साम्या

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उन्नीसवीं शती के आरम्भिक दिनों में लन्दन का चांसरी न्यायालय

न्यायशास्त्र के सन्दर्भ में साम्या (Equity) या 'सुनीति' कुछ कानूनी सिद्धान्तों का समुच्चय है जो कानून के कड़े प्रावधानों का पूरक है। साधारण न्याय के अनुसार सब लोगों के साथ निष्पक्ष और समान भाव से किया जानेवाला व्यवहार।

परिचय[संपादित करें]

लौकिक अर्थ में साम्या (Equity) को सहज न्याय (Natural Justice) का पर्याय मानते हैं पर ऐसा सोचना भ्रमात्मक होगा कि प्राकृतिक न्याय के अंतर्गत आने वाली सभी विषयों पर न्यायालय अपना निर्णय देगा। दया, करुणा आदि अनेक मानवोचित गुण प्राकृतिक न्याय की सीमा के अंदर हैं, पर न्यायालय किसी को दया का आचरण दिखलाने को बाध्य नहीं कर सकता। न्यायाधीश बक्ले ने रि टेलीस्क्रिप्ट सिंडीकेट लि. (१९०३), २ चांसरी, १७४ द्रष्टव्य पृ. १९५-९६ में कहा था, This court is not a court of conscidence` अर्थात् 'सुनीति' से संबंधित मामलों की जाँच करने वाले इस न्यायालय को हम अंत:करण का न्यायालय नहीं कह सकते। उसी प्रसंग में उन्होंने कहा कि कानून ने विहित उन अधिकारों को ही यह न्यायालय कार्यान्वित करेगा, जिनके लिए देश का साधारण कानून पर्याप्त नहीं है। अत: 'सुनीति' प्राकृतिक न्याय का वह अंश है, जो न्यायालयों द्वारा कार्यान्वित होने योग्य रहने पर भी ऐतिहासिक कारणों से कॉमन लॉ के न्यायालयों द्वारा कार्यान्वित ने होने के कारण 'चांसरी' न्यायालय द्वारा लागू किया जाता था। अन्यथा तथ्य की दृष्टि से 'सुनीति' एवं 'कॉमन लॉ' में कोई अंतर नहीं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि[संपादित करें]

प्राचीन काल में नैतिकता एवं कानून परस्पर मिले हुए थे एवं 'धर्म' के व्यापक अर्थ में सन्निहित थे। हिंदू धर्म के चार स्रोत माने गए हैं-वेद, स्मृति, सदाचार एवं सुनीति। सुनीति के सिद्धांत 'न्याय' में अंतर्निहित रहे हैं। स्मृति के वचन एवं सदाचार की विशद विवृति के बावजूद न्याय के सभी प्रश्नों का निर्णय देने के लिए मान्य नियमों एवं कानून की कल्पनाओं (Fiction) का आश्रय लिया जाता रहा है तथा इन पर सुनीति की छाप स्पष्ट है। स्मृतिकारों ने स्वीकार कर लिया था कि सनातन धर्म स्वभावत: व्यापक नहीं हो सकता। अत: 'न्याय' के सिद्धांतों को विभिन्न परिस्थियों में कार्यान्वित करना ही होगा। याज्ञवल्क्य का कथन है कि कानून के नियमों के परस्पर एक-दूसरे से विषम होने पर न्याय अर्थात् प्राकृतिक सुनीति एवं युक्ति की उन पर मान्यता होगी। बृहस्पतिवार के अनुसार केवल धर्म शास्त्र का ही आश्रय लेकर निर्णय देना उचित नहीं होगा, क्योंकि युक्तिहीन विचार से धर्म की हानि ही होती है। नारद ने भी युक्ति की महत्ता मानी है। कानून एवं न्याय के बीच शाश्वत द्वंद्व के प्रसंग में स्मृतिकारों ने युक्ति एवं सुनीति को मान्यता दी है।

