सदस्य:Pandit AshuBahuguna/प्रयोगपृष्ठ

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1. तंत्र शास्त्र भारत की एक प्राचीन विद्या है। तंत्र ग्रंथ भगवान शिव के मुख से आविर्भूत हुए हैं। उनको पवित्र और प्रामाणिक माना गया है। भारतीय साहित्य में 'तंत्र' की एक विशिष्ट स्थिति है, पर कुछ साधक इस शक्ति का दुरुपयोग करने लग गए, जिसके कारण यह विद्या बदनाम हो गई। कामी, क्रोधी, लालची, इनसे भक्ति न होय । भक्ति करे कोइ सूरमा, जाति वरन कुल खोय ॥ जो तंत्र से भय खाता हैं, वह मनुष्य ही नहीं हैं, वह साधक तो बन ही नहीं सकता! गुरु गोरखनाथ के समय में तंत्र अपने आप में एक सर्वोत्कृष्ट विद्या थी और समाज का प्रत्येक वर्ग उसे अपना रहा था! जीवन की जटिल समस्याओं को सुलझाने में केवल तंत्र ही सहायक हो सकता हैं! परन्तु गोरखनाथ के बाद में भयानन्द आदि जो लोग हुए उन्होंने तंत्र को एक विकृत रूप दे दिया! उन्होंने तंत्र का तात्पर्य भोग, विलास, मद्य, मांस, पंचमकार को ही मान लिया ! “मद्यं मांसं तथा मत्स्यं मुद्रा मैथुनमेव च, मकार पंचवर्गस्यात सह तंत्रः सह तान्त्रिकां” जो व्यक्ति इन पांच मकारो में लिप्त रहता हैं वही तांत्रिक हैं, भयानन्द ने ऐसा कहा! उसने कहा की उसे मांस, मछली और मदिरा तो खानी ही चाहिए, और वह नित्य स्त्री के साथ समागम करता हुआ साधना करे! ये ऐसी गलत धरना समाज में फैली की जो ढोंगी थे, जो पाखंडी थे, उन्होंने इस श्लोक को महत्वपूर्ण मान लिया और शराब पीने लगे, धनोपार्जन करने लगे, और मूल तंत्र से अलग हट गए, धूर्तता और छल मात्र रह गया! और समाज ऐसे लोगों से भय खाने लगे! और दूर हटने लगे! लोग सोचने लगे कि ऐसा कैसा तंत्र हैं, इससे समाज का क्या हित हो सकता हैं? लोगों ने इन तांत्रिकों का नाम लेना बंद कर दिया, उनका सम्मान करना बंद कर दिया, अपना दुःख तो भोगते रहे परन्तु अपनी समस्याओं को उन तांत्रिकों से कहने में कतराने लगे, क्योंकि उनके पास जाना ही कई प्रकार की समस्याओं को मोल लेना था! और ऐसा लगने लगा कि तंत्र समाज के लिए उपयोगी नहीं हैं!

परन्तु दोष तंत्र का नहीं, उन पथभ्रष्ट लोगों का रहा, जिनकी वजह से तंत्र भी बदनाम हो गया! सही अर्थों में देखा जायें तो तंत्र का तात्पर्य तो जीवन को सभी दृष्टियों से पूर्णता देना हैं!

जब हम मंत्र के माध्यम से देवता को अनुकूल बना सकते हैं, तो फिर तंत्र की हमारे जीवन में कहाँ अनुकूलता रह जाती हैं? मंत्र का तात्पर्य हैं, देवता की प्रार्थना करना, हाथ जोड़ना, निवेदन करना, भोग लगाना, आरती करना, धुप अगरबत्ती करना, पर यह आवश्यक नहीं कि लक्ष्मी प्रसन्ना हो ही और हमारा घर अक्षय धन से भर दे! तब दुसरे तरीके से यदि आपमें हिम्मत हैं, साहस हैं, हौसला हैं, तो क्षमता के साथ लक्ष्मी की आँख में आँख डालकर आप खड़े हो जाते हैं और कहते हैं कि मैं यह तंत्र साधना कर रहा हूँ, मैं तुम्हें तंत्र में आबद्ध कर रहा हूँ और तुम्हें हर हालत में सम्पन्नता देनी हैं, और देनी ही पड़ेगी!

पहले प्रकार से स्तुति या प्रार्थना करने से देवता प्रसन्ना न भी हो परन्तु तंत्र से तो देवता बाध्य होते ही हैं, उन्हें वरदान देना ही पड़ता हैं! मंत्र और तंत्र दोनों ही पद्धतियों में साधना विधि, पूजा का प्रकार, न्यास सभी कुछ लगभग एक जैसा ही होता हैं, बस अंतर होता हैं, तो दोनों के मंत्र विन्यास में, तांत्रोक्त मंत्र अधिक तीक्ष्ण होता हैं! जीवन की किसी भी विपरीत स्थिति में तंत्र अचूक और अनिवार्य विधा हैं.

आज के युग में हमारे पास इतना समय नहीं हैं, कि हम बार-बार हाथ जोड़े, बार-बार घी के दिए जलाएं, बार-बार भोग लगायें, लक्ष्मी की आरती उतारते रहे और बीसों साल दरिद्री बने रहे, इसलिए तंत्र ज्यादा महत्वपूर्ण हैं, कि लक्ष्मी बाध्य हो ही जायें और कम से कम समय में सफलता मिले! बड़े ही व्यवस्थित तरीके से मंत्र और साधना करने की क्रिया तंत्र हैं! किस ढंग से मंत्र का प्रयोग किया जायें, साधना को पूर्णता दी जायें, उस क्रिया का नाम तंत्र हैं! और तंत्र साधना में यदि कोई न्यूनता रह जायें, तो यह तो हो सकता हैं, कि सफलता नहीं मिले परन्तु कोई विपरीत परिणाम नहीं मिलता! तंत्र के माध्यम से कोई भी गृहस्थ वह सब कुछ हस्तगत कर सकता हैं, जो उसके जीवन का लक्ष्य हैं! तंत्र तो अपने आप में अत्यंत सौम्य साधना का प्रकार हैं, पंचमकार तो उसमें आवश्यक हैं ही नहीं! बल्कि इससे परे हटकर जो पूर्ण पवित्रमय सात्विक तरीके, हर प्रकार के व्यसनों से दूर रहता हुआ साधना करता हैं तो वह तंत्र साधना हैं! जनसाधारण में इसका व्यापक प्रचार न होने का एक कारण यह भी था कि तंत्रों के कुछ अंश समझने में इतने कठिन हैं कि गुरु के बिना समझे नहीं जा सकते । अतः ज्ञान का अभाव ही शंकाओं का कारण बना। तंत्र शास्त्र वेदों के समय से हमारे धर्म का अभिन्न अंग रहा है। वैसे तो सभी साधनाओं में मंत्र, तंत्र एक-दूसरे से इतने मिले हुए हैं कि उनको अलग-अलग नहीं किया जा सकता, पर जिन साधनों में तंत्र की प्रधानता होती है, उन्हें हम 'तंत्र साधना' मान लेते हैं। 'यथा पिण्डे तथा ब्रह्माण्डे' की उक्ति के अनुसार हमारे शरीर की रचना भी उसी आधार पर हुई है जिस पर पूर्ण ब्रह्माण्ड की। तांत्रिक साधना का मूल उद्देश्य सिद्धि से साक्षात्कार करना है। इसके लिए अन्तर्मुखी होकर साधनाएँ की जाती हैं। तांत्रिक साधना को साधारणतया तीन मार्ग : वाम मार्ग, दक्षिण मार्ग व मधयम मार्ग कहा गया है। श्मशान में साधना करने वाले का निडर होना आवश्यक है। जो निडर नहीं हैं, वे दुस्साहस न करें। तांत्रिकों का यह अटूट विश्वास है, जब रात के समय सारा संसार सोता है तब केवल योगी जागते हैं। तांत्रिक साधना का मूल उद्देश्य सिद्धि से साक्षात्कार करना है। यह एक अत्यंत ही रहस्यमय शास्त्र है । चूँकि इस शास्त्र की वैधता विवादित है अतः हमारे द्वारा दी जा रही सामग्री के आधार पर किसी भी प्रकार के प्रयोग करने से पूर्व किसी योग्य तांत्रिक गुरु की सलाह अवश्य लें। अन्यथा किसी भी प्रकार के लाभ-हानि की जिम्मेदारी आपकी होगी। परस्पर आश्रित या आपस में संक्रिया करने वाली चीजों का समूह, जो मिलकर सम्पूर्ण बनती हैं, निकाय, तंत्र, प्रणाली या सिस्टम (System) कहलातीं हैं। कार है और चलाने का मन्त्र भी आता है, यानी शुद्ध आधुनिक भाषा मे ड्राइविन्ग भी आती है, रास्ते मे जाकर कार किसी आन्तरिक खराबी के कारण खराब होकर खडी हो जाती है, अब उसके अन्दर का तन्त्र नही आता है, यानी कि किस कारण से वह खराब हुई है और क्या खराब हुआ है, तो यन्त्र यानी कार और मन्त्र यानी ड्राइविन्ग दोनो ही बेकार हो गये, किसी भी वस्तु, व्यक्ति, स्थान, और समय का अन्दरूनी ज्ञान रखने वाले को तान्त्रिक कहा जाता है, तो तन्त्र का पूरा अर्थ इन्जीनियर या मैकेनिक से लिया जा सकता है जो कि भौतिक वस्तुओं का और उनके अन्दर की जानकारी रखता है, शरीर और शरीर के अन्दर की जानकारी रखने वाले को डाक्टर कहा जाता है, और जो पराशक्तियों की अन्दर की और बाहर की जानकारी रखता है, वह ज्योतिषी या ब्रह्मज्ञानी कहलाता है, जिस प्रकार से बिजली का जानकार लाख कोशिश करने पर भी तार के अन्दर की बिजली को नही दिखा सकता, केवल अपने विषेष यन्त्रों की सहायता से उसकी नाप या प्रयोग की विधि दे सकता है, उसी तरह से ब्रह्मज्ञान की जानकारी केवल महसूस करवाकर ही दी जा सकती है, जो वस्तु जितने कम समय के प्रति अपनी जीवन क्रिया को रखती है वह उतनी ही अच्छी तरह से दिखाई देती है और अपना प्रभाव जरूर कम समय के लिये देती है मगर लोग कहने लगते है, कि वे उसे जानते है, जैसे कम वोल्टेज पर वल्व धीमी रोशनी देगा, मगर अधिक समय तक चलेगा, और जो वल्व अधिक रोशनी अधिक वोल्टेज की वजह से देगा तो उसका चलने का समय भी कम होगा, उसी तरह से जो क्रिया दिन और रात के गुजरने के बाद चौबीस घंटे में मिलती है वह साक्षात समझ मे आती है कि कल ठंड थी और आज गर्मी है, मगर मनुष्य की औसत उम्र अगर साठ साल की है तो जो जीवन का दिन और रात होगी वह उसी अनुपात में लम्बी होगी, और उसी क्रिया से समझ में आयेगा.जितना लम्बा समय होगा उतना लम्बा ही कारण होगा, अधिकतर जीवन के खेल बहुत लोग समझ नही पाते, मगर जो रोजाना विभिन्न कारणों के प्रति अपनी जानकारी रखते है वे तुरत फ़ुरत में अपनी सटीक राय दे देते है.यही तन्त्र और और तान्त्रिक का रूप कहलाता है. तन्त्र परम्परा से जुडे हुए आगम ग्रन्थ हैं। इनके वक्ता साधारणतयः शिवजी होते हैं। तन्त्र का शाब्दिक उद्भव इस प्रकार माना जाता है - “तनोति त्रायति तन्त्र” । जिससे अभिप्राय है – तनना, विस्तार, फैलाव इस प्रकार इससे त्राण होना तन्त्र है। हिन्दू, बौद्ध तथा जैन दर्शनों में तन्त्र परम्परायें मिलती हैं। यहाँ पर तन्त्र साधना से अभिप्राय "गुह्य या गूढ़ साधनाओं" से किया जाता रहा है।

तन्त्रों को वेदों के काल के बाद की रचना माना जाता है और साहित्यक रूप में जिस प्रकार पुराण ग्रन्थ मध्ययुग की दार्शनिक-धार्मिक रचनायें माने जाते हैं उसी प्रकार तन्त्रों में प्राचीन-अख्यान, कथानक आदि का समावेश होता है। अपनी विषयवस्तु की दृष्टि से ये धर्म, दर्शन, सृष्टिरचना शास्त्र, प्रचीन विज्ञान आदि के इनसाक्लोपीडिया भी कहे जा सकते हैं। ........................स्वास्थ्य के लिये टोटके

1॰ सदा स्वस्थ बने रहने के लिये रात्रि को पानी किसी लोटे या गिलास में सुबह उठ कर पीने के लिये रख दें। उसे पी कर बर्तन को उल्टा रख दें तथा दिन में भी पानी पीने के बाद बर्तन (गिलास आदि) को उल्टा रखने से यकृत सम्बन्धी परेशानियां नहीं होती तथा व्यक्ति सदैव स्वस्थ बना रहता है।

2॰ हृदय विकार, रक्तचाप के लिए एकमुखी या सोलहमुखी रूद्राक्ष श्रेष्ठ होता है। इनके न मिलने पर ग्यारहमुखी, सातमुखी अथवा पांचमुखी रूद्राक्ष का उपयोग कर सकते हैं। इच्छित रूद्राक्ष को लेकर श्रावण माह में किसी प्रदोष व्रत के दिन, अथवा सोमवार के दिन, गंगाजल से स्नान करा कर शिवजी पर चढाएं, फिर सम्भव हो तो रूद्राभिषेक करें या शिवजी पर “ॐ नम: शिवाय´´ बोलते हुए दूध से अभिषेक कराएं। इस प्रकार अभिमंत्रित रूद्राक्ष को काले डोरे में डाल कर गले में पहनें।

3॰ जिन लोगों को 1-2 बार दिल का दौरा पहले भी पड़ चुका हो वे उपरोक्त प्रयोग संख्या 2 करें तथा निम्न प्रयोग भी करें :- एक पाचंमुखी रूद्राक्ष, एक लाल रंग का हकीक, 7 साबुत (डंठल सहित) लाल मिर्च को, आधा गज लाल कपड़े में रख कर व्यक्ति के ऊपर से 21 बार उसार कर इसे किसी नदी या बहते पानी में प्रवाहित कर दें।

4॰ किसी भी सोमवार से यह प्रयोग करें। बाजार से कपास के थोड़े से फूल खरीद लें। रविवार शाम 5 फूल, आधा कप पानी में साफ कर के भिगो दें। सोमवार को प्रात: उठ कर फूल को निकाल कर फेंक दें तथा बचे हुए पानी को पी जाएं। जिस पात्र में पानी पीएं, उसे उल्टा कर के रख दें। कुछ ही दिनों में आश्चर्यजनक स्वास्थ्य लाभ अनुभव करेंगे।

5॰ घर में नित्य घी का दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय लौ पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर हो या दीपक के मध्य में (फूलदार बाती) बाती लगाना शुभ फल देने वाला है।

6॰ रात्रि के समय शयन कक्ष में कपूर जलाने से बीमारियां, दु:स्वपन नहीं आते, पितृ दोष का नाश होता है एवं घर में शांति बनी रहती है।

7॰ पूर्णिमा के दिन चांदनी में खीर बनाएं। ठंडी होने पर चन्द्रमा और अपने पितरों को भोग लगाएं। कुछ खीर काले कुत्तों को दे दें। वर्ष भर पूर्णिमा पर ऐसा करते रहने से गृह क्लेश, बीमारी तथा व्यापार हानि से मुक्ति मिलती है।

8॰ रोग मुक्ति के लिए प्रतिदिन अपने भोजन का चौथाई हिस्सा गाय को तथा चौथाई हिस्सा कुत्ते को खिलाएं।

9॰ घर में कोई बीमार हो जाए तो उस रोगी को शहद में चन्दन मिला कर चटाएं।

10॰ पुत्र बीमार हो तो कन्याओं को हलवा खिलाएं। पीपल के पेड़ की लकड़ी सिरहाने रखें।

11॰ पत्नी बीमार हो तो गोदान करें। जिस घर में स्त्रीवर्ग को निरन्तर स्वास्थ्य की पीड़ाएँ रहती हो, उस घर में तुलसी का पौधा लगाकर उसकी श्रद्धापूर्वक देखशल करने से रोग पीड़ाएँ समाप्त होती है।

12॰ मंदिर में गुप्त दान करें।

13॰ रविवार के दिन बूंदी के सवा किलो लड्डू मंदिर में प्रसाद के रूप में बांटे।

14॰ सदैव पूर्व या दक्षिण दिषा की ओर सिर रख कर ही सोना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर सिर कर के सोने वाले व्यक्ति में चुम्बकीय बल रेखाएं पैर से सिर की ओर जाती हैं, जो अधिक से अधिक रक्त खींच कर सिर की ओर लायेंगी, जिससे व्यक्ति विभिन्न रोंगो से मुक्त रहता है और अच्छी निद्रा प्राप्त करता है।

15॰ अगर परिवार में कोई परिवार में कोई व्यक्ति बीमार है तथा लगातार औषधि सेवन के पश्चात् भी स्वास्थ्य लाभ नहीं हो रहा है, तो किसी भी रविवार से आरम्भ करके लगातार 3 दिन तक गेहूं के आटे का पेड़ा तथा एक लोटा पानी व्यक्ति के सिर के ऊपर से उबार कर जल को पौधे में डाल दें तथा पेड़ा गाय को खिला दें। अवश्य ही इन 3 दिनों के अन्दर व्यक्ति स्वस्थ महसूस करने लगेगा। अगर टोटके की अवधि में रोगी ठीक हो जाता है, तो भी प्रयोग को पूरा करना है, बीच में रोकना नहीं चाहिए।

16॰ अमावस्या को प्रात: मेंहदी का दीपक पानी मिला कर बनाएं। तेल का चौमुंहा दीपक बना कर 7 उड़द के दाने, कुछ सिन्दूर, 2 बूंद दही डाल कर 1 नींबू की दो फांकें शिवजी या भैरों जी के चित्र का पूजन कर, जला दें। महामृत्युजंय मंत्र की एक माला या बटुक भैरव स्तोत्र का पाठ कर रोग-शोक दूर करने की भगवान से प्रार्थना कर, घर के दक्षिण की ओर दूर सूखे कुएं में नींबू सहित डाल दें। पीछे मुड़कर नहीं देखें। उस दिन एक ब्राह्मण -ब्राह्मणी को भोजन करा कर वस्त्रादि का दान भी कर दें। कुछ दिन तक पक्षियों, पशुओं और रोगियों की सेवा तथा दान-पुण्य भी करते रहें। इससे घर की बीमारी, भूत बाधा, मानसिक अशांति निश्चय ही दूर होती है।

17॰ किसी पुरानी मूर्ति के ऊपर घास उगी हो तो शनिवार को मूर्ति का पूजन करके, प्रात: उसे घर ले आएं। उसे छाया में सुखा लें। जिस कमरे में रोगी सोता हो, उसमें इस घास में कुछ धूप मिला कर किसी भगवान के चित्र के आगे अग्नि पर सांय, धूप की तरह जलाएं और मन्त्र विधि से ´´ ॐ माधवाय नम:। ॐ अनंताय नम:। ॐ अच्युताय नम:।´´ मन्त्र की एक माला का जाप करें। कुछ दिन में रोगी स्वस्थ हो जायेगा। दान-धर्म और दवा उपयोग अवश्य करें। इससे दवा का प्रभाव बढ़ जायेगा।

18॰ अगर बीमार व्यक्ति ज्यादा गम्भीर हो, तो जौ का 125 पाव (सवा पाव) आटा लें। उसमें साबुत काले तिल मिला कर रोटी बनाएं। अच्छी तरह सेंके, जिससे वे कच्ची न रहें। फिर उस पर थोड़ा सा तिल्ली का तेल और गुड़ डाल कर पेड़ा बनाएं और एक तरफ लगा दें। फिर उस रोटी को बीमार व्यक्ति के ऊपर से 7 बार वार कर किसी भैंसे को खिला दें। पीछे मुड़ कर न देखें और न कोई आवाज लगाए। भैंसा कहाँ मिलेगा, इसका पता पहले ही मालूम कर के रखें। भैंस को रोटी नहीं खिलानी है, केवल भैंसे को ही श्रेष्ठ रहती है। शनि और मंगलवार को ही यह कार्य करें।

19॰ पीपल के वृक्ष को प्रात: 12 बजे के पहले, जल में थोड़ा दूध मिला कर सींचें और शाम को तेल....19॰ पीपल के वृक्ष को प्रात: 12 बजे के पहले, जल में थोड़ा दूध मिला कर सींचें और शाम को तेल का दीपक और अगरबत्ती जलाएं। ऐसा किसी भी वार से शुरू करके 7 दिन तक करें। बीमार व्यक्ति को आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा।

20॰ किसी कब्र या दरगाह पर सूर्यास्त के पश्चात् तेल का दीपक जलाएं। अगरबत्ती जलाएं और बताशे रखें, फिर वापस मुड़ कर न देखें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा।

21॰ किसी तालाब, कूप या समुद्र में जहां मछलियाँ हों, उनको शुक्रवार से शुक्रवार तक आटे की गोलियां, शक्कर मिला कर, चुगावें। प्रतिदिन लगभग 125 ग्राम गोलियां होनी चाहिए। रोगी ठीक होता चला जायेगा।

22॰ शुक्रवार रात को मुठ्ठी भर काले साबुत चने भिगोयें। शनिवार की शाम काले कपड़े में उन्हें बांधे तथा एक कील और एक काले कोयले का टुकड़ा रखें। इस पोटली को किसी तालाब या कुएं में फेंक दें। फेंकने से पहले रोगी के ऊपर से 7 बार वार दें। ऐसा 3 शनिवार करें। बीमार व्यक्ति शीघ्र अच्छा हो जायेगा।

23॰ सवा सेर (1॰25 सेर) गुलगुले बाजार से खरीदें। उनको रोगी पर से 7 बार वार कर चीलों को खिलाएं। अगर चीलें सारे गुलगुले, या आधे से ज्यादा खा लें तो रोगी ठीक हो जायेगा। यह कार्य शनि या मंगलवार को ही शाम को 4 और 6 के मध्य में करें। गुलगुले ले जाने वाले व्यक्ति को कोई टोके नहीं और न ही वह पीछे मुड़ कर देखे।

24॰ यदि लगे कि शरीर में कष्ट समाप्त नहीं हो रहा है, तो थोड़ा सा गंगाजल नहाने वाली बाल्टी में डाल कर नहाएं।

25॰ प्रतिदिन या शनिवार को खेजड़ी की पूजा कर उसे सींचने से रोगी को दवा लगनी शुरू हो जाती है और उसे धीरे-धीरे आराम मिलना प्रारम्भ हो जायेगा। यदि प्रतिदिन सींचें तो 1 माह तक और केवल शनिवार को सींचें तो 7 शनिवार तक यह कार्य करें। खेजड़ी के नीचे गूगल का धूप और तेल का दीपक जलाएं।

26॰ हर मंगल और शनिवार को रोगी के ऊपर से इमरती को 7 बार वार कर कुत्तों को खिलाने से धीरे-धीरे आराम मिलता है। यह कार्य कम से कम 7 सप्ताह करना चाहिये। बीच में रूकावट न हो, अन्यथा वापस शुरू करना होगा।

27॰ साबुत मसूर, काले उड़द, मूंग और ज्वार चारों बराबर-बराबर ले कर साफ कर के मिला दें। कुल वजन 1 किलो हो। इसको रोगी के ऊपर से 7 बार वार कर उनको एक साथ पकाएं। जब चारों अनाज पूरी तरह पक जाएं, तब उसमें तेल-गुड़ मिला कर, किसी मिट्टी के दीये में डाल कर दोपहर को, किसी चौराहे पर रख दें। उसके साथ मिट्टी का दीया तेल से भर कर जलाएं, अगरबत्ती जलाएं। फिर पानी से उसके चारों ओर घेरा बना दें। पीछे मुड़ कर न देखें। घर आकर पांव धो लें। रोगी ठीक होना शुरू हो जायेगा।

28॰ गाय के गोबर का कण्डा और जली हुई लकड़ी की राख को पानी में गूंद कर एक गोला बनाएं। इसमें एक कील तथा एक सिक्का भी खोंस दें। इसके ऊपर रोली और काजल से 7 निशान लगाएं। इस गोले को एक उपले पर रख कर रोगी के ऊपर से 3 बार उतार कर सुर्यास्त के समय मौन रह कर चौराहे पर रखें। पीछे मुड़ कर न देखें।

29॰ शनिवार के दिन दोपहर को 2॰25 (सवा दो) किलो बाजरे का दलिया पकाएं और उसमें थोड़ा सा गुड़ मिला कर एक मिट्टी की हांडी में रखें। सूर्यास्त के समय उस हांडी को रोगी के शरीर पर बायें से दांये 7 बार फिराएं और चौराहे पर मौन रह कर रख आएं। आते-जाते समय पीछे मुड़ कर न देखें और न ही किसी से बातें करें।

30॰ धान कूटने वाला मूसल और झाडू रोगी के ऊपर से उतार कर उसके सिरहाने रखें।

31॰ सरसों के तेल को गरम कर इसमें एक चमड़े का टुकड़ा डालें, पुन: गर्म कर इसमें नींबू, फिटकरी, कील और काली कांच की चूड़ी डाल कर मिट्टी के बर्तन में रख कर, रोगी के सिर पर फिराएं। इस बर्तन को जंगल में एकांत में गाड़ दें।.........................ऋण मुक्ति भैरव साधना- हर व्यक्ति के जीवन में ऋण एक अभिशाप है !एक वार व्यक्ति इस में फस गया तो धस्ता चला जाता है ! सूत की चिंता धीरे धीरे मष्तश पे हावी होती चली जाती है जिस का असर स्वस्थ पे होना भी स्वाभिक है ! प्रत्येक व्क्यती पे छ किस्म का ऋण होता है जिस में पित्र ऋण मार्त ऋण भूमि ऋण गुरु ऋण और भ्राता ऋण और ऋण जिसे ग्रह ऋण भी कहते है !संसारी ऋण (कर्ज )व्यक्ति की कमर तोड़ देता है मगर हजार परयत्न के बाद भी व्यक्ति छुटकारा नहीं पाता तो मेयूस हो के ख़ुदकुशी तक सोच लेता है !मैं जहां एक बहुत ही सरल अनुभूत साधना प्रयोग दे रहा हु आप निहचिंत हो कर करे बहुत जल्द आप इस अभिशाप से मुक्ति पा लेंगे ! विधि – शुभ दिन जिस दिन रवि पुष्य योग हो जा रवि वार हस्त नक्षत्र हो शूकल पक्ष हो तो इस साधना को शुरू करे वस्त्र --- लाल रंग की धोती पहन सकते है ! माला – काले हकीक की ले ! दिशा –दक्षिण ! सामग्री – भैरव यन्त्र जा चित्र और हकीक माला काले रंग की ! मंत्र संख्या – 12 माला 21 दिन करना है ! पहले गुरु पूजन कर आज्ञा ले और फिर श्री गणेश जी का पंचौपचार पूजन करे तद पहश्चांत संकल्प ले ! के मैं गुरु स्वामी निखिलेश्वरा नन्द जी का शिष्य अपने जीवन में स्मस्थ ऋण मुक्ति के लिए यह साधना कर रहा हु हे भैरव देव मुझे ऋण मुक्ति दे !जमीन पे थोरा रेत विशा के उस उपर कुक्म से तिकोण बनाए उस में एक पलेट में स्वास्तिक लिख कर उस पे लाल रंग का फूल रखे उस पे भैरव यन्त्र की स्थापना करे उस यन्त्र का जा चित्र का पंचौपचार से पूजन करे तेल का दिया लगाए और भोग के लिए गुड रखे जा लड्डू भी रख सकते है ! मन को स्थिर रखते हुये मन ही मन ऋण मुक्ति के लिए पार्थना करे और जप शुरू करे 12 माला जप रोज करे इस प्रकार 21 दिन करे साधना के बाद स्मगरी माला यन्त्र और जो पूजन किया है वोह समान जल प्रवाह कर दे साधना के दोरान रवि वार जा मंगल वार को छोटे बच्चो को मीठा भोजन आदि जरूर कराये ! शीघ्र ही कर्ज से मुक्ति मिलेगी और कारोबार में प्रगति भी होगी ! मंत्र—ॐ ऐं क्लीम ह्रीं भम भैरवाये मम ऋणविमोचनाये महां महा धन प्रदाय क्लीम स्वाहा !!....................पारिवारिक क्लेश निवारक तंत्र ( उपाय ) अक्षर लोग हमारे पास नोकरी – बिजनेश – आर्थिक संकट – विवाह – संतान – या फिर शारीरिक तकलीफ यह सारी परेशानी ज्यादा लेकर आते और उनमे से ज्यादातर लोगो से वार्तालाप में यह सामने आता हें की उनके घर और जीवन में क्लेश भी हें जिस वजह से वो परेशान हें, यदि पारिवारिक जीवन सुखमय हो और परिवार के सभ्यो का संपूर्ण सहयोग मिलता हो तो व्यक्त शीघ्र ही उन्नति को प्राप्त करता हें – में यहाँ कुछ ऐसे उपाय दे रहा हू जो कर के आप अपने जीवन से क्लेश को मिटा करे जीवन को सुखमय बना शके .

