सात्राप

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
रुद्रदमन का सिक्का, जो पश्चिमी सात्राप कहलाने वाले गुजरात-राजस्थान क्षेत्र के शक राजाओं में से एक था

सात्राप या क्षत्राप (फ़ारसी: ساتراپ‎, Satrap) प्राचीन ईरान के मीदि साम्राज्य और हख़ामनी साम्राज्य के प्रान्तों के राज्यपालों को कहा जाता था। इस शब्द का प्रयोग बाद में आने वाले सासानी और यूनानी साम्राज्यों ने भी किया। आधुनिक युग में किसी बड़ी शक्ति के नीचे काम करने वाले नेता को कभी-कभी अनौपचारिक रूप से 'सात्राप' कहा जाता है। किसी सात्राप के अधीन क्षेत्र को सात्रापी (satrapy) कहा जाता था।[1]

शब्दोत्त्पत्ति[संपादित करें]

'सात्राप' शब्द अवस्ताई भाषा और प्राचीन फ़ारसी भाषा के 'ख़्षथ़्रपावन' (xšaθrapāvan) शब्द से आया है। इस शब्द में 'ख़्षथ़्र' संस्कृत के सजातीय शब्द 'क्षेत्र' से मिलता-जुलता है। 'पावन' शब्द का अर्थ प्राचीन फ़ारसी में 'रक्षा करने वाला' होता है, जो संस्कृत के 'पालन' (रक्षक) शब्द से और 'पावन' (शुद्ध करने वाला) शब्द दोनों से मिलता है। 'ख़्षथ़्रपावन' समय के साथ परिवर्तित हो गया - 'ख़्षथ़्र' ('क्षेत्र') तो 'शहर' बन गया और 'पावन' ('पाल') 'बान' या केवल 'प' बन गया। इस से यह शब्द 'सात्राप' के रूप में और 'शहरबान' के रूप में मिलता है, जिसका संस्कृत में 'क्षेत्रपाल' बराबरी का शब्द होता। प्राचीन फ़ारसी में इसके जैसी 'शोइथ़्रापैती' उपाधि भी मिलती है, जिसका संस्कृत अनुवाद 'क्षेत्रपति' सरल है और ठीक यही उपाधि छत्रपति शिवाजी के लिए प्रयोग होती है।[2]

परिचय[संपादित करें]

'क्षत्रप' प्राचीन काल में फारस के सम्राटों द्वारा प्रांतीय शासकों के लिये दिया हुआ नाम (क्षत्रपावन)। इब्रानी का 'शख्शद्रपन' भी इसी अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। इसका अर्थ 'प्रदेश का रक्षक' होता है। ग्रीक लेखकों - हेरारदोतस, थ्यूसिदीदिज़ तथा [[ज़ेनोफ़न ने बाबुल, मिस्र आदि देशों के अभिलेखों में इसका अर्थ उपशासक अर्थात् लेफ्टिनेंट गवर्नर किया है। हेरोदोतस के अनुसार कुरूष के महान ने अपने साम्राज्य को अनेक प्रान्तों में विभक्त किया; दारयावौष ने उनका एक निश्चित ढंग से संगठन किया तथा अपने पूरे साम्राज्य में २१ क्षत्रप प्रान्तों का निर्माण किया और उनका कर भी निश्चित किया। क्षत्रपों तथा उपक्षत्रपों का सर्वप्रथम कार्य अपने प्रान्तों का भूमिकर इकट्ठा करना था। क्षत्रप इस कर में से राजकीय सेना, न्यायाधीशों तथा अपने व्यक्तिगत व्ययों को निकालकर अवशिष्ट भाग सम्राट को देता था। यदि क्षत्रप सम्राट का कृपापात्र बनना चाहता तो वह सम्राट के भाग की मात्रा अधिक कर देता। क्षत्रपों की और से सम्राट के लिए कोई निश्चित रकम नहीं बँधी होती थी।

