सामीप्य सिद्धांत

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सामीप्य सिद्धांत, साइप्रेस डॉक्ट्रिन (Cypress doctrine) का हिन्दी रूपान्तरण है। साइप्रेस डॉक्ट्रिन एक नॉर्मन फ्रेंच शब्द है जिसका शाब्दिक अर्थ है - 'उतना समीप जितना सम्भव हो' । यह एक विधिक सिद्धान्त है जो सबसे पहले साम्या न्यायालयों (कोर्ट्स आफ इक्विटी) में उठा।

धार्मिक न्यास (trust) की एक विशेषता यह है कि यदि वसीयत (will) करने वाले ने अपने विल में दान के निमित्त पूर्ण एवं निश्चित इच्छा प्रकट की है, अथवा विल में कथित विवरणों से न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि विल करने वाले (testator) ने दानार्थ अपनी संपत्ति दी है, तो न्यायालय दान को व्यर्थ नहीं होने देगा। अर्थात्‌ विल में दानार्थ दी गई संपत्ति को न्यायालय दान के निमित्त ही यथासंभव खर्च होने का आदेश देगा। यदि विल में कथित दान के लक्ष्य का अस्तित्व भी कभी नहीं रहा हो, तथापि न्यायालय एक दातव्य योजना तैयार कराकर विल करने वाले की इच्छा की पूर्ति होने देगा।

किंतु सामीप्य सिद्धांत के लागू होने के लिए दान का लक्ष्य निर्विवाद होना आवश्यक है। धन की कोई राशि दान या देशभक्ति के लक्ष्य में लगाने पर, दान व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि इससे दान के निमित्त दाता की एकांत भावना प्रगट नहीं होती। देशभक्ति दान की परिभाषा से बाहर है। ऐसी स्थिति में दान के निमित्त निर्दिष्ट राशि संपदा (estate) के अवशेष में आ जाएगी एवं विल के अनुसार अवशेष (residue) के उत्तराधिकारी इस राशि में भोक्ता होंगे। किंतु यदि कोई राशि दान या परोपकार के लिए दी गई हो, तो दान व्यर्थ नहीं होगा, क्योंकि दान और परोपकार के लक्ष्य में विषमता नहीं मानी जाती है। यदि विल करने वाला (testator) दातव्य तता अदातव्य (uncharitable) लक्ष्यों के बीच संपत्ति का विभाजन न कर सका हो तो न्यायालय उक्त रकम को दोनों लक्ष्यों के बीच समान भाग में बाँट देगा।

सामीप्य सिद्धांत की उत्पत्ति कब और किस तरह हुई, अनिश्चित है। किंतु न्यायाधीश लार्ड एल्डन ने मागिरज बनाम थैकवेल (1802) 70 वेज, 69 में कहा था कि एक समय था, जब इंग्लैंड में प्रत्येक व्यक्ति के इस्टेट के अवशेष का एक अंश दानार्थ व्यय होता था एवं संपत्ति का उत्तराधिकारी व्यक्ति नैतिक दृष्टि से ऐसा करना अपना कर्तव्य समझता था, क्योंकि समझा जाता था कि विल करने वालों में दान की भावना रहती है। जब कानून द्वारा संपत्ति का विभाजन अनिवार्य हो गया हो तो ऐसा सोचना असंभव नहीं कि दानार्थ संपत्ति में भी वहीं सिद्धांत लागू हुआ हो।

सामीप्य सिद्धांत को लागू करने में दो प्रतिबंध उल्लेखनीय हैं-

(1) दाता की इच्छा का उल्लंघन उसी स्थिति में हो जब विल करने वाले की इच्छा का अक्षरश: पालन करना असंभव हो जाए। किंतु असंभव शब्द की विवृत्ति (interpretation) उदार भाव से की जाती है तथा