भारत में अंग्रेजी शासन स्थापित होने पर इस देश के न्यायालयों के निर्णय अंतिम अपील के रूप में प्रिवी काउंसिल के अधिकारक्षेत्र में आने लगा। अत: इंग्लैंड में विकसित सुनीति का प्रभाव हिंदू विधान पर परिलक्षित होने लगा। प्रिवी काउंसिल ने केंचुवा वी गिरिमालप्या (१९२४) ५१९ ए, ३६८ में यह निर्णय किया कि यदि कोई किसी की हत्या कर दे तो वह व्यक्ति मृतक की संपत्ति का अधिकारी नहीं होगा। सार्वजनिक नीति पर आधारित उक्त नियम हिंदुओं के मामले में न्याय एवं सुनीति की दृष्टि से लागू किया गया।

संसार के भिन्न-भिन्न देशों में जहाँ पिछली कई शताब्दियों में अंग्रेजी शासन रहा है, उनके न्यायालयों के निर्णय पर अंग्रेजी सुनीति का प्रभाव स्पष्ट है। अत: इंग्लैंड में सुनीति के ऐतिहासिक विकास पर कुछ शब्द आवश्यक हैं। मध्य युग में इंग्लैंड के राजा का सचिवालय 'चांसरी' कहलाता था एवं उसका अधिकारीश् 'चांसलर' के नाम से विख्यात था। देश में मामलों का निर्णय करने के निमित्त न्यायालयों के रहने के बावजूद न्याय की अंतिम थाती 'चांसरी' (Reserve of justice) राजा में ही आश्रित थी। अत: चांसरी में बहुधा ऐसा आवेदन आने लगा कि आवेदक दरिद्र, वृद्ध और रुग्ण है; किंतु उसका विपक्षी धनी एवं शक्तिशाली है। इसलिए उसे आशंका है कि विपक्षी जूरी को घूस देगा; अपनी प्रभुता से उन्हें भय दिखलाएगा; अथवा चालाकी से उसने कुछ ऐसी परिस्थिति पैदा कर दी है कि देश का साधारण न्यायालय उसे न्याय नहीं दे सकेगा। ऐसा आवेदन प्राय: करुण शब्दों में भगवान और धर्म की दुहाई

देकर लिखा जाता था। चांसलर राजा के नाम प्रादेश (Writ) निकालकर विपक्षी को अपने समक्ष उपस्थित कराने लगे। उसे शपथ लेकर आवेदन की फरियाद का उत्तर देना पड़ता था। सन् १४७४ ई. से चांसलर स्वतंत्र रूप से निर्णय देने लगे एवं चांसरी न्यायालय में सुनीति का विकास यहीं से आरंभ हुआ। चांसरी की लोकप्रियता बढ़ने लगी। इसका मुख्य कारण यह था कि चांसलर ऐसे मामलों का निराकरण करने लगे, जिनके लिए साधारण न्यायालय में कोई विधान नहीं था। दृष्टांत के लिए न्यास (Trust) को ले सकते हैं। क्रमश: छल (Fraud), दुर्घटना (Accident), 'चांसरी' दस्तावेज गुम होने के प्रसंग में तथा विश्वासघात (Breach of Confidence) भी उसके अधिकार क्षेत्र में आ गए। सतरहवीं शताब्दी के आरंभ में चांसरी एवं कॉमन लॉ के न्यायालयों के बीच अपने-अपने अधिकारक्षेत्र का प्रश्न लेकर विवाद उपस्थित हुआ; पर अंतत: इस बात को मान्यता दी गई कि चांसरी न्यायालय का निर्णय सर्वोपरि होगा। इस प्रसंग में यह स्मरणीय है कि चांसरी न्यायालय ने कॉमन लॉ के न्यायालयों पर प्रत्यक्ष शासन नहीं किया। उसने केवल सफल वादी को वारण किया कि वह अनैतिक निर्णय को कार्यान्वित न करे। उक्त दोनों प्रकार के न्यायालयों के विकास के साथ-साथ चांसलर के अधिकार भी सीमित होते गए। सुनीति के सिद्धांत स्थिर हुए, जिन पर कॉमन लॉ की परिधि से बाहर के अधिकार आधारित थे और जिनके लिए निदानश् (Remedy) अपेक्षित था। सन् १८७३-७५ ई. के अभ्यंतर निर्मित कानून के द्वारा 'सुनीति' एवं कॉमन लॉ की दो विभिन्न पद्धतियाँ एक हो गईं। इसका परिणाम यह हुआ कि कॉमन लॉ के न्यायालय व्यादेश (Injunction) जारी करने लगे एवं चांसरी न्यायालय संविदा (Contract) के स्खलन (Breach) के कारण क्षतिपूर्ति कराने लगा, जैसा पूर्व में संभव नहीं था। अर्थात् अब देश के किसी भी न्यायालय में कॉमन लॉ एवं सुनीति दोनों के निदान एक साथ प्राप्त होने लगे। सन् १७७५ ई. के बाद यदि किसी मामले में सुनीति एवं कॉमन लॉ के नियमों में किसी एक ही विषय को लेकर विषमता उपस्थित हो तो सुनीति के नियम की मान्यता होगी। किंतु यह स्मरणीय है कि सुनीति का यह उद्देश्य नहीं था कि वह देश के साधारण कानून को नष्ट करे, वरन् उसकी कभी की पूर्ति करना ही इसका लक्ष्य था। उदाहरणार्थ, न्यास (Trust) व्यादेश (Injunction), संविदा की पूर्ति (Specific performance), एवं मृत व्यक्ति के इस्टेट का प्रबंध सुनीति के ही अवदान हैं। इन विषयों के लिए कॉमन लॉ के न्यायालय में कोई निदान नहीं था।