... परिवार के सभी सदस्यों को साल में एक बार किसी नदी या सरोवर में एक साथ स्नान करना चाहिए

... अगर आपके परिवार में किसी महिला सदस्य की वजह से कलश उत्पन्न हो रहा हो तो उस महिला का स्वभाव शांत करने के लिए उसे एक चांदी की चैन में चांदी के पत्र पर चंद्रमा का यन्त्र बनवाकर उसे धारण करवाना चाहिए ( किसी भी सोमवार को

... अगर आपके परिवार में किसी पुरुष सदाशय की वजह से क्लेश उत्पन्न हो रहा हो तो उस पुरुष से हर सोमवार को चावल का दान करवाए और हररोज सूर्योदय के समय सूर्य को जल अर्पण करवाए, अवश्य उसका स्वभाव शांत होगा

... अगर आपके परिवार में स्त्री वर्ग में परस्पर तनाव या विवाद की वजह से क्लेश उत्पन्न हो रहा हो तो ध्यान रहे की सभी महिला सदस्य कभी लाल वस्त्र एक साथ नहीं पहने और हो शके तो उन महिलाओ से कहे की वो माँ दुर्गा का पूजन अवश्य करे

... अगर आपके परिवार में पुरुष वर्ग में परस्पर तनाव या विवाद की वजह से क्लेश उत्पन्न हो रहा हो तो यह घर के में एक कदम्ब वृक्ष की डाली लाकर घर में रखनी चाहिए ( डाली में कमसे कम ७ अखंडित पत्ते होने चाहिए ) हर पूर्णिमा को ये डाली ले जाकर वही कदम्ब वृक्ष के आगे छोड़ दे और वह से दूसरी ले आये इस तरह १८ पूर्णिमा तक करे और साथै में उन पुरुषों को कहे की वो श्री हरी विष्णु के दर्शन अवश्य करे

... अगर परिवार के युवा एवं वृद्ध व्यक्ति के बिच में तनाव या विवाद की वजह से क्लेश उत्पन्न हो रहा हो तो घर के हर एक कक्ष के दरवाजे पर हर पूर्णिमा के दिन सुबह अशोक के पत्तों का तोरण बनाकर लगाना चाहिए

... यदि उपरोक्त उपायों के बावजूत भी घर में ज्यादा ही क्लेश उत्पन्न हो रहा हो तो प्रत्येक व्यक्ति की कुंडली के अनुसार समस्या का समाधान करना चाहिए............................ Pandit Rajesh Dubey ज्योतिष को भी आधुनिक विषयों एवं परम्पराओं की जानकारिय रखना चाहिए. जब कभी ज्योतिष आपनी रचनाओं को या लेख को रखे तो निर्भीक होना चाहिए. प्राचीनकाल में वात्सायन ऋषि ने निर्भीक होकर कोलाचार जैसे गूढ़ विषय ग्रन्थ लिखे थे आज इसक्रम में जानकारी है जो ज्योतिष के अनुसार है.( फोटो टेग केवल प्रस्तावना के लिए है.) जब कभी किसी स्त्री की जन्म कुंडली में शुक्र ,राहु,शनि तीन ग्रहों की युति होती है तो वह अंग प्रदर्शन करने में अभिरुचि रखती है.यहाँ तक की ऐसी स्त्री नगर-वधु योग की भागी होती है. जातिका के सप्त भावगत शुक्र राहु हो तो वह कामुक ,स्वेक्छाचारी बहु-पुरुष गामी होती है. मांस,शराब आदि का सेवन करनेवाली होती है.झगडालू स्वाभाव होता है. जातिका के सातवे भाव में शुक्र हो तो वो पुष्ट अन्गोवाली होती है एवम दिखने में आकर्षक होती है . आपने सुन्दरता के बल पर पराये पुरुषों से छल-कपट करते हुए धन हरण करती है. शुक्र के साथ शनि हो सातवे भाव में तो आपने से कम उम्र के युवा से भोगी होती है. प्रेम प्रसंग में अनेको युवाओं से सम्बन्ध बनाने वाली होती है.नगर वधु योगी होती है. ...............................................................................................................................................................अंक ज्योतिष के अनुसार निन्म उपाय करे मूलांक १ - श्री गणेश की पूजा करे और महीने में एक रविवार को गेहू दान करे मूलांक २ - महालक्ष्मी की पूजा करे और महीने में एक सोमवार को चावल का दान करे मूलांक ३ – श्री गणेश और लक्ष्मी की साथ में पूजा करे और महीने में एक गुरुवार को चने की दाल का दान करे मूलांक ४ – श्री हनुमानजी का पूजन करे और महीने में एक शनिवार को काले तिल का दान करे मूलांक ५ – श्री हरी विष्णु का पूजन करे और महीने में एक बुधवार को साबुत मुंग का दान करे मूलांक ६ – आशुतोष शिव का पूजन करे और महीने में एक बार बुधवार को गाय को हरा चारा डाले मूलांक ७ - हररोज शिवलिंग पर जलाभिषेक करे और हर मंगलवार को सफ़ेद तिल का दान करे मूलांक ८ – श्री कृष्ण का पूजन करे और महीने के हर शनिवार को साबुत मुंग का दान करे मूलांक ९ - श्री भैरव का पूजन करे और महीने में हर मंगलवार को मसूर की दाल का दान करे......................हरिद्रा कल्प तंत्र हरिद्रा सामान्यतः हल्दी के नाम से प्रचलित हें जिसे हम रोजबरोज के खाने के मसलो में इस्तमाल करते हें असल में यह एक पोंधे की जड़ हें | हल्दी कई प्रकार की होती हें जैस आवा हल्दी , दारू हल्दी, कलि हल्दी इत्यादी | हमारे दैनिक प्रयोग में आनेवाली हल्दी पित्त वर्णी और नारंगी दो प्रकार की होती हें इसमे कोई कोई गांठ काले रंग की भी मिल जाती हें परन्तु यह काले रंग की गांठ सही होना जरुरी हें, यह गांठ ऊपर से काली और अंदर से कत्थई रंग की होती हें | इसकी जड़ से कपूर के जैसी सुघंध आती हें | काली हल्दी के पोंधो पर गुछेदार पीले रंग का पुष्प खिलता हें

यह काली हल्दी दिखने में जितनी कुरूप, अनाकर्षक और अनुपयोगी हें उतनी ही अधिक मूल्यवान दुर्लभ और दिव्य गुण युक्त होती हें | अगर आपको कलि हल्दी मिल जाये तो बहोत ही अच्छी बात हें ( कृपया सावधान बाजार में ज्यादातर नकली हल्दी ही प्राप्त होती हें ) उसे घर लाकर उसे पूजा के स्थान पर रख ले, वैसे यह कलि हल्दी जहा भी रहती हें वहा सहज ही श्री समृद्धि का आगमन होने लगता हें | इस दिव्य कलि हल्दी को कोई नए वस्त्र में चावल और चांदी के सिक्के या टुकड़े के साथ रख कर उसका पंचोपचार पूजन कर उस कपडे को गांठ बांध ले और उसे अपने जहा आप पैसे रखते हें वह कोई बक्से में रख दे तो अवश्य आपको आश्चर्य जनक अर्थलाभ प्राप्त होगा .. कृपया लाभ उठाये....................तंत्र क्या है..कुंडलिनी क्या होती है....क्या होती है इसकी जाग्रत और सुप्त अवस्था....साधक कैसा होता है....और योगी कैसा होता है....क्या इन दोनों में कोई भेद है....क्या है दिव्या भूमि या देव भूमि....और सिद्ध स्थिति कैसी होती है....ऐसी कौन सी क्रिया हो सकती है जो उपरोक्त प्रश्नों को ना सिर्फ सुलझा दे बल्कि यथाचित वो उत्तर भी दे जो सर्व माननीय हो... किसी भी चीज़ को समझने के लिए कम से कम आज के युग में ये बहुत जरुरी हो गया है की कही गयी बात के पीछे कोई ठोस तर्क काम करता हो और यही स्थिति आज तंत्र के क्षेत्र में भी बनी हुई है...अपनी अपनी जगह पे हम सब जानते हैं की कोई भी साधना शुरू करने से पहले हमे इस बात को जानने की जल्दी होती है की इससे लाभ क्या होगा...तो मेरा अध्ययन मुझे बताता है की तंत्र ही जीवन है, ये कोई कोरी कल्पना नहीं बल्कि एक ठोस ज्ञान है. ज्ञान केवल तब तक ज्ञान रहता है जब तक की वो पूरी तरह से आपकी पकड़ में नहीं आ जाता पर जैसे ही आप उसके अंश विशेष को जानकर उसे अपने आधीन कर लेते हैं तो वही ज्ञान...विज्ञान बन जाता है, वो विज्ञान जिसमें आपका जीवन परिवर्तन करने की क्षमता होती है. तंत्र भी एक ऐसा ही विज्ञान है पर हम इसमें विजयी हो सके उसके लिए जरूरी है कुंडलिनी जागरण. हम सब जानते हैं की हमारे शरीर में इड़ा (जो की चंद्र का प्रतीक है), पिंगला (जो सूर्य रूप में है) और सुष्मना (जो चन्द्र और सूर्य में समभाव स्थापित करती है) विधमान हैं जो क्रम अनुसार दक्षिण शक्ति, वाम शक्ति और मध्य शक्ति के रूप में हैं...और इन शक्तियों का त्रिकोण रूप में जो आधार बिंदु है वो शिव है पर ये बिंदु सिर्फ बोल देने से शिव रूप नहीं ले लेता इसके लिए तीनो त्रिकोनिये शक्तियों को जागृत होना पड़ता है अर्थात शिव तभी अपने चरम रूप में जाग्रत होते है जब तीनो शक्तियाँ जो की आदिशक्ति माँ काली, माँ तारा और माँ राजराजेश्वरी के रूप में हैं वो जागती हैं क्योकि शक्ति के बिना शिव अधूरे हैं .माँ काली की जाग्रत अवस्था में शिव या बिंदु के शिवमय होने की प्रथम स्थिति है...पर इस वक्त शिव शव अर्थात क्रिया हीन रहते हैं...माँ तारा के जाग जाने से शिव अपने श्व्त्व में चरम रूप में होते हैं और राजराजेश्वरी माँ के जागने से शिव का श्व्त्व तो भंग हो जाता है पर वो निंद्रा में चले जाते हैं पर एक साधक के लिए ये पूरी प्रक्रिया कुंडलिनी जागरण ही होती है क्योकि इसमें भी नाभि कुंड में स्थापित कमलासन खुलता है पर राजराजेश्वरी माँ भगवती उसमें विराजमान नहीं होती वो विराजमान होती है गुरु कृपा से...और जब गुरु की कृपा दीक्षा या शक्तिपात से प्राप्त हो जाती है तो स्थिति बनती है आनंद की, विज्ञान की और फिर सत्य की...जिसे योगी अपनी भाषा में खंड, अखंड और महाखंड की अवस्थिति में वर्णित करते हैं....जहाँ हम में और हमारे इष्ट में कोई भेद नहीं होता है वो मैं और मैं वो बन जाते हैं.......................-:मंत्र प्रयोग:- मूल मंत्र में संपुट लगा देने से यह मंत्र महामृत्युञ्जय हो जाता है।लघु मृत्युंजय तथा बहुत से ऐसे मंत्र है,जिसका जप किया जाता है।जीव को मृत्यु मुख से खींच लाते है,मृत्युंजय।आज तो हमेशा भय लगा रहता है कि कब क्या हो जाय।ग्रह के अशुभ दशा या दैविक,दैहिक प्रभाव,तंत्र या कोई भी अनिष्टकारी प्रभाव को दूर कर देते है पल में।पुरा परिवार सुरक्षित रहता है,छोटा रोग हो या असाध्य बिमारी,आपरेशन हो या महामारी,कोई खो जाय या कोई भी संकट आन पड़े मृत्युंजय की कृपा से सब कुछ अच्छा हो जाता हैं।मृत्युंजय मंत्र ३२ अक्षर का "त्र्यम्बक मंत्र" भी कहलाता हैं ।"ॐ" लगा देने से यह ३३ अक्षर का हो जाता हैं,इस मंत्र में संपुट लगा देने से मंत्र का कई रूप प्रकट हो जाता है।गायत्री मंत्र के साथ प्रयोग करने पर यह "मृतसंजीवनी मंत्र" हो जाता हैं।मंत्र प्रयोग के लिए "शिव वास" देखकर ही जप शुरू करें।शिव मंदिर में मंत्र जप करने पर कोई नियम की पाबन्दी नहीं हैं।यदि घर में पूजन करते है तो पहले पार्थिव शिव पूजन करके या चित्र का पूजन कर घी का दीपक अर्पण कर,पुष्प,प्रसाद के साथ कामना के लिए दायें हाथ में जल,अक्षत लेकर संकल्प कर ले।कितनी संख्या में जप करना है यह निर्णय कर ले साथ ही जप माला रूद्राक्ष का ही हो।एक निश्चित संख्या में ही जप होना चाहिए।हवन के दिन "अग्निवास" देख लेना चाहिए।आज मै "मृत्युंजय प्रयोग" दे रहा हूँ,विधि संक्षिप्त हैं पूरी श्रद्धा के साथ प्रयोग करे,और शिव कृपा देखे।साथ ही शिव पार्थिव पूजन विधि श्रावण में दे दूंगा।गुरू,गणेश पूजन के बाद शिव पूजन कर,पूर्व दिशा में ऊनी आसन पर बैठ एकाग्र चित जप करना चाहिये।आचमनी निम्न मंत्र से कर संकल्प कर ले।दाएँ हाथ मे जल लेकर मंत्र बोले मंत्र १.ॐ केशवाय नमः।जल पी जाए। २.ॐ नारायणाय नमः।जल पी जाए। ३.ॐ माधवाय नमः।जल पी लें। अब हाथ इस मंत्र से धो ले।४.ॐ हृषिकेषाय नमः।

अब संकल्प करे।संकल्प अपने कामना अनुसार छोटा,बड़ा कर सकते है।दाएँ हाथ में जल,अक्षत,बेलपत्र,द्रव्य,सुपारी रख संकल्प करें। संकल्प "ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुःश्रीमद् भगवतो महापूरूषस्य,विष्णुराज्ञया प्रवर्तमानस्य अद्य ब्रह्माणोऽहनि द्वितीये परार्धे श्री श्वेत वाराहकल्पे,वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तैक देशान्तर्गते अमुक संवतसरे महांमागल्यप्रद मासोतमे मासे अमुक मासे अमुकपक्षे,अमुकतिथौःअमुकवासरे,अमुक गोत्रोत्पन्नोहं अमुक शर्माहं,या वर्माहं ममात्मनःश्रुति स्मृति,पुराणतन्त्रोक्त फलप्राप्तये मम जन्मपत्रिका ग्रहदोष,दैहिक,दैविक,भौतिक ताप सर्वारिष्ट निरसन पूर्वक सर्वपाप क्षयार्थं मनसेप्सित फल प्राप्ति पूर्वक,दीर्घायु,विपुलं,बल,धन,धान्य,यश,पुष्टि,प्राप्तयर्थम सकल आधि,व्याधि,दोष परिहार्थम सकलाभीष्टसिद्धये श्री शिव मृत्युंजय प्रीत्यर्थ पूजन,न्यास,ध्यान यथा संख्याक मंत्र जप करिष्ये।" गणेश प्रार्थना गजाननं भूतगणादि सेवितं कपित्थजम्बू फलचारूभक्षणम्।उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वर पाद पंकजम्॥नागाननाय श्रुतियज्ञविभूषिताय,गौरीसुताय गणनाथ नमो नमस्ते॥ॐ श्री गणेशाय नमः।

गुरू प्रार्थना गुरूर्ब्रह्मा,गुरूर्विष्णु,गुरूर्देवो महेश्वरः।गुरू साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरूवे नमः॥

गौरी प्रार्थना ॐ नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्॥

विनियोग अस्य त्र्यम्बक मन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिःअनुष्टुप छन्दःत्र्यम्बक पार्वतीपतिर्देवता,त्र्यं बीजम्,वं शक्तिः,कं कीलकम्,सर्वेष्टसिद्धयर्थे जपे विनियोगः। ऋष्यादिन्यास ॐ वसिष्ठर्षये नमःशिरसि।अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे।त्र्यम्बकपार्वतीपति देवतायै नमः हृदि।त्र्यं बीजाय नमः गुह्ये।वं शक्तये नमः पादयोः।कं कीलकाय नमः नाभौ। विनियोगाय नमःसर्वागें। करन्यास त्र्यम्बकम् अंगुष्ठाभ्यां नमः।यजामहे तर्जनीभ्यां नमः।सुगंधिं पुष्टिवर्द्धनं मध्यमाभ्यां नमः।उर्वारूकमिव बन्धनात् अनामिकाभ्यां नमः।मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठिकाभ्यां नमः।मामृतात् करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। हृदयादिन्यास ॐ त्र्यम्बकं हृदयाय नमः।यजामहे शिरसे स्वाहा।सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनं शिखायै वषट्।उर्वारूकमिव बन्धनात् कवचाय हुं।मृत्योर्मुक्षीय नेत्रत्रयाय वौषट्।मामृतात् अस्त्राय फट्। ध्यान हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयन्तं शिरो द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां बहन्तं परम्।अंकन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलासकान्तं शिवं स्वच्छाम्भोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे। मंत्र ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् उर्वारूकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥ हवन विधि जप के समापन के दिन हवन के लिए बिल्वफल,तिल,चावल,चन्दन,पंचमेवा,जायफल,गुगुल,करायल,गुड़,सरसों धूप,घी मिलाकर हवन करे।रोग शान्ति के लिए,दूर्वा,गुरूचका चार इंच का टुकड़ा,घी मिलाकर हवन करे।श्री प्राप्ति के लिए बिल्वफल,कमलबीज,तथा खीर का हवन करे।ज्वरशांति में अपामार्ग,मृत्युभय में जायफल एवं दही,शत्रुनिवारण में पीला सरसों का हवन करें।हवन के अंत में सुखा नारियल गोला में घी भरकर खीर के साथ पुर्णाहुति दें।इसके बाद तर्पण,मार्जन करे।एक कांसे,पीतल की थाली में जल,गो दूध मिलाकर अंजली से तर्पण करे।मंत्र के दशांश हवन,उसका दशांश तर्पण,उसका दशांश मार्जन,उसका दशांश का शिवभक्त और ब्राह्मण को भोजन कराना चाहिए।तर्पण,मार्जन में मूल मंत्र के अंत मे तर्पण में "तर्पयामी" तथा मार्जन मे "मार्जयामी" लगा लें।अब इसके दशांश के बराबर या १,३,५,९,११ ब्राह्मणों और शिव भक्तों को भोजन कर आशिर्वाद ले।जप से पूर्व कवच का पाठ भी किया जा सकता है,या नित्य पाठ करने से आयु वृद्धि के साथ रोग से छुटकारा मिलता है। मृत्युञ्जय कवच विनियोग अस्य मृत्युञ्जय कवचस्य वामदेव ऋषिःगायत्रीछन्दः मृत्युञ्जयो देवता साधकाभीष्टसिद्धर्यथ जपे विनियोगः। ऋष्यादिन्यास वामदेव ऋषये नमःशिरसि,गायत्रीच्छन्दसे नमःमुखे,मृत्युञ्जय देवतायै नमःहृदये,विनियोगाय नमःसर्वांगे। करन्यास ॐ जूं सःअगुष्ठाभ्यां नमः।ॐ जूं सः तर्जनीभ्यां नमः।ॐजूं सः मध्याभ्यां नमः।ॐजूं सःअनामिकाभ्यां नमः।ॐजूं सःकनिष्ठिकाभ्यां नमः।ॐजूं सःकरतलकरपृष्ठाभ्यां नमः। हृदयादिन्यास ॐजूं सः हृदयाय नमः।ॐजूं सःशिरसे स्वाहा।ॐजूं सःशिखायै वषट्।ॐजूं सःकवचाय हुं।ॐजूंसःनेत्रत्रयाय वौषट्।ॐजूं सःअस्त्राय फट्। ध्यान हस्ताभ्यां.....उपरोक्त ध्यान ही पढ ले। शिरो मे सर्वदा पातु मृत्युञ्जय सदाशिवः।स त्र्यक्षरस्वरूपो मे वदनं च महेश्वरः॥ पञ्चाक्षरात्मा भगवान् भुजौ मे परिरक्षतु।मृत्युञ्जयस्त्रिबीजात्मा ह्यायू रक्षतु मे सदा॥ बिल्ववृक्षसमासीनो दक्षिणामूर्तिरव्ययः।सदा मे सर्वदा पातु षट्त्रिंशद् वर्णरूपधृक्॥ द्वाविंशत्यक्षरो रूद्रः कुक्षौ मे परिरक्षतु।त्रिवर्णात्मा नीलकण्ठः कण्ठं रक्षतु सर्वदा॥ चिन्तामणिर्बीजपूरे ह्यर्द्धनारीश्वरो हरः।सदा रक्षतु में गुह्यं सर्वसम्पत्प्रदायकः॥ स त्र्यक्षर स्वरूपात्मा कूटरूपो महेश्वरः।मार्तण्डभैरवो नित्यं पादौ मे परिरक्षतु॥ ॐ जूं सः महाबीज स्वरूपस्त्रिपुरान्तकः।ऊर्ध्वमूर्घनि चेशानो मम रक्षतु सर्वदा॥ दक्षिणस्यां महादेवो रक्षेन्मे गिरिनायकः।अघोराख्यो महादेवःपूर्वस्यां परिरक्षतु॥ वामदेवः पश्चिमायां सदा मे परिरक्षतु।उत्तरस्यां सदा पातु सद्योजातस्वरूपधृक्॥

इस कवच को विधि विधान से अभिमंत्रित कर धारण करने का विशेष लाभ हैं।महामृत्युञ्जय मंत्र का बड़ा महात्मय है।शिव के रहते कैसी चिन्ता ये अपने भक्तों के सारे ताप शाप भस्म कर देते है।शिव है तो हम है,यह सृष्टि है तथा जगत का सारा विस्तार है,शिव भोलेभाले है और उनकी शक्ति है भोली शिवा,यही लीला हैं।................."महामृत्युञ्जय शिव".....(प्राणों के रक्षक) शिव आदि देव है।शिव को समझना या जानना सब कुछ जान लेना जैसा हैं।अपने भक्तों पर परम करूणा जो रखते है,जिनके कारण यह सृष्टि संभव हो पायी है,वह एकमात्र शिव ही है।शिव इस ब्रह्माण्ड में सबसे उदार एवं कल्याणकारी हैं।अनेक रुपों में शिव सिर्फ दाता हैं।सम्पूर्ण लोक के सभी देवता और देवियाँ महा ऐश्वर्यशाली हैं,परन्तु शिव के पास सब कुछ रहते हुए भी वे वैरागी हैं।कारण वे ही निराकार और साकार पूर्ण ब्रह्म हैं।शिव पल पल कितने विष पीते है,कहना क्या?दक्ष प्रजापति ने अपनी पुत्री सती का कन्यादान किया था,शिव दमाद थे।परन्तु एक बार किसी सभा में सभी देवों की उपस्थिती में दक्ष के आने पर सभी देवता और ॠषिगण सम्मान में दक्ष को प्रणाम करने लगे,परन्तु शिव कुछ नही बोले।इस बात को स्वयं का अनादर समझ कर दक्ष शिव को भूतों का स्वामी,वेद से बहिष्कृत रहने वाला कह अपमान करने लगे,परन्तु शिव ने कुछ नहीं कहा। कुछ काल बाद दक्ष प्रजापति ने एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन कनखल क्षेत्र में रखा सभी देवी,देवता,ॠषि,मुनि सहित असुर,नवग्रह,नक्षत्र मण्डल को भी निमंत्रित किया परन्तु शिव को नही बुलाया।कारण शिव के अपमान के लिए ही यज्ञ रखा गया था।शिव भक्त दधिचि शिव के बिना यज्ञ को अमंगलकारी बताकर वहां से चले गये।अभिमानी लोगों का यही हाल है वो थोड़ी सी शक्ति आ जाने पर अपने को सर्वज्ञ समझ लेते है।रोहिणी संग चन्द्रमा को जाते देख सती को जब इस बात का ज्ञान हुआ कि मेरे पिता के यहां यज्ञ में ये जा रहे है तो आश्चर्य हुआ कि हमे क्यों नही बुलाया?वे शिव जी के समीप जाकर बोली कि स्वामी मेरे पिता ने हमें यज्ञ में नहीं बुलाया फिर भी मैं जाना चाहती हूँ।सती को शिव नें समझाया कि बिन बुलाए जाना मृत्यु के समान हैं,परन्तु सति द्वारा हठ करने पर शिव ने आज्ञा प्रदान की।यज्ञ में जब शिव की निन्दा सुन सती ने आत्मदाह कर लिया तो शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र तथा कालिका को प्रकट कर असंख्य गणों के साथ दक्ष यज्ञ के विनाश के लिए भेजा।क्या परिणाम हुआ अंहकारी,देव,दानव के साथ दक्ष का भी सिर मुण्डन हो गया।फिर शिव की दया ही थी कि ब्रह्मा जी के स्तुति से प्रसन्न होकर दक्ष को पशु मुख देकर अभय दान प्रदान किया। शिव है तो सारी सृष्टि हैं।शिव का एक रूप है "महामृत्युञ्जय" जो सभी को अमृत प्रदान करते है।आज प्रकृति हमारे विरूद्ध हो गई है,कारण हम उस दिव्य प्रकृति को ही नष्ट कर रहे हैं।हम शायद ज्यादा बुद्धिमान वैज्ञानिक हो गये है।इतने ही अगर हम योग्य हो गये है तो,महामारी,भूकम्प और गंगा आदि नदीयों की अशुद्धता,आसुरी बुद्धि चिंतन को बदलने का विज्ञान क्यों नहीं ढूढँ लेते हैं।हर युग में विज्ञान रहा है।द्वापर में कृष्ण के समय भी इस सृष्टि में आसुरी प्रवृति की कमी नहीं थी,तभी तो महाभारत जैसा युद्ध हुआ था।आज उन्हीं आसुरी जीवों का ज्यादा विकास हो रहा समाज में,शिव को मनाना होगा स्तुति से प्रसन्न करना होगा तभी संतुलन होगा।भक्ती तो आज बहुत से लोग कर रहे है।भगवत कृपा,दिव्य दर्शन भी ज्यादा से ज्यादा हो रहे है,परन्तु हमारी आँखे कभी प्रभु को खोजती भी हैं क्या।शिव तो सदा हमारे सामने ही खड़े है क्या हम उन्हें देख पाते है,नहीं!कारण हमेशा व्यर्थ की चीजों को देख अपनी आँखो को थका लेते है,जिस कारण से अब उर्जा ही नहीं रही तीसरे नेत्र से देखने की हममे।शिव व्याकुल हैं हमारे लिए पर हमे तो भक्ति करने का भी ढंग नही है।हमे भी तो शिव के लिए व्याकुल होना पड़ेगा।हम दुशमन है अपने परिवार के,अपनी संतान के अपनी नयी पीढी के जिसे अपने अंहकार वश विंध्वस के राह पर ले जा रहे है,कारण शरीर,मन,बुद्धि से हम रोगग्रस्त है।यहाँ बस शिव मृत्युञ्जय की अराधना से ही हम स्वस्थ हो पायेंगे।इस विषम परिस्थितियों से बचने के लिए शिव कृपा ही एकमात्र सहारा है।मृत्यु क्या है?सिर्फ शरीर के मृत्यु की बात नहीं हैं यह,हमारे इच्छाओं की मृत्यु।हमारे जीवन की बहुत सी भौतिक जरूरते,वंश और समाज की अवनति तथा कोई भी अभाव मृत्यु ही तो हैं।.......................मैं आज यहाँ पार्थिव पूजन की विधि दे रहा हूँ इसे कोई भी कम समय में कर शिव की कृपा प्राप्त कर सकता है।शिव सबके अराध्य है एक बार भी दिल से कोई बस कहे "ॐ नमः शिवाय" फिर शिव भक्त के पास क्षण भर में चले आते है। -:पार्थिव शिव लिंग पूजा विधि:- पार्थिव शिवलिंग पूजन से सभी कामनाओं की पूर्ति होती है।इस पूजन को कोई भी स्वयं कर सकता है।ग्रह अनिष्ट प्रभाव हो या अन्य कामना की पूर्ति सभी कुछ इस पूजन से प्राप्त हो जाता है।सर्व प्रथम किसी पवित्र स्थान पर पुर्वाभिमुख या उतराभिमुख ऊनी आसन पर बैठकर गणेश स्मरण आचमन,प्राणायाम पवित्रिकरण करके संकल्प करें।दायें हाथ में जल,अक्षत,सुपारी,पान का पता पर एक द्रव्य के साथ निम्न संकल्प करें। -:संकल्प:- "ॐ विष्णुर्विष्णुर्विष्णुः श्री मद् भगवतो महा पुरूषस्य विष्णोराज्ञया पर्वतमानस्य अद्य ब्रह्मणोऽहनि द्वितिये परार्धे श्री श्वेतवाराह कल्पे वैवस्वत मन्वन्तरे अष्टाविंशति तमे कलियुगे कलि प्रथमचरणे भारतवर्षे भरतखण्डे जम्बूद्वीपे आर्यावर्तेक देशान्तर्गते बौद्धावतारे अमुक नामनि संवत सरे अमुकमासे अमुकपक्षे अमुक तिथौ अमुकवासरे अमुक नक्षत्रे शेषेशु ग्रहेषु यथा यथा राशि स्थानेषु स्थितेषु सत्सु एवं ग्रह गुणगण विशेषण विशिष्टायां अमुक गोत्रोत्पन्नोऽमुक नामाहं मम कायिक वाचिक,मानसिक ज्ञाताज्ञात सकल दोष परिहार्थं श्रुति स्मृति पुराणोक्त फल प्राप्तयर्थं श्री मन्महा महामृत्युञ्जय शिव प्रीत्यर्थं सकल कामना सिद्धयर्थं शिव पार्थिवेश्वर शिवलिगं पूजनमह करिष्ये।"

