नहीं छोड़ता हैं. नशा करने वाले व्यक्ति को समग्र नशा अवश्य चाहिए . नहीं तो वह व्यक्ति किसी भी हद तक जाकर नशा हासिल करना चाहता हैं. इसके लिए कोई भी अपराध करने को तैयार रहता हैं कारोबार करने वाले तो विल्डिंग और गाड़ी के मालिक हो जाते हैं, परन्तु इतने नवयुवक इस नशे में अपने घर का सारा सामान बेंचकर नशा करने में ही अपनी जिंदगी समझ रहे हैं सब कुछ समाप्त होने के बाद उनको बेंचने के लिए कुछ नहीं रहता हैं तो वो अपना खून नर्सिगहोम या अन्य स्थानों पर बेंचकर यह नशा करते हैं नशा खोर की जिंदगी में जब ऐसा समय आ जाता हैं तो उनकी जिंदगी गिनती के दिनों की रह जाती हैं. अब तक हमारे देश में अनेक इस नशे के चलते जान गवां चुके हैं पर कारोबार दुगनी तेजी से बढ़ रहा है
कानून बना मजाक सार्वजनिक स्थान पर धुम्रपान करना कानून अपराध की श्रैणी में आता है किन्तु ऐसा करने से कोई नहीं मान रहा है। रेलवे स्टेशन , बस स्टैण्ड के अलावा सरकारी कार्यालयों में तैनात कर्मचारी ही धुएं की दो कश लेते नजर आते हैं। जब सरकारी कर्मचारी ही कानून की खुलेआम अव्हेलना करने के लिये आतुर हैं तो भला आम जनता से क्या अपेक्षा की जाऐ, जबकि सभी शासकीय संस्थानों में धूम्रपान करना वर्जित है। इतना ही नहीं सरकारी संस्थानों एवं सार्वजनिक स्थानों पर चेतावनी भी दे रखी है इसके बावजूद इस कानून का पालन नहीं करवाया जा रहा है। ये नजारे अब आम हो गये हैं जो कि रेल्वे स्टेशन, बैंक , कचहरी, शासकीय विद्यालयों , कॉलेजों , बस स्टैण्ड , शासकीय चिकित्सालय और कई शासकीय एवं गैर शासकीय संस्थानों में देखने को मिलते हैें। अब धार्मिक स्थलों से अधिक हमारे देश में तम्बाकू और पान की गुमटियाँ मिलती है , यहां तक की शैक्षणिक संस्थान भी इस समस्या से अछुते नहीं रहे । शिक्षा के मंदिर कहे जाने वाले स्थानों के करीब ही इन नशीले उत्पादों का व्यापार फल फूल रहा है। इतना ही नहीं जिले भर में स्कूलों के पास गुटखा पाउच की बिक्री भी की जा रही है। खास बात यह है कि प्रशासन की ओर से इस पर रोक लगाने के लिए कोई कारर्वाई नहीं की जा रही है। यह है शहर की स्थिति शहर में शासकीय उत्कृष्ट विद्यालय, गर्ल्स स्कूल, सरस्वती शिशु मंदिर, सेंट अलॉयसिस, सेंट जोसेफ स्कूल से कुछ दूरी पर ही बीड़ी सिगरेट की दुकानें खुली हुई है। बायपास रोड स्थित सरकारी व निजी कॉलेजों के बाहर भी गुटखा, बीड़ी, सिगरेट की दुकानें संचालित हैं। शैक्षणिक संस्थाओं के पास गुटखा आदि की बिक्री से छात्रों पर बुरा प्रभाव पड़ रहा है। अंचल में भी है यही स्थिति गुटखा प्रतिबंध बेअसर प्रदेश सरकार ने गुटखा बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है। लेकिन गुटखा बिक्री करने वालों पर कारर्वाई नहीं की जा रही है। यही वजह है कि स्कूलों के पास भी खुलेआम गुटखा पाउच की बिक्री की जा रही है। शिक्षण संस्थाओं के पास तंबाकू गुटखा बिकने से बच्चों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ रहा है। स्टाईल के लिये करते हैं युवा धुम्रपान आज के युवा दिखावे के चक्कर में धूम्रपान करते हैं। कहीं वे फिल्मी हीरो से प्रेरित होते हैं तो कभी अपने आस - पास के वातावरण से । उनकी आँखें तब खुलती है जब वे गंभीर बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं। लेकिन तब तक जिंदगी का