सुनीति के सिद्धांत[संपादित करें]

  • (१) सुनीति प्रत्येक हरकत या अपकार (Wrong) के लिए त्राण देती है।

यह नियम सुनीति का आधार है। इसका आशय यह है कि यदि कोई हरकत ऐसी है, जिसके लिए नैतिक दृष्टि से न्यायालय को त्राण देना चाहिए, तो न्यायालय त्राण अवश्य देगा। चांसरी न्यायालय का आरंभ इसी आधार पर हुआ। न्यास का कानून इस प्रसंग में एक उपयुक्त दृष्टांत है।

  • (२) सुनीति कॉमन लॉ का अनुसरण करती है। इसका अर्थ यह है कि सुनीति देश के साधारण कानून द्वारा प्रदत्त किसी व्यक्ति के अधिकारों में तभी हस्तक्षेप करेगी, जब उस व्यक्ति के लिए ऐसे अधिकारों से लाभ उठाना अनैतिक होगा, क्योंकि सुनीति अंत:करण पर आधारित है। दृष्टांत- किसी व्यक्ति को कॉमन लॉ के अनुसार फी सिंपुल (Fee simple) एक इस्टेट है एवं वह बिना वसीयत किए मर जाता है। उसके पुत्र और कन्याएँ हैं। सबसे ज्येष्ठ पुत्र इस्टेट का उत्तराधिकारी हो जाता है यद्यपि ऐसा होना अन्याय संततियों के हित में अनुचित है तथापि सुनीति इस स्थिति में हस्तक्षेप नहीं करेगी। पर यदि ज्येष्ठ पुत्र ने अपने पिता से कहा कि आप वसीयत न करें, मैं संपत्ति को सब भाइयों और बहनों में बाँट दूँगा और उसके आश्वासन पर पिता ने संपत्ति की वसीयत नहीं की और ज्येष्ठ पुत्र ने अपनी प्रतिज्ञा न रखकर पूरे इस्टेट को आत्मसात् कर लिया तो इस स्थिति में सुनीति उसे अपने वचन का पालन करने को बाध्य करेगी, चूँकि ज्येष्ठ पुत्र के लिए पूरी संपत्ति का उपभोग करना अंत:करण के प्रतिकूल होगा।
  • (३) जहाँ सुनीति समान है, कॉमन लॉ की व्यापकता होती है।
  • (४) जहाँ सुनीति समान है, क्रम में जो पहले है, उसकी मान्यता होती है।