तत्पश्चात त्रिपुण्ड और रूद्राक्ष माला धारण करे और शुद्ध की हुई मिट्टी इस मंत्र से अभिमंत्रित करे... "ॐ ह्रीं मृतिकायै नमः।" फिर "वं"मंत्र का उच्चारण करते हुए मिटी् में जल डालकर "ॐ वामदेवाय नमःइस मंत्र से मिलाए। १.ॐ हराय नमः, २.ॐ मृडाय नमः, ३.ॐ महेश्वराय नमः बोलते हुए शिवलिंग,माता पार्वती,गणेश,कार्तिक,एकादश रूद्र का निर्माण करे।अब पीतल,तांबा या चांदी की थाली या बेल पत्र,केला पता पर यह मंत्र बोल स्थापित करे, ॐ शूलपाणये नमः। अब "ॐ"से तीन बार प्राणायाम कर न्यास करे। -:संक्षिप्त न्यास विधि:- विनियोगः- ॐ अस्य श्री शिव पञ्चाक्षर मंत्रस्य वामदेव ऋषि अनुष्टुप छन्दःश्री सदाशिवो देवता ॐ बीजं नमःशक्तिःशिवाय कीलकम मम साम्ब सदाशिव प्रीत्यर्थें न्यासे विनियोगः। ऋष्यादिन्यासः- ॐ वामदेव ऋषये नमः शिरसि।ॐ अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे।ॐ साम्बसदाशिव देवतायै नमः हृदये।ॐ ॐ बीजाय नमः गुह्ये।ॐ नमः शक्तये नमः पादयोः।ॐ शिवाय कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमः सर्वांगे। शिव पंचमुख न्यासः ॐ नं तत्पुरूषाय नमः हृदये।ॐ मम् अघोराय नमःपादयोः।ॐ शिं सद्योजाताय नमः गुह्ये।ॐ वां वामदेवाय नमः मस्तके।ॐ यम् ईशानाय नमःमुखे। कर न्यासः- ॐ ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः।ॐ नं तर्जनीभ्यां नमः।ॐ मं मध्यमाभ्यां नमः।ॐ शिं अनामिकाभ्यां नमः।ॐ वां कनिष्टिकाभ्यां नमः।ॐ यं करतलकर पृष्ठाभ्यां नमः। हृदयादिन्यासः- ॐ ॐ हृदयाय नमः।ॐ नं शिरसे स्वाहा।ॐ मं शिखायै वषट्।ॐ शिं कवचाय हुम।ॐ वाँ नेत्रत्रयाय वौषट्।ॐ यं अस्त्राय फट्। "ध्यानम्" ध्यायेनित्यम महेशं रजतगिरि निभं चारू चन्द्रावतंसं,रत्ना कल्पोज्जवलागं परशुमृग बराभीति हस्तं प्रसन्नम। पदमासीनं समन्तात् स्तुतम मरगणै वर्याघ्र कृतिं वसानं,विश्वाधं विश्ववन्धं निखिल भय हरं पञ्चवक्त्रं त्रिनेत्रम्। -:प्राण प्रतिष्ठा विधिः- विनियोगः- ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मन्त्रस्य ब्रह्मा विष्णु महेश्वरा ऋषयःऋञ्यजुःसामानिच्छन्दांसि प्राणख्या देवता आं बीजम् ह्रीं शक्तिः कौं कीलकं देव प्राण प्रतिष्ठापने विनियोगः। ऋष्यादिन्यासः- ॐ ब्रह्मा विष्णु रूद्र ऋषिभ्यो नमः शिरसि।ॐ ऋग्यजुः सामच्छन्दोभ्यो नमःमुखे।ॐ प्राणाख्य देवतायै नमःहृदये।ॐआं बीजाय नमःगुह्ये।ॐह्रीं शक्तये नमः पादयोः।ॐ क्रौं कीलकाय नमः नाभौ।ॐ विनियोगाय नमःसर्वांगे। अब न्यास के बाद एक पुष्प या बेलपत्र से शिवलिंग का स्पर्श करते हुए प्राणप्रतिष्ठा मंत्र बोलें। प्राणप्रतिष्ठा मंत्रः- ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य प्राणा इह प्राणाःॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं शिवस्य जीव इह स्थितः।ॐ आं ह्रीं क्रौं यं रं लं वं शं षं सं हं शिवस्य सर्वेन्द्रियाणि,वाङ् मनस्त्वक् चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण पाणिपाद पायूपस्थानि इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु स्वाहा।अब नीचे के मंत्र से आवाहन करें। आवाहन मंत्रः- ॐ भूः पुरूषं साम्ब सदाशिवमावाहयामि,ॐ भुवः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि,ॐ स्वः पुरूषं साम्बसदाशिवमावाहयामि।अब शिद्ध जल,मधु,गो घृत,शक्कर,हल्दीचूर्ण,रोड़ीचंदन,जायफल,गुलाबजल,दही,एक,एक कर स्नान कराये",नमःशिवाय"मंत्र का जप करता रहे,फिर चंदन, भस्म,अभ्रक,पुष्प,भांग,धतुर,बेलपत्र से श्रृंगार कर नैवेद्य अर्पण करें तथा मंत्र जप या स्तोत्र का पाठ,भजन करें।अंत में कपूर का आरती दिखा क्षमा प्रार्थना का मनोकामना निवेदन कर अक्षत लेकर निम्न मंत्र से विसर्जन करे,फिर पार्थिव को नदी,कुआँ,या तालाब में प्रवाहित करें। विसर्जन मंत्रः- गच्छ गच्छ गुहम गच्छ स्वस्थान महेश्वर पूजा अर्चना काले पुनरगमनाय च। "गुरु महिमा"..........(सद्गुरुओं का सान्निध्य) "श्री गणेश":-(शिव शक्ति के प्यारे) श्री स्वामी "महामृत्युञ्जय शिव".....(प्राणों के रक्षक)........"पार्थिव में बसे शिव कल्याणकारी" शिव सनातन देव हैं।दुनियां में जितने भी धर्म है वे किसी न किसी रूप या नाम से शिव की ही अराधना करते है।ये कही गुरू रूप में पूज्य है तो कही निर्गुण,निराकार रूप में।शिव बस एक ही हैं पर लीला वश कइ रूपों में प्रकट होकर जगत का कल्याण करते हैं।शक्ति इनकी क्रिया शक्ति है।सृष्टि में जब कुछ नहीं था तब सृजन हेतु शिव की शक्ति को साकार रूप धारण करना पड़ा और शिव भी साकार रूप में आ पाये इसलिए ये दोनों एक ही हैं।भेद लीला वश होता है।और इसका कारण तो ये ही जानते हैं क्योकिं इनके रहस्य को कोई भी जान नहीं सकता और जो इनकी कृपा से कुछ जान गये उन्होनें कुछ कहा ही नहीं,सभी मौन रह गए।शिव भोले औघड़दानी है इसलिए दाता है सबको कुछ न कुछ देते है,देना उनको बहुत प्रिय है।ये भाव प्रधान देव है,भक्ति से प्रसन्न हो जाते है,तभी तो ये महादेव कहलाते है।....................भैरव कृपा भैरव भक्त वत्सल है शीघ्र ही सहायता करते है,भरण,पोषण के साथ रक्षा भी करते है।ये शिव के अतिप्रिय तथा माता के लाडले है,इनके आज्ञा के बिना कोई शक्ति उपासना करता है तो उसके पुण्य का हरण कर लेते है कारण दिव्य साधना का अपना एक नियम है जो गुरू परम्परा से आगे बढता है।अगर कोई उदण्डता करे तो वो कृपा प्राप्त नहीं कर पाता है। भैरव सिर्फ शिव माँ के आज्ञा पर चलते है वे शोधन,निवारण,रक्षण कर भक्त को लाकर भगवती के सन्मुख खड़ा कर देते है।इस जगत में शिव ने जितनी लीलाएं की है उस लीला के ही एक रूप है भैरव।भैरव या किसी भी शक्ति के तीन आचार जरूर होते है,जैसा भक्त वैसा ही आचार का पालन करना पड़ता है।ये भी अगर गुरू परम्परा से मिले वही करना चाहिए।आचार में सात्वीक ध्यान पूजन,राजसिक ध्यान पूजन,तथा तामसिक ध्यान पूजन करना चाहिए।भय का निवारण करते है भैरव।...भैरव स्वरुप इस जगत में सबसे ज्यादा जीव पर करूणा शिव करते है और शक्ति तो सनातनी माँ है इन दोनो में भेद नहीं है कारण दोनों माता पिता है,इस लिए करूणा,दया जो इनका स्वभाव है वह भैरव जी में विद्यमान है।सृष्टि में आसुरी शक्तियां बहुत उपद्रव करती है,उसमें भी अगर कोई विशेष साधना और भक्ति मार्ग पर चलता हो तो ये कई एक साथ साधक को कष्ट पहुँचाते है,इसलिए अगर भैरव कृपा हो जाए तो सभी आसुरी शक्ति को भैरव बाबा मार भगाते है,इसलिये ये साक्षात रक्षक है।................."भय का निवारण करते है".....(भैरव) अनुभूतियाँ बटुक भैरव शिवांश है तथा शाक्त उपासना में इनके बिना आगे बढना संभव ही नहीं है।शक्ति के किसी भी रूप की उपासना हो भैरव पूजन कर उनकी आज्ञा लेकर ही माता की उपासना होती है।भैरव रक्षक है साधक के जीवन में बाधाओं को दूर कर साधना मार्ग सरल सुलभ बनाते है।वह समय याद है जब बिना भैरव साधना किये ही कई मंत्रों पुश्चरण कर लिया था तभी एक रात एकांत माता मंदिर से दूर हटकर आम वृक्ष के नीचे आसन लगाये बैठा था तभी गर्जना के साथ जोर से एक चीखने की आवाज सुनाई पड़ी,नजर घुमाकर देखा तो एक सुन्दर दिव्य बालक हाथ में सोटा लिए खड़ा था और उसके आसपास फैले हल्के प्रकाश में वह बड़ा ही सुन्दर लगा।मैं आवाक हो गया और सोचने लगा ये कौन है तभी वो बोले कि "राज मुझे नहीं पहचाने इतने दिनो से मैं तुम्हारी सहायता कर रहा हूँ और तुमने कभी सोचा मेरे बारे में परन्तु तुम नित्य मेरा स्मरण,नमस्कार करते हो जाओ काशी शिव जी का दर्शन कर आओ।" मैंने प्रणाम किया और कहा हे बटुक भैरव आपको बार बार नमस्कार है,आप दयालु है,कृपालु है मैं सदा से आपका भक्त हूँ,मेरे भूल के लिए आप मुझे क्षमा करे।मेरे ऐसा कहने से वे प्रसन्न मुद्रा में अपना दिव्य रूप दिखाकर वहाँ से अदृश्य हो गये।मुझे याद आया कि कठिन साधनाओं के समय भैरव,हनुमान,गणेश इन तीनों ने मेरा बहुत मार्गदर्शन किया था,तथा आज भी करते है।जीवन में कहीं भी भटकाव हो या कठिनाई भैरव बताते है कि आगे क्या करना चाहिए,तभी जाकर सत्य का राह समझ में आता है।..मंत्र शक्ति पूर्णतय: ध्वनि विज्ञान के सिद्धान्तों पर आधारित है। इनमें प्रयुक्त होने वाले भिन्न भिन्न शब्दों का जो गुंथन है---वही महत्वपूर्ण है, अर्थ का समावेश गौण है। कितने ही बीज मन्त्र ऎसे हैं, जिनका खींचतान के ही भले ही कुछ अर्थ गढ लिया जाए, वस्तुत: उनका कुछ अर्थ है नहीं। ह्रीं, क्लीं, श्रीं, ऎं, हुं, यं, फट इत्यादि शब्दों का क्या अर्थ हो सकता है, इस प्रश्न पर कैसी भी माथापच्ची करना बेकार है। उनका सृ्जन इस आधार पर किया गया है कि उनका उच्चारण किस स्तर का शक्ति कम्पन उत्पन करता है। और उनका जप करने वाले, उसके अभीष्ट प्रयोजन तथा बाह्य वातावरण पर क्या प्रभाव पडता है। और जो मानसिक, वाचिक और उपांशु जाप की बात कही जाती है, उसमें भी सिर्फ ध्वनियों के हल्के भारी किए जाने की प्रक्रिया ही काम में लाई जाती है। मैं समझता हूँ कि उपरोक्त लेखों सहित इस पोस्ट को पढकर आप शब्द तथा मन्त्र की सामर्थ्य, शक्तियों एवं जगत पर पडने वाले उनके प्रभावों से अच्छे से परिचित हो चुके होंगें। चलिए इस विषय को ओर अधिक विस्तार न देते हुए पिछली पोस्ट में आपसे कहे अनुरूप आपको आज एक ऎसे मन्त्र के बारे में बताना चाहूँगा----जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव आप स्वयं अनुभव कर सकते हैं। पारिवारिक अशान्ती, आपसी वैचारिक मतभेदो का हारक मन्त्र :- कभी कभी ग्रह दोष अथवा अन्य किन्ही बाह्य या आन्तरिक कारणों के फलस्वरूप पति-पत्नि,पिता-पुत्र,भाई-भाई अथवा अन्य किन्ही सदस्यों के बीच आपसी मतभेद उत्पन होकर घर परिवार की शान्ती में विघ्न उत्पन हो जाता है। ओर ऎसा प्रतीत होता है कि जैसे सभी पारिवारिक सम्बंध बिगडते जा रहे हैं, जिनके कारण मन अशान्त एवं अधीर हो उठता है। हर समय कुछ अनिष्ट हो जाने का भय मन में बना रहता है। यहाँ मैं जो मन्त्र आपको बता रहा हूँ----ये जानिए कि ऎसी किसी भी स्थिति के उन्मूलन के लिए ये मन्त्र सचमुच रामबाण औषधि का कार्य करता है। ऎसा नहीं कि इसके लिए आपको कोई पूजा अनुष्ठान करना पडेगा या अन्य किसी प्रकार की कोई सामग्री, कोई माला इत्यादि की जरूरत पडेगी। न कोई पाठ पूजा, न सामग्री, न माला या अन्य कैसे भी नियम, विधि-विधान की कोई आवश्यकता नहीं और न ही समय का कोई निश्चित बन्धन। आप अपनी सुविधा अनुसार जैसा और जब, जितनी मात्रा में चाहें उतना जाप कर सकते हैं। बस मन्त्र एवं मिलने वाले उसके सुफल के बारे में श्रद्धा बनाए रखिए तो समझिए कुछ ही दिनों में आपको इसका प्रत्यक्ष लाभ दिखलाई पडने लगेगा। मन्त्र है :- ॐ क्लीं विघ्न क्लेश नाशाय हुँ फट.......................शत्रु-मोहन

“चन्द्र-शत्रु राहू पर, विष्णु का चले चक्र। भागे भयभीत शत्रु, देखे जब चन्द्र वक्र। दोहाई कामाक्षा देवी की, फूँक-फूँक मोहन-मन्त्र। मोह-मोह-शत्रु मोह, सत्य तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र।। तुझे शंकर की आन, सत-गुरु का कहना मान। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।” विधिः- चन्द्र-ग्रहण या सूर्य-ग्रहण के समय किसी बारहों मास बहने वाली नदी के किनारे, कमर तक जल में पूर्व की ओर मुख करके खड़ा हो जाए। जब तक ग्रहण लगा रहे, श्री कामाक्षा देवी का ध्यान करते हुए उक्त मन्त्र का पाठ करता रहे। ग्रहण मोक्ष होने पर सात डुबकियाँ लगाकर स्नान करे। आठवीं डुबकी लगाकर नदी के जल के भीतर की मिट्टी बाहर निकाले। उस मिट्टी को अपने पास सुरक्षित रखे। जब किसी शत्रु को सम्मोहित करना हो, तब स्नानादि करके उक्त मन्त्र को १०८ बार पढ़कर उसी मिट्टी का चन्दन ललाट पर लगाए और शत्रु के पास जाए। शत्रु इस प्रकार सम्मोहित हो जायेगा कि शत्रुता छोड़कर उसी दिन से उसका सच्चा मित्र बन जाएगा।..............................नजर उतारने के उपाय १॰ बच्चे ने दूध पीना या खाना छोड़ दिया हो, तो रोटी या दूध को बच्चे पर से ‘आठ’ बार उतार के कुत्ते या गाय को खिला दें। २॰ नमक, राई के दाने, पीली सरसों, मिर्च, पुरानी झाडू का एक टुकड़ा लेकर ‘नजर’ लगे व्यक्ति पर से ‘आठ’ बार उतार कर अग्नि में जला दें। ‘नजर’ लगी होगी, तो मिर्चों की धांस नहीँ आयेगी। ३॰ जिस व्यक्ति पर शंका हो, उसे बुलाकर ‘नजर’ लगे व्यक्ति पर उससे हाथ फिरवाने से लाभ होता है। ४॰ पश्चिमी देशों में नजर लगने की आशंका के चलते ‘टच वुड’ कहकर लकड़ी के फर्नीचर को छू लेता है। ऐसी मान्यता है कि उसे नजर नहीं लगेगी। ५॰ गिरजाघर से पवित्र-जल लाकर पिलाने का भी चलन है। ६॰ इस्लाम धर्म के अनुसार ‘नजर’ वाले पर से ‘अण्डा’ या ‘जानवर की कलेजी’ उतार के ‘बीच चौराहे’ पर रख दें। दरगाह या कब्र से फूल और अगर-बत्ती की राख लाकर ‘नजर’ वाले के सिरहाने रख दें या खिला दें। ७॰ एक लोटे में पानी लेकर उसमें नमक, खड़ी लाल मिर्च डालकर आठ बार उतारे। फिर थाली में दो आकृतियाँ- एक काजल से, दूसरी कुमकुम से बनाए। लोटे का पानी थाली में डाल दें। एक लम्बी काली या लाल रङ्ग की बिन्दी लेकर उसे तेल में भिगोकर ‘नजर’ वाले पर उतार कर उसका एक कोना चिमटे या सँडसी से पकड़ कर नीचे से जला दें। उसे थाली के बीचो-बीच ऊपर रखें। गरम-गरम काला तेल पानी वाली थाली में गिरेगा। यदि नजर लगी होगी तो, छन-छन आवाज आएगी, अन्यथा नहीं। ८॰ एक नींबू लेकर आठ बार उतार कर काट कर फेंक दें। ९॰ चाकू से जमीन पे एक आकृति बनाए। फिर चाकू से ‘नजर’ वाले व्यक्ति पर से एक-एक कर आठ बार उतारता जाए और आठों बार जमीन पर बनी आकृति को काटता जाए। १०॰ गो-मूत्र पानी में मिलाकर थोड़ा-थोड़ा पिलाए और उसके आस-पास पानी में मिलाकर छिड़क दें। यदि स्नान करना हो तो थोड़ा स्नान के पानी में भी डाल दें। ११॰ थोड़ी सी राई, नमक, आटा या चोकर और ३, ५ या ७ लाल सूखी मिर्च लेकर, जिसे ‘नजर’ लगी हो, उसके सिर पर सात बार घुमाकर आग में डाल दें। ‘नजर’-दोष होने पर मिर्च जलने की गन्ध नहीं आती। १२॰ पुराने कपड़े की सात चिन्दियाँ लेकर, सिर पर सात बार घुमाकर आग में जलाने से ‘नजर’ उतर जाती है। १३॰ “नमो सत्य आदेश। गुरु का ओम नमो नजर, जहाँ पर-पीर न जानी। बोले छल सो अमृत-बानी। कहे नजर कहाँ से आई ? यहाँ की ठोर ताहि कौन बताई ? कौन जाति तेरी ? कहाँ ठाम ? किसकी बेटी ? कहा तेरा नाम ? कहां से उड़ी, कहां को जाई ? अब ही बस कर ले, तेरी माया तेरी जाए। सुना चित लाए, जैसी होय सुनाऊँ आय। तेलिन-तमोलिन, चूड़ी-चमारी, कायस्थनी, खत-रानी, कुम्हारी, महतरानी, राजा की रानी। जाको दोष, ताही के सिर पड़े। जाहर पीर नजर की रक्षा करे। मेरी भक्ति, गुरु की शक्ति। फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा।” विधि- मन्त्र पढ़ते हुए मोर-पंख से व्यक्ति को सिर से पैर तक झाड़ दें। १४॰ “वन गुरु इद्यास करु। सात समुद्र सुखे जाती। चाक बाँधूँ, चाकोली बाँधूँ, दृष्ट बाँधूँ। नाम बाँधूँ तर बाल बिरामनाची आनिङ्गा।”

विधि- पहले मन्त्र को सूर्य-ग्रहण या चन्द्र-ग्रहण में सिद्ध करें। फिर प्रयोग हेतु उक्त मन्त्र के यन्त्र को पीपल के पत्ते पर किसी कलम से लिखें। “देवदत्त” के स्थान पर नजर लगे हुए व्यक्ति का नाम लिखें। यन्त्र को हाथ में लेकर उक्त मन्त्र ११ बार जपे। अगर-बत्ती का धुवाँ करे। यन्त्र को काले डोरे से बाँधकर रोगी को दे। रोगी मंगलवार या शुक्रवार को पूर्वाभिमुख होकर ताबीज को गले में धारण करें। १५॰ “ॐ नमो आदेश। तू ज्या नावे, भूत पले, प्रेत पले, खबीस पले, अरिष्ट पले- सब पले। न पले, तर गुरु की, गोरखनाथ की, बीद याहीं चले। गुरु संगत, मेरी भगत, चले मन्त्र, ईश्वरी वाचा।” विधि- उक्त मन्त्र से सात बार ‘राख’ को अभिमन्त्रित कर उससे रोगी के कपाल पर टिका लगा दें। नजर उतर जायेगी। १६॰ “ॐ नमो भगवते श्री पार्श्वनाथाय, ह्रीं धरणेन्द्र-पद्मावती सहिताय। आत्म-चक्षु, प्रेत-चक्षु, पिशाच-चक्षु-सर्व नाशाय, सर्व-ज्वर-नाशाय, त्रायस त्रायस, ह्रीं नाथाय स्वाहा।” विधि- उक्त जैन मन्त्र को सात बार पढ़कर व्यक्ति को जल पिला दें। १७॰ झाडू को चूल्हे / गैस की आग में जला कर, चूल्हे / गैस की तरफ पीठ कर के, बच्चे की माता इस जलती झाडू को 7 बार इस तरह स्पर्श कराए कि आग की तपन बच्चे को न लगे। तत्पश्चात् झाडू को अपनी टागों के बीच से निकाल कर बगैर देखे ही, चूल्हे की तरफ फेंक दें। कुछ समय तक झाडू को वहीं पड़ी रहने दें। बच्चे को लगी नजर दूर हो जायेगी।

१८॰ नमक की डली, काला कोयला, डंडी वाली 7 लाल मिर्च, राई के दाने तथा फिटकरी की डली को बच्चे या बड़े पर से 7 बार उबार कर, आग में डालने से सबकी नजर दूर हो जाती है।

१९॰ फिटकरी की डली को, 7 बार बच्चे/बड़े/पशु पर से 7 बार उबार कर आग में डालने से नजर तो दूर होती ही है, नजर लगाने वाले की धुंधली-सी शक्ल भी फिटकरी की डली पर आ जाती है। २०॰ तेल की बत्ती जला कर, बच्चे/बड़े/पशु पर से 7 बार उबार कर दोहाई बोलते हुए दीवार पर चिपका दें। यदि नजर लगी होगी तो तेल की बत्ती भभक-भभक कर जलेगी। नजर न लगी होने पर शांत हो कर जलेगी। नोट :- नजर उतारते समय, सभी प्रयोगों में ऐसा बोलना आवश्यक है कि “इसको बच्चे की, बूढ़े की, स्त्री की, पुरूष की, पशु-पक्षी की, हिन्दू या मुसलमान की, घर वाले की या बाहर वाले की, जिसकी नजर लगी हो, वह इस बत्ती, नमक, राई, कोयले आदि सामान में आ जाए तथा नजर का सताया बच्चा-बूढ़ा ठीक हो जाए। सामग्री आग या बत्ती जला दूंगी या जला दूंगा।´..........................................शत्रु-मोहन

“चन्द्र-शत्रु राहू पर, विष्णु का चले चक्र। भागे भयभीत शत्रु, देखे जब चन्द्र वक्र। दोहाई कामाक्षा देवी की, फूँक-फूँक मोहन-मन्त्र। मोह-मोह-शत्रु मोह, सत्य तन्त्र-मन्त्र-यन्त्र।। तुझे शंकर की आन, सत-गुरु का कहना मान। ॐ नमः कामाक्षाय अं कं चं टं तं पं यं शं ह्रीं क्रीं श्रीं फट् स्वाहा।।” विधिः- चन्द्र-ग्रहण या सूर्य-ग्रहण के समय किसी बारहों मास बहने वाली नदी के किनारे, कमर तक जल में पूर्व की ओर मुख करके खड़ा हो जाए। जब तक ग्रहण लगा रहे, श्री कामाक्षा देवी का ध्यान करते हुए उक्त मन्त्र का पाठ करता रहे। ग्रहण मोक्ष होने पर सात डुबकियाँ लगाकर स्नान करे। आठवीं डुबकी लगाकर नदी के जल के भीतर की मिट्टी बाहर निकाले। उस मिट्टी को अपने पास सुरक्षित रखे। जब किसी शत्रु को सम्मोहित करना हो, तब स्नानादि करके उक्त मन्त्र को १०८ बार पढ़कर उसी मिट्टी का चन्दन ललाट पर लगाए और शत्रु के पास जाए। शत्रु इस प्रकार सम्मोहित हो जायेगा कि शत्रुता छोड़कर उसी दिन से उसका सच्चा मित्र बन जाएगा।.....................................दूकान की बिक्री अधिक हो- १॰ “श्री शुक्ले महा-शुक्ले कमल-दल निवासे श्री महालक्ष्मी नमो नमः। लक्ष्मी माई, सत्त की सवाई। आओ, चेतो, करो भलाई। ना करो, तो सात समुद्रों की दुहाई। ऋद्धि-सिद्धि खावोगी, तो नौ नाथ चौरासी सिद्धों की दुहाई।” विधि- घर से नहा-धोकर दुकान पर जाकर अगर-बत्ती जलाकर उसी से लक्ष्मी जी के चित्र की आरती करके, गद्दी पर बैठकर, १ माला उक्त मन्त्र की जपकर दुकान का लेन-देन प्रारम्भ करें। आशातीत लाभ होगा। २॰ “भँवरवीर, तू चेला मेरा। खोल दुकान कहा कर मेरा। उठे जो डण्डी बिके जो माल, भँवरवीर सोखे नहिं जाए।।” विधि- १॰ किसीशुभ रविवार से उक्त मन्त्र की १० माला प्रतिदिन के नियम से दस दिनों में १०० माला जप कर लें। केवल रविवार के ही दिन इस मन्त्र का प्रयोग किया जाता है। प्रातः स्नान करके दुकान पर जाएँ। एक हाथ में थोड़े-से काले उड़द ले लें। फिर ११ बार मन्त्र पढ़कर, उन पर फूँक मारकर दुकान में चारों ओर बिखेर दें। सोमवार को प्रातः उन उड़दों को समेट कर किसी चौराहे पर, बिना किसी के टोके, डाल आएँ। इस प्रकार चार रविवार तक लगातार, बिना नागा किए, यह प्रयोग करें। २॰ इसके साथ यन्त्र का भी निर्माण किया जाता है। इसे लाल स्याही अथवा लाल चन्दन से लिखना है। बीच में सम्बन्धित व्यक्ति का नाम लिखें। तिल्ली के तेल में बत्ती बनाकर दीपक जलाए। १०८ बार मन्त्र जपने तक यह दीपक जलता रहे। रविवार के दिन काले उड़द के दानों पर सिन्दूर लगाकर उक्त मन्त्र से अभिमन्त्रित करे। फिर उन्हें दूकान में बिखेर दें।....................................१॰ हनुमान रक्षा-शाबर मन्त्र “ॐ गर्जन्तां घोरन्तां, इतनी छिन कहाँ लगाई ? साँझ क वेला, लौंग-सुपारी-पान-फूल-इलायची-धूप-दीप-रोट॒लँगोट-फल-फलाहार मो पै माँगै। अञ्जनी-पुत्र ‌प्रताप-रक्षा-कारण वेगि चलो। लोहे की गदा कील, चं चं गटका चक कील, बावन भैरो कील, मरी कील, मसान कील, प्रेत-ब्रह्म-राक्षस कील, दानव कील, नाग कील, साढ़ बारह ताप कील, तिजारी कील, छल कील, छिद कील, डाकनी कील, साकनी कील, दुष्ट कील, मुष्ट कील, तन कील, काल-भैरो कील, मन्त्र कील, कामरु देश के दोनों दरवाजा कील, बावन वीर कील, चौंसठ जोगिनी कील, मारते क हाथ कील, देखते क नयन कील, बोलते क जिह्वा कील, स्वर्ग कील, पाताल कील, पृथ्वी कील, तारा कील, कील बे कील, नहीं तो अञ्जनी माई की दोहाई फिरती रहे। जो करै वज्र की घात, उलटे वज्र उसी पै परै। छात फार के मरै। ॐ खं-खं-खं जं-जं-जं वं-वं-वं रं-रं-रं लं-लं-लं टं-टं-टं मं-मं-मं। महा रुद्राय नमः। अञ्जनी-पुत्राय नमः। हनुमताय नमः। वायु-पुत्राय नमः। राम-दूताय नमः।”

