सिंधी भाषा
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| जिन देशों में प्रचलित है | दक्षिण एशिया | |
| कुल बोलनेवाले | ४,१०,०००,०० | |
| विज्ञान वर्गीकरण |
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| राजभाषा | सिंध (पाकिस्तान), भारत | |
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| आइएसओ 639-1: | sd | |
| आइएसओ 639-2: | snd | |
सिंधी एक भाषा का प्रकार है। जो भारत के पश्चिमी हिस्से और मुख्य रुप से गुजरात और पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में बोली जाने वाली एक प्रमुख भाषा है। इसका संबंध भाषाई परिवार के स्तर पर आर्य भाषा परिवार से है जिसमें संस्कृत समेत हिन्दी, पंजाबी और गुजराती भाषाएँ शामिल हैं। सिंधी भाषा नस्तालिक यानि अरबी लिपी में लिखी जाती है। यानि दायें से बायें लिखि जाती है। जबकि भारत में इसके लिये देवनागरी और नस्तालिक दोनो प्रयोग किये जाते हैं।
सिंधी भाषा सिंध प्रदेश की आधुनिक भारतीय-आर्य भाषा जिसका संबंध पैशाची नाम की प्राकृत और व्राचड नाम की अपभ्रंश से जोड़ा जाता है। इन दोनों नामों से विदित होता है कि सिंधी के मूल में अनार्य तत्व पहले से विद्यमान थे, भले ही वे आर्य प्रभावों के कारण गौण हो गए हों। सिंधी के पश्चिम में बलोची, उत्तर में लहँदी, पूर्व में मारवाड़ी, और दक्षिण में गुजराती का क्षेत्र है। यह बात उल्लेखनीय है कि इस्लामी शासनकाल में सिंध और मुलतान (लहँदीभाषी) एक प्रांत रहा है, और 1843 से 1936 ई. तक सिंध बंबई प्रांत का एक भाग होने के नाते गुजराती के विशेष संपर्क में रहा है।
अनुक्रम |
[संपादित करें] सिन्धी का भूगोल
सिंध के तीन भौगोलिक भाग माने जाते हैं-1. सिरो (शिरो भाग), 2. विचोली (बीच का) और 3. लाड़ (सं. लाट प्रदेश, नीचे का)। सिरो की बोली सिराइकी कहलाती है जो उत्तरी सिंध में खैरपुर, दादू, लाड़कावा और जेकबाबाद के जिलों में बोली जाती है। यहाँ बलोच और जाट जातियों की अधिकता है, इसलिए इसको बरीचिकी और जतिकी भी कहा जाता है। दक्षिण में हैदराबाद और कराची जिलों की बोली लाड़ी है और इन दोनों के बीच में विचोली का क्षेत्र है जो मीरपुर खास और उसके आसपास फैला हुआ है। विचोली सिंध की सामान्य और साहित्यिक भाषा है। सिंध के बाहर पूर्वी सीमा के आसपास थड़ेली, दक्षिणी सीमा पर कच्छी, और पश्चिमी सीमा पर लासी नाम की सम्मिश्रित बोलियाँ हैं। धड़ेली (धर उ थल उ मरुभूमि) जिला नवाबशाह और जोधपुर की सीमा तक व्याप्त है जिसमें मारवाड़ी और सिंधी का सम्मिश्रण है। कच्छी (कच्छ, काठियावाड़ में) गुजराती और सिंधी का एवं लासी (लासबेला, बलोचिस्तान के दक्षिण में) बलोची और सिंधी का सम्मिश्रित रूप है। इन तीनों सीमावर्ती बोलियों में प्रधान तत्व सिंधी ही का है। भारत के विभाजन के बाद इन बोलियों के क्षेत्रों में सिंधियों के बस जाने के कारण सिंधी का प्राधान्य और बढ़ गया है। सिंधी भाषा का क्षेत्र 65 हजार वर्ग मील है।
