सन्धि

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यह पृष्ट संस्कृत व्याकरण में प्रयुक्त सन्धि के बारे में है। अन्तरराष्ट्रीय विधि के सन्दर्भ में सन्धि अलग पृष्ट पर देखें।


सन्धि का अर्थ होता है जोड़ (Addition या Joint ) । संस्कृत, हिन्दी एवं अन्य भाषाओं में जब दो शब्दों के मेल से एक नया शब्द बनता है तो इसे सन्धि कहते हैं। सन्धि के नियम केवल भारोपीय भाषाओं में ही नहीं हैं बल्कि कोरियायी जैसी यूराल-आल्टिक परिवार की भाषाओं में भी हैं। जिस प्रकार नीला और लाल मिलकर बैगनी रंग बन जाता है उसी प्रकार सन्धि एक "प्राकृतिक" या सहज क्रिया है।

भेद[संपादित करें]

सन्धि के मुख्यतः तीन भेद हैं -

स्वर सन्धि[संपादित करें]

जब दो स्वरों के मेल से नया शब्द बनता है तो स्वर सन्धि होती है। स्वर सन्धि के मुख्य भेद निम्नलिखित हैं

दीर्घ सन्धि[संपादित करें]

अकार आदि समान स्वरों के मेल से दीर्घ स्वर बन जाता है। यथा–

अ + अ = आ — कमल + आसन = कमलासन

अ +आ= आ — हिम + आलय = हिमालय

आ + अ = आ — विद्या + अर्थी = विद्यार्थी

आ + आ = आ — महा + आलय = महालय

इ + इ = ई — गिरि + इन्द्र = गिरीन्द्र

ई + ई = ई — नदी + ईश = नदीश

उ + उ = ऊ — लघु + उर्मि = लघूर्मि

ऊ + उ = ऊ — वधू + उत्सव = वधूत्सव

गुण सन्धि[संपादित करें]

भिन्न स्वरों के मेल से गुण सन्धि होती है। इसके कुछ प्रमुख नियम इस प्रकार हैं-

(१) जब ह्रस्व या दीर्घ "अ" के बाद ह्रस्व या दीर्घ "इ" आए तो दोनों के स्थान पर "ए" हो जाता है । जैसे

अ+ इ = ए — भारत + इन्दु = भारतेन्दु

आ+ ई = ए — रमा + ईश = रमेश

आ+ इ = ए — महा + इन्द्र = महेन्द्र

अ+ ई = ए — गण + ईश = गणेश

(२) जब ह्रस्व या दीर्घ "अ" के बाद ह्रस्व या दीर्घ "उ" आए तो दोनों के स्थान पर "ओ" हो जाता है । जैसे

अ+ उ = ओ — चन्द्र + उदय = चन्द्रोदय

आ + उ = ओ — महा + उदय = महोदय

आ+ ऊ = ओ — गंगा + ऊर्मि = गंगोर्मि

अ + ऊ = ओ — जल + ऊर्मि = जलोर्मि

(३) जब ह्रस्व या दीर्घ "अ" के बाद ह्रस्व या दीर्घ "ॠ" आए तो दोनों के स्थान पर "अर्" हो जाता है । जैसे

अ+ ऋ = अर् — देव + ऋषि = देवर्षि

आ + ऋ = अर् — महा + ऋषि = महर्षि

वृद्धि सन्धि[संपादित करें]

इसके प्रमुख सूत्र निम्न हैं

(१) जब ह्रस्व या दीर्घ "अ" के बाद "ए" या "ऐ" आए तो दोनों के स्थान पर "ऐ" हो जाता है । जैसे

अ+ ए = ऐ — अत्र + एव = अत्रैव

आ + ऐ = ऐ — महा + ऐश्वर्य = महैश्वर्य

अ+ ऐ = ऐ — मत + ऐक्य = मतैक्य

आ +ए = ऐ — सदा + एव = सदैव

(२) जब ह्रस्व या दीर्घ "अ" के बाद "ओ" या "औ" आए तो दोनों के स्थान पर "औ" हो जाता है । जैसे

अ + ओ = औ — सुन्दर + ओदन = सुन्दरौदन

अ + औ = औ — वन + औषधि= वनौषधि

आ + ओ = औ — महा + ओज = महौज

आ + औ = औ — महा + औषधि = महौषधि

यण् सन्धि[संपादित करें]

इसके कुछ प्रमुख नियम इस प्रकार हैं-

(१) जब "इ" या "ई" के बाद "इ" या "ई" के अतिरिक्त कोई अन्य स्वर आए तो "इ" या "ई" के स्थान पर "य" हो जाता है । जैसे

अभि+ उदय = अभ्युदय

इति +आदि = इत्यादि

(२) जब "उ" या "ऊ" के बाद "उ" या "ऊ" के अतिरिक्त कोई अन्य स्वर आए तो "उ" या "ऊ" के स्थान पर "व" हो जाता है । जैसे

सु + आगत = स्वागत

अनु + एषण = अन्वेषण

वधू + आगमन = वध्वागमन

(३) जब "ऋ" के बाद "ऋ" के अतिरिक्त कोई अन्य स्वर आए तो "ऋ" के स्थान पर "र" हो जाता है । जैसे

मातृ + आदेश = मात्रादेश

पितृ + आदि = पित्रादि

अयादि सन्धि[संपादित करें]

जब "ए", "ऐ", "ओ" एवं "औ" के बाद कोई अन्य स्वर आए तो इनके स्थान पर क्रमशः "अय्", "आय्", "अव्" "आव्" हो जाता है । जैसे

ने +अन =नयन

गै +अक = गायक

पो + अन = पवन

नौ + इक = नाविक

व्यंजन सन्धि[संपादित करें]

जब दो व्यंजनों या व्यंजन और स्वर के मेल से एक नया शब्द बनता है तो इसे व्यंजन सन्धि कहते हैं। जैसे :- दिक् + गज = दिग्गज वाक् + ईश = वागीश

विसर्ग सन्धि[संपादित करें]

जब पहले शब्द के अंत में स्थित विसर्ग के दूसरे शब्द के प्रथम अक्षर से संयुक्त होने पर नया शब्द बनता है तो विसर्ग सन्धि होती है।