विधिः- अत्यन्त लाभ-दायक अनुभूत मन्त्र है। १००० पाठ करने से सिद्ध होता है। अधिक कष्ट हो, तो हनुमानजी का फोटो टाँगकर, ध्यान लगाकर लाल फूल और गुग्गूल की आहुति दें। लाल लँगोट, फल, मिठाई, ५ लौंग, ५ इलायची, १ सुपारी चढ़ा कर पाठ करें।...............................“शाबर मन्त्र साधना” के तथ्य १॰ इस साधना को किसी भी जाति, वर्ण, आयु का पुरुष या स्त्री कर सकती है। २॰ इन मन्त्रों की साधना में गुरु की इतनी आवश्यकता नहीं रहती, क्योंकि इनके प्रवर्तक स्वयं सिद्ध साधक रहे हैं। इतने पर भी कोई निष्ठावान् साधक गुरु बन जाए, तो कोई आपत्ति नहीं क्योंकि किसी होनेवाले विक्षेप से वह बचा सकता है। ३॰ साधना करते समय किसी भी रंग की धुली हुई धोती पहनी जा सकती है तथा किसी भी रंग का आसन उपयोग में लिया जा सकता है। ४॰ साधना में जब तक मन्त्र-जप चले घी या मीठे तेल का दीपक प्रज्वलित रखना चाहिए। एक ही दीपक के सामने कई मन्त्रों की साधना की जा सकती है। ५॰ अगरबत्ती या धूप किसी भी प्रकार की प्रयुक्त हो सकती है, किन्तु शाबर-मन्त्र-साधना में गूगल तथा लोबान की अगरबत्ती या धूप की विशेष महत्ता मानी गई है। ६॰ जहाँ ‘दिशा’ का निर्देश न हो, वहाँ पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके साधना करनी चाहिए। मारण, उच्चाटन आदि दक्षिणाभिमुख होकर करें। मुसलमानी मन्त्रों की साधना पश्चिमाभिमुख होकर करें। ७॰ जहाँ ‘माला’ का निर्देश न हो, वहाँ कोई भी ‘माला’ प्रयोग में ला सकते हैं। ‘रुद्राक्ष की माला सर्वोत्तम होती है। वैष्णव देवताओं के विषय में ‘तुलसी’ की माला तथा मुसलमानी मन्त्रों में ‘हकीक’ की माला प्रयोग करें। माला संस्कार आवश्यक नहीं है। एक ही माला पर कई मन्त्रों का जप किया जा सकता है। ८॰ शाबर मन्त्रों की साधना में ग्रहण काल का अत्यधिक महत्त्व है। अपने सभी मन्त्रों से ग्रहण काल में कम से कम एक बार हवन अवश्य करना चाहिए। इससे वे जाग्रत रहते हैं। ९॰ हवन के लिये मन्त्र के अन्त में ‘स्वाहा’ लगाने की आवश्यकता नहीं होती। जैसा भी मन्त्र हो, पढ़कर अन्त में आहुति दें। १०॰ ‘शाबर’ मन्त्रों पर पूर्ण श्रद्धा होनी आवश्यक है। अधूरा विश्वास या मन्त्रों पर अश्रद्धा होने पर फल नहीं मिलता। ११॰ साधना काल में एक समय भोजन करें और ब्रह्मचर्य-पालन करें। मन्त्र-जप करते समय स्वच्छता का ध्यान रखें। १२॰ साधना दिन या रात्रि किसी भी समय कर सकते हैं। १३॰ ‘मन्त्र’ का जप जैसा-का-तैसा करं। उच्चारण शुद्ध रुप से होना चाहिए। १४॰ साधना-काल में हजामत बनवा सकते हैं। अपने सभी कार्य-व्यापार या नौकरी आदि सम्पन्न कर सकते हैं। १५॰ मन्त्र-जप घर में एकान्त कमरे में या मन्दिर में या नदी के तट- कहीं भी किया जा सकता है। १६॰ ‘शाबर-मन्त्र’ की साधना यदि अधूरी छूट जाए या साधना में कोई कमी रह जाए, तो किसी प्रकार की हानि नहीं होती। १७॰ शाबर मन्त्र के छः प्रकार बतलाये गये हैं- (क) सवैया, (ख) अढ़ैया, (ग) झुमरी, (घ) यमराज, (ड़) गरुड़ा, तथा (च) गोपाल शाबर।..................................शाबर मन्त्रों का आशयः- स्व॰ वामन शिवराम आप्टे ने सन् १९४२ ई॰ में अपने ‘संस्कृत-कोष’ में ‘शाबर’ शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार दी है; ‘शब (व)-र-अण्-शाबरः, शावरः, शाबरी।’ अर्थ में ‘जंगली जाति’ या ‘पर्वतीय’ लोगों द्वारा बोली जानीवाली ‘भाषा’ बताया गया है। वह एक प्रकार का मन्त्र भी है, इसका वहँ कोई उल्लेख नहीं है। गोस्वामी तुलसीदास जी ने ‘श्रीरानचरितमानस’ (संवत् १६३१) में शाबर मन्त्रों का महत्त्व स्वीकार किया है, यह भी रहस्योद्घाटन भी किया है कि इस ‘साबर-मन्त्र-जाल’ के स्रष्टा भी शिव-पार्वती ही हैं। कलि बिलोकि जग-हित हर गिरिजा, ‘साबर-मन्त्र-जाल’ जिन्ह सिरिजा। अनमिल आखर अरथ न जापू, प्रगट प्रभाव महेश प्रतापू।। आधुनिक काल में महा-महोपाध्याय स्व॰ पण्डित गोपीनाथ कविराज जी ने अपने प्रसिद्ध ‘तान्त्रिक-साहित्य’ ग्रन्थ के पृष्ठ ६२३-२४ में ‘शाबर’- सम्बन्धी पाँच पाण्डुलिपियों का उल्लेख किया हैः १॰ शाबर-चिन्तामणि पार्वती-पुत्र आदिनाथ विरचित, २॰ शाबर तन्त्र गोरखनाथ विरचित, ३॰ शाबर तन्त्र सर्वस्व, शाबर मन्त्र, तथा ५॰ शाबर मन्त्र चिन्तामणि। उक्त पाँच पाण्डुलिपियों में सा प्रथम पाण्डुलिपि एशियाटिक सोसाइटी बंगाल के सूचीपत्र में संख्या ६१०० से सम्बन्धित है। द्वितीय पाण्डुलिपि की चार प्रतियों का उल्लेख कविराज जी ने किया है। पहली उक्त सोसाइटी की सूची-पत्र ६०९९ से सम्बन्धित है, दूसरी म॰म॰ हरप्रसाद शास्त्री के विवरण की सं॰ १।३५९ है। तीसरी प्रति डेकन कालेज, पूना सूचीपत्र ५८० है। चौथी प्रति की तीन पाण्डुलिपियों का उल्लेख है, जो संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के सूचीपत्र की संख्या २३८६७, २४८१५ और २४५७९ पर वर्णित है। ये तीनों अपूर्ण है। तृतीय पाण्डुलिपि ‘शाबर-तन्त्र-सर्वस्व’ के सम्बन्ध में अपुष्ट कथन लिखा है। चतुर्थ पाण्डुलिपि की तीन प्रतियों का उल्लेख हुआ है। पहली प्रति एशियाटिक सोसाइटी के सूचीपत्र की संख्या ६५५८ है। दूसरी प्रति बड़ौदा पुस्तकालय के अकारादि सूचीपत्र की संख्या ५६१४ पर है। तीसरी प्रति की दो पाण्डुलिपियां संस्कृत विश्वविद्यालय, वाराणसी के सूचीपत्र की संख्या २३८५६ और २६२३२ से सम्बद्ध है। पञ्चम पाण्डुलिपि एशियाटिक सोसाइटी के सूचीपत्र की संख्या ६१०० पर उल्लिखित है। ‘उ॰प्र॰ हिन्दी संस्थान’ द्वारा प्रकाशित ‘हिन्दू धर्म कोश’ में सम्पादक डा‌॰ चन्द्रबली पाण्डेय ने ‘शाबर’ शब्द को अपने ‘कोश’ में स्थान तक नहीं दिया है-जबकि ‘शबर-शंकर-विलास’, ‘शबर-स्वामी’, ‘शाबर-भाष्य’ जैसे शब्दों को उन्होनें सम्मिलित किया है। श्रीतारानाथ तर्क-वाचस्पति भट्टाचार्य द्वारा संकलित एवं चौखम्भा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी द्वारा प्रकाशित प्रख्यात ‘वृहत् संस्कृताभिधानम्’ (कोश) में भी ‘शबर’ या ‘शाबर’ शब्द का उल्लेख नहीं है। उक्त विश्लेषण के पश्चात भी शाबर विद्या सर्वत्र भारत में अपना एक विशिष्ट अस्तित्व तथा प्रभाव रखती है। वस्तुतः देखा जाये तो समस्त विश्व में शाबर विद्या या समानार्थी विद्या प्रचलन में है। ज्ञान की संज्ञा भले ही बदल जाये मूल भावना तथा क्रिया वही रहती है।.......................................सर्वारिष्ट निवारण स्तोत्र ॐ गं गणपतये नमः। सर्व-विघ्न-विनाशनाय, सर्वारिष्ट निवारणाय, सर्व-सौख्य-प्रदाय, बालानां बुद्धि-प्रदाय, नाना-प्रकार-धन-वाहन-भूमि-प्रदाय, मनोवांछित-फल-प्रदाय रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ गुरवे नमः, ॐ श्रीकृष्णाय नमः, ॐ बलभद्राय नमः, ॐ श्रीरामाय नमः, ॐ हनुमते नमः, ॐ शिवाय नमः, ॐ जगन्नाथाय नमः, ॐ बदरीनारायणाय नमः, ॐ श्री दुर्गा-देव्यै नमः।। ॐ सूर्याय नमः, ॐ चन्द्राय नमः, ॐ भौमाय नमः, ॐ बुधाय नमः, ॐ गुरवे नमः, ॐ भृगवे नमः, ॐ शनिश्चराय नमः, ॐ राहवे नमः, ॐ पुच्छानयकाय नमः, ॐ नव-ग्रह रक्षा कुरू कुरू नमः।। ॐ मन्येवरं हरिहरादय एव दृष्ट्वा द्रष्टेषु येषु हृदयस्थं त्वयं तोषमेति विविक्षते न भवता भुवि येन नान्य कश्विन्मनो हरति नाथ भवान्तरेऽपि। ॐ नमो मणिभद्रे। जय-विजय-पराजिते ! भद्रे ! लभ्यं कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ भूर्भुवः स्वः तत्-सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।। सर्व विघ्नं शांन्तं कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीबटुक-भैरवाय आपदुद्धारणाय महान्-श्याम-स्वरूपाय दिर्घारिष्ट-विनाशाय नाना प्रकार भोग प्रदाय मम (यजमानस्य वा) सर्वरिष्टं हन हन, पच पच, हर हर, कच कच, राज-द्वारे जयं कुरू कुरू, व्यवहारे लाभं वृद्धिं वृद्धिं, रणे शत्रुन् विनाशय विनाशय, पूर्णा आयुः कुरू कुरू, स्त्री-प्राप्तिं कुरू कुरू, हुम् फट् स्वाहा।। ॐ नमो भगवते वासुदेवाय नमः। ॐ नमो भगवते, विश्व-मूर्तये, नारायणाय, श्रीपुरूषोत्तमाय। रक्ष रक्ष, युग्मदधिकं प्रत्यक्षं परोक्षं वा अजीर्णं पच पच, विश्व-मूर्तिकान् हन हन, ऐकाह्निकं द्वाह्निकं त्राह्निकं चतुरह्निकं ज्वरं नाशय नाशय, चतुरग्नि वातान् अष्टादष-क्षयान् रांगान्, अष्टादश-कुष्ठान् हन हन, सर्व दोषं भंजय-भंजय, तत्-सर्वं नाशय-नाशय, शोषय-शोषय, आकर्षय-आकर्षय, मम शत्रुं मारय-मारय, उच्चाटय-उच्चाटय, विद्वेषय-विद्वेषय, स्तम्भय-स्तम्भय, निवारय-निवारय, विघ्नं हन हन, दह दह, पच पच, मथ मथ, विध्वंसय-विध्वंसय, विद्रावय-विद्रावय, चक्रं गृहीत्वा शीघ्रमागच्छागच्छ, चक्रेण हन हन, पा-विद्यां छेदय-छेदय, चौरासी-चेटकान् विस्फोटान् नाशय-नाशय, वात-शुष्क-दृष्टि-सर्प-सिंह-व्याघ्र-द्विपद-चतुष्पद अपरे बाह्यं ताराभिः भव्यन्तरिक्षं अन्यान्य-व्यापि-केचिद् देश-काल-स्थान सर्वान् हन हन, विद्युन्मेघ-नदी-पर्वत, अष्ट-व्याधि, सर्व-स्थानानि, रात्रि-दिनं, चौरान् वशय-वशय, सर्वोपद्रव-नाशनाय, पर-सैन्यं विदारय-विदारय, पर-चक्रं निवारय-निवारय, दह दह, रक्षां कुरू कुरू, ॐ नमो भगवते, ॐ नमो नारायणाय, हुं फट् स्वाहा।। ठः ठः ॐ ह्रीं ह्रीं। ॐ ह्रीं क्लीं भुवनेश्वर्याः श्रीं ॐ भैरवाय नमः। हरि ॐ उच्छिष्ट-देव्यै नमः। डाकिनी-सुमुखी-देव्यै, महा-पिशाचिनी ॐ ऐं ठः ठः। ॐ चक्रिण्या अहं रक्षां कुरू कुरू, सर्व-व्याधि-हरणी-देव्यै नमो नमः। सर्व प्रकार बाधा शमनमरिष्ट निवारणं कुरू कुरू फट्। श्रीं ॐ कुब्जिका देव्यै ह्रीं ठः स्वाहा।। शीघ्रमरिष्ट निवारणं कुरू कुरू शाम्बरी क्रीं ठः स्वाहा।। शारिका भेदा महामाया पूर्णं आयुः कुरू। हेमवती मूलं रक्षा कुरू। चामुण्डायै देव्यै शीघ्रं विध्नं सर्वं वायु कफ पित्त रक्षां कुरू। मन्त्र तन्त्र यन्त्र कवच ग्रह पीडा नडतर, पूर्व जन्म दोष नडतर, यस्य जन्म दोष नडतर, मातृदोष नडतर, पितृ दोष नडतर, मारण मोहन उच्चाटन वशीकरण स्तम्भन उन्मूलनं भूत प्रेत पिशाच जात जादू टोना शमनं कुरू। सन्ति सरस्वत्यै कण्ठिका देव्यै गल विस्फोटकायै विक्षिप्त शमनं महान् ज्वर क्षयं कुरू स्वाहा।। सर्व सामग्री भोगं सप्त दिवसं देहि देहि, रक्षां कुरू क्षण क्षण अरिष्ट निवारणं, दिवस प्रति दिवस दुःख हरणं मंगल करणं कार्य सिद्धिं कुरू कुरू। हरि ॐ श्रीरामचन्द्राय नमः। हरि ॐ भूर्भुवः स्वः चन्द्र तारा नव ग्रह शेषनाग पृथ्वी देव्यै आकाशस्य सर्वारिष्ट निवारणं कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं श्रीं बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीवासुदेवाय नमः, बटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीविष्णु भगवान् मम अपराध क्षमा कुरू कुरू, सर्व विघ्नं विनाशय, मम कामना पूर्णं कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीबटुक भैरवाय आपदुद्धारणाय सर्व विघ्न निवारणाय मम रक्षां कुरू कुरू स्वाहा।। ॐ ऐं ह्रीं क्लीं श्रीं ॐ श्रीदुर्गा देवी रूद्राणी सहिता, रूद्र देवता काल भैरव सह, बटुक भैरवाय, हनुमान सह मकर ध्वजाय, आपदुद्धारणाय मम सर्व दोषक्षमाय कुरू कुरू सकल विघ्न विनाशाय मम शुभ मांगलिक कार्य सिद्धिं कुरू कुरू स्वाहा।।

एष विद्या माहात्म्यं च, पुरा मया प्रोक्तं ध्रुवं। शम क्रतो तु हन्त्येतान्, सर्वाश्च बलि दानवाः।। य पुमान् पठते नित्यं, एतत् स्तोत्रं नित्यात्मना। तस्य सर्वान् हि सन्ति, यत्र दृष्टि गतं विषं।। अन्य दृष्टि विषं चैव, न देयं संक्रमे ध्रुवम्। संग्रामे धारयेत्यम्बे, उत्पाता च विसंशयः।। सौभाग्यं जायते तस्य, परमं नात्र संशयः। द्रुतं सद्यं जयस्तस्य, विघ्नस्तस्य न जायते।। किमत्र बहुनोक्तेन, सर्व सौभाग्य सम्पदा। लभते नात्र सन्देहो, नान्यथा वचनं भवेत्।। ग्रहीतो यदि वा यत्नं, बालानां विविधैरपि। शीतं समुष्णतां याति, उष्णः शीत मयो भवेत्।। नान्यथा श्रुतये विद्या, पठति कथितं मया। भोज पत्रे लिखेद् यन्त्रं, गोरोचन मयेन च।। इमां विद्यां शिरो बध्वा, सर्व रक्षा करोतु मे। पुरूषस्याथवा नारी, हस्ते बध्वा विचक्षणः।। विद्रवन्ति प्रणश्यन्ति, धर्मस्तिष्ठति नित्यशः। सर्वशत्रुरधो यान्ति, शीघ्रं ते च पलायनम्।।

‘श्रीभृगु संहिता’ के सर्वारिष्ट निवारण खण्ड में इस अनुभूत स्तोत्र के 40 पाठ करने की विधि बताई गई है। इस पाठ से सभी बाधाओं का निवारण होता है। किसी भी देवता या देवी की प्रतिमा या यन्त्र के सामने बैठकर धूप दीपादि से पूजन कर इस स्तोत्र का पाठ करना चाहिये। विशेष लाभ के लिये ‘स्वाहा’ और ‘नमः’ का उच्चारण करते हुए ‘घृत मिश्रित गुग्गुल’ से आहुतियाँ दे सकते हैं।.......................................बजरङग वशीकरण मन्त्र “ॐ पीर बजरङ्गी, राम लक्ष्मण के सङ्गी। जहां-जहां जाए, फतह के डङ्के बजाय। ‘अमुक’ को मोह के, मेरे पास न लाए, तो अञ्जनी का पूत न कहाय। दुहाई राम-जानकी की।” विधि- ११ दिनों तक ११ माला उक्त मन्त्र का जप कर इसे सिद्ध कर ले। ‘राम-नवमी’ या ‘हनुमान-जयन्ती’ शुभ दिन है। प्रयोग के समय दूध या दूध निर्मित पदार्थ पर ११ बार मन्त्र पढ़कर खिला या पिला देने से, वशीकरण होगा।..................................................आकर्षण हेतु हनुमद्-मन्त्र-तन्त्र “ॐ अमुक-नाम्ना ॐ नमो वायु-सूनवे झटिति आकर्षय-आकर्षय स्वाहा।” विधि- केसर, कस्तुरी, गोरोचन, रक्त-चन्दन, श्वेत-चन्दन, अम्बर, कर्पूर और तुलसी की जड़ को घिस या पीसकर स्याही बनाए। उससे द्वादश-दल-कलम जैसा ‘यन्त्र’ लिखकर उसके मध्य में, जहाँ पराग रहता है, उक्त मन्त्र को लिखे। ‘अमुक’ के स्थान पर ‘साध्य’ का नाम लिखे। बारह दलों में क्रमशः निम्न मन्त्र लिखे- १॰ हनुमते नमः, २॰ अञ्जनी-सूनवे नमः, ३॰ वायु-पुत्राय नमः, ४॰ महा-बलाय नमः, ५॰ श्रीरामेष्टाय नमः, ६॰ फाल्गुन-सखाय नमः, ७॰ पिङ्गाक्षाय नमः, ८॰ अमित-विक्रमाय नमः, ९॰ उदधि-क्रमणाय नमः, १०॰ सीता-शोक-विनाशकाय नमः, ११॰ लक्ष्मण-प्राण-दाय नमः और १२॰ दश-मुख-दर्प-हराय नमः। यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजन करते हुए उक्त मन्त्र का ११००० जप करें। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए लाल चन्दन या तुलसी की माला से जप करें। आकर्षण हेतु अति प्रभावकारी है।.............................................आकर्षण एवं वशीकरण के प्रबल सूर्य मन्त्र १॰ “ॐ नमो भगवते श्रीसूर्याय ह्रीं सहस्त्र-किरणाय ऐं अतुल-बल-पराक्रमाय नव-ग्रह-दश-दिक्-पाल-लक्ष्मी-देव-वाय, धर्म-कर्म-सहितायै ‘अमुक’ नाथय नाथय, मोहय मोहय, आकर्षय आकर्षय, दासानुदासं कुरु-कुरु, वश कुरु-कुरु स्वाहा।” विधि- सुर्यदेव का ध्यान करते हुए उक्त मन्त्र का १०८ बार जप प्रतिदिन ९ दिन तक करने से ‘आकर्षण’ का कार्य सफल होता है। २॰ “ऐं पिन्स्थां कलीं काम-पिशाचिनी शिघ्रं ‘अमुक’ ग्राह्य ग्राह्य, कामेन मम रुपेण वश्वैः विदारय विदारय, द्रावय द्रावय, प्रेम-पाशे बन्धय बन्धय, ॐ श्रीं फट्।” विधि- उक्त मन्त्र को पहले पर्व, शुभ समय में २०००० जप कर सिद्ध कर लें। प्रयोग के समय ‘साध्य’ के नाम का स्मरण करते हुए प्रतिदिन १०८ बार मन्त्र जपने से ‘वशीकरण’ हो जाता है।........................................३॰ कामिया सिन्दूर-मोहन मन्त्र- “हथेली में हनुमन्त बसै, भैरु बसे कपार। नरसिंह की मोहिनी, मोहे सब संसार। मोहन रे मोहन्ता वीर, सब वीरन में तेरा सीर। सबकी नजर बाँध दे, तेल सिन्दूर चढ़ाऊँ तुझे। तेल सिन्दूर कहाँ से आया ? कैलास-पर्वत से आया। कौन लाया, अञ्जनी का हनुमन्त, गौरी का गनेश लाया। काला, गोरा, तोतला-तीनों बसे कपार। बिन्दा तेल सिन्दूर का, दुश्मन गया पाताल। दुहाई कमिया सिन्दूर की, हमें देख शीतल हो जाए। सत्य नाम, आदेश गुरु की। सत् गुरु, सत् कबीर। विधि- आसाम के ‘काम-रुप कामाख्या, क्षेत्र में ‘कामीया-सिन्दूर’ पाया जाता है। इसे प्राप्त कर लगातार सात रविवार तक उक्त मन्त्र का १०८ बार जप करें। इससे मन्त्र सिद्ध हो जाएगा। प्रयोग के समय ‘कामिया सिन्दूर’ पर ७ बार उक्त मन्त्र पढ़कर अपने माथे पर टीका लगाए। ‘टीका’ लगाकर जहाँ जाएँगे, सभी वशीभूत होंगे।................................. सिद्ध वशीकरण मन्त्र

१॰ “बारा राखौ, बरैनी, मूँह म राखौं कालिका। चण्डी म राखौं मोहिनी, भुजा म राखौं जोहनी। आगू म राखौं सिलेमान, पाछे म राखौं जमादार। जाँघे म राखौं लोहा के झार, पिण्डरी म राखौं सोखन वीर। उल्टन काया, पुल्टन वीर, हाँक देत हनुमन्ता छुटे। राजा राम के परे दोहाई, हनुमान के पीड़ा चौकी। कीर करे बीट बिरा करे, मोहिनी-जोहिनी सातों बहिनी। मोह देबे जोह देबे, चलत म परिहारिन मोहों। मोहों बन के हाथी, बत्तीस मन्दिर के दरबार मोहों। हाँक परे भिरहा मोहिनी के जाय, चेत सम्हार के। सत गुरु साहेब।” विधि- उक्त मन्त्र स्वयं सिद्ध है तथा एक सज्जन के द्वारा अनुभूत बतलाया गया है। फिर भी शुभ समय में १०८ बार जपने से विशेष फलदायी होता है। नारियल, नींबू, अगर-बत्ती, सिन्दूर और गुड़ का भोग लगाकर १०८ बार मन्त्र जपे। मन्त्र का प्रयोग कोर्ट-कचहरी, मुकदमा-विवाद, आपसी कलह, शत्रु-वशीकरण, नौकरी-इण्टरव्यू, उच्च अधीकारियों से सम्पर्क करते समय करे। उक्त मन्त्र को पढ़ते हुए इस प्रकार जाँए कि मन्त्र की समाप्ति ठीक इच्छित व्यक्ति के सामने हो।...........यदि शरीर स्वस्थ है तो जीवन का हर सुख अच्छा लगता है और यदि शरीर ही स्वस्थ नहीं हैं तो किसी भी सुख में मजा नहीं आता। यदि आप भी किसी असाध्य रोग से पीडि़त हैं तो नीचे लिखे हनुमान मंत्र का जप मंगलवार को करें इससे आपका रोग दूर हो सकता है। यह हनुमान मंत्र इस प्रकार है-

मंत्र

हनुमन्नंजनी सुनो वायुपुत्र महाबल:।

अकस्मादागतोत्पांत नाशयाशु नमोस्तुते।।

जप विधि

- प्रति मंगलवार सुबह जल्दी उठकर सर्वप्रथम स्नान आदि नित्य कर्म से निवृत्त होकर साफ वस्त्र पहनें।

- इसके बाद हनुमानजी की पूजा करें और उन्हें सिंदूर तथा गुड़-चना चढ़ाएं।

- इसके बाद पूर्व दिशा की ओर मुख करके कुश का आसन ग्रहण करें।

- तत्पश्चात लाल चंदन की माला से ऊपर लिखे मंत्र का जप करें।

- इस मंत्र का प्रभाव आपको कुछ ही समय में दिखने लगेगा।................. सूर्य को वरुण देवता का नेत्र भी माना जाता है, सूर्य को कई पुत्र और पुत्रियां हैं ! ऐसा कहा जाता है की विस्वकर्मा की पुत्री संज्ञा उनकी सर्ब्प्र्मुख पत्नी हैं !इन्हीं के गर्भ से यम और यमुना का जन्म हुआ ! इनकी दूसरी पत्नी का नाम छाया बताया जाता है,इनके गर्भ से शनि और ताप्ती का जन्म हुआ !