[संपादित करें] व्याकरण
[संपादित करें] सिन्धी शब्द
सिंधी के सब शब्द स्वरांत होते हैं। इसकी ध्वनियों में ग, ज, ड, और ब अतिरिक्त और विशिष्ट ध्वनियाँ हैं जिनके उच्चारण में सवर्ण ध्वनियों के साथ ही स्वर तंत्र को नीचा करके काकल को बंद कर देना होता है जिससे द्वित्व का सा प्रभाव मिलता है। ये भेदक स्वनग्राम है। संस्कृत के त वर्ग-र के साथ मूर्धन्य ध्वनि आ गई है, जैसे पुट्ट, या पुट्टु (पुत्र), मंडØ (मंत्र), निंड (निंद्रा), डोह (द्रोह)। संस्कृत का संयुक्त व्यंजन और प्राकृत का द्वित्व रूप सिंधी में समान हो गया है किंतु उससे पहले का ह्रस्व स्वर दीर्घ नहीं होता जैसे धातु (हिं. भात), जिभ (जिह्वा), खट (खट्वा, हिं. खाट), सुठो (सुष्ठु)। प्राय: ऐसी स्थिति में दीर्घ स्वर भी ह्रस्व हो जाता है, जैसे डिघो (दीर्घ), सिसी (शीर्ष), तिको (तीक्ष्ण)। जैसे सं. दत्त: और सुप्त: से दतो, सुतो बनते हैं, ऐसे ही सादृश्य के नियम के अनुसार कृत: से कीतो, पीत: से पीतो आदि रूप बन गए हैं यद्यपि मध्यम-त-का लोप हो चुका था। पश्चिमी भारतीय आर्य भाषाओं की तरह सिंधी में भी महाप्राणत्व को संयत करने की प्रवृत्ति है जैसे साडा (सार्ध, हिं. साढे), कानो (हिं. खाना), कुलण (हिं. खुलना), पुचा (सं. पृच्छा)।
[संपादित करें] संज्ञा
संज्ञाओं का वितरण इस प्रकार से पाया जाता है - अकारांत संज्ञाएँ सदा स्त्रीलिंग होती है, जैसे खट (खाट), तार, जिभ (जीभ), बाँह, सूँह (शोभा); ओकरांत संज्ञाएँ सहा पुÏल्लग होती हैं, जैसे घोड़ों, कुतो, महिनो (महीना), हफ्तो, दूँहों (धूम); -आ-, इ और - ई में अंत होने वाली संज्ञाएँ बहुधा स्त्रीलिंग हैं, जैसे हवा, गरोला (खोज), मखि राति, दिलि (दिल), दरी (खिड़की), (घोड़ो, बिल्ली-अपवाद रूप से सेठी (सेठ), मिसिरि (मिसर), पखी, हाथी, साँइ और संस्कृत के शब्द राजा, दाता पुÏल्लग हैं; -उ-, -ऊ में अंत होने वाले संज्ञाप्रद प्राय: पुÏल्लग हैं, जैसे किताब, धरु, मुँह, माण्ह (मनुष्य), रहाकू (रहने वाला) -अपवाद है विजु (विद्युत), खंड (खांड), आबरू, गऊ। पुÏल्लग से स्त्रीलिंग बनाने के लिए-इ, -ई, -णि और -आणी प्रत्यय लगाते हैं-कुकुरि (मुर्गी), छोकरि; झिर्की (चिड़िया), बकिरी, कुत्ती; घोबिणी, शीहणि, नोकिर्वाणी, हाथ्याणी। लिंग दो ही हैं-स्त्रीलिंग और पुÏल्लग। वचन भी दो ही हैं-एकवचन और बहुवचन। स्त्रीलिंग शब्दों का बहुवचन ऊँकारांत होता है, जैसे जालूँ (स्त्रियाँ), खटूँ (चारपाइयाँ), दवाऊँ (दवाएँ) अख्यूँ (आँखें); पुÏल्लग के बहुरूप में वैविध्य हैं। ओकारांत शब्द आकारांत हो जाते हैं-घोड़ों से घोड़ा, कपड़ों से कपड़ा आदि; उकारांत शब्द अकारांत हो जाते हैं-घरु से घर, वणु (वृक्ष) से वण; इकारांत शब्दों में-ऊँ बढ़ाया जाता है, जैसे सेठ्यूँ। ईकारांत और ऊकारांत शब्द वैसे ही बने रहते हैं।