दि सैमुएल एलेन ऐंड संस लि. (१९०७) १ चांसरी ५७५ में एक कंपनी ने किराया-खरीद (Hire-purchase) की शर्त पर मशीन खरीदी। यह तय हुआ कि अंतिम किस्त आदा कर देने तक मशीन का स्वत्वाधिकारी इसका विक्रेता रहेगा एवं उसे अधिकार रहेगा कि वह किस्त टूटने पर मशीन को उठाकर ले जाए। कंपनी के व्यवसाय वाले मकान में मशीन लगा दी गई, अत: मशीन का कॉमन लॉ द्वारा प्रदत्त स्वत्वाधिकार कंपनी का हुआ। पीछे कंपनी ने उक्त मकान गिरवी में एक ऐसे व्यक्ति को दिया, जिसे मशीन से संबंधित 'किराया-खरीद' की कोई सूचना नहीं थी। एक मामला हुआ जिसमें न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि मशीन हटाकर ले जाने का अधिकार भूमि में साम्यिक स्वत्वाधिकार (equitable interest) था। चूँकि क्रम में इसकी सृष्टि पहले हुई, अत: मकान के गिरवीदार के अधिकार की अपेक्षा इसकी प्राथमिकता है।

  • (५) जिसे सुनीति चाहिए, उसे सुनीतिपूर्ण कर्तव्य करना ही है।

यदि कोई व्यक्ति इस विश्वास में कि अमुक जमीन उसकी है, उस पर मकान बनाता है एवं जमीन का वास्तविक स्वत्वाधिकारी मकान बनते देखकर भी वास्तविक स्थिति से दूसरे व्यक्ति को अवगत नहीं कराता तो मकान बन जाने पर बिना इसकी यथोचित कीमत दिए जमीन का वास्तविक मालिक मकान प्राप्त नहीं कर सकता। जिस व्यक्ति ने सच्चे विश्वास से मकान बनाया, उसका उस संपत्ति पर मकान संबंधी खर्च के लिए पूर्वाधिकार (Lien) रहेगा।

  • (६) जो सुनीति से सहायता चाहता है, उसका निजी आचरण भी निर्मल होना चाहिए।

एक नाबालिग ने ट्रस्टी को ठगने के अभिप्राय से यह कहकर कि वह वयस्क हो चुका है, उससे रुपए ले लिए। वह रकम वयस्क होने पर ही उसे मिलती। वयस्क होने पर उसने फिर ट्रस्टी से उक्त रकम की माँग की। यद्यपि नाबालिग की रसीद पक्की नहीं मानी जाती, फिर भी न्यायालय ने कहा कि ट्रस्टी दुबारा उक्त रकम देने को जिम्मेदार नहीं है।

  • (७) विलंब सुनीति का घातक है। इथवा सुनीति क्रियाशील को सहायता देती है, अकर्मण्य को नहीं।

जहाँ दावा बहुत पुराना हो चुका है एवं कोई पक्ष अपने स्वत्व को पुन: हासिल करने के लिए प्रस्तुत नहीं हुआ है तथा उसने विपक्षी के अनधिकार को अपनी अकर्मण्यता के कारण स्वीकार कर लिया है, ऐसी स्थिति में सुनीति कोई सहायता नहीं करेगी। किंतु कानून द्वारा निर्धारित मामला चलाने की अवधि को मान्यता देगी। पर यदि वादी की गफलत के कारण वह साक्ष्य, जिसके द्वारा प्रतिवादी मामले का जवाब देता, नष्ट हो चुका है तो विलंब घातक होगा। विषय की अज्ञानता, कानूनी दृष्टि से असमर्थता, स्वेच्छा का अभाव इत्यादि 'विलंब' के जवाब हैं।

  • (८) समता की सुनीति है।

यदि संपत्ति का विभाजन इस प्रकार किया गया हो कि क को एक भाग, ख को पाँच भाग और ग को छह भाग मिले हों, पर ग अपना भाग न ले सके, ऐसी स्थिति में एक्रूएर क्लाज (Accruer Clause) के अनुसार ग के भाग समान रूप से क और ख को प्राप्त होंगे। अर्थात् प्रत्येक को तीन-तीन अतिरिक्त भाग मिलेंगे एवं मौलिक विभाजन की असमानता की प्रकल्पना लागू नहीं होगी, क्योंकि समता ही सुनीति है।