कपिराज सुग्रीव और दानवीर कर्ण इन्हीं के वंसज थे !

पछिराज गरुण के बड़े भाई अरुण सूर्य के सात घोड़े वाले रथ के सारथि माने गए हैं ! ये सात घोड़े सूर्य की सात ज्योतिओं के रंग हैं ! बैगनी ,नीला,आसमानी,हरा,पीला,नारंगी और लाल ये सातों रंग मिलकर प्रकाश-पुंज बनाते हैं ! इसे सूर्य की धुप का रंग कहा जाता है !!

ओम सूर्याय: नमह !! ॐ ॐ ......... अशुभ ग्रहों का उपाय किस प्रकार से करे: 1. सूर्य : बहते पानी में गुड़ बहाएँ। सूर्य को जल दे, पिता की सेवा करे या गेहूँ और तांबे का बर्तन दान करें., 2. चंद्र : किसी मंदिर में कुछ दिन कच्चा दूध और चावल रखें या खीर-बर्फी का दान करें, या माता की सेवा करे, या दूध या पानी से भरा बर्तन रात को सिरहाने रखें. सुबह उस दुध या पानी से किसी कांटेदार पेड़ की जड़ में डाले या चन्द्र के लिए चावल, दुध एवं चान्दी के वस्तुएं दान करें. 3. मंगल : बहते पानी में तिल और गुड़ से बनी रेवाडि़यां प्रवाहित करे. या बरगद के वृक्ष की जड़ में मीठा कच्चा दूध 43 दिन लगातार डालें। उस दूध से भिगी मिट्टी का तिलक लगाएँ। या ८ मंगलवार को बंदरो को भुना हुआ गुड और चने खिलाये , या बड़े भाई बहन के सेवा करे, मंगल के लिए साबुत, मसूर की दाल दान करें 4. बुध : ताँबे के पैसे में सूराख करके बहते पानी में बहाएँ। फिटकरी से दन्त साफ करे, अपना आचरण ठीक रखे ,बुध के लिए साबुत मूंग का दान करें., माँ दुर्गा की आराधना करें . 5. बृहस्पति : केसर का तिलक रोजाना लगाएँ या कुछ मात्रा में केसर खाएँ और नाभि या जीभ पर लगाएं या बृ्हस्पति के लिए चने की दाल या पिली वस्तु दान करें. 6. शुक्र : गाय की सेवा करें और घर तथा शरीर को साफ-सुथरा रखें, या काली गाय को हरा चारा डाले .शुक्र के लिए दही, घी, कपूर आदि का दान करें. 7. शनि : बहते पानी में रोजाना नारियल बहाएँ। शनि के दिन पीपल पर तेल का दिया जलाये ,या किसी बर्तन में तेल लेकर उसमे अपना क्षाया देखें और बर्तन तेल के साथ दान करे. क्योंकि शनि देव तेल के दान से अधिक प्रसन्ना होते है, या हनुमान जी की पूजा करे और बजरंग बाण का पथ करे, शनि के लिए काले साबुत उड़द एवं लोहे की वस्तु का दान करें. 8. राहु : जौ या मूली या काली सरसों का दान करें या अपने सिरहाने रख कर अगले दिन बहते हुए पानी में बहाए , 9. केतु : मिट्टी के बने तंदूर में मीठी रोटी बनाकर 43 दिन कुत्तों को खिलाएँ या सवा किलो आटे को भुनकर उसमे गुड का चुरा मिला दे और ४३ दिन तक लगातार चींटियों को डाले, या कला सफ़ेद कम्बल कोढियों को दान करें या आर्थिक नुकासन से बचने के लिए रोज कौओं को रोटी खिलाएं. या काला तिल दान करे, अपना कर्म ठीक रखे तभी भाग्य आप का साथ देगा और कर्म ठीक हो इसके लिए आप मन्दिर में प्रतिदिन दर्शन के लिए जाएं., माता-पिता और गुरु जानो का सम्मान करे , अपने धर्मं का पालन करे, भाई बन्धुओं से अच्छे सम्बन्ध बनाकर रखें., पितरो का श्राद्ध करें. या प्रत्येक अमावस को पितरो के निमित्त मंदिर में दान करे, गाय और कुत्ता पालें, यदि किसी कारणवश कुत्ता मर जाए तो दोबारा कुत्ता पालें. अगर घर में ना पाल सके तो बाहर ही उसकी सेवा करे, यदि सन्तान बाधा हो तो कुत्तों को रोटी खिलाने से घर में बड़ो के आशीर्वाद लेने से और उनकी सेवा करने से सन्तान सुख की प्राप्ति होगी . गौ ग्रास. रोज भोजन करते समय परोसी गयी थाली में से एक हिस्सा गाय को, एक हिस्सा कुत्ते को एवं एक हिस्सा कौए को खिलाएं आप के घर में हमेसा बरक्कत रहेगी, ........... जन्म कुंडली आप के जीवन में प्रकाश ला सकती है , अगर किसी का जन्म दिन , जन्म समय और जन्म स्थान एकदम ठीक है तो किसी भी विद्वान से अपनी कुंडली के बारे में गड़ना जरुर कराएँ … जन्म पत्रिका के अनुसार कार्य करने से जीवन में प्रायः सफलता मिलती है…. कर्मो के अनुसार अच्छे – बुरे फल मिलते है,वैदिक विधियों द्वारा किया गया उपाय कभी खाली नहीं जाता है , अच्छे कर्मों से आप अपनी किस्मत बना भी सकते है और उसे ख़राब भी कर सकते है ..….. जन्म पत्रिका से अनेक लाभ है … कुंडली में १२ भाव होते है प्रत्येक भाव का अपना फल है जैसे :- १-आपके जीवन में कौन कौन सी परेशानियां हैं, और कब आएगी…? , शरीर क्यों और कब साथ नहीं देता इसका पता होना चाहिए।…? इन्शान के अन्दर सभी गुण होते हुए भी वो आखिर लाचार क्यों रहता है ….? २- धन – सम्पति सम्बंधित जानकारी …? . धन का संग्रह ना होना , ३- आपकी कुण्डली में कहीं दोष तो नहीं जो आपके भाई बहन के साथ सम्बन्ध खराब कर दे और साझेदारी या व्यापर करने में आप को आपर में कलह करना पड़े.,…? ४- मकान , वाहन, जमीन-जायदाद लेने के बाद या अचानक काम में नुक्सान या लेने के बाद भी सुख- सुविधावो में कमी या आपके घर में क्लेश क्यों रहता है ? ५. किस विषय को चुने जो आप को नई उचाई पर ले जायेगा…? साथ ही संतान के बारे में जाने की हमारे बच्चे दुख का कारण तो नही बन रहें हैं और आगे साथ देगे भी या नहीं …..? ६- आपके जीवन में कौन सा बुरा वक्त कब और कैसे आएगा , कहीं आपके मित्र ही शत्रु न बन जाये , या आप का अपना ही शारीर आप का साथ न छोड़ दे .. दुर्घटना या बिमारी कैसे आ सकती है, कहीं ऐसा तो नहीं कि जिसके लिए आपने अपना पूरा जीवन अच्छा करें वही आपको धोखा दें .?, ७- आपकी कुण्डली में शादी के बाद जीवन साथी का सुख है या नहीं और होगा भी तो कब होगी , प्रेम विवाह करने के बाद भी तलाक की मुशीबत न आये …? ८- विदेश यात्रा … कुंडली में जन्म स्थान से दूर जाने को ही विदेशा यात्रा कहते है ,,,,? अकस्मात दुर्घटना कही आप की जीवन में तो नहीं होगी….? ९- आप का भाग्य आप का साथ देगा या नहीं , कही आप अपना कीमती समय बस यूँ ही मौज मस्ती में गुजार रहे है, आपको बहुत ज्यादा सफलता क्यों नही मिलती या कब मिलेगी ?….? १०- व्यापर करे तो कौन सा करें , पिता से कितना सहयोग मिलेगा , पैत्रिक सम्पति मिलेगी या नहीं ,.. ११- जीवन में लाभ होगा या नहीं और होगा भी तो कब होगा और कैसे या हमारे बड़े भाई – बहन या सगे सम्बन्धी साथ देगे या नहीं , ..? १२ भाव हमें हानी के बारे में बताता है जैसे किस कार्य को करे जिससे हमें हानी न हो या कही आपका बिज़नस पार्टनर ही आप को नुकसान न पहुंचा दे , या जिसे आप अपना समझते है वो सिर्फ आप की दौलत से प्यार करते है ….. जिस भाव में जो ग्रह अशुभ फल प्रदान करे उसका हमें उपाय करना चाहिए , ........... जय भगवति देवि नमो वरदे जय पापविनाशिनि बहुफलदे। जय शुम्भनिशुम्भकपालधरे प्रणमामि तु देवि नरार्तिहरे॥1॥ जय चन्द्रदिवाकरनेत्रधरे जय पावकभूषितवक्त्रवरे। जय भैरवदेहनिलीनपरे जय अन्धकदैत्यविशोषकरे॥2॥ जय महिषविमर्दिनि शूलकरे जय लोकसमस्तकपापहरे। जय देवि पितामहविष्णुनते जय भास्करशक्रशिरोवनते॥3॥ जय षण्मुखसायुधईशनुते जय सागरगामिनि शम्भुनुते। जय दु:खदरिद्रविनाशकरे जय पुत्रकलत्रविवृद्धिकरे॥4॥ जय देवि समस्तशरीरधरे जय नाकविदर्शिनि दु:खहरे। जय व्याधिविनाशिनि मोक्ष करे जय वाञ्िछतदायिनि सिद्धिवरे॥5॥ एतद्व्यासकृतं स्तोत्रं य: पठेन्नियत: शुचि:। गृहे वा शुद्धभावेन प्रीता भगवती सदा॥6॥ भावार्थ :- हे वरदायिनी देवि! हे भगवति! तुम्हारी जय हो। हे पापों को नष्ट करने वाली और अनन्त फल देने वाली देवि। तुम्हारी जय हो! हे शुम्भनिशुम्भ के मुण्डों को धारण करने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। हे मुष्यों की पीडा हरने वाली देवि! मैं तुम्हें प्रणाम करता हूँ॥1॥ हे सूर्य-चन्द्रमारूपी नेत्रों को धारण करने वाली! तुम्हारी जय हो। हे अग्नि के समान देदीप्यामान मुख से शोभित होने वाली! तुम्हारी जय हो। हे भैरव-शरीर में लीन रहने वाली और अन्धकासुरका शोषण करने वाली देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो॥2॥ हे महिषसुर का मर्दन करने वाली, शूलधारिणी और लोक के समस्त पापों को दूर करने वाली भगवति! तुम्हारी जय हो। ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य और इन्द्र से नमस्कृत होने वाली हे देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो॥3॥ सशस्त्र शङ्कर और कार्तिकेयजी के द्वारा वन्दित होने वाली देवि! तुम्हारी जय हो। शिव के द्वारा प्रशंसित एवं सागर में मिलने वाली गङ्गारूपिणि देवि! तुम्हारी जय हो। दु:ख और दरिद्रता का नाश तथा पुत्र-कलत्र की वृद्धि करने वाली हे देवि! तुम्हारी जय हो, जय हो॥4॥ हे देवि! तुम्हारी जय हो। तुम समस्त शरीरों को धारण करने वाली, स्वर्गलोक का दर्शन करानेवाली और दु:खहारिणी हो। हे व्यधिनाशिनी देवि! तुम्हारी जय हो। मोक्ष तुम्हारे करतलगत है, हे मनोवाच्छित फल देने वाली अष्ट सिद्धियों से सम्पन्न परा देवि! तुम्हारी जय हो॥5॥

जो कहीं भी रहकर पवित्र भाव से नियमपूर्वक इस व्यासकृत स्तोत्र का पाठ करता है अथवा शुद्ध भाव से घर पर ही पाठ करता है, उसके ऊपर भगवती सदा ही प्रसन्न रहती हैं॥6॥ ............. दस महाविद्यायें शक्ति ग्रंथों में दस महाविद्याओं का वर्णन मिलता है,लेकिन जन श्रुति के अनुसार इन विद्याओं का रूप अपने अपने अनुसार बताया जाता है,यह दस विद्या क्या है और किस कारण से इन विद्याओं का रूप संसार में वर्णित है,यह दस विद्यायें ही क्यों है इसके अलावा और क्यों नही इससे कम भी होनी चाहिये थी,आदि बातें जनमानस के अन्दर अपना अपना रूप दिखाकर भ्रमित करती है। .......... शनिश्चरी अमावस्या पर शनिदेव का विधिवत पूजन कर पर्याप्त लाभ उठा सकते हैं :- 1. सर्वप्रथम नित्यकर्म से निवृत हो स्नानोपरांत माता-पिता के चरण स्पर्श करें। 2. भोजन में उड़द दाल, गुड़ तिल के पकवान, मीठी पूड़ी बनाकर शनिदेव को भोग लगाकर गाय, गरीब, कुत्ते को भोजन कराने के बाद स्वयं भोजन करें तथा प्रशाद बांटे। इस दिन केसरीया, काला वस्त्र पहनना लाभदायक व अनुकूल रहेगा। 3. शनि अमावस्या के दिन संपूर्ण श्रद्धा भाव से पवित्र करके घोडे की नाल या नाव की पेंदी की कील का छल्ला मध्यमा अंगुली में धारण करें। (किसी योग्य पंडित जी से ज़रूर पूछ ले, धारण करने से पहले) 4. शनि अमावस्या के दिन 108 बेलपत्र की माला भगवान शिव के शिवलिंग पर चढाए। 5. शनिवार को साबुत उडद किसी भिखारी को दान करें.या पक्षियों को ( कौए ) खाने के लिए डाले। 6. शनि ग्रह की वस्तुओं का दान करें, शनि ग्रह की वस्तुएं हैं –काला उड़द,चमड़े का जूता, नमक, सरसों तेल, तेल, नीलम, काले तिल, लोहे से बनी वस्तुएं, काला कपड़ा आदि। (योग्य पंडित जी से ज़रूर पूछ ले, दान करने से पहले) 7. उडद के आटे के 108 गोली बनाकर मछलियों को खिलाने से लाभ होगा । 8. १६ शनिवार सूर्यास्त्र के समय एक पानी वाला नारियल, ५ बादाम, कुछ दक्षिणा शनि मंदिर में चढायें । (योग्य पंडित जी से ज़रूर पूछ ले) 9. शनि को दरिद्र नारायण भी कहते हैं इसलिए दरिद्रो की सेवा से भी शनि प्रसन्न होते हैं, असाध्य व्यक्ति को काला छाता, चमडे के जूते चप्पल पहनाने से शनि देव प्रसन्न होते हैं । 10. शनिवार को हनुमान मन्दिर में पूजा उपासना कर तथा प्रसाद चढायें । 11. शनि के कोप से बचने के लिये मंगलमूर्ति श्री गणेश की भक्ति भी बहुत मंगलकारी है। इसलिए शनिवार को श्री गणेश पूजन में 21 दूर्वा या मोदक का भोग लगाएं और काम पर जाते समय श्री गणेश मूर्ति से कार्यसिद्धी और शनि कोप व अनिष्ठ से रक्षा की कामना करें। 12. शुक्रवार की रात सवा-सवा किलो काले चने अलग-अलग तीन बर्तनों में भिगो कर रख दें। शनिवार की सुबह नहाकर साफ वस्त्र पहनकर शनिदेव का पूजन करें और चनों को सरसौं के तेल में छौंककर इनका भोग शनिदेव को लगाएं और अपनी समस्याओं के निवारण के लिए प्रार्थना करें। इसके बाद पहला सवा किलो चना भैंसे को खिला दें। दूसरा सवा किलो चना कुष्ट रोगियों में बांट दें और तीसरा सवा किलो चना अपने ऊपर से ऊतारकर किसी सुनसान स्थान पर रख आएं। इस टोटके को करने से शनिदेव के प्रकोप में अवश्य कमी होगी।

मेष राशि पीपल के पेड़ के नीचे 11 उड़द की ढेरी पर 11 सरसों के तेल के दीपक रखें। वृष राशि मां भगवती के मंदिर में 11 घी के और 11 सरसों के तेल के दीपक जलाएं व श्रीचरणों में चुन्नी भेंट करें। मिथुन राशि मां भगवती के श्रीचरणों में 11 घी के और 11 सरसों के तेल के दीपक जलाएं। कर्क राशि पीपल के पेड़ के नीचे 11 सरसों के तेल के दीपक व 11 डली गुड़ रख दें। सिंह राशि भगवान शिव के मंदिर में 21 सरसों के तेल के दीपक जलाएं। कन्या राशि हनुमान जी श्रीचरणों में 11 सरसों के तेल के दीपक जलाएं। तुला राशि सूर्योदय से पूर्व बरगद के पेड़ के नीचे 24 सरसों के तेल के दीपक जलाएं। वृश्चिक राशि घर के मुख्य द्वार के बाहर 11 सरसों के तेल के दीपक जलाएं। धनु राशि भगवान शिव के मंदिर में 24 सरसों के तेल के दीपक जलाएं। मकर राशि पीपल के पेड़ में 11 दीपक जलाएं। कुंभ राशि अपनी छत के ऊपर 11 सरसों के तेल के दीपक जलाएं। मीन राशि हनुमान जी के मंदिर में सरसों के तेल के 24 दीपक जलाएं। ............ भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं- ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परन्तप।कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः॥(गीता १८/४१) 'ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्यों के तथा शूद्रों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न गुणों द्वारा विभक्त किए गए हैं। यह कर्मभूमि है, यहाँ किसी का भी कर्म व्यर्थ नहीं जाता। इस धरा-धाम में सभी को अपने कर्मों का फल स्वय ही भोगना पड़ता है , अच्छे कर्म इन्शान को अच्छा और बुरे कर्म इन्शान को बुरा बनती है .. कर्म के कारन ही कोई जीवात्मा राजा बन जाती है और कर्म के कारन ही कोई भिखारी बन जाता है ,

गोस्वामी तुलसीदासजी ने रामायण में लिखा है कि :-“कर्म प्रधान विस्व रचि राखा, जो जस करहिं तो तस फल चाखा”

अर्थात ईश्वर ने संसार को कर्म प्रधान बना रखा है, इसमें जो मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसको वैसा ही फल प्राप्त होता है । इस धरती पर जितने भी प्राणी हैं, वे सब अपने-अपने संचित कर्मों के कारण ही संसार में चक्कर लगाया करते हैं। अपने किए कर्मों के अनुसार वे भिन्न-भिन्न योनियों में जन्म लेते हैं। किए हुए कर्मों का फल भोगे बिना प्राणी का छुटकारा नहीं होता।अच्छा कर्म करेगा, अच्छा फल मिलेगा; बुरा कर्म करेगा बुरा फल मिलेगा । कर्म के फल से कोई भी बच नहीं सकता । हमारा सुख-दु:ख सभी हमारे अच्छे और बुरे कर्मों का नतीजा है । हमारा अगला जन्म कैसा और कहाँ होगा यह पिछ्ले जन्मों के कर्मों के आधार पर निर्धारित होता है । कर्मफल अवश्य ही भोगना पड़ता है :-प्रत्येक मनुष्य को अपने किए कर्म का फल अवश्य भुगतना पडता है। ईश्वर ने जीव को मनुष्य योनि में अच्छे कर्म करके आवागमन के चक्कर से छुटकारा पाने का प्रयास करने के लिए भेजा है। जीव को पशु पक्षी और अन्य योनियों में उसके द्वारा किए गए कर्मो का फल भुगतने के लिए भेजा जाता है। इसलिए इन्हें भोग योनि कहा जाता है। केवल मनुष्य योनि ही ऐसी है जिसमें जीव अपने पिछले कर्मो का फल भोगता है और अच्छे और बुरे कर्म कर अपने आगे के जीवन को सफल और असफल बना सकता है। वह अच्छे कर्म करके मोक्ष के मार्ग पर अपने कदम बढा सकता है अथवा बुरे कर्म करके अपने पतन का मार्ग अपना सकता है। इसीलिए संत समझाते हैं कि अगर इस जन्म में और अगले जन्मों में भी सुखी होना चाहते हो तो “मनसा- वाचा-कर्मणा “किसी का भी बुरा ना करो । यानि मन से, कर्म से और वचन से किसी का भी बुरा न सोचो और न करो ।नाभुक्तं क्षीयते कर्म कल्पकोटिशतैरपि। अवश्यमेव भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्।।(नारद पुराणः पूर्व भागः 31.69-70)

चाहे कोई देखे या न देखे फिर भी कोई है जो हर समय देख रहा है, जिसके पास हमारे पाप-पुण्य सभी देख रहा है, जिसके पास हमारे पाप-पुण्य सभी कर्मों का लेखा-जोखा है। इस दुनिया की सरकार से शायद कोई बच भी जाय पर उस सरकार से आज तक न कोई बचा है और न बच पायेगा। किसी प्रकार की सिफारिश अथवा रिश्वत वहाँ काम नहीं आयेगी। उससे बचने का कोई मार्ग नहीं है। कर्म करने में तो मानव स्वतंत्र है किंतु फल में भोगने में कदापि नहीं, इसले हमेशा अशुभ कर्मों का त्याग करके शुभ कर्म करने चाहिए।

जो कर्म स्वयं को और दूसरा को भी सुख-शांति दें तथा देर-सवेर भगवान तक पहुँचा दें, वे शुभ कर्म हैं और जो क्षण भर के लिए ही (अस्थायी) सुख दे तथा भविष्य में अपने को व दूसरों को भगवान से दूर कर दें, नरकों में पहुँचा दें उन्हें अशुभ कर्म कहते हैं।

किये हुए शुभ या अशुभ कर्म कई जन्मों तक मनुष्य का पीछा नहीं छोडते। पूर्वजन्मों के कर्मों के जैसे संस्कार होते हैं, वैसा फल भोगना पड़ता है। ............ रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग !! होहिँ कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिँ सुलच्छन लोग !! ग्रह , ओषधि , जल , वायु और वस्त्र .. ये सब भी कुसंग और सुसंग पाकर संसार मेँ बुरे और भले पदार्थ बन जाते हैँ ,चतुर एवं विचारशील पुरुष ही इस बात को जान पाते हैँ ! महाकवि श्री गोस्वामी तुलसीदास जी कहते है , इस संसार में संगति का अत्यंत प्रभाव है , हम जिस प्रकार की संगति करेंगे हमारी प्रकृति भी सदैव उसी प्रकार की होगी , भले ही कोई वस्तु कितनी भी महत्वपूर्ण एवं उपयोगी क्यों ना हो किन्तु यदि उसकी संगति या प्रभाव सम्यक रूपेण किसी अवांछनीय वस्तु के साथ हो जाता है तब उसका जीवनोपयोगी स्वभाब जीव हंता भी हो सकता है !!

संगति सुगति ना पावहि परे कुमति के धन्ध !!राखो मेल कपूर के हींग ना होय सुगंध !! ............. उपाय

जिस दिन किसी कार्य विशेष के लिए जाना हो उस दिन जल्दी उठकर स्नान आदि नित्य कामों से निपटकर सबसे पहले भगवान श्रीगणेश का पूजन करें। उन्हें धूप-दीप, फूल, दूर्वा आदि चढ़ाएं। गुड़-धनिए का प्रसाद अर्पित करें। इसके बाद गणेशजी के सामने बैठकर रुद्राक्ष या पन्ना की माला से ऊँ गं गणपतये नम: मंत्र का यथाशक्ति जप करें। जब घर से निकलने वाले हों तब श्रीगणेश को चढ़ाई दूर्वा में से थोड़ी दूर्वा अपनी जेब में रख लें।

इस उपाय से निश्चित रूप से आपका हर सोचा हुआ काम जल्दी और ठीक से हो जाएगा ............ लाल किताब के अनुसार क्या दान करें क्या ना करें :- अंकुर नागौरी सर्य के उच्च होने पर गुड़ या गेहूं का, मंगल के उच्च होने पर मीठी वस्तुओं का, बुध उच्च वाले व्यक्ति को कलम और घड़े का दान, बृहस्पति के उच्च होने पर पीली वस्त,ु चने की दाल, सोना और पुस्तक का, शुक्र के उच्च होने पर परफ्यूम व रेडीमेड कपड़ों का, शनि के उच्च होने पर अंडा, मांस, तेल व काले उड़द का दान नहीं करना चाहिए। यदि आपकी जन्म पत्रिका में चंद्र चतुर्थ भाव में है तो आपको कभी भी दूध, जल अथवा दवा का मूल्य नहीं लेना चाहिए। यदि आपकी पत्रिका में गुरु सातवें भाव में हो तो आपको कभी भी कपड़े का दान नहीं करना चाहिए अन्यथा स्वयं वस्त्रहीन हो जायेंगे। अर्थात आप पर इतना अधिक आर्थिक संकट आ जायेगा कि आपके स्वयं के पहनने के लिए कपड़े भी नहीं बचेंगे। गुरु यदि नवम भाव में बैठे हों तो मंदिर आदि में अर्थात किसी भी प्रकार के धार्मिक कार्य के लिए दान नहीं करना चाहिए। यदि आपकी जन्मपत्रिका में शनि, आठवें भाव में हो तो कभी भी भोजन, वस्त्र या जूते आदि का दान नहीं करना चाहिए। यदि दशम भाव में बृहस्पति एवं चतुर्थ में चंद्र हो तो मंदिर बनवाने पर व्यक्ति झूठे मामले में जेल भी जा सकता है। यदि सूर्य सातवें या आठवें घर में विद्यमान हो तो जातक को सुबह शाम दान नहीं करना चाहिए। उसके लिए विष पान समान साबित होगा। जातक का शुक्र नौवें खाने में हो और वह अनाथ बच्चे को गोद ले तो स्वयं अनाथ हो जाता है। यदि शनि प्रथम भाव में तथा बृहस्पति पंचम भाव में हो तो ऐसे व्यक्ति द्वारा तांबे का दान करने पर संतान नष्ट हो जाती है। अष्टम भावस्थ शनि होने पर मकान बनवाना मृत्यु का कारक होगा। जिन व्यक्तियों का दूसरा घर खाली हो तथा आठवें घर में शनि जैसा क्रूर ग्रह विद्यमान हो, उन्हें कभी मंदिर नहीं जाना चाहिए। बाहर से ही अपने इष्टदेव को नमस्कार करें। यदि 6, 8, 12 भाव में शत्रु ग्रह हों तथा भाव 2 खाली हों तो भी मंदिर न जायें। जन्मपत्री में केतु भाव सात में हो तो लोहे का दान नहीं करना चाहिए। जन्मपत्री के चौथे भाव में मंगल बैठा हो तो वस्त्र का दान नहीं करना चाहिए। राहु दूसरे भाव में हो तो तेल व चिकनाई वाली चीजों का दान नहीं करना चाहिए। सूर्य-चंद्रमा ग्यारहवें भाव में हो तो शराब व कबाब का सेवन न करें। नहीं तो आर्थिक स्थिति खराब हो जायेगी। सूर्य-बुध की युति ग्यारहवें भाव में हो तो अपने घर में कोई किरायेदार नहीं रखना चाहिए। बुध यदि चौथे भाव में हो तो घर में तोता नहीं पालना चाहिए। यदि पाले तो माता को कष्ट होता है। जन्मपत्रिका के भाव तीन में केतु हो तो जातक को दक्षिणमुखी घर में नहीं रहना चाहिए। चंद्र -केतु एक साथ किसी भी भाव में हो तो जातक को किसी के पेशाब के ऊपर पेशाब नहीं करना चाहिए। यदि जन्मपत्रिका के किसी भी भाव में बुध-शुक्र की युति हो तो गद्दे पर न सोयें। यदि भाव पांच में गुरु बैठा हो तो धन का दान नहीं करना चाहिए। एक बार भवन निर्माण शुरू हो जाये तो उसे बीच में ना रोकें। अन्यथा अधूरे मकान में राहु का वास हो जायेगा। चतुर्थी (4) नवमी (9) और चतुर्दशी (14) को नया कार्य आरंभ न करें क्योंकि ये रिक्ता तिथि होती हैं। इन तिथियों को कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होता। ............. "ॐ अमुक-नाम्ना ॐ नमो वायु-सूनवे झटिति आकर्षय-आकर्षय स्वाहा।"

विधि- केसर, कस्तुरी, गोरोचन, रक्त-चन्दन, श्वेत-चन्दन, अम्बर, कर्पूर और तुलसी की जड़ को घिस या पीसकर स्याही बनाए। उससे द्वादश-दल-कलम जैसा ‘यन्त्र’ लिखकर उसके मध्य में, जहाँ पराग रहता है, उक्त मन्त्र को लिखे। ‘अमुक’ के स्थान पर ‘साध्य’ का नाम लिखे। बारह दलों में क्रमशः निम्न मन्त्र लिखे-

