तिमिगण

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पाकिस्तान से मिले कुछ अवशेष इसी ओर ईशारा करते हैं. अमेरिका के पालेनोटोलोजिस्ट फिलिप गायंग्रीच ने इन अवशेषों को सन 2000 और 2004 के बीच पाकिस्तान के समुद्री इलाके के पास पाया था.

ये अवशेष एक मादा और एक नर व्हेल के हैं जो करीब 47.5 मिलीयन साल पुराने हो सकते हैं. इन अवशेषों के अध्ययन के नतीजे चौंकाने वाले हैं. इन नतीजों से यह साबित हुआ है कि व्हेल मछलियाँ किसी समय अपना काफी वक्त पानी के बाहर भी गुजारती थी. पाकिस्तान से जो अवशेष मिले उनमें से एक मादा व्हेल का है जो गर्भवती रही होगी. इसने अपना सिर जमीन की तरफ झुका रखा था. अधिकतर भूचर प्राणी बच्चे को जन्म देते समय यही करते हैं ताकी सांस ले सकें. इससे साबित हुआ कि वह व्हेल मछली जन्म देते समय मारी गई होगी. उसके पास ही नर व्हेल मछली के अवशेष भी थे.

इन दोनों मछलियों के चार छोटे छोटे पाँव भी थे, जो इन्हें जमीन पर चलने की सुविधा देते थे. लेकिन ये इतने छोटे हैं कि इनकी सहायता से सिमित दूरी तक ही चला जा सकता होगा. वैज्ञानिकों की राय है कि उस समय यह मछली शिकार करने और प्रजनन करने के लिए जमीन पर आती होगी.

ग्लोबल वार्मिंग[संपादित करें]

ग्लोबल वार्मिंग के चलते पृथ्वी का समुद्रीय क्षेत्र तो लगातार बढ़ता जा रहा है, लेकिन उसमें रहने वाले जलचरों की संख्या दिनोंदिन घटती जा रही है। हम बात कर रहे हैं समुद्रों और महासागरों में पाए जाने वाले कुछ खास किस्म की जलीय जीवों की जिनकी कई प्रजातियाँ इस समय विलुप्तता के कगार पर पहुंच गई हैं। यदि इसी रफ्तार से सागरीय प्रदूषण और इनका दोहन जारी रहा तो कई जलीय जीवों को सिर्फ एक्वेयरियमों में ही देखा जा सकेगा या फिर किताबों में उनके बारे में पढ़ा जाएगा।

दुनिया की काफी बड़ी आबादी का जीवन समुद्रों पर ही आधारित हैं। इस आबादी में मछुआरों से लेकर बड़े-बड़े उद्योग भी शामिल हैं। इन सभी के भरण-पोषण का मुख्य जरिया समद्र धीरे-धीरे कचराघर में तब्दील होता जा रहा है। औद्योगिक अपशिष्टों से लेकर घरेलू कचरे तक इसमें फेंके जा रहे हैं। इस वजह से मछलियों की कई प्रजातियाँ विलुप्त होने की कगार पर जा पहुंची हैं। मसलन अटलांटिक सलोमन नाम की मछली अगले कुछ वर्षो में मिलना बंद हो जाएगी। इसकी वजह है समुद्रीय प्रदूषण और अत्यधिक मात्रा में इनका शिकार। यदि भारत के समुद्रीय क्षेत्रों की बात करें तो पश्चिमी समुद्री तट सबसे ज्यादा प्रदूषित हैं और हमारे देश में मछलियों के शिकार को लेकर किसी भी तरह के कानून का पालन नहीं किया जाता है। जबकि दुनिया के कई देशों ने अपने यहां शिकार का मौसम तय कर दिया है। उस तय समय के बाद पूरे वर्ष तक कोई भी शिकार नहीं कर सकता है। इसे दंडनीय अपराध बना दिया गया है। जबकि हमारे देश में इस तरह की कोई व्यवस्था नहीं है। गुजरात से लेकर दक्षिण में केरल के तट तक मछलियों का बेतहाशा शिकार किया जाता है। इस वजह से क्षेत्र में पाई जाने वाली ईल, धादा और करकरा मछलियों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। इस कमी का एक और कारण प्रदूषण भी है।