  • (९) सुनीति तथ्य को ग्रहण करती है, बाहरी रूप को नहीं।

यह सिद्धांत रेहन (Mortgage), शास्ति (Penalty), जब्ती (Forfeiture) एवं अनुनय के शब्दों पर आधारित न्यास के मूल में है। जब यह प्रश्न उठता है कि कोई संपत्ति रेहन में दी गई है या इस विकल्प के साथ बेच दी गई है कि बिक्री करने वाला इसे पुन: खरीद सकता है, तो ऐसी स्थिति में सुनीति यह देखती है कि मूल्य बिक्री की दृष्टि से पर्याप्त है या नहीं। तथाकथित खरीददार का संपत्ति पर कब्जा हुआ या नहीं। इसी प्रकार किसी संविदा में ऐसी शर्त रहे कि इसकी पूर्ति नहीं होने पर दोषी पक्ष को पूरी शास्ति देनी होगी तो सुनीति यह देखती है कि शास्ति की रकम संविदा की पूर्ति कराने के निमित्त रखी गई थी या यह क्षतिपूर्ति की रकम है।

  • (१०) जो होना उचित है, उसे सुनीति हुआ ही मानती है।

यदि वादी ने किसी मौलिक संविदा में अपना भाग इस विश्वास में पूरा कर दिया है कि प्रतिवादी भी अपना भाग पूरा करेगा, ऐसी स्थिति में न्यायालय बहुथा ऐसा आदेश देता है कि प्रतिवादी भी अपना भाग पूरा करे चूँकि प्रतिवादी का ऐसा न करना अन्यायपूर्ण होगा। इसी प्रकार यह सिद्धांत संपरिवर्तन (Conversion) के मूल में भी परिलक्षित होता है।

  • (११) सुनीति दायित्व पूर्ण करने की इच्छा को मान्यता देती है। यदि किसी व्यक्ति पर कोई दायित्व है और वह कोई काम करता है, जो उस दायित्व के प्रसंग में ग्रहण किया जा सकता हो तो सुनीति उस काम को उक्त दायित्व की पूर्ति में ही मानेगी। यह सिद्धांत निष्पादन (Performance), पूर्ति (Satisfaction) तथा विखंडन (Ademption) का आधार है।
  • (१२) सुनीति का क्षेत्राधिकार प्रतिवादी की उपस्थिति पर निर्भर है।

इस सिद्धांत की पृष्ठभूमि ऐतिहासिक है। आरंभ में चांसरी न्यायालय प्रतिवादी की संपत्ति में हस्तक्षेप नहीं करता था। केवल उसे न्यायोचित कार्य करने को आदेश देता था। यदि प्रतिवादी आदेश का पालन नहीं करना तो न्यायालय उसे अवमान के लिए दंडित करता था। उसकी संपत्ति भी जप्त कर ली जाती थी। अब भी सुनीति का मूल क्षेत्राधिकार वादी की उपस्थिति पर निर्भर है। यदि मामले की संपत्ति न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर भी हो, किंतु प्रतिवादी क्षेत्राधिकार में है या उस पर क्षेत्राधिकार से बाहर भी मामले के निमित्त सम्मन जारी कराया जा सकता है एवं वादी के मामले में नैतिक अधिकार है तो न्यायालय प्रतिवादी के विरुद्ध मामला अवश्य चलाएगा। किंतु यदि भूमि में टाइटिल का प्रश्न है तथा भूमि न्यायालय के क्षेत्राधिकार से बाहर है तो न्यायालय उस विषय का निर्णय नहीं करेगा।

सन्दर्भ ग्रन्थ[संपादित करें]

  • स्टोरी: इक्विटी चुरिसप्रुडेंस (१८९२);
  • होल्ड्सवर्थ: हिस्ट्री ऑव इंग्लिश लॉ, खंड १,१९०५;
  • मेटलैंड: इक्विटी (१९३६);
  • स्नेल: प्रिंसिपल्स ऑव इक्विटी, १९४७