१. हनुमते नमः, २. अञ्जनी-सूनवे नमः, ३. वायु-पुत्राय नमः, ४. महा-बलाय नमः, ५. श्रीरामेष्टाय नमः, ६. फाल्गुन-सखाय नमः, ७. पिङ्गाक्षाय नमः, ८. अमित-विक्रमाय नमः, ९. उदधि-क्रमणाय नमः, १०. सीता-शोक-विनाशकाय नमः, ११. लक्ष्मण-प्राण-दाय नमः और १२. दश-मुख-दर्प-हराय नमः।

यन्त्र की प्राण-प्रतिष्ठा करके षोडशोपचार पूजन करते हुए उक्त मन्त्र का ११००० जप करें। ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए लाल चन्दन या तुलसी की माला से जप करें। आकर्षण हेतु अति प्रभावकारी है। ........... होरा कार्याऽकार्य विवेचना

रवि की होरा - संगीत वाद्यादि शिक्षा, स्वास्थ्य, विचार औषधसेवन, मोअर यान, सवारी, नौकरी, पशु खरीदी, हवन मंत्र, उपदेश, शिक्षा, दीक्षा, अस्त्र, शस्त्र धातु की खरीद व बेचान, वाद-विवाद, न्याय विषयक सलाह कार्य, नवीन कार्य पद ग्रहण तथा राज्य प्रशासनिक कार्य, सेना संचालन आदि कार्य शुभ।

सोम की होरा - कृषि खेती यंत्र खरीदी, बीज बोना, बगीचा, फल, वृक्ष लगाना, वस्त तथा रत्न धारण, औषध क्रय-विक्रय, भ्रमण-यात्रा, कला-कार्य, नवीन कार्य, अलंकार धारण, पशुपालन, स्त्रीभूषण क्रय-विक्रय करने हेतु शुभ।

मंगल की होरा - भेद लेना, ऋण देना, गवाही, चोरी, सेना-संग्राम, युद्ध नीति-रीति, वाद-विवाद निर्णय, साहस कृत्य आदि कार्य शुभ, पर मंगल का ऋण लेना अशुभ है।

बुध की होरा -ऋण लेना अहितकर तथा शिक्षा-दीक्षा विष्ज्ञयक कार्य, विद्यारंभ, अध्ययन चातुर्य कार्य, सेवावृत्ति, बही-खाता, हिसाब विचार, शिल्प काय्र निर्माण कार्य, नोटिस देना, गृह -प्रवेश, राजनीति विचार, शालागमन शुभ है।

गुरू की होरा- ज्ञान-विज्ञान की शिक्षा, धर्म-न्याय विषयक कार्य, अनुष्ठान, साइंस, कानूनी व कला संकाय शिक्षा आरंभ, शांति पाठ, मांगलिक कार्य, नवीन पद ग्रहण, वस्त आभूषण धारण, यात्रा, अंक, अेक्टर, इंजन, मोटर, यान, औषध सेवन व निर्माण शुीा साथ ही शपथ ग्रहण शुभद।

शुक्र की होरा - गुप्त विचार गोष्ठी, प्रेम-व्यवहार, मित्रता, वस्त्र, मणिरत्न धारण तथा निर्माण, अंक, इत्र, नाटक, छाया-चित्र, संगीत आदि कार्य शुभ, भंडार भरना, खेती करना, हल प्रवाह, धन्यरोपण, आयु, ठान, शिक्षा शुभ।

शनि की होरा - गृह प्रवेश व निर्माण, नौकर चाकर रखना, धातुलोह, मशीनरी, कलपुर्जों के कार्य, गवाही, व्यापार विचार, वाद-विवाद, वाहन खरीदना, सेवा विषयक कार्य करना शुभ। परन्तु बीज बोना, कृषि खेती कार्य शुभ नहीं। ................ दत्तात्रेय भगवान् दत्तात्रेय भी श्रीविद्या के एक श्रेष्ठ उपासक थे । दुर्वासा के समान ये भी आ सूया गर्भ से समुद्भूत थे । प्रसिद्ध के अनुसार इन्होंने शिष्यों के हितसाधन के लिए श्रीविद्या के उपासनार्थ श्रीदत्त -संहिता नामक एक विशाल ग्रन्थ की रचना की थी । बाद में परशुराम ने उसका अध्ययन करके पचास खण्डों में एक सूत्र ग्रन्थ की रचना की थी । कहा जात है कि इनके बाद शिष्य सुमेधा ने दत्त -संहिता और ‘परशुराम कल्प सूत्र ’ का सारांश लेकर ‘त्रिपुर -रहस्य ’ की रचना की । प्रसिद्धि यह भी है कि दत्तात्रेय ‘महाविद्या महाकालिका ’ के भी उपासक थे । ............ श्री हनुमान जी के बारह नाम ... १.हनुमान २.अंजनी सुनू ३.महाबल ४.वायु पुत्रा ५.समेष्ट ६.फाल्गुन सख ७.पिंगाक्ष ८.आमित विक्रम ९.दघीक्रमण १०.सीता शोक विनासन ११.लक्ष्मण प्राण दाता १२.दस ग्रीव दर्पहा नाम की महिमा--- प्रातः काल सो कर उठते ही जिस भी अवस्था में हो इन बारह नामों को ११ बार लेने वाला व्यक्ति दीर्घायु होता है|नित्य नियम के समय नाम लेने से ईष्ट की प्राप्ति होती है|दोपहर में नाम लेने वाला व्यक्ति लक्ष्मीवान होटा है|संध्या के समय नाम लेने वाला व्यक्ति पारिवारिक सुखों से तृप्त होता है|रात्रि को सोते समय नाम लेने वाले व्यक्ति की शत्रु पर जीत होती है|उपरोक्त समय के अतिरिक्त इस बारह नामों का निरंतर जप करने वाले व्यक्ति की श्री हनुमान जी महाराज दसों दिशाओं से एवं आकाश-पाताल से रक्षा करते हैं|यात्रा के समय एवं न्यायालय में पड़े विवाद के लिए यह बारह नाम अपना चमत्कार दिखायेंगे|लाल स्याही से मंगलवार को भोजपत्र पर ये बारह नाम लिखकर मंगलवार के ही दिन ताबीज बाँधने से कभी सिर दर्द नहीं होगा|गले या बाजू में तांबे का ताबीज ज्यादा उत्तम है|भोजपत्र पर लिखने के काम आने वाला पैन या साइन पैन नया होना चाहिए| ............ अप्सराये अत्यंत सुंदर और जवान होती हैं. उनको सुंदरता और शक्ति विरासत में मिली है. वह गुलाब का इत्र और चमेली आदि की गंध पसंद करती हैं। तुमको उसके शरीर से बहुत प्रकार की खुशबू आती महसूस कर सकते हैं. यह गन्ध किसी भी पुरुष को आकर्षित कर सकती हैं। वह चुस्त कपड़े पहनना के साथ साथ अधिक गहने पहना पसंद करती है. इनके खुले-लंबे बाल होते है। वह हमेशा एक 16-17 साल की लड़की की तरह दिखती है। दरअसल, वह बहुत ही सीधी होती है। वह हमेशा उसके साधक को समर्पित रहती है। वह साधक को कभी धोखा नहीं देती हैं। इस साधना के दौरान अनुभव हो सकता है, कि वह साधना पूरी होने से पहले दिखाई दे। अगर ऐसा होता है, तो अनदेखा कर दें। आपको अपने मंत्र जाप पूरा करना चाहिए जैसा कि आप इसे नियमित रूप से करते थे। कोई जल्दबाजी ना करे जितने दिन की साधना बताई हैं उतने दिन पुरी करनी चाहिए। काम भाव पर नियंत्रण रखे। वासना का साधना मे कोई स्थान नहीं होता हैं। अप्सरा परीक्षण भी ले सकती हैं। जब सुंदर अप्सरा आती है तो साधक सोचता है, कि मेरी साधना पूर्ण हो गया है। लेकिन जब तक वो विवश ना हो जाये तब तक साधना जारी रखनी चाहिए। केई साधक इस मोड़ पर, अप्सरा के साथ यौन कल्पना लग जाते है। यौन भावनाओं से बचें, यह साधना ख़राब करती हैं। जब संकल्प के अनुसार मंत्र जाप समाप्त हो और वो आपसे अनुरोध करें तो आप उसे गुलाब के फूल और कुछ इत्र दे। उसे दूध का बनी मिठाई पान आदि भेंट दे। उससे वचन ले ले की वह जीवन-भर आपके वश में रहेगी। वो कभी आपको छोड़ कर नहीं जाएगी और आपक कहा मानेगी। जब तक कोई वचन न दे तब तक उस पर विश्वास नही किया जा सकता क्योंकि वचन देने से पहले तक वो स्वयं ही चाहती हैं कि साधक की साधना भंग हो जाये। किसी भी साधना मैं सबसे महत्वपुर्ण भाग उसके नियम हैं. सामान्यता सभी साधना में एक जैसे नियम होते हैं. परतुं मैं यहाँ पर विशेष तौर पर यक्षिणी और अप्सरा साधना में प्रयोग होने वाले नियम का उल्लेख कर रहा हूँ । अप्सरा या यक्षिणी साधना में ऊपर जो अण्डरलाइन और हरे रंग से लिखे गये नियम ही प्रयोग में आने वाले नियम हैं । 1. ब्रह्मचये : सभी साधना मैं ब्रह्मचरी रहना परम जरुरी होता हैं. सेक्स के बारे में सोचना, करना, किसी स्त्री के बारे में विचारना, सम्भोग, मन की अपवित्रा, गन्दे चित्र देखना आदि सब मना हैं, अगर कुछ विचारना हैं तो केवल अपने ईष्ट को, आप सदैव यह सोचे कि वो सुन्दर सी अलंकार युक्त अप्सरा या देवी आपके पास ही मौजुद हैं और आपको देख रही हैं. और उसके शरीर में से ग़ुलाब जैसी या अष्टगन्ध की खुशबू आ रही हैं । साकार रुप मैं उसकी कल्पना करते रहो . 2. भूमि शयन : केवल जमीन पर ही अपने सभी काम करें. जमीन पर एक वस्त्र बिछा सकते हैं और बिछना भी चाहिए 3. भोजन : मांस, शराब, अन्डा, नशे, तम्बाकू, लहसुन, प्याज आदि सभी का प्रयोग मना हैं. केवल सात्विक भोजन ही करें. 4. वस्त्र : वस्त्रो में उन्ही रंग का चुनाव करें जो देवता पसन्द करता हो. ( आसन, पहनने और देवता को देने के लिये) (सफेद या पीला अप्सरा के लिये ) 5. क्या करना हैं :- नित्य स्नान, नित्य गुरु सेवा , मौन, नित्य दान, जप में ध्यान- विश्वास , रोज पुजा करना आदि अनिवार्य हैं. और जप से कम से कम दो- तीन घंटे पहले भोजन करना चाहिए 6. क्या ना करें :- जप का समय ना बद्ले, क्रोध मत करो , अपना आसन किसी को प्रयोग मत करने दो, खाना खाते समय और सोकर जागते समय जप ना करें. बासी खाना ना खाये, चमडे का प्रयोग ना करना, साधना के अनुभव साधना के दोरान किसी को मत बताना (गुरु को छोडकर) 7. मंत्र जप के समय कृपा करके नींद्, आलस्य, उबासी, छींक, थूकना, डरना, लिंग को हाथ लगाना , बक्वास, सेल फोन को पास रखना, जप को पहले दिन निधारित संख्या से कम-ज्यादा जपना , गा-गा कर जपना, धीमे- धीमे जपना, बहुत् तेज-तेज जपना, सिर हिलाते रहना, स्वयं हिलते रहना, मंत्र को भुल जाना ( पहले से याद नहीं किया तो भुल जाना ), हाथ-पैंर फैलाकर जप करना, पिछ्ले दिन के गन्दे वस्त्र पहनकर मंत्र जप करना, यह सब कार्य मना हैं (हर मंत्र की एक मुल ध्वनि होती हैं अगर मुल ध्वनि- लय में मंत्र जपा तो मज़ा ही जायेगा, मंत्र सिद्धि बहुत जल्द प्राप्त हो सकती हैं जो केवल गुरु से सिखी जा सकती हैं ) 8. यादि आपको सिद्धि करनी हैं तो श्री शिव शंकर भगवान के कथन को कभी ना भुलना कि " जिस साधक की जिव्हा परान्न (दुसरे का भोजन) से जल गयी हो, जिसका मन में परस्त्री (अपनी पत्नि के अलावा कोई भी) हो और जिसे किसी से प्रतिशोध लेना हो उसे भला केसै सिद्धि प्राप्त हो सकती हैं " 9. और एक सबसे महत्वपुर्ण कि आप जिस अप्सरा की साधना उसके बारे में यह ना सोचे कि वो आयेगी और आपसे सेक्स करेंगी क्योंकि वासना का किसी भी साधना में कोई स्थान नहीं हैं । बाद कि बातें बाद पर छोड दे । क्योंकि सेक्स में उर्जा नीचे (मुलाधार) की ओर चलती हैं जबकि साधना में उर्जा ऊपर (सहस्त्रार) की ओर चलती हैं 10. किसी भी स्त्री वर्ग से केवल माँ, बहन, प्रेमिका और पत्नी का सम्बन्ध हो सकता हैं । यही सम्बन्ध साधक का अप्सरा या देवी से होता हैं । 11.यह सब वाक सिद्ध होती हैं । किसी के नसिब में अगर कोई चीज़ ना हो तब भी देने का समर्थ रखती हैं । इनसे सदैव आदर से बात करनी चाहिए। ............ जीवन से हर समस्या का समाधान शास्त्रों में बताया गया है। एक उपाय तो ये है कि हम अपनी मेहनत से और स्वयं की समझदारी इन समस्याओं को दूर करने का प्रयास करें और दूसरा उपाय है धार्मिक कार्य करें। हमें प्राप्त होने वाले सुख-दुख हमारे कर्मों का प्रतिफल ही है। पुण्य कर्म किए जाए तो दुख का समय जल्दी निकल जाता है। शास्त्रों के अनुसार गाय, पक्षी, कुत्ता, चींटियां और मछली से हमारे जीवन की सभी समस्याएं दूर हो सकती हैं। 1.यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से गाय को रोटी खिलाएं तो उसके ज्योतिषीय ग्रह दोष नष्ट हो जाते हैं। गाय को पूज्य और पवित्र माना जाता है, इसी वजह से इसकी सेवा करने वाले व्यक्ति को सभी सुख प्राप्त हो जाते हैं। 2. इसी प्रकार पक्षियों को दाना डालने पर आर्थिक मामलों में लाभ प्राप्त होता है। व्यवसाय करने वाले लोगों को विशेष रूप से प्रतिदिन पक्षियों को दाना अवश्य डालना चाहिए। 3. यदि कोई व्यक्ति दुश्मनों से परेशान हैं और उनका भय हमेशा ही सताता रहता है तो कुत्ते को रोटी खिलाना चाहिए। नियमित रूप से जो कुत्ते को रोटी खिलाते हैं उन्हें दुश्मनों का भय नहीं सताता है। 4.कर्ज से परेशान से लोग चींटियों को शक्कर और आटे डालें। ऐसा करने पर कर्ज की समाप्ति जल्दी हो जाती है। 5. जिन लोगों की पुरानी संपत्ति उनके हाथ से निकल गई है या कई मूल्यवान वस्तु खो गई है तो ऐसे लोग यदि प्रतिदिन मछली को आटे की गोलियां खिलाते हैं तो उन्हें लाभ प्राप्त होता है। मछलियों को आटे की गोलियां देने पर पुरानी संपत्ति पुन: प्राप्त होने के योग बनते हैं। इन पांचों को जो भी व्यक्ति खाना खिलाते हैं उनके सभी दुख-दर्द दूर हो जाते हैं और अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है। .............. अनुभुत ज्वरहर बलिदानव्रत - चिरकालीन ज्वरकी शान्तिके लिये मेने ये व्रत और उपाय किया और पुर्णतः लाभ हुआ ।लगातार बुखार फिर ठीक फिर बुखार ,समझ ना पङते देख ये व्रत और ऊपाय करे ,दवाई भी लेते रहे । क्रष्ण अष्टमीके अपराह्णमें चावलोंके चूर्णसे मनुष्यकीआकृतिका पुतला बनाकर उसके हलदीका लेप करे । मुख, हदय, कण्ठ और नाभिमें पीली कौड़ी लगावे, फिर खसके आसनपर विराजमान करके उसके चारों कोणोंमें पीले रंगकी चार पताका लगावे तथा उनके पास हलदीके रससे भरे हुए पीपलकेपत्तोंके पत्तोके चार दोने रखे और ' मम चिरकालीनज्वरजनि तपापतापादिशप्रशमनार्थं ज्वरहबलिदानं करिष्ये । ' यह संकल्प करके पुतलेका पूजन करे । सायंकाल होनेपर ज्वरवाले मनुष्यकी ' ॐ नमो भगवते गरुडासनाय त्र्यम्बकाय स्वस्तिरस्तु स्वस्तिरस्तु स्वाहा । ॐ कं ठं यं सं वैनतेयाय नमः । ॐ ह्लीं क्षः क्षेत्रपालाय नमः । ॐ ठः ठः भो भो ज्वर श्रृणु श्रृणु हल हल गर्ज गर्ज नैमित्तिकं मौहूर्त्तिकं एकाहिकं द्वयाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं पाक्षिकादिकं चफट् हल हल मुञ्च मुञ्च भूम्यां गच्छ गच्छ स्वाहा ।' इस मन्त्नसे तीन या सात आरती उतारकर पूर्वोक्त पुतलेको पूजा - सामग्रीसहित किसी वृक्षके मूल, चौराहे या श्मशानमें रख आवे । इस प्रकार तीन दिन करे और तीनों ही दिनोंमें नक्तव्रत ( रात्रिमें एक बार भोजन ) करे । स्मरण रहे कि पुत्तलपूजन बीमारके दक्षिण भागके स्थानमें करना चाहिये । इससे ज्वरजातव्याधियाँ शीघ्र ही शान्त होती हैं ............... काल भैरव का नाम सुनते ही एक अजीब-सी भय मिश्रित अनुभूति होती है। एक हाथ में ब्रह्माजी का कटा हुआ सिर और अन्य तीनों हाथों में खप्पर, त्रिशूल और डमरू लिए भगवान शिव के इस रुद्र रूप से लोगों को डर भी लगता है, लेकिन ये बड़े ही दयालु-कृपालु और जन का कल्याण करने वाले हैं।

भैरव शब्द का अर्थ ही होता है भरण-पोषण करने वाला, जो भरण शब्द से बना है। काल भैरव की चर्चा रुद्रयामल तंत्र और जैन आगमों में भी विस्तारपूर्वक की गई है। शास्त्रों के अनुसार कलियुग में काल भैरव की उपासना शीघ्र फल देने वाली होती है। उनके दर्शन मात्र से शनि और राहु जैसे क्रूर ग्रहों का भी कुप्रभाव समाप्त हो जाता है। काल भैरव की सात्त्विक, राजसिक और तामसी तीनों विधियों में उपासना की जाती है।

इनकी पूजा में उड़द और उड़द से बनी वस्तुएं जैसे इमरती, दही बड़े आदि शामिल होते हैं। चमेली के फूल इन्हें विशेष प्रिय हैं। पहले भैरव को बकरे की बलि देने की प्रथा थी, जिस कारण मांस चढ़ाने की प्रथा चली आ रही थी, लेकिन अब परिवर्तन आ चुका है। अब बलि की प्रथा बंद हो गई है।

शराब इस लिए चढ़ाई जाती है क्योंकि मान्यता है कि भैरव को शराब चढ़ाकर बड़ी आसानी से मन मांगी मुराद हासिल की जा सकती है। कुछ लोग मानते हैं कि शराब ग्रहण कर भैरव अपने उपासक पर कुछ उसी अंदाज में मेहरबान हो जाते हैं जिस तरह आम आदमी को शराब पिलाकर अपेक्षाकृत अधिक लाभ उठाया जा सकता है। यह छोटी सोच है।

आजकल धन की चाह में स्वर्णाकर्षण भैरव की भी साधना की जा रही है। स्वर्णाकर्षण भैरव काल भैरव का सात्त्विक रूप हैं, जिनकी पूजा धन प्राप्ति के लिए की जाती है। यह हमेशा पाताल में रहते हैं, जैसे सोना धरती के गर्भ में होता है। इनका प्रसाद दूध और मेवा है। यहां मदिरा-मांस सख्त वर्जित है। भैरव रात्रि के देवता माने जाते हैं। इस कारण इनकी साधना का समय मध्य रात्रि यानी रात के 12 से 3 बजे के बीच का है। इनकी उपस्थिति का अनुभव गंध के माध्यम से होता है। शायद यही वजह है कि कुत्ता इनकी सवारी है। कुत्ते की गंध लेने की क्षमता जगजाहिर है।

देवी महाकाली, काल भैरव और शनि देव ऐसे देवता हैं जिनकी उपासना के लिए बहुत कड़े परिश्रम, त्याग और ध्यान की आवश्यकता होती है। तीनों ही देव बहुत कड़क, क्रोधी और कड़ा दंड देने वाले माने जाते है। धर्म की रक्षा के लिए देवगणों की अपनी-अपनी विशेषताएं है। किसी भी अपराधी अथवा पापी को दंड देने के लिए कुछ कड़े नियमों का पालन जरूरी होता ही है। लेकिन ये तीनों देवगण अपने उपासकों, साधकों की मनाकामनाएं भी पूरी करते हैं। कार्यसिद्धि और कर्मसिद्धि का आशीर्वाद अपने साधकों को सदा देते रहते हैं।

भगवान भैरव की उपासना बहुत जल्दी फल देती है। इस कारण आजकल उनकी उपासना काफी लोकप्रिय हो रही है। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि भैरव की उपासना क्रूर ग्रहों के प्रभाव को समाप्त करती है। शनि की पूजा बढ़ी है। अगर आप शनि या राहु के प्रभाव में हैं तो शनि मंदिरों में शनि की पूजा में हिदायत दी जाती है कि शनिवार और रविवार को काल भैरव के मंदिर में जाकर उनका दर्शन करें। मान्यता है कि 40 दिनों तक लगातार काल भैरव का दर्शन करने से मनोकामना पूरी होती है। इसे चालीसा कहते हैं। चन्द्रमास के 28 दिनों और 12 राशियां जोड़कर ये 40 बने हैं।

पूजा में शराब, मांस ठीक नहीं हमारे यहां तीन तरह से भैरव की उपासना की प्रथा रही है। राजसिक, सात्त्विक और तामसिक। हमारे देश में वामपंथी तामसिक उपासना का प्रचलन हुआ, तब मांस और शराब का प्रयोग कुछ उपासक करने लगे। ऐसे उपासक विशेष रूप से श्मशान घाट में जाकर मांस और शराब से भैरव को खुश कर लाभ उठाने लगे।

लेकिन भैरव बाबा की उपासना में शराब, मांस की भेंट जैसा कोई विधान नहीं है। शराब, मांस आदि का प्रयोग राक्षस या असुर किया करते थे। किसी देवी-देवता के नाम के साथ ऐसी चीजों को जोड़ना उचित नहीं है। कुछ लोगों के कारण ही आम आदमी के मन में यह भावना जाग उठी कि काल भैरव बड़े क्रूर, मांसाहारी और शराब पीने वाले देवता हैं। किसी भी देवता के साथ ऐसी बातें जोड़ना पाप ही कहलाएगा।

गृहस्थ के लिए इन दोनों चीजों का पूजा में प्रयोग वर्जित है। गृहस्थों के लिए काल भैरवाष्टक स्तोत्र का नियमित पाठ सर्वोत्तम है, जो अनेक बाधाओं से मुक्ति दिलाता है। काल भैरव तंत्र के अधिष्ठाता माने जाते हैं। ऐसी मान्यता है कि तंत्र उनके मुख से प्रकट होकर उनके चरणों में समा जाता है। लेकिन, भैरव की तांत्रिक साधना गुरुगम्य है। योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही यह साधना की जानी चाहिए।

काल भैरव की उत्पत्ति और काशी से संबंध

कथा-एक पहली कथा है कि ब्रह्मा जी ने पूरी सृष्टि की रचना की। ऐसा मानते हैं कि उस समय प्राणी की मृत्यु नहीं होती थी। पृथ्वी के ऊपर लगातार भार बढ़ने लगा। पृथ्वी परेशान होकर ब्रह्मा के पास गई। पृथ्वी ने ब्रह्मा जी से कहा कि मैं इतना भार सहन नहीं कर सकती। तब ब्रह्मा जी ने मृत्यु को लाल ध्वज लिए स्त्री के रूप में उत्पन्न किया और उसे आदेश दिया कि प्राणियों को मारने का दायित्त्व ले। मृत्यु ने ऐसा करने से मना कर दिया और कहा कि मैं ये पाप नहीं कर सकती। ब्रह्माजी ने कहा कि तुम केवल इनके शरीर को समाप्त करोगी लेकिन जीव तो बार-बार जन्म लेते रहेंगे। इस पर मृत्यु ने ब्रह्माजी की बात स्वीकार कर ली और तब से प्राणियों की मृत्यु शुरू हो गई।

समय के साथ मानव समाज में पाप बढ़ता गया। तब शंकर भगवान ने ब्रह्मा जी से पूछा कि इस पाप को समाप्त करने का आपके पास क्या उपाय है। ब्रह्माजी ने इस विषय में अपनी असमर्थता जताई। शंकर भगवान शीघ्र कोपी हैं। उन्हें क्रोध आ गया और उनके क्रोध से काल भैरव की उत्पत्ति हुई। काल भैरव ने ब्रह्माजी के उस मस्तक को अपने नाखून से काट दिया जिससे उन्होंने असमर्थता जताई थी। इससे काल भैरव को ब्रह्म हत्या लग गयी।

काल भैरव तीनों लोकों में भ्रमण करते रहे लेकिन ब्रह्म हत्या से वे मुक्त नहीं हो पाए। ऐसी मान्यता है कि जब काल भैरव काशी पहुंचे, तब ब्रह्म हत्या ने उनका पीछा छोड़ा। उसी समय आकाशवाणी हुई कि तुम यहीं निवास करो और काशीवासियों के पाप-पुण्य के निर्णय का दायित्त्व संभालो। तब से भगवान काल भैरव काशी में स्थापित हो गए।

कथा-दो दूसरी कथा यह भी है कि एक बार देवताओं की सभा हुई थी। उसमें ब्रह्मा जी के मुख से शंकर भगवान के प्रति कुछ अपमानजनक शब्द निकल गए। तब शंकर भगवान ने क्रोध में हुंकार भरी और उस हुंकार से काल भैरव प्रकट हुए और ब्रह्मा जी के उस सिर को काट दिया जिससे ब्रह्मा जी ने शंकर भगवान की निंदा की थी। काल भैरव को ब्रह्म हत्या दोष लगने और काशी में वास करने तक की आगे की कथा पहली कथा जैसी ही है।

यह भी मान्यता है कि धर्म की मर्यादा बनाएं रखने के लिए भगवान शिव ने अपने ही अवतार काल भैरव को आदेश दिया था कि हे भैरव, तुमने ब्रह्माजी के पांचवें सिर को काटकर ब्रह्म हत्या का जो पाप किया है, उसके प्रायश्चित के लिए तुम्हें पृथ्वी पर जाकर माया जाल में फंसना होगा और विश्व भ्रमण करना होगा। जब ब्रह्मा जी का कटा हुआ सिर तुम्हारे हाथ से गिर जाएगा, उसी समय तुम ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त हो जाओगे और उसी स्थान पर स्थापित हो जाओगे। काल भैरव की यह यात्रा काशी में समाप्त हुई थी। .............. दारिद्र्य नाशक धूमावती साधना जीवन में कई बार ऐसे पल आ जाते है की हम निराश हो जाते है,अपनी गरीबी से अपनी तकलीफों से,और इस बात को नहीं नाकारा जा सकता की हर इन्सान को धन की आवश्यकता होती है जीवन के ९९ % काम धन के आभाव में अधूरे है यहाँ तक की साधना करने के लिए भी धन लगता है,तो क्यों और कब तक बैठे रहोगे इस गरीबी का रोना लेकर क्यों ना इसे उठा कर फेक दिया जाये जीवन से.मेरे सभी प्यारे भाइयो और बहनों के लिए एक विशेष साधना दे रहा हु जिससे उनके आर्थिक कष्ट माँ की कृपा से समाप्त हो जायेंगे.ये मेरी अनुभूत साधना है आप संपन्न करे और माँ की कृपा के पात्र बने. साधना सामग्री. एक सूपड़ा,स्फटिक या तुलसी माला. विधि: यह साधना धूमावती जयंती से आरम्भ करे,समय रात्रि १० बजे का होगा,आप सफ़ेद वस्त्र धारण कर सफ़ेद आसन पर पूर्व मुख कर बैठ जाये.सामने बजोट पर सूपड़ा रख कर उसमे सफ़ेद वस्त्र बिछा दे फिर उसमे धूमावती यन्त्र स्थापित करे,इसके बाद गाय के कंडे से बनी भस्म यन्त्र पर अर्पण करे घी का दीपक जलाये,पेठे का भोग अर्पण करे,माँ से प्रार्थना करे की में यह साधना अपनी दरिद्रता से मुक्ति के लिए कर रहा हु आप मेरी साधना को सफलता प्रदान करे तथा मेरे सभी कष्टों को दूर कर दे.इसके बाद निम्न मंत्र की एक माला करे ॐ धूम्र शिवाय नमः इसके बाद धूं धूं धूमावती ठह ठह की २१ माला करे.फिर पुनः एक माला पहले वाले मंत्र की करे.जप के बाद दिल से माँ से प्रार्थना करे और इस साधना को २१ दिन तक करे.साधना पूरी होने के बाद सुपडे को यन्त्र सहित उठाकर माँ से प्रार्थना करे की माँ आप हमारी सभी पापो को क्षमा करे और आज आप हमारे जीवन के सारे दुःख सारी दरिद्रता को आपके इस पवित्र सुपडे में भर के ले जाये है माँ हमारे जीवन में कभी दरिद्रता ना लोटे ऐसी दया करे.इसके बाद.सुपडे और यन्त्र को जल में प्रवाहित कर दे या किसी निर्जन स्थान में रख दे.निश्चित माँ की आप पर कृपा बरसेगी और जीवन की दरिद्रता कोसो दूर चली जाएगी.साधना के पहले गुरुदेव पूजन तथा गणपति पूजन करे ये हर बार बताना आवश्यक नहीं है.जय धूमावती. ............. श्री गुरु स्तवन

गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः | गुरुर्साक्षात परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः ||

ध्यानमूलं गुरुर्मूर्ति पूजामूलं गुरोः पदम् | मंत्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ||

अखंडमंडलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् | तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्री गुरवे नमः ||

ब्रह्मानंदं परम सुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिं | द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्षयम् ||

एकं नित्यंविमलं अचलं सर्वधीसाक्षीभूतम् | भावातीतं त्रिगुणरहितं सदगुरुं तं नमामि ||

त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव | त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देव देव || ................ गुरुदेव प्रदत ऋण मुक्ति मैं जहां एक बहुत ही सरल अनुभूत साधना प्रयोग दे रहा हु आप निहचिंत हो कर करे बहुत जल्द आप इस अभिशाप से मुक्ति पा लेंगे ! विधि – शुभ दिन जिस दिन रविपुष्य योग हो जा रवि वार हस्त नक्षत्र हो शूकल पक्ष हो तो इस साधना को शुरू करे वस्त्र --- लाल रंग की धोतीपहन सकते है ! माला – काले हकीक की ले ! दिशा –दक्षिण ! सामग्री – भैरव यन्त्र जा चित्र और हकीक माला काले रंग की ! मंत्र संख्या – 12 माला 21 दिन करना है ! पहले गुरु पूजन कर आज्ञा लेऔर फिर श्री गणेश जी का पंचौपचार पूजन करे तद पहश्चांत संकल्प ले ! के मैं गुरु स्वामी निखिलेश्वरा नन्द जी का शिष्य अपने जीवन में स्मस्थ ऋण मुक्ति के लिए यहसाधना कर रहा हु हे भैरव देव मुझे ऋण मुक्ति दे!जमीन पे थोरा रेत विशा के उस उपर कुक्म से तिकोण बनाएउस में एक पलेट में स्वास्तिक लिख कर उस पे लालरंग का फूल रखे उस पे भैरव यन्त्र की स्थापना करे उस यन्त्र का जा चित्र का पंचौपचार से पूजन करे तेल का दिया लगाए और भोग के लिए गुड रखे जा लड्डू भी रख सकते है ! मन को स्थिर रखते हुये मन ही मन ऋण मुक्ति के लिए पार्थना करे और जप शुरूकरे 12 माला जप रोज करे इस प्रकार 21 दिन करे साधना केबाद स्मगरी माला यन्त्र और जो पूजन किया है वोह समान जल प्रवाह कर दे साधना के दोरान रवि वार जा मंगल वार को छोटे बच्चो को मीठा भोजनआदि जरूर कराये ! शीघ्र ही कर्ज से मुक्ति मिलेगी और कारोबार में प्रगति भी होगी ! जय गुरुदेव !! मंत्र—ॐ ऐं क्लीम ह्रीं भमभैरवाये मम ऋणविमोचनाये महां महा धन प्रदाय क्लीम स्वाहा !! ........... निवारक इस्लामिक अमल आज आपको एक इस्लामिक अमल बताने जा रहा हु .जिसके जरिये आप अपने शत्रु पर विजय पा सकते है.मात्र उंगली उठाकर यदि आप इन पाक आयत को पड़ देंगे तो शत्रु अपनी शत्रुता भूल जायेगा.इसे सिद्ध करने की अवधि ४० दिन है.इसके बाद जब शत्रु आपको तंग करे अपनी तर्जनी उंगली उसकी तरफ करे या उसके घर की दिशा की और करे और इसे ७ बार पड़ दे आखरी में उसका नाम लेकर कह दे की इसकी शत्रुता ख़शत्रु तम हुई.शत्रु शांत हो जायेगा.ये अमल इतना बाकमाल है की यदि मात्र अमल पड़कर उंगली हिला दी जाये तो शत्रु का सर उड़ जाये,पर उसकी विधि अलग है जो हर किसी को बताना उचित नहीं है.वो योग्य तथा सोम्य लोगो को ही सिखाई जा सकती है.अतः केवल शत्रु को शांत करने की विधि बता रहा हु.ये अमल आप किसी भी शुक्रवार से शुरू करे जब सूरज उगना शुरू हो तब उसकी तरफ मुह करके खड़े हो जाये और इस अमल को पड़ना शुरू करे .अमल पड़ते जाये और अपनी तर्जनी उंगली पर फूकते जाये.ऐसा १००० बार करे ४० दिन तक.ये अमल मुकम्मल हो जायेगा.और प्रयोग कैसे करना है पहले ही बताया जा चूका है. इन्ना अयतैना कल कौसर फ सल्ली ली रब्बीक वन्हर इन्ना शानी अक हुवल अब्तर ............ प्रचंड पीताम्बरा रुद्राक्ष १.जिसके धारण कर लेने मात्र से गृह अपनी चल बदल देते है और अनुकूल हो जाते है,न चाहते हुए भी उन्हें हमारे हिसाब से चलना पड़ता है,भगवती पीताम्बर का ऐसा वज्र पड़ता है ग्रहों पर की वे मजबूर हो जाते है आपको सुख देने के लिये. २. जिसके धारण करने से शत्रु शत्रुता भूलकर शरण में आ जाते है,और उनका स्तम्भन हो जाता है.सारी तंत्र बाधा अपने आप समाप्त हो जाती है,तथा साधक के जीवन में सुख का आगमन होने लगता है.जिस घर में स्थापित होगा वहा कोई तंत्र बाधा असर नहीं करेगी.साधक एक तरह से हर क्षेत्र में सफलता पता है तथा जिस साधना के वक़्त इसे धारण करेगा वो साधना अवश्य सफल होगी ३.इसके धारण करने वाले की ग्रहस्ती में सुख का आगमन होता है,पारिवारिक समबन्ध मधुर हो जाते है. और सबसे बड़ी बात साधना के वक़्त जिसके शारीर पर ये रुद्राक्ष होगा कोई शक्ति साधक का कुछ नहीं बिगड़ पायेगी,ये रुद्राक्ष यम वरुण अग्नि जल इन्द्र आदि के पसीने छुडवा दे तो और किसी की बात ही क्या करे.साधक के लिये ये एक कवच है.शमशान में धारण करके चले गए तो सारी दुष्ट शक्तिया साधक से दस हाथ दूर रहती है,और क्या कहू इस रुद्राक्ष के बारे में आप स्वयं करे और इसका चमत्कार देखे. जल्द ही इस रुद्राक्ष को कैसे तैयार किया जाये कैसे सिद्ध किया जाये इसकी विधि आप सब के बिच लेकर आऊंगा.पर इस रुद्राक्ष को वही साधक सिद्ध कर सकता है जिसने अपने जीवन में कभी गुरु मंत्र अथवा ॐ नमः शिवाय का एक लाख जप किया हो.अतः ये साधना उन लोगो को ही दी जाएगी यदि आप मुजह्से असत्य बोलकर ये साधना लेते है और इसे करते है तो इसके जवाबदार वे लोग होंगे जिन्होंने असत्य बोलकर साधना ली है,क्युकी इस साधना की पहली और आखरी शर्त ही यही है की जिसने गुरु मंत्र अथवा ॐ नमः शिवाय के जप एक लाख किये हो वो ही इसे करे अन्यथा ये इस साधना से हानि हो सकती है नहीं,बल्कि हो ही जाएगी ये अटल सत्य है.अतः ये साधना टाइप होने के बाद में सभी को सूचित कर दूंगा आप अपने इमेल देकर प्राप्त कर लेना अगर अपने इस शर्त को पूरा कर लिया हो तो.माँ मेरे सभी साधक भाइयो का कल्याण करे.जय माँ ............ भूत- प्रेत साधना


तंत्र में भूत - प्रेत का अस्तित्व स्वीकार किया गया है | यह माना गया है की मृत्यु के उपरांत मनुष्य को कई बार प्रेत योनी में जाना पड़ता है पर पुनर्जन्म की अनेक घटनाए इस सम्बन्ध में सोचने के लिए विवश कर देती है | मृत्यु के बाद की दुनिया का कही कुछ न कुछ अस्तित्व है | इस बात को स्वीकार करना पड़ता है | प्रेत योनी में जाकर मनुष्य कई बार उत्पाती हो जाता है | वह अनेक प्रकार के आतंक बिखरा देता है | इस प्रकार का उपद्रव शान्त करने का विधान तंत्र शास्त्र में है | हमारे योग्य तांत्रिक उनका समय -समय पर प्रयोग करते है | प्रेतों की उपद्रवी सकती पर नियंत्रण करने के लिए निम्नलिखित तंत्र है-

' ॐ ह्रंच ह्रंच ह्रंच फट स्वाहा | '

ये बहुत ही सरल साधना है | किसी एकांत स्थान में शिव जी की मूर्ति की स्थापना कर प्रत्येक अर्धरात्रि में २५ बार पाठ आवश्यक है | इस प्रकार नियमित रूप से बिना नागा के २५०० हजार मंत्र का पाठ १०० दिन तक लगातार करना आवश्यक है | जप की माला रूद्राक्ष की होनी चाहिए | दिशा पूर्व या उत्तर की होनी चाहिए | २५०००० हजार मंत्र का पाठ हो जाये तो साधक शिव जी की आकृति की पूजा कर आ जाये | इस प्रकार की साधना करने के बाद साधक भूत-प्रेत ग्रस्त किसी भी व्यक्ति को या स्थान को मुक्त कर सकता है | साधक के आदेश का पालन भूत-प्रेत करते है और साधक भूत-प्रेत को देख सकता है और उनसे बात भी कर सकता है | ...... .......... सुख-समृद्धि के टोटका 1॰ यदि परिश्रम के पश्चात् भी कारोबार ठप्प हो, या धन आकर खर्च हो जाता हो तो यह टोटका काम में लें। किसी गुरू पुष्य योग और शुभ चन्द्रमा के दिन प्रात: हरे रंग के कपड़े की छोटी थैली तैयार करें। श्री गणेश के चित्र अथवा मूर्ति के आगे "संकटनाशन गणेश स्तोत्र´´ के 11 पाठ करें। तत्पश्चात् इस थैली में 7 मूं...ग, 10 ग्राम साबुत धनिया, एक पंचमुखी रूद्राक्ष, एक चांदी का रूपया या 2 सुपारी, 2 हल्दी की गांठ रख कर दाहिने मुख के गणेश जी को शुद्ध घी के मोदक का भोग लगाएं। फिर यह थैली तिजोरी या कैश बॉक्स में रख दें। गरीबों और ब्राह्मणों को दान करते रहे। आर्थिक स्थिति में शीघ्र सुधार आएगा। 1 साल बाद नयी थैली बना कर बदलते रहें।

2॰ किसी के प्रत्येक शुभ कार्य में बाधा आती हो या विलम्ब होता हो तो रविवार को भैरों जी के मंदिर में सिंदूर का चोला चढ़ा कर "बटुक भैरव स्तोत्र´´ का एक पाठ कर के गौ, कौओं और काले कुत्तों को उनकी रूचि का पदार्थ खिलाना चाहिए। ऐसा वर्ष में 4-5 बार करने से कार्य बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।

3॰ रूके हुए कार्यों की सिद्धि के लिए यह प्रयोग बहुत ही लाभदायक है। गणेश चतुर्थी को गणेश जी का ऐसा चित्र घर या दुकान पर लगाएं, जिसमें उनकी सूंड दायीं ओर मुड़ी हुई हो। इसकी आराधना करें। इसके आगे लौंग तथा सुपारी रखें। जब भी कहीं काम पर जाना हो, तो एक लौंग तथा सुपारी को साथ ले कर जाएं, तो काम सिद्ध होगा। लौंग को चूसें तथा सुपारी को वापस ला कर गणेश जी के आगे रख दें तथा जाते हुए कहें `जय गणेश काटो कलेश´।

4॰ सरकारी या निजी रोजगार क्षेत्र में परिश्रम के उपरांत भी सफलता नहीं मिल रही हो, तो नियमपूर्वक किये गये विष्णु यज्ञ की विभूति ले कर, अपने पितरों की `कुशा´ की मूर्ति बना कर, गंगाजल से स्नान करायें तथा यज्ञ विभूति लगा कर, कुछ भोग लगा दें और उनसे कार्य की सफलता हेतु कृपा करने की प्रार्थना करें। किसी धार्मिक ग्रंथ का एक अध्याय पढ़ कर, उस कुशा की मूर्ति को पवित्र नदी या सरोवर में प्रवाहित कर दें। सफलता अवश्य मिलेगी। सफलता के पश्चात् किसी शुभ कार्य में दानादि दें।

5॰ व्यापार, विवाह या किसी भी कार्य के करने में बार-बार असफलता मिल रही हो तो यह टोटका करें- सरसों के तैल में सिके गेहूँ के आटे व पुराने गुड़ से तैयार सात पूये, सात मदार (आक) के पुष्प, सिंदूर, आटे से तैयार सरसों के तैल का रूई की बत्ती से जलता दीपक, पत्तल या अरण्डी के पत्ते पर रखकर शनिवार की रात्रि में किसी चौराहे पर रखें और कहें -"हे मेरे दुर्भाग्य तुझे यहीं छोड़े जा रहा हूँ कृपा करके मेरा पीछा ना करना।´´ सामान रखकर पीछे मुड़कर न देखें।

6॰ सिन्दूर लगे हनुमान जी की मूर्ति का सिन्दूर लेकर सीता जी के चरणों में लगाएँ। फिर माता सीता से एक श्वास में अपनी कामना निवेदित कर भक्ति पूर्वक प्रणाम कर वापस आ जाएँ। इस प्रकार कुछ दिन करने पर सभी प्रकार की बाधाओं का निवारण होता है।

7॰ किसी शनिवार को, यदि उस दिन `सर्वार्थ सिद्धि योग' हो तो अति उत्तम सांयकाल अपनी लम्बाई के बराबर लाल रेशमी सूत नाप लें। फिर एक पत्ता बरगद का तोड़ें। उसे स्वच्छ जल से धोकर पोंछ लें। तब पत्ते पर अपनी कामना रुपी नापा हुआ लाल रेशमी सूत लपेट दें और पत्ते को बहते हुए जल में प्रवाहित कर दें। इस प्रयोग से सभी प्रकार की बाधाएँ दूर होती हैं और कामनाओं की पूर्ति होती है।

८॰ रविवार पुष्य नक्षत्र में एक कौआ अथवा काला कुत्ता पकड़े। उसके दाएँ पैर का नाखून काटें। इस नाखून को ताबीज में भरकर, धूपदीपादि से पूजन कर धारण करें। इससे आर्थिक बाधा दूर होती है। कौए या काले कुत्ते दोनों में से किसी एक का नाखून लें। दोनों का एक साथ प्रयोग न करें।

9॰ प्रत्येक प्रकार के संकट निवारण के लिये भगवान गणेश की मूर्ति पर कम से कम 21 दिन तक थोड़ी-थोड़ी जावित्री चढ़ावे और रात को सोते समय थोड़ी जावित्री खाकर सोवे। यह प्रयोग 21, 42, 64 या 84 दिनों तक करें।

10॰ अक्सर सुनने में आता है कि घर में कमाई तो बहुत है, किन्तु पैसा नहीं टिकता, तो यह प्रयोग करें। जब आटा पिसवाने जाते हैं तो उससे पहले थोड़े से गेंहू में 11 पत्ते तुलसी तथा 2 दाने केसर के डाल कर मिला लें तथा अब इसको बाकी गेंहू में मिला कर पिसवा लें। यह क्रिया सोमवार और शनिवार को करें। फिर घर में धन की कमी नहीं रहेगी।

11॰ आटा पिसते समय उसमें 100 ग्राम काले चने भी पिसने के लियें डाल दिया करें तथा केवल शनिवार को ही आटा पिसवाने का नियम बना लें।

12॰ शनिवार को खाने में किसी भी रूप में काला चना अवश्य ले लिया करें।

13॰ अगर पर्याप्त धर्नाजन के पश्चात् भी धन संचय नहीं हो रहा हो, तो काले कुत्ते को प्रत्येक शनिवार को कड़वे तेल (सरसों के तेल) से चुपड़ी रोटी खिलाएँ।

14॰ संध्या समय सोना, पढ़ना और भोजन करना निषिद्ध है। सोने से पूर्व पैरों को ठंडे पानी से धोना चाहिए, किन्तु गीले पैर नहीं सोना चाहिए। इससे धन का क्षय होता है।

15॰ रात्रि में चावल, दही और सत्तू का सेवन करने से लक्ष्मी का निरादर होता है। अत: समृद्धि चाहने वालों को तथा जिन व्यक्तियों को आर्थिक कष्ट रहते हों, उन्हें इनका सेवन रात्रि भोज में नहीं करना चाहिये।

16॰ भोजन सदैव पूर्व या उत्तर की ओर मुख कर के करना चाहिए। संभव हो तो रसोईघर में ही बैठकर भोजन करें इससे राहु शांत होता है। जूते पहने हुए कभी भोजन नहीं करना चाहिए।

17॰ सुबह कुल्ला किए बिना पानी या चाय न पीएं। जूठे हाथों से या पैरों से कभी गौ, ब्राह्मण तथा अग्नि का स्पर्श न करें।

18॰ घर में देवी-देवताओं पर चढ़ाये गये फूल या हार के सूख जाने पर भी उन्हें घर में रखना अलाभकारी होता है।

19॰ अपने घर में पवित्र नदियों का जल संग्रह कर के रखना चाहिए। इसे घर के ईशान कोण में रखने से अधिक लाभ होता है।

20॰ रविवार के दिन पुष्य नक्षत्र हो, तब गूलर के वृक्ष की जड़ प्राप्त कर के घर लाएं। इसे धूप, दीप करके धन स्थान पर रख दें। यदि इसे धारण करना चाहें तो स्वर्ण ताबीज में भर कर धारण कर लें। जब तक यह ताबीज आपके पास रहेगी, तब तक कोई कमी नहीं आयेगी। घर में संतान सुख उत्तम रहेगा। यश की प्राप्ति होती रहेगी। धन संपदा भरपूर होंगे। सुख शांति और संतुष्टि की प्राप्ति होगी।

21॰ `देव सखा´ आदि 18 पुत्रवर्ग भगवती लक्ष्मी के कहे गये हैं। इनके नाम के आदि में और अन्त में `नम:´ लगाकर जप करने से अभीष्ट धन की प्राप्ति होती है। यथा - ॐ देवसखाय नम:, चिक्लीताय, आनन्दाय, कर्दमाय, श्रीप्रदाय, जातवेदाय, अनुरागाय, सम्वादाय, विजयाय, वल्लभाय, मदाय, हर्षाय, बलाय, तेजसे, दमकाय, सलिलाय, गुग्गुलाय, ॐ कुरूण्टकाय नम:।

22॰ किसी कार्य की सिद्धि के लिए जाते समय घर से निकलने से पूर्व ही अपने हाथ में रोटी ले लें। मार्ग में जहां भी कौए दिखलाई दें, वहां उस रोटी के टुकड़े कर के डाल दें और आगे बढ़ जाएं। इससे सफलता प्राप्त होती है।

23॰ किसी भी आवश्यक कार्य के लिए घर से निकलते समय घर की देहली के बाहर, पूर्व दिशा की ओर, एक मुट्ठी घुघंची को रख कर अपना कार्य बोलते हुए, उस पर बलपूर्वक पैर रख कर, कार्य हेतु निकल जाएं, तो अवश्य ही कार्य में सफलता मिलती है।

24॰ अगर किसी काम से जाना हो, तो एक नींबू लें। उसपर 4 लौंग गाड़ दें तथा इस मंत्र का जाप करें : `ॐ श्री हनुमते नम:´। 21 बार जाप करने के बाद उसको साथ ले कर जाएं। काम में किसी प्रकार की बाधा नहीं आएगी।

25॰ चुटकी भर हींग अपने ऊपर से वार कर उत्तर दिशा में फेंक दें। प्रात:काल तीन हरी इलायची को दाएँ हाथ में रखकर "श्रीं श्रीं´´ बोलें, उसे खा लें, फिर बाहर जाए¡।

26॰ जिन व्यक्तियों को लाख प्रयत्न करने पर भी स्वयं का मकान न बन पा रहा हो, वे इस टोटके को अपनाएं। प्रत्येक शुक्रवार को नियम से किसी भूखे को भोजन कराएं और रविवार के दिन गाय को गुड़ खिलाएं। ऐसा नियमित करने से अपनी अचल सम्पति बनेगी या पैतृक सम्पति प्राप्त होगी। अगर सम्भव हो तो प्रात:काल स्नान-ध्यान के पश्चात् निम्न मंत्र का जाप करें। "ॐ पद्मावती पद्म कुशी वज्रवज्रांपुशी प्रतिब भवंति भवंति।।´´

27॰ यह प्रयोग नवरात्रि के दिनों में अष्टमी तिथि को किया जाता है। इस दिन प्रात:काल उठ कर पूजा स्थल में गंगाजल, कुआं जल, बोरिंग जल में से जो उपलब्ध हो, उसके छींटे लगाएं, फिर एक पाटे के ऊपर दुर्गा जी के चित्र के सामने, पूर्व में मुंह करते हुए उस पर 5 ग्राम सिक्के रखें। साबुत सिक्कों पर रोली, लाल चन्दन एवं एक गुलाब का पुष्प चढ़ाएं। माता से प्रार्थना करें। इन सबको पोटली बांध कर अपने गल्ले, संदूक या अलमारी में रख दें। यह टोटका हर 6 माह बाद पुन: दोहराएं।

28॰ घर में समृद्धि लाने हेतु घर के उत्तरपश्चिम के कोण (वायव्य कोण) में सुन्दर से मिट्टी के बर्तन में कुछ सोने-चांदी के सिक्के, लाल कपड़े में बांध कर रखें। फिर बर्तन को गेहूं या चावल से भर दें। ऐसा करने से घर में धन का अभाव नहीं रहेगा।

29॰ व्यक्ति को ऋण मुक्त कराने में यह टोटका अवश्य सहायता करेगा : मंगलवार को शिव मन्दिर में जा कर शिवलिंग पर मसूर की दाल "ॐ ऋण मुक्तेश्वर महादेवाय नम:´´ मंत्र बोलते हुए चढ़ाएं।

30॰ जिन व्यक्तियों को निरन्तर कर्ज घेरे रहते हैं, उन्हें प्रतिदिन "ऋणमोचक मंगल स्तोत्र´´ का पाठ करना चाहिये। यह पाठ शुक्ल पक्ष के प्रथम मंगलवार से शुरू करना चाहिये। यदि प्रतिदिन किसी कारण न कर सकें, तो प्रत्येक मंगलवार को अवश्य करना चाहिये।

31॰ सोमवार के दिन एक रूमाल, 5 गुलाब के फूल, 1 चांदी का पत्ता, थोड़े से चावल तथा थोड़ा सा गुड़ लें। फिर किसी विष्णुण्लक्ष्मी जी के मिन्दर में जा कर मूर्त्ति के सामने रूमाल रख कर शेष वस्तुओं को हाथ में लेकर 21 बार गायत्री मंत्र का पाठ करते हुए बारी-बारी इन वस्तुओं को उसमें डालते रहें। फिर इनको इकट्ठा कर के कहें की `मेरी परेशानियां दूर हो जाएं तथा मेरा कर्जा उतर जाए´। यह क्रिया आगामी 7 सोमवार और करें। कर्जा जल्दी उतर जाएगा तथा परेशानियां भी दूर हो जाएंगी।

32॰ सर्वप्रथम 5 लाल गुलाब के पूर्ण खिले हुए फूल लें। इसके पश्चात् डेढ़ मीटर सफेद कपड़ा ले कर अपने सामने बिछा लें। इन पांचों गुलाब के फुलों को उसमें, गायत्री मंत्र 21 बार पढ़ते हुए बांध दें। अब स्वयं जा कर इन्हें जल में प्रवाहित कर दें। भगवान ने चाहा तो जल्दी ही कर्ज से मुक्ति प्राप्त होगी।

34॰ कर्ज-मुक्ति के लिये "गजेन्द्र-मोक्ष´´ स्तोत्र का प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व पाठ अमोघ उपाय है।

35॰ घर में स्थायी सुख-समृद्धि हेतु पीपल के वृक्ष की छाया में खड़े रह कर लोहे के बर्तन में जल, चीनी, घी तथा दूध मिला कर पीपल के वृक्ष की जड़ में डालने से घर में लम्बे समय तक सुख-समृद्धि रहती है और लक्ष्मी का वास होता है।

33॰ अगर निरन्तर कर्ज में फँसते जा रहे हों, तो श्मशान के कुएं का जल लाकर किसी पीपल के वृक्ष पर चढ़ाना चाहिए। यह 6 शनिवार किया जाए, तो आश्चर्यजनक परिणाम प्राप्त होते हैं।

36॰ घर में बार-बार धन हानि हो रही हो तों वीरवार को घर के मुख्य द्वार पर गुलाल छिड़क कर गुलाल पर शुद्ध घी का दोमुखी (दो मुख वाला) दीपक जलाना चाहिए। दीपक जलाते समय मन ही मन यह कामना करनी चाहिए की `भविष्य में घर में धन हानि का सामना न करना पड़े´। जब दीपक शांत हो जाए तो उसे बहते हुए पानी में बहा देना चाहिए।

37॰ काले तिल परिवार के सभी सदस्यों के सिर पर सात बार उसार कर घर के उत्तर दिशा में फेंक दें, धनहानि बंद होगी।

38॰ घर की आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए घर में सोने का चौरस सिक्का रखें। कुत्ते को दूध दें। अपने कमरे में मोर का पंख रखें।

39॰ अगर आप सुख-समृद्धि चाहते हैं, तो आपको पके हुए मिट्टी के घड़े को लाल रंग से रंगकर, उसके मुख पर मोली बांधकर तथा उसमें जटायुक्त नारियल रखकर बहते हुए जल में प्रवाहित कर देना चाहिए।

40॰ अखंडित भोज पत्र पर 15 का यंत्र लाल चन्दन की स्याही से मोर के पंख की कलम से बनाएं और उसे सदा अपने पास रखें।

41॰ व्यक्ति जब उन्नति की ओर अग्रसर होता है, तो उसकी उन्नति से ईर्ष्याग्रस्त होकर कुछ उसके अपने ही उसके शत्रु बन जाते हैं और उसे सहयोग देने के स्थान पर वे ही उसकी उन्नति के मार्ग को अवरूद्ध करने लग जाते हैं, ऐसे शत्रुओं से निपटना अत्यधिक कठिन होता है। ऐसी ही परिस्थितियों से निपटने के लिए प्रात:काल सात बार हनुमान बाण का पाठ करें तथा हनुमान जी को लड्डू का भोग लगाए¡ और पाँच लौंग पूजा स्थान में देशी कर्पूर के साथ जलाएँ। फिर भस्म से तिलक करके बाहर जाए¡। यह प्रयोग आपके जीवन में समस्त शत्रुओं को परास्त करने में सक्षम होगा, वहीं इस यंत्र के माध्यम से आप अपनी मनोकामनाओं की भी पूर्ति करने में सक्षम होंगे।

42॰ कच्ची धानी के तेल के दीपक में लौंग डालकर हनुमान जी की आरती करें। अनिष्ट दूर होगा और धन भी प्राप्त होगा।