[संपादित करें] संज्ञाओं के कारक
संज्ञाओं के कारकीय रूप परसर्गों के योग से बनते हैं - कर्ता-; कर्म-के, खे; करण-साँ; संप्रदान-के, खे, लाइ; अपादान-काँ, खाँ, ताँ (पर से), माँ (में से); संबंध-पु. एकव. जो, बहुव. जो, स्त्रीलिंग एकव. जी. बहुव. जूँ, अभिकरण-में, ते (पर)। कुछ पद अपादान और अधिकरण कारक में विभक्त्यंत मिलते हैं-गोठूँ (गाँव से), घरूँ (घर में), पटि (जमीन पर), वेलि (समय पर)। बहुव. में संज्ञा के तिर्यक् रूपृ-उनि प्रत्यय (तुलना कीजिए हिंदी-ओं) से बनता है-छोकर्युनि, दवाउनि, राजाउनि, इत्यादि।
[संपादित करें] सर्वनाम
सर्वनामों की सूची मात्र से इनकी प्रकृति को जाना जा सकेगा-1. माँ, आऊँ (मैं); अर्सी (हम); तिर्यक क्रमश: मूँ तथा असाँ; 2. तूँ; तव्हीं, अब्हीं (तुम); तिर्यक रूप तो, तब्हाँ; 3. पुँ. हू अथवा ऊ (वह, वे), तिर्यक् रूप हुन, हुननि; स्त्री. हूअ, हू, तिर्यक रूप उहो, उहे; पुँ. ही अथवा हीउ (यह, ये) तिर्यक् रूप हि, हिननि; स्त्री. इहो, इहे, तिर्यक् रूप इन्हें। इझी (यही), उझो (वही), बहुव. इझे, उझे; जो, जे (हिं. जो); छा, कुजाड़ी (क्या); केरु, कहिड़ी (कौन); को (कोई); की, कुझु (कुछ); पाण (आप, खुद)। विशेषणों में ओकारांत शब्द विशेष्य के लिंग, कारक के तिर्यक् रूप, और वचन के अनुरूप बदलते हैं, जैसे सुठो छोकरो, सुठा छोकरा, सुठी छोकरी, सुठ्यनि छोकर्युनि खे। शेष विशेषण अविकारी रहते हैं। संख्यावाची विशेषणों में अधिकतर को हिंदीभाषी सहज में पहचान सकते हैं। ब (दो), टे (तीन), दाह (दस), अरिदह (18), वीह (20), टीह, (30), पंजाह, (50), साढा दाह (10।।), वीणो (दूना), टीणो (तिगुना), सजो (सारा), समूरो (समूचा) आदि कुछ शब्द निराले जान पड़ते हैं।
[संपादित करें] संज्ञार्थक क्रिया
णुकारांत होती है-हलणु (चलना), बधणु (बाँधना), टपणु (फाँदना) घुमणु, खाइणु, करणु, अचणु (आना) वअणु (जानवा, विहणु (बैठना) इत्यादि। कर्मवाच्य प्राय: धातु में-इज-या-ईज (प्राकृत अज्ज) जोड़कर बनता है, जैसे मारिजे (मारा जाता है), पिटिजनु (पीटा जाना); अथवा हिंदी की तरह वञणु (जाना) के साथ संयुक्त क्रिया बनाकर प्रयुक्त होता है, जैसे माओ वर्ञ थो (मारा जाता है)। प्रेरणार्थक क्रिया की दो स्थितियाँ हैं-लिखाइणु (लिखना), लिखराइणु (लिखवाना); कमाइणु (कमाना), कमाराइणु (कमवाना), कृदंतों में वर्तमानकालिक-हलंदों (हिलता), भजदो (टूटता) -और भूतकालिक-बच्यलु (बचा), मार्यलु (मारा)-लिंग और वचन के अनुसार विकारी होते हैं। वर्तमानकालिक कृदंत भविष्यत् काल के अर्थ में भी प्रयुक्त होता है। हिंदी की तरह कृदंतों में सहायक क्रिया (वर्तमान आहे, था; भूत हो, भविष्यत् हूँदो आदि) के योग से अनेक क्रिया रूप सिद्ध होते हैं। पूर्वकालिक कृदंत धातु में-इ-या -ई लगाकर बनाया जाता है, जैसे खाई (खाकर), लिखी (लिखकर), विधिलिंग और आज्ञार्थक क्रिया के रूप में संस्कृत प्राकृत से विकसित हुए हैं-माँ हलाँ (मैं चलूँ), असीं हलूँ (हम चलें), तूँ हलीं (तू चले), तूँ हल (तू चल), तब्हीं हलो (तुम चलो); हू हले, हू हलीन। इनमें भी सहायक क्रिया जोड़कर रूप बनते हैं। हिंदी की तरह सिंधी में भी संयुक्त क्रियाएँ पवणु (पड़ना), रहणु (रहना), वठणु (लेना), विझणु (डालना), छदणु (छोड़ना), सघणु (सकना) आदि के योग से बनती हैं।
[संपादित करें] विविध
सिंधी की एक बहुत बड़ी विशेषता है उसके सार्वनामिक अंत्यय जो संज्ञा और क्रिया के साथ संयुक्त किए जाते हैं, जैसे पुट्रऊँ (हमारा लड़का), भासि (उसका भाई), भाउरनि (उनके भाई); चयुमि (मैंने कहा), हुजेई (तुझे हो), मारियाई (उसने उसको मारा), मारियाईमि (उसने मुझको मारा)। सिंधी अव्यय संख्या में बहुत अधिक हैं। सिंधी के शब्द भंडार में अरबी-फारसी-तत्व अन्य भारतीय भाषाओं की अपेक्षा अधिक हैं। सिंधी और हिंदी की वाक्य रचना, पदक्रम और अन्वय में कोई विशेष अंतर नहीं है।
[संपादित करें] संधी के लिये प्रयुक्त लिपियाँ
एक शताब्दी से कुछ पूर्व तक सिंधी में चार लिपियाँ प्रचलित थीं। हिंदू पुरुष देवनागरी का, हिंदू स्त्रियाँ प्राय: गुरुमुखी का, व्यापारी लोग (हिंदू मुसलमान दोनों) "हटवाणिको" का (जिसे सिंधी लिपि भी कहते हैं), और मुसलमान तथा सरकारी कर्मचारी अरबी- फारसी लिपि का प्रयोग करते थे। सन् 1853 ईं. में ईस्ट इंडिया कंपनी के निर्णयानुसार लिपि का स्थिरीकरण करने के लिए सिंध के कमिश्नर मिनिस्टर एलिस की अध्यक्षता में एक समिति नियुक्त की गई। इस समिति ने अरबी-फारसी-उर्दू लिपियों के आधार पर "अरबी सिंधी" लिपि की स्थापना की। सिंधी ध्वनियों के लिए सवर्ण अक्षरों में अतिरिक्त बिंदु लगाकर नए अक्षर जोड़ लिए गए। अब यह लिपि सभी वर्गों द्वारा व्यवहृत होती है। इधर भारत के सिंधी लोग नागरी लिपि को सफलतापूर्वक अपना रहे हैं; किंतु यहाँ भी व्यापक रूप से "अरबी-सिंधी" ही चलती है।
[संपादित करें] अरबी