एक दशक पहले तक इस क्षेत्र से शिकार के मौसम में लगभग 15 टन मछलियाँ पकड़ी जाती थीं, जो अब घटकर मात्र दो हजार टन रह गई है। इतना ही नहीं शिकार का मौसम तय न होने की वजह से पकड़ी गई मछलियों में अवयस्क मछलियों की संख्या सबसे ज्यादा होती है। इनकी संख्या में कमी का एक कारण यह भी है। पिछली शताब्दी में समुद्री दुघर्टनाओं में भी खासा इजाफा हुआ है। इनमें से ज्यादातर जहाज ऐसे होते हैं जिनमें तेल लदा रहता है और इस तेल की परत समुद्री पानी की ऊपरी सतह पर फैल जाने से पानी में ऑक्सीजन का प्रवाह खत्म हो जाता है। नतीजा मछलियों समेत कई जलचरों की मृत्यु। राजधानी दिल्ली के यमुना किनारे के कई हिस्सों से रोजाना सैकड़ों की तादाद में मरी हुई मछलियाँ निकाली जाती हैं।

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इनके संरक्षण के लिए कई कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। भारतीय केंद्रीय मत्स्य संस्थान भी इसके लिए कार्यक्रम शुरू करने की योजना बना रहा है। इसके तहत अब से मछलियों के शिकार का मौसम और समय तय किया जाएगा और प्रदूषण कम करने की कार्ययोजना बनाई जा रही है। ऑस्ट्रेलिया ने इसको गंभीरता से लेते हुए उन मछलियों के शिकार पर रोक लगा दी है जिनकी संख्या कम हो रही है। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हुए एक शोध के मुताबिक यदि इसी रफ्तार से समुद्री जीवों का दोहन होता रहा और प्रदूषण पर नियंत्रण नहीं किया गया तो सन् 2048 तक दुनिया के सभी महासागरों से मछलियाँ विलुप्त हो जाएंगी। व्हेल के शिकार से प्रतिबंध हटा

हाल ही में अंतरराष्ट्रीय व्हेल संस्थान ने व्हेल के शिकार से प्रतिबंध हटा लिया है। 80 देशों के इस संगठन ने तय किया है कि भले ही शिकार पर से रोक हटा ली गई हो पर समय-समय पर इसकी समीक्षा की जाती रहेगी। इन मछलियों के शिकार पर पिछले 12 वर्षो से रोक लगी हुई थी। आईसलैंड, जापान और नॉर्वे शिकार से प्रतिबंध हटाने के सबसे बड़े पक्षधर थे

जापान में हर वर्ष एक हजार व्हेल मछलियों का शिकार किया जाता है|

चिली ने अपने 2700 मील के समुद्री क्षेत्र को सेंचुरी घोषित कर दिया है। इस क्षेत्र में मछलियों के शिकार पर पूरी तरह से रोक लगी हुई है। व्हेल भी खतरे में फिन व्हेल - उत्तरी अटलांटिक के समुद्री क्षेत्र में पाई जाने वाली इस मछली की आबादी लगभग 23000 रह गई है, जो खतरे का सूचक है। बो-हेड व्हेल - बेरिंग सागर में पाई जाने वाली यह मछली की संख्या महज दस हजार रह गई है, जो कि विलुप्तता का संकेत है। हम्पबैक व्हेल - दक्षिणी हेमिस्फेयर में पाई जाने वाली इस मछली की संख्या सिमटकर लगभग चालीस हजार रह गई है। अटलांटिक सेलमन - पिछले बीस वर्षो में इतना ज्यादा शिकार हुआ कि अब इनकी संख्या आधी रह गई है। स्वोर्डफिश - नुकीली नाक वाली इन मछलियों की घटती संख्या का प्रमुख कारण इनका असमय शिकार है। प्लाइस - अत्यधिक शिकार की वजह से इनकी संख्या भी विलुप्ती के कगार पर पहुंच गई है। मोंकफिश - इन मछलियों की वयस्कता उम्र काफी ज्यादा है और असमय शिकार की वजह से इनकी संख्या में कमी आ रही है। दक्षिणी ब्लूफिन टूना - अत्यधिक शिकार की वजह से कई देशों ने इनके शिकार पर रोक लगा दी है। शार्क व्हेल - दुनिया के सभी हिस्सों में पाई जाने वाली व्हेल शार्क की प्रजातियाँ सबसे अधिक खतरे में हैं।

बरकुडा - लगभग 6 फीट लंबी इस मछली की संख्या में भारी कमी पाई गई है।

सीयर फीस - यह मछली तेजी से तैरने और अपने शिकारी से लड़ने के लिए जानी जाती है। कई तरह के हुक्स और जालों का इस्तेमाल करके बड़े पैमाने पर इनका शिकार होने की वजह से इनकी संख्या में कमी आई है।

संसार का सबसे बड़ा जीव नीली व्हेल(२५टन से भारी) होता है।