एक बहुत ही महत्वपूर्ण हिस्सा निकल चुका होता है । भारत में 2200 लोग रोज तम्बाकू सेवन से काल के गाल में समा जाते हैं और करीब 9 , 00,000 लोग साल भर में मृत्यु को प्राप्त करते हैं। करीब 5500 लोग रोज सिगरेट , बीड़ी पीना सीखते हैं। यह लत भी प्रोफेशनल कॉलेज के छात्रों में 90 फीसदी तक पाई जाती है। तकरीबन 36 प्रतिशत बच्चे 10 साल की उम्र से पहले स्मोकिंग करना सीखते हैं । इनमें कई गांजा - स्मैक और सर्दी , खांसी में इस्तेमाल में लाई जाने वाली दवाइयों का सेवन नशे के रूप में करते हैं। हमारे देश का एक बड़ा हिस्सा आज इस बुरी लत की चपेट में है । इसका कारण जगह - जगह आसानी से प्राप्त हो जाने वाला यह सस्ता जहर है जिसे गुटखा , बीड़ी , सिगरेट , तम्बाकू, श्राब , गांजा , स्मैक , सिलोचन और व्हाईटनर के रूप में जानते हैं। आज लोग नशा करते आसानी से मिल जाते हैं। सिर्फ यहीं नहीं बल्कि 10 साल तक ड्रग एडिग के बच्चे रेल्वे स्टेशन , बस स्टैण्ड , जैसे स्थानों पर नशा करते देखे जा सकते हैं , ये शराब , सिगरेट , गुटखा और व्हाईटनर जैसे उत्पादों का सेवन करते हैं ।
नशा है विनाश का द्वार इस तरह का नशा बच्चे , युवा, बुजूर्ग सभी के लिये अहितकर होता है जो एक नहीं अपितु अनेक बीमारियों को खुला न्यौता देता है । इसके कारण तर्क शक्ति कम होना, निर्णय क्षमता खत्म होना, स्वंय पर नियंत्रण की गिरावट , दर्द और संवेदना में कमी, अनिश्चित भावनाओं का विकास, कम सजगता, चेतना की कमी जैसे परिवर्तन होते हैं जो नुकसानदेय हैं । इस बुरी लत के शिकार लोग अपना ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिये खतरा हैं जो कि पैसे न होने पर नशे की पूर्ति के लिये कई आवांछनिय गतिविधियों अपहरण, लूट-पाट, चोरी , हत्या , बलात्कार आदि में पूर्णत: लिप्त हो जाते हैं। अल्कोहल से युक्त दवाओं का सेवन नशे के रूप में करते हैं , इस लत के शिकार युवक शहर के मेडीकल स्टोर्स में कोरंक्स, फेंसीडील की ब्रिकी बंद होने के बाद अब खांसी की दवा का इस्तेमाल नशे के लिये करते हैं इन दवाओं के गलत उपयोग होने के चलते मेडीकल स्टोर्स में इन दवाओं की बिक्री पर पूर्णत: प्रतिबंधित है जिसके कारण संबंधित रोगों के लिये जरूरतमंद रोगियों को यह दवाएं नहीं मिल पाती , फिर नशे के शिकार लोग इन दवाओं को उच्च कीमत पर प्राप्त करते हैं, इन दवाओं में प्रॉक्सीवान, स्पास्मो प्रॉक्सीवान, अलफाजोल्म जैसे टैबलेट शामिल हैं, इन दवाइयों में पाए गए साल्ट न तो बिना लाइसेंस बेचे जा सकते हैैं, न ही अनुज्ञापत्र में निर्धारित स्थान के अलावा कहीं और इनका भंडारण किया सकता है जोकि बिना डॉक्टर की पर्ची के नहीं दी जाती पर नशे के शिकार लोगों को ये दवाएं चिकित्सक की अनुमति के बिना उच्चदामों पर कौन ? कहाँ? और कैसे? उपलब्ध करा रहा है यह एक चिंतनीय विषय है अंतरहवासी क्षेत्रों मोहल्ले, गलियों , नुक्कड़ और चौराहों पर बच्चे , युवक अब सिलोसन, व्हाईटनर, पैट्रोल, क्यूफिक्स, बोनफिक्स जैसे उत्पादों का उपयोग सूंघकर नशा करने के लिये करते हैं, जो इन्हें कुछ आनन्द के पल तो देता है पर धीरे - धीरे वह उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतय: विकलांग बना देता है जिनसे समाज कि ही क्या? अपितु उनके स्वयं के निर्माण की परिकल्पना भी नहीं की जा सकती ....