सिंधी भाषा अरबी तरीके से यानि दायें से बायें लिखि ज्याती है। इसमें 52 अल्फाबेट्स होते है। जिसमे 34 अक्षर फारसी भाषा के है और 18 नये अक्षर, ڄ ,ٺ ,ٽ ,ٿ ,ڀ ,ٻ ,ڙ ,ڍ ,ڊ ,ڏ ,ڌ ,ڇ ,ڃ ,ڦ ,ڻ ,ڱ ,ڳ ,ڪ है। इनमें अधिकतर का रूप आदि, मध्य और अंत में भिन्न-भिन्न होता है। स्वरों की मात्राएँ अनिवार्य न होने के कारण एक ही शब्द के कई उच्चारण हो जाते हैं।
| جھ | ڄ | ج | پ | ث | ٺ | ٽ | ٿ | ت | ڀ | ٻ | ب | ا |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ɟʱ | ʄ | ɟ | p | s | ʈʰ | ʈ | tʰ | t | bʱ | ɓ | b | * |
| ڙ | ر | ذ | ڍ | ڊ | ڏ | ڌ | د | خ | ح | ڇ | چ | ڃ |
| ɽ | r | z | ɖʱ | ɖ | ɗ | dʱ | d | x | h | cʰ | c | ɲ |
| ق | ڦ | ف | غ | ع | ظ | ط | ض | ص | ش | س | ز | ڙھ |
| k | pʰ | f | ɣ | ∅ | z | t | z | s | ʃ | s | z | ɽʱ |
| ي | ه | و | ڻ | ن | م | ل | ڱ | گھ | ڳ | گ | ک | ڪ |
| * | h | * | ɳ | n | m | l | ŋ | ɡʱ | ɠ | ɡ | kʰ | k |
[संपादित करें] देवनागरी
जबकि भारत में अरबी के अलावा देवनागरी लिपी का भी उपयोग किया जाता है। देवनागरी लिपी जो हिन्दी कि तरह बायें से दायें लिखि जाती है। यह 1948 में भारत सरकार द्वारा लायी गयी भाषा है।
| अ | आ | इ | ई | उ | ऊ | ए | ऐ | ओ | औ |
|---|---|---|---|---|---|---|---|---|---|
| ə | a | ɪ | i | ʊ | uː | e | ɛ | o | ɔ |
| क | ख | ख़ | ग | ग॒ | ग़ | घ | ङ | ||
| k | kʰ | x | ɡ | ɠ | ɣ | ɡʱ | ŋ | ||
| च | छ | ज | ज॒ | ज़ | झ | ञ | |||
| c | cʰ | ɟ | ʄ | z | ɟʱ | ɲ | |||
| ट | ठ | ड | ड॒ | ड़ | ढ | ढ़ | ण | ||
| ʈ | ʈʰ | ɖ | ɗ | ɽ | ɖʱ | ɽʱ | ɳ | ||
| त | थ | द | ध | न | |||||
| t | tʰ | d | dʱ | n | |||||
| प | फ | फ़ | ब | ब॒ | भ | म | |||
| p | pʰ | f | b | ɓ | bʱ | m | |||
| य | र | ल | व | ||||||
| j | r | l | ʋ | ||||||
| श | ष | स | ह | ||||||
| ʃ | ʂ | s | h | AMEERDDIN | |||||
[संपादित करें] संखिया
| हिन्दी | मध्य-पुर्व | पुर्व/भारतिय-सिंधी |
|---|---|---|
| ० | ٠ | ۰ |
| १ | ١ | ۱ |
| २ | ٢ | ۲ |
| ३ | ٣ | ۳ |
| ४ | ٤ | ۴ |
| ५ | ٥ | ۵ |
| ६ | ٦ | ۶ |
| ७ | ٧ | ۷ |
| ८ | ٨ | ۸ |
| ९ | ٩ | ۹ |
[संपादित करें] आम बोलचाल(वाक्य)
- कीयं आहियो / कीयं आहीं? - "आप कैसे हो/तुम कैसे हो?"
- आउं / मां ठीक आहियां - "मैं ठीक हुं।"
- तवाहिन्जी महेरबानी - "धन्यवाद/शुकिरीया"
- हा - "हां"
- न - "नहीं"
- तवाहिन्जो / तुहिन्जो नालो छा आहे? - "आपका/तुमारा नाम क्या है?"
- मुहिन्जो नालो _____ आहे। - "मेरा नाम _____ है।"
- हिक - "एक"
- बह् - "दो"
- टेह् - "तीन"
- च्हार - "चार"
- पंज - "पांच"
- छः - "छे"
- सत - "सात"
- अठः - "आठ"
- नवं - "नौ"
- डहः - "दस"
[संपादित करें] यह भी देखें
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