सारे आय का हिसाब रखने तथा सम्राट् के भाग की निगरानी करने के लिए राजकीय कायस्थ रहता था। उन्हीं को सम्राट् की ओर से राजकीय आदेश प्राप्त हुआ करते थे। इस प्रकार दी हुई आज्ञा के शीघ्रातिशीघ्र पालन की आशा की जाती थी। इसमें तनिक भी अवरोध विद्रोह समझ लिया जाता था। क्षत्रपों को इसके लिए दंड भी मिलता था। और तुर्की साम्राज्य की भाँति उनके दंड में कोई औपचारिकता नहीं बरती जाती थी। क्षत्रपों के पास सम्राट् की आज्ञा पहुँचाने की विधि के लिए एक दिन की यात्रा की दूरी पर एक व्यक्ति रहता था। एक दूसरे के पास, दूसरा तीसरे के पास, इस प्रकार क्षत्रपों तक संदेश पहुँचाया जाता था। फारस के सम्राटों के पास क्षत्रपों की अधीनता प्राप्त करने के लिए अन्य प्रकार भी थे एक कमिश्नर को सेना के संरक्षण के साथ वातावरण तथा आवश्यकता के अनुसार कृपा प्रदान करने अथवा दंड देने के लिए भेजा जाता था। ज़ेनोफ़न के अनुसार यह प्रथा साम्राज्य के आरंभ से ही चली आ रही थी और उसके समय भी प्रचलित थी। क्षत्रपों के कार्य की निगरानी के लिए सम्राट् स्वयं साम्राज्य के प्रत्येक प्रदेश में प्रतिवर्ष जाया करता था। यदि वह स्वयं नहीं जा पाता तो अपने किसी प्रतिनिधि को भेज देता था। क्षत्रपों के अपने प्रान्त में भूमि की उर्वरता अथवा कृषि की अभिवृद्धि के लिए विशेष प्रयास करने पर उनको कुछ और भी प्रान्त प्रदान कर दिए जाते किंतु जहाँ यह सुव्यवस्था नहीं प्राप्त होती थी वहाँ से प्रदेश को काटकर दूसरे क्षत्रप प्रान्तों में मिला दिया जाता था। प्रांतों में प्रशासन के विधान का भार सम्राट् पर होता था जो अपने भाई, किसी कुटुंबी अथवा दामाद को क्षत्रप नियुक्त करता था। भारतवर्ष में नहपान ने अपने दामाद उषवदात को क्षत्रप बना रखा था।