कामयाबी बीते दिनों नई दिल्ली में नशीले पदार्थों की बरामदगी के दो बड़े मामले सामने आए. एक में महिपालपुर स्थित एक कोरियर कंपनी के दफ्तर पर छापा मार कर इंटेलीजेंस विभाग ने एक पार्सल बरामद किया जिसमें से 14 किलों से अधिक हशीश बरामद की जिसे कोलकाता के सैय्यद मो. हुसैन द्वारा हांगकांग भेजा जा रहा था. दूसरे मामलें में मायापुरी स्थित एक कोरियर कंपनी के दफ्तर पर इंटेलीजेंस विभाग के छापे में करोड़ों की हेरोइन बरामद की गई. इसे एक नाइजीरियन मोबाइक लिपाइक मोनिज द्वारा वीआईपी वाहनों पर लगने वाली लाल व नीली बत्तियों के पार्सल के बीच में छिपाकर अमेरिका भेजा जा रहा था. इस तरह नशीले पदार्थों की बरामदगी अब रोजमर्रा की बात हो गई है. हाल ही में दिल्ली में सीमा शुल्क एवं केन्द्रीय उत्पाद शुल्क के मुख्य आयुक्तों और महानिदेशकों के सम्मेलन में एक नए तथ्य का खुलासा हुआ कि देश में आतंकी गतिविधियों में संलिप्त आतंकियों का पेट पालने के लिए सीमा पार बैठे उनके आका देश में चोरी छिपे ड्रग्स भेज रहे हैं. देश में आतंकियों को फंडिग के लिए ड्रग्स के कारोबार को मुख्य जरिया बना दिया गया है. ड्रग्स की तस्करी के इस नए पैटर्न ने सुरक्षा एजेंसियों के होश उड़ा दिए .... कारण पाकिस्तान और अफगानिस्तान से अवैध तरीके से मादक पदार्थों की खेप हर साल तेजी से बढ़ रही है और उस पर अंकुश नहीं लग पा रहा है. हर साल पाकिस्तान से अफगान निर्मित हशीश की बड़ी मात्रा में देश में लायी जाती है जिसमें से काफी कुछ पकड़ी भी जाती है. बीते साल ही डीआरआई ने 1267 किलोग्राम प्रतिबंधित केटामाइन हाइड्रोक्लोराइड जब्त किया था जो तीन साल पहले के मुकाबले दो गुना ज्यादा है. केटामाइन के अलावा एसेटिक एनहाइड्राइड की तस्करी में भी पिछले सालों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है.
नारकोटिक्स विभाग के अनुसार सबसे ज्यादा तस्करी पाकिस्तान और अफगानिस्तान से हेरोइन की होती है जिसका मुख्य केन्द्र भारत-पाक सीमा है. तस्करी के इस कारोबार में मुख्य तौर पर दिल्ली में रहने वाले अफ्रीकी और अफगानी शामिल हैं. जिस तरह दिल्ली में आये-दिन भारी मात्रा में ड्रग्स की बरामदगी होती है, उससे लगता है कि ड्रग तस्कर इसे ट्रांजिट प्वाइंट के बतौर इस्तेमाल कर रहे हैं. सुरक्षा एजेंसियों को चकमा देकर न केवल वह अवैध तरीके से भारी मात्रा में नशीले पदार्थ दिल्ली लाने में कामयाब हो रहे हैं बल्कि वह ड्रग्स को यहां से नेपाल, बांग्लादेश और पूर्वी एशियाई देशों व दुनिया के अन्य मुल्कों में छोटे-छोटे पैकेट बनाकर भेज रहे हैं. इसमें आतंकी संगठनों का भी उन्हें पूरा सहयोग मिल रहा है. शायद ही कोई भी दिन ऐसा जाता हो जब देश के किसी हिस्से से हशीश या हेरोइन पकड़े जाने का समाचार न मिलता हो. असलियत में आज कोई एक देश नहीं, समूची दुनिया नशे की गिरफ्त में है. जहां तक दक्षिण एशियाई देशों का सवाल है, भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान व म्यांमार अवैध मादक पदार्थों के बीस शीर्ष उत्पादकों में शामिल हैं और भारत में पश्चिम बंगाल और उत्तराखंड के कुछ भागों में अफीम की अवैध खेती निर्बाध गति से जारी है. हालांकि वैश्विक स्तर पर अफगानिस्तान अफीम पैदा करने वाला सबसे बड़ा देश है. अनुमान के अनुसार आज वहां चार-साढे़ चार हजार मीट्रिक टन अफीम पैदा होती है. जबकि मेथाकुआलोन जैसी नशीली दवा के उत्पादन में भारत शीर्ष पर है.