(2) जब इस सिद्धांत के लागू करने से अवांछनीय फल निकले, तभी इस पर अंकुश लगाया जाए। देखिए, रि डोमीनियन स्टूडेंट्स हाल ट्रस्ट (1957) चांसरी 183, जिसमें किसी वसीयत करने वाले ने अपनी संपत्ति का एक अंश इस उद्देश्य से दान में दिया कि इंग्लैंड के किसी छात्रावास में, जहाँ ब्रिटिश उपनिवेश के विद्यार्थी आकर रहते थे, वर्णविभेद न रहे। दाता की इच्छा का अक्षरश: पालन करने से छात्रों में पारस्परिक तनाव ही बढ़ता अत: न्यायालय ने कहा कि दाता का मुख्य उद्देश्य भिन्न-भिन्न वर्णों के विद्यार्थियों में सद्भावना बढ़ाना है और इसी के निमित्त दातव्य राशि का व्यय हुआ।

यदि विल करने वाले ने दान के लक्ष्य का संकेत किया है तथापि लक्ष्य का कार्यान्वयन होना असंभव या अव्यावहारिक है, या भविष्य में ऐसी योजना चालू नहीं रखी जा सकती तो न्यायालय विल के लक्ष्य से यथासंभव मिलते-जुलते किसी अन्य लक्ष्य के निमित्त उक्त राशि व्यय करने का आदेश देगा। देखिए, एटॉर्नी जनरल बनाम दी आयरन मांगर्स कं. (1840) 10, सी-एल. ऐंड एफ., 908।

विल में दी हुई राशि लक्ष्य के निमित्त पूर्व से ही अधिक है या पीछे आवश्यकता से अधिक हो जाती है तो आवश्यकता से अधिक राशि के प्रयोग में सामीप्य सिद्धांत लागू होगा। देखिए, रि राबर्ट्सन (1930) 2 चांसरी, 71।

दान का उद्देश्य दिखलाने के लिए क्या आवश्यक है, इस प्रसंग में कोई नियम रखना असंभव है। न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णयों से उदार एवं अनुदार दोनों विवृत्तियाँ (interpretation) परिलक्षित होती हैं। निर्दिष्ट दान यदि अन्यान्य दान के साथ मिश्रित हो, जो स्वत: पूर्ण एवं असंदिग्ध हो, तो दान की भावना स्पष्ट हो जाती है। देखिए, री नॉक्स (1937) चांसरी 109। किंतु यदि विल करने वाले के मन में कोई विशेष दातव्य लक्ष्य रहा हो और उस लक्ष्य की पूर्ति संभव न हो तो दान व्यर्थ हो जाएगा तथा दान की राशि दाता के पास लौट जाएगी और यदि विल के द्वारा दान दिया गया हो तो वह राशि संपत्ति के अवशेष में आ मिलेगी। देखिए, रि ह्वाइट्स ट्रस्ट (1886), 33 चांसरी 449।

यदि विल करने वाले ने किसी विशेष लक्ष्य के निमित्त दान दिया है एवं उसकी मृत्यु के पूर्व ही वह लक्ष्य लुप्त हो चुका है, तो न्यायालय के लिए उक्त लक्ष्य के निमित्त दातव्य भावना की निवृत्ति करना कठिन हो जाएगा। न्यायालय ने यदि दातव्य भावना नहीं पाई तो दान के लिए लक्षित संपत्ति अवशेष में मिल जाएगी। इसी प्रकार यदि दान किसी व्यक्ति विशेष के लिए दिया गया हो एवं वह भक्ति विल करने वाले से पहले ही मर चुका हो तो उक्त दान समाप्त हो जाएगा। दातव्य लक्ष्य यदि कोई संस्था हो और यह विल करने वाले की मृत्यु के समय वर्तमान हो, किंतु पीछे लुप्त हो जाए, तो संपत्ति सरकार की हो जाएगी और सरकार इसके निमित्त सामीप्य सिद्धांत लागू करेगी। देखिए, रि स्लेविन (1891) 2 चांसरी, 236।

संदर्भ ग्रंथ[संपादित करें]

  • स्नेल: प्रिंसिपुल्स ऑव ऐक्विटी, 23वाँ संस्करण, 1947;
  • जॉर्ज डब्ल्यू., कीटन: दि लॉ ऑव ट्रस्ट्स चतुर्थ संस्करण 1947;
  • मेटलैंड: एक्विटी, 1936।