सम्राट् के साथ बहुदा निकट संबंध के कारण क्षत्रपों के जीवन में सम्राट् की ही भाँति विलासिता परिलक्षित होती थी। क्षत्रप के दरबार में भी सम्राट् की भाँति औपचारिकता बरती जाती थी। सम्राट् की भाँति ही क्षत्रपों का अपना अंतपुर होता था। अंतपुर में क्लीवों की पर्याप्त संख्या रहती थी। राजकीय सेना के अतिरिक्त क्षत्रपों की व्यक्तिगत सेना हुआ करती थी। सम्राट् की ही भाँति उनके महलों में भी उद्यान, प्रमदवन, आदि होते थे। सम्राटों की ही भाँति वे भी वर्ष के कतिपय महींनों में एक स्थान से दूसरे स्थान पर समय व्यतीत करने के लिए जाते थे। क्षत्रपों को इस प्रकार अधिक राजकीय शक्ति स्वत प्राप्त थी। सैन्य तथा अन्य शक्तियों के अधिष्ठाता होने के अतिरिक्त एक और भी बात थी जिसके कारण क्षत्रप अत्यंत शक्तिशाली हो जाते थे और उनके विद्रोह करने की आशंका बनी रहती थी। कभी कभी वे विद्रोह कर भी देते थे। कभी दो या अधिक क्षत्रप प्रांतों का अधिष्ठाता एक ही क्षत्रप बना दिया जाता था जिसे महाक्षत्रप कहते थे। इन्हें अधिक सैन्यशक्ति तथा राजकीय शक्ति प्राप्त होती थी जो उनके विद्रोह में सहायक होती थी। इसका उदाहरण दारणवौष के राज्यकाल में ही प्राप्त है। आरोक्लीज़ ने, जो फ़ीजिया तथा लीदिया दोनों का क्षत्रप था, विद्रोह कर दिया था परवर्ती शासकों के काल में, विशेषकर लघु एशिया में, क्षत्रपों के विद्रोह अधिक होने लगे। लघु कुरूष के काल से क्षत्रपों की इस प्रवृत्ति में निरंतर वृद्धि होती गई। क्षत्रप कभी कभी खुला विद्रोह भी करते थे और अपने को स्वतंत्र शासक घोषित कर देते थे। इन विद्रोही क्षत्रपों में से बहुतों ने कई राज्यवंशों की स्थापना की और बाद में बिलकुल स्वतंत्र हो गए। इन सबके बावजूद सम्राट् उनकी अधीनता प्राप्त करने में सफल रहता था। इसका प्रमुख कारण क्षत्रपों में पारस्परिक कलह और युद्ध था। इसके अतिरिक्त दरबार में स्त्रियों की अधिकता तथा व्यभिचार के वातावरण से भी क्षत्रपों के व्यक्तित्व में सहज ढीलापन आने लगता था। क्षत्रप अपने को प्रान्तों के रक्षार्थ नियुक्त नहीं समझते थे बल्कि उनपर अपना आधिपत्य समझते थे। इसका एक कारण यह भी था कि क्षत्रपीय प्रशासन की व्यवस्था अंशत आनुवंशिक भी थी। वे क्षत्रप प्रान्तों के भूमिकर तथा अन्य आयों का उपभोग करते थे।

ज़ेनोफन के समय मिसिया के एक क्षत्रप ने उपक्षत्रप भी नियुक्त किया था जिसे उस प्रदेश के लोग कर देते थे और वह उलके बदले व्यवस्था करता था। यही व्यवस्था उसकी मृत्यु के पश्चात् उसकी विधवा के लिए भी होती रही। इस प्रकार की व्यवस्था ने साम्राज्य के ढाँचे को सहज ही ढीला कर दिया। परवर्ती काल में क्षत्रपों को राजकीय सेना के संचालन का भी अधिकार मिल गया था, विशेषकर तब जब वह राजकीय परिवार का अथवा उसका कोई संबंधी होता था। लघुकुरूष मिसिया, फ़ीज़िया, तथा लीदिया का क्षत्रप था पर युद्ध में संपूर्ण सेना का सेनापति भी वही था। यही स्थिति फ़ार्नबेसस तथा अन्य क्षत्रपों की भी है, किंतु इसका अर्थ यह नहीं है कि क्षत्रप प्रांतों में सैनिक शासन हो गया था। वस्तुत सम्राट् सैनिक तथा समाज के अधिकारियों, दोनों को स्वयं नियुक्त करता था। मजिस्ट्रेटों की नियुक्ति भी वह स्वयं करता था। क्षत्रप मजिस्ट्रेटों के कार्य में हस्तक्षेप नहीं कर सकता था। क्षत्रपीय प्रशासन की व्यवस्था को सिकंदर तथा उसके उत्तराधिकारियों ने भी अपनाया था, विशेषकर सिल्युकस के साम्राज्य में यहीं व्यवस्था थी।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. Foreign influence on ancient India, Krishna Chandra Sagar, Northern Book Centre, 1992, ISBN 978-81-7211-028-4, ... The satraps were a kind of subordinate rulers with a varying degree of political importance. The term 'satrap' is the Hellenised form of the old Persian Kshathrapavan (meaning protector of the realm) Indianized into 'Kshatrap' ...
  2. A concise etymological dictionary of the English language, Walter William Skeat, Clarendon press, 1896, ... Satrap, a Persian viceroy ... Zend (O. Pers.) shoithra-paiti, ruler of a region. - Zend. shoithra, a region; paiti, chief. Cf Skt. kshetra, a field, region; pati, a lord ...