43॰ अगर अचानक धन लाभ की स्थितियाँ बन रही हो, किन्तु लाभ नहीं मिल रहा हो, तो गोपी चन्दन की नौ डलियाँ लेकर केले के वृक्ष पर टाँग देनी चाहिए। स्मरण रहे यह चन्दन पीले धागे से ही बाँधना है।

44॰ अकस्मात् धन लाभ के लिये शुक्ल पक्ष के प्रथम बुधवार को सफेद कपड़े के झंडे को पीपल के वृक्ष पर लगाना चाहिए। यदि व्यवसाय में आकिस्मक व्यवधान एवं पतन की सम्भावना प्रबल हो रही हो, तो यह प्रयोग बहुत लाभदायक है।

45॰ अगर आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे हों, तो मन्दिर में केले के दो पौधे (नर-मादा) लगा दें।

46॰ अगर आप अमावस्या के दिन पीला त्रिकोण आकृति की पताका विष्णु मन्दिर में ऊँचाई वाले स्थान पर इस प्रकार लगाएँ कि वह लहराता हुआ रहे, तो आपका भाग्य शीघ्र ही चमक उठेगा। झंडा लगातार वहाँ लगा रहना चाहिए। यह अनिवार्य शर्त है।

47॰ देवी लक्ष्मी के चित्र के समक्ष नौ बत्तियों का घी का दीपक जलाए¡। उसी दिन धन लाभ होगा।

48॰ एक नारियल पर कामिया सिन्दूर, मोली, अक्षत अर्पित कर पूजन करें। फिर हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएँ। धन लाभ होगा।

49॰ पीपल के वृक्ष की जड़ में तेल का दीपक जला दें। फिर वापस घर आ जाएँ एवं पीछे मुड़कर न देखें। धन लाभ होगा।

50॰ प्रात:काल पीपल के वृक्ष में जल चढ़ाएँ तथा अपनी सफलता की मनोकामना करें और घर से बाहर शुद्ध केसर से स्वस्तिक बनाकर उस पर पीले पुष्प और अक्षत चढ़ाए¡। घर से बाहर निकलते समय दाहिना पाँव पहले बाहर निकालें।

51॰ एक हंडिया में सवा किलो हरी साबुत मूंग की दाल, दूसरी में सवा किलो डलिया वाला नमक भर दें। यह दोनों हंडिया घर में कहीं रख दें। यह क्रिया बुधवार को करें। घर में धन आना शुरू हो जाएगा।

52॰ प्रत्येक मंगलवार को 11 पीपल के पत्ते लें। उनको गंगाजल से अच्छी तरह धोकर लाल चन्दन से हर पत्ते पर 7 बार राम लिखें। इसके बाद हनुमान जी के मन्दिर में चढ़ा आएं तथा वहां प्रसाद बाटें और इस मंत्र का जाप जितना कर सकते हो करें। `जय जय जय हनुमान गोसाईं, कृपा करो गुरू देव की नांई´ 7 मंगलवार लगातार जप करें। प्रयोग गोपनीय रखें। अवश्य लाभ होगा।

53॰ अगर नौकरी में तरक्की चाहते हैं, तो 7 तरह का अनाज चिड़ियों को डालें।

54॰ ऋग्वेद (4/32/20-21) का प्रसिद्ध मन्त्र इस प्रकार है - `ॐ भूरिदा भूरि देहिनो, मा दभ्रं भूर्या भर। भूरि घेदिन्द्र दित्ससि। ॐ भूरिदा त्यसि श्रुत: पुरूत्रा शूर वृत्रहन्। आ नो भजस्व राधसि।।´ (हे लक्ष्मीपते ! आप दानी हैं, साधारण दानदाता ही नहीं बहुत बड़े दानी हैं। आप्तजनों से सुना है कि संसारभर से निराश होकर जो याचक आपसे प्रार्थना करता है उसकी पुकार सुनकर उसे आप आर्थिक कष्टों से मुक्त कर देते हैं - उसकी झोली भर देते हैं। हे भगवान मुझे इस अर्थ संकट से मुक्त कर दो।)

51॰ निम्न मन्त्र को शुभमुहूर्त्त में प्रारम्भ करें। प्रतिदिन नियमपूर्वक 5 माला श्रद्धा से भगवान् श्रीकृष्ण का ध्यान करके, जप करता रहे - "ॐ क्लीं नन्दादि गोकुलत्राता दाता दारिद्र्यभंजन। सर्वमंगलदाता च सर्वकाम प्रदायक:। श्रीकृष्णाय नम:।।´´

52॰ भाद्रपद मास के कृष्णपक्ष भरणी नक्षत्र के दिन चार घड़ों में पानी भरकर किसी एकान्त कमरे में रख दें। अगले दिन जिस घड़े का पानी कुछ कम हो उसे अन्न से भरकर प्रतिदिन विधिवत पूजन करते रहें। शेष घड़ों के पानी को घर, आँगन, खेत आदि में छिड़क दें। अन्नपूर्णा देवी सदैव प्रसन्न रहेगीं।

53॰ किसी शुभ कार्य के जाने से पहले - रविवार को पान का पत्ता साथ रखकर जायें। सोमवार को दर्पण में अपना चेहरा देखकर जायें। मंगलवार को मिष्ठान खाकर जायें। बुधवार को हरे धनिये के पत्ते खाकर जायें। गुरूवार को सरसों के कुछ दाने मुख में डालकर जायें। शुक्रवार को दही खाकर जायें। शनिवार को अदरक और घी खाकर जाना चाहिये।

54॰ किसी भी शनिवार की शाम को माह की दाल के दाने लें। उसपर थोड़ी सी दही और सिन्दूर लगाकर पीपल के वृक्ष के नीचे रख दें और बिना मुड़कर देखे वापिस आ जायें। सात शनिवार लगातार करने से आर्थिक समृद्धि तथा खुशहाली बनी रहेगी। .............. क्या आप इनमें से किसी लक्षण से पीड़ित हैं - मतली, भूख न लगना, जी अच्छा न होना इत्यादि? हो सकता है कि आप सिर दर्द के लक्षणों का अनुभव कर रहे हों! सिर दर्द सिर में होने वाले किसी

कम, मध्यम या तीव्र दर्द को कहा जाता है जो कि सर में आंखों या कानों के ऊपर, सर के पिछले हिस्से में या गर्दन में होता है।

ज्‍योतिष के माध्‍यम से दूर भगायें सिर दर्द.....

एक चेतावनी! ... यदि सर में चोट लगने पर आपको अचानक बहुत तेज़, सिर दर्द होता हो या गर्दन में अकड़न, बुखार, बेहोशी या आंख या कान में दर्द होना इत्यादि की शिकायत हो तो यह एक गंभीर विकार भी हो सकता है और जिसके लिए आपको तत्काल चिकित्सीय परामर्श लेना चाहिए।

ज्योतिष विज्ञान आपकी मदद कर सकता है!

यदि किसी विशेषज्ञ को जन्मकुंडली दिखाई जाए तो वह बता सकता है कि व्यक्ति में किन रोगों के आक्रण की अधिक संभावना है और उसके स्वास्थ्य की भावी स्थिति क्या है। प्राचीन समय में प्रसिद्ध रोग विज्ञानी हिप्पोक्रेट्स सबसे पहले व्यक्ति की जन्मसंबंधी तालिका का अध्ययन करता था और फिर उपचार संबंधी कोई निर्णय लेता था!

कोई व्यक्ति किस रोग से पीडि़त होता है, यह इस पर निर्भर करता है कि उसके भाव या राशि का संबंध जन्म कुंडली में कौन से अनिष्टकर ग्रह से किस रूप में है। ऐसा इसलिए है कि प्रत्येक राशि एक या एकाधिक शारीरिक अंगों से जुड़ी होती है। इसके साथ ही प्रत्येक ग्रह वायु, अग्नि, जल या आर्द्र प्रकृति वाला कोई एक प्रभुत्वकारी गुण लिए हुए होता है। आयुर्वेद में इसे वात-पित्त-कफ के रूप में बताया गया है। इस तरह राशि चक्र में अंकित शारीरिक अंग और प्रभुत्वकारी ग्रह की विशेषता के मेल से यह तय होता है कि किस व्यक्ति को कौन-सी बीमारी होगी।

सिर, मस्तिष्क एवं आंखों, विशेष रूप से सर का अगला हिस्सा, आंखों से नीचे और सर के पीछे वाले हिस्से से लेकर खोपड़ी के आधार तक का हिस्सा मेष द्वारा नियंत्रित होता है। यह मंगल को प्रतिबिंबित करता है जो दिमाग में अग्निमय ऊर्जा का स्रोत है। सूर्य, चंद्रमा या मेष का कोई अन्य उदीयमान ग्रह जिस व्यक्ति के साथ जुड़ा होगा उसके सरदर्द की संभावना अन्य लोगों की तुलना में अधिक होगी।

यदि सूर्य पहले, दूसरे या बारहवें घर में विघ्नपूर्ण है या मंगल बहुत कमजोर है या नीच के चंद्रमा के साथ दाहक स्थिति में है तब ऐसे लोग अधकपारी सरदर्द (माइग्रेन) से पीड़ित होंगे। साथ ही यदि अनिष्टकर सूर्य या मंगल छठे घर में बैठा है (व्यक्ति की जन्म कुंडली में रोगों का द्योतक) तो व्यक्ति सरदर्द का शिकार होगा।

जन्मपत्री की कमजोरी और/या जन्मपत्री में उच्च स्थान पर बैठे अनिष्टकर देव के कारण एक रोगकारी परिस्थिति निर्मित होती है। इससे सरदर्द की संभावना बनती है। मजबूत सूर्य और मंगल, जो कि क्रमशः प्राण क्षमता और ऊर्जा के प्रतीक हैं, सुरक्षात्मक कवच प्रदान करते हैं। Read: In English वैदिक नुस्खे

सबसे आसान किंतु बेहद प्रभावी उपायों में से एक यह है कि सुबह उठकर सूर्य की ओर देखकर कम से कम 42 दिनों तक 3, 11, 21, 51 या 108 बार ओम सूर्यायः नमः या ओम आदित्याय नमः या गायत्री मंत्र का जाप करें या सूर्य नमस्कार करें।

धन्वंतरि होम और मंगल होम का आयोजन करने से भी प्रभावी तौर पर अनिष्टकर ग्रहों के प्रभाव दूर हो जाते हैं और इस प्रकार सरदर्द आपसे मीलों दूर चला जाता है। ............... हीरे की भांति कीमती लाभ प्रदान करने वाली कुछ जडियाँ---------------------- मित्र जनों !जरा सोचें....कितने %लोग ग्रह उपचारार्थ महंगे नग आदि धारण कर पाते हैं...?मेरे ख़याल से आज के इस महंगाई के युग में बहुत कम %लोग महंगे नगों के एवं विशिष्ट अनुष्ठान के माध्यम से अपने रुष्ट ग्रह शांत कर पते हैं! और जो संपन्न लोग हैं उन्हें भी असली नग मिले इस की भी पूर्ण क्या ग्यारंटी है? नग पत्थर निर्जीव हैं फिर भी वो प्राण प्रतिष्ठित एवं चैतन्य होकर एक सजीव व्यक्ति को पूर्ण लाभ प्रदान करने में सक्षम हैं ..तो १ सजीव वृक्ष की जड़ वनस्पति विज्ञान के हिसाब से पूर्ण प्रतिष्ठित होने के वाद प्रभाव नहीं डालेगा क्या? ऐसा सोच के मैंने कुछ पंचांग एवं विद्वद जनों के माध्यम द्वारा उल्लेखित लेखों के माध्यम से कुछ जडियों के प्रयोग मेरे पास आने वाले लोगों को कराया....जिस का फल लगभग १ उच्चस्तरीय नग की तरह एवं कुछ जडियाँ तो उस से भी अधिक कारगर दिखी...जिस से प्रभावित होकर सभी धनि एवं सामान्य परिवार वाले मित्र जन भी इस का लाभ ले सकें इस के लिए आगे ग्रहों का विवरण एवं उन की शान्त्यर्थ कौन से वृक्ष की जड़ी काम करेगी उस के बारे में बताने की प्रयास करूँगा उम्मीद है सही जड़ी ग्रहण कर के आप सुधिजन लाभ प्राप्त करेंगे......!! ग्रह --सूर्य--(रत्न-माणिक्य)जड़ी-बेल वृक्ष की जड़ .. ,,,,,--चन्द्र -(रत्न-मोती) जड़ी -खिरनी की या ढाक की जड़ ........मंगल -(रत्न मूंगा) जड़ी -नाग फनी की जड़ ........बुध (रत्न -पन्ना) जड़ी -तिधारा जड़ ........गुरु (रत्न-pukhraaj ) जड़ी-bhring राज या केले की जड़ .......शुक्र (रत्न-heera ) जड़ी-सिंहनी वृक्ष जड़ .......शनि (नीलम) जड़ी -बिच्छु की जड़ '''''''राहू (रत्न-गौमेद) जड़ी -सफ़ेद चन्दन ........केतु (रत्न-लहसुनिया) जड़ी-असगंध जड़ इन को धारण करते समय ग्रहों के दिन के हिसाब से उनका यथोपचार पूजन ग्रह रंग के अनुसार कपडे में चैतन्य प्राण प्रतिष्ठित कराकर ही धारण करें ....शत प्रतिशत लाभ प्राप्त होगा....जिन की जन्म पत्रिका नहीं है वो भी अपने जिस नाम का सिग्नेचर करते है उसी नाम की राशी निकालकर राशी स्वमी ग्रह अनुसार जड़ी धारण कर के पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकते है.... आप का दिन व् जीवन मंगल मय हो .. ............... फलित ज्योतिष:--- फलित ज्योतिष उस विद्या को कहते हैं जिसमें मनुष्य तथा पृथ्वी पर, ग्रहों और तारों के शुभ तथा अशुभ प्रभावों का अध्ययन किया जाता है। ज्योतिष शब्द का यौगिक अर्थ ग्रह तथा नक्षत्रों से संबंध रखनेवाली विद्या है। इस शब्द से यद्यपि गणित (सिद्धांत) ज्योतिष का भी बोध होता है, तथापि साधारण लोग ज्योतिष विद्या से फलित विद्या का अर्थ ही लेते हैं। ग्रहों तथा तारों के रंग भिन्न-भिन्न प्रकार के दिखलाई पड़ते हैं, अतएव उनसे निकलनेवाली किरणों के भी भिन्न भिन्न प्रभाव हैं। इन्हीं किरणों के प्रभाव का भारत, बैबीलोनिया, खल्डिया, यूनान, मिस्र तथा चीन आदि देशों के विद्वानों ने प्राचीन काल से अध्ययन करके ग्रहों तथा तारों का स्वभाव ज्ञात किया। पृथ्वी सौर मंडल का एक ग्रह है। अतएव इसपर तथा इसके निवासियों पर मुख्यतया सूर्य तथा सौर मंडल के ग्रहों और चंद्रमा का ही विशेष प्रभाव पड़ता है। पृथ्वी विशेष कक्षा ...में चलती है जिसे क्रांतिवृत्त कहते हैं। पृथ्वी के निवासियों को सूर्य इसी में चलता दिखलाई पड़ता है। इस कक्षा के इर्द गिर्द कुछ तारामंडल हैं, जिन्हें राशियाँ कहते हैं। इनकी संख्या 12 है। इन्हें, मेष, वृष आदि कहते हैं। प्राचीन काल में इनके नाम इनकी विशेष प्रकार की किरणें निकलती हैं, अत: इनका भी पृथ्वी तथा इसके निवासियों पर प्रभाव पड़ता है। प्रत्येक राशि 30 की होती है। मेष राशि का प्रारंभ विषुवत् तथा क्रांतिवृत्त के संपातबिंदु से होता है। अयन की गति के कारण यह बिंदु स्थिर नहीं है। पाश्चात्य ज्योतिष में विषुवत् तथा क्रातिवृत्त के वर्तमान संपात को आरंभबिंदु मानकर, 30-30 अंश की 12 राशियों की कल्पना की जाती है। भारतीय ज्योतिष में सूर्यसिद्धांत आदि ग्रंथों से आनेवाले संपात बिंदु ही मेष आदि की गणना की जाती है। इस प्रकार पाश्चात्य गणनाप्रणाली तथा भारतीय गणनाप्रणाली में लगभग 23 अंशों का अंतर पड़ जाता है। भारतीय प्रणाली निरयण प्रणाली है। फलित के विद्वानों का मत है कि इससे फलित में अंतर नहीं पड़ता, क्योंकि इस विद्या के लिये विभिन्न देशों के विद्वानों ने ग्रहों तथा तारों के प्रभावों का अध्ययन अपनी अपनी गणनाप्रणाली से किया है। भारत में 12 राशियों के 27 विभाग किए गए हैं, जिन्हें नक्षत्र कहते हैं। ये हैं अश्विनी, भरणी आदि। फल के विचार के लिये चंद्रमा के नक्षत्र का विशेष उपयोग किया जाता है। .................... 1 मई 2012 को शाम पांच बजे से गुरु तारा अस्त हो गया है। (पंचांग भेद से तारीखों में भिन्नता हो सकती है।) जिसके कारण विवाहादि समस्त शुभ कार्यों पर रोक लग गई। गुरु अस्त हो जाने के कारण मंदिरों की प्राण प्रतिष्ठा भी नहीं हो सकेगी एवं नए प्रतिष्ठानों के उद्घाटन भी नहीं किये जाने चाहिये। गुरु का उदय 28 मई 2012 को होगा। सूर्य से संयुक्त गुरु का अस्त होने से कहीं-कहीं वर्षा के योग बनेंगे तथा मंहगाई में वृद्धि होगी। ग्रीष्म का प्रभाव भी तेज होगा तथा प्राकृतिक संकटों की संभावानाएं बनी रहेगी। गुरु अस्त स्थिति में ही अपनी राशि बदलकर वृषभ में 14 मई 2012 को प्रवेश करेगा कई पंचांग से 17 मई 2012 से ) तथा इस राशि में यह अगले 13 माह तक गुरु रहेगे। इसके कारण मिथुन, तुला, कुंभ राशि वाली कन्याओं के विवाह निषेध रहेंगे तथा वृषभ, मीन, सिंह, धनु राशि वाली कन्याओं को पीले पूजन के पश्चात विवाह किये जा सकते है। कुंभ, तुला या मिथुन राशि कि कन्याओ का विवाह पूरा एक वर्ष तक इंतजार करना पड़ेगा। तीन राशियों में शादी का यह अड़ंगा गुरु की चाल से लग रहा है।इस दरमयान मंगनी (सगाई) करने के लिए कोई रोक नहीं है। गुरु क्यों रहेगा एक वर्ष : - विवाह के लिए लड़का और लड़की की कुंडली मिलाकर चंद्र बल देखे जाते हैं। चंद्रमा हर दो या सवा दो दिन बाद बदल जाता है। अकेले लड़के की कुंडली में चंद्र के साथ सूर्य बल देखा जाता है। सूर्य भी हर एक माह बाद बदल जाता है, जबकि लड़की की कुंडली में चंद्र के साथ गुरु देखा जाता है। गुरु एक राशि से दूसरी राशि में जाने के लिए एक वर्ष का वक्त लगाता है। ज्योतिष विज्ञान के मुताबिक गुरु ज्ञान देने वाला होता है। ऐसे में यदि बिना मुहूर्त के शादी की जाती है तो इसका असर सीधे दांपत्य जीवन पर पड़ता है। गुरु उच्च राशि का हो, मित्र राशि का हो, स्वयं की राशि का हो या शुभ नवमान्य का हो तो गुरु के चौथे, आठवें व बारहवें घर में होने पर भी विवाह हो सकता है। लेकिन 17 मई को गुरु वृषभ राशि पर शत्रु राशि का आ रहा है, इसलिए मिथुन, कुंभ और तुला राशि वाली लड़कियों का विवाह मुहूर्त एक वर्ष तक नहीं बनेगा। 28 मई के पश्चात गुरु उदय होगा लेकिन शुक्र के अस्त रहने के कारण वर्षा एवं तूफान के योग बनेंगे। जनता के मध्य आपसी तनाव तथा सरकार युद्ध की नीति पर अधिक ध्यान दे सकती है। वाहन दुर्घटनाओं के योग भी बनेंगे। राशि अनुसार फल- मेष, कर्क, तुला, मकर- शुभ वृषभ, सिंह, वृश्चिक, कुंभ- मध्यम मिथुन, कन्या, धनु, मीन- ग्रहो के अनुसार ............. कई बार व्यक्ति की समृद्धि अचानक रुष्ट हो जाती है,सारे बने बनाये कार्य बिगड जाते है,जीवन की सारी खुशिया नाराज सी लगती हैं,जिस भी काम में हाथ डालो असफलता ही हाथ लगती है.घर का कोई सदस्य जब चाहे तब घर से भाग जाता है,या हमेशा गुमसुम सा पागलों सा व्यवहार करता हो,तब ये प्रयोग जीवन की विभिन्न समस्याओं का न सिर्फ समाधान करता है अपितु पूरी तरह उन्हें नष्ट ही कर देता और आने वाले पूरे जीवन में भी आपको सपरिवार तंत्र बाधा और स्थान दोष ,दिशा दोष से मुक्त कर अभय ही दे देता हैं.

इस मंत्र को यदि पूर्ण विधि पूर्वक गुरु पूजन संपन्न कर ११०० की संख्या में जप कर सिद्ध कर लिया जाये तो साधक को ये मंत्र उसकी तीक्ष्ण साधनाओं में भी सुरक्षा प्रदान करता है और यात्रा में चोरी आदि घटनाओं से भी बचाता है.मंत्र को सिद्ध करने के बाद जिस भी मकान या दुकान में उपरोक्त बाधाएं आ रही हो,किसी प्रेत का वास हो गया हो या अज्ञात कारणों से बाधाएँ आ रही हो,उस मकान में बाहर के दरवाजे से लेकर अंदर तक कुल जितने दरवाजे हो उतनी ही छोटी नागफनी कीलें और एक मुट्ठी काली उडद ले ले.इसके बाद मकान के बाहर आकर प्रत्येक कील पर ५ बार मंत्र पढ़ कर फूँक मारे और उडद को भी फूँक मार कर अभिमंत्रित कर ले,जितनी कीलो को आप अभिमंत्रित करेंगे उतनी बार उडद पर भी फूँक मारनी होगी.अब इस सामग्री को लेकर उस मकान में प्रवेश करे और मन ही मन मन्त्र जप करते रहे.आखिरी कमरे में प्रवेश कर ४-५ दाने उडद के बिखेर दे और और उस कमरे से बाहर आकर उस कमरे की दरवाजे की चौखट पर कील ठोक दे.यही क्रिया प्रत्येक कमरों में करे. और आखिर में बाहर निकल कर मुख्य दरवाजे को भी कीलित कर दे.इस प्रयोग से खोयी खुशियाँ वापिस आती ही है. ये मेरा स्वयं का कई बार परखा हुआ प्रयोग है. मन्त्र- ओम नमो आदेश गुरुन को ईश्वर वाचा,अजरी-बजरी बाड़ा बज्जरी मैं बज्जरी बाँधा दशौ दुवार छवा ,और के घालों तो पलट हनुमंत वीर उसी को मारे,पहली चौकी गणपती,दूजी चौकी हनुमंत,तीजी चौकी में भैरों,चौथी चौकी देत रक्षा करन को आवें श्री नरसिंह देव जी, शब्द साँचा,पिण्ड काँचा,चले मन्त्र ईश्वरो वाचा. .. ................ नारायणास्त्रम् ।। हरिः ॐ नमो भगवते श्रीनारायणाय नमो नारायणाय विश्वमूर्तये नमः श्री पुरुषोत्तमाय पुष्पदृष्टिं प्रत्यक्षं वा परोक्षं अजीर्णं पञ्चविषूचिकां हन हन ऐकाहिकं द्वयाहिकं त्र्याहिकं चातुर्थिकं ज्वरं नाशय नाशय चतुरशितिवातानष्टादशकुष्ठान् अष्टादशक्षय रोगान् हन हन सर्वदोषान् भंजय भंजय तत्सर्वं नाशय नाशय आकर्षय आकर्षय शत्रून् शत्रून् मारय मारय उच्चाटयोच्चाटय विद्वेषय विदे्वेषय स्तंभय स्तंभय निवारय निवारय विघ्नैर्हन विघ्नैर्हन दह दह मथ मथ विध्वंसय विध्वंसय चक्रं गृहीत्वा शीघ्रमागच्छागच्छ चक्रेण हत्वा परविद्यां छेदय छेदय भेदय भेदय चतुःशीतानि विस्फोटय विस्फोटय अर्शवातशूलदृष्टि सर्पसिंहव्याघ्र द्विपदचतुष्पद पद बाह्यान्दिवि भुव्यन्तरिक्षे अन्येऽपि केचित् तान्द्वेषकान्सर्वान् हन हन विद्युन्मेघनदी पर्वताटवीसर्वस्थान रात्रिदिनपथचौरान् वशं कुरु कुरु हरिः ॐ नमो भगवते ह्रीं हुं फट् स्वाहा ठः ठं ठं ठः नमः ।। ।। विधानम् ।। एषा विद्या महानाम्नी पुरा दत्ता मरुत्वते । असुराञ्जितवान्सर्वाञ्च्छ क्रस्तु बलदानवान् ।। १।। यः पुमान्पठते भक्त्या वैष्णवो नियतात्मना । तस्य सर्वाणि सिद्धयन्ति यच्च दृष्टिगतं विषम् ।। २।। अन्यदेहविषं चैव न देहे संक्रमेद्ध्रुवम् । संग्रामे धारयत्यङ्गे शत्रून्वै जयते क्षणात् ।। ३।। अतः सद्यो जयस्तस्य विघ्नस्तस्य न जायते । किमत्र बहुनोक्तेन सर्वसौभाग्यसंपदः ।। ४।। लभते नात्र संदेहो नान्यथा तु भवेदिति । गृहीतो यदि वा येन बलिना विविधैरपि ।। ५।। शतिं समुष्णतां याति चोष्णं शीतलतां व्रजेत् । अन्यथां न भवेद्विद्यां यः पठेत्कथितां मया ।। ६।। भूर्जपत्रे लिखेन्मंत्रं गोरोचनजलेन च । इमां विद्यां स्वके बद्धा सर्वरक्षां करोतु मे ।। ७।। पुरुषस्याथवा स्त्रीणां हस्ते बद्धा विचेक्षणः । विद्रवंति हि विघ्नाश्च न भवंति कदाचनः ।। ८।। न भयं तस्य कुर्वंति गगने भास्करादयः । भूतप्रेतपिशाचाश्च ग्रामग्राही तु डाकिनी ।। ९।। शाकिनीषु महाघोरा वेतालाश्च महाबलाः । राक्षसाश्च महारौद्रा दानवा बलिनो हि ये ।। १०।। असुराश्च सुराश्चैव अष्टयोनिश्च देवता । सर्वत्र स्तम्भिता तिष्ठेन्मन्त्रोच्चारणमात्रतः ।। ११।। सर्वहत्याः प्रणश्यंति सर्व फलानि नित्यशः । सर्वे रोगा विनश्यंति विघ्नस्तस्य न बाधते ।। १२।। उच्चाटनेऽपराह्णे तु संध्यायां मारणे तथा । शान्तिके चार्धरात्रे तु ततोऽर्थः सर्वकामिकः ।। १३।। इदं मन्त्ररहस्यं च नारायणास्त्रमेव च । त्रिकालं जपते नित्यं जयं प्राप्नोति मानवः ।। १४।। आयुरारोग्यमैश्वर्यं ज्ञानं विद्यां पराक्रमः । चिंतितार्थ सुखप्राप्तिं लभते नात्र संशयः ।। १५।। ।। इति नारायणास्त्रम् ।।…………. ............. भविष्य अपने आप में कई रहस्य समेटे हुए हैं | यही वजह हैं कि हम सब अपने भविष्य के बारे जानने के लिय उत्सुक हैं || सभी समस्या का समाधान वैदिक विधियों द्वारा समस्याओं का समाधान... जन्म कुंडली के द्वारा , विद्या, कारोबार, विवाह, संतान सुख, विदेश-यात्रा, लाभ-हानि, गृह-क्लेश , गुप्त- शत्रु , कर्ज से मुक्ति, सामाजिक, आर्थिक, राजनितिक .व्यापार नौकरी. प्यार जीवन साथी.धन लाभ. आर्थिक संपन्नता.संतान की चिंता.शिक्षा, .पारिवारिक अशांति. और के बारे में. क्या अच्छा होगा ,क्या बुरा होगा होगा ,मेरा अच्छा समय कब आएगा अन्य व्यक्तिगत समस्या है यह जानना सबके लिए काफी रोचक होता हैं इन प्रश्नों के उत्तर जन्म कुंडली से आसानी दिए जा सकते || जानने के लिए सम्पर्क करे० श्रीराम ज्योतिष सदन. पन्डित आशु बहुगुणा …….आपकी कोई ज्योतिष संबंधित है समस्या तो आप अपनी जानकारी निम्न प्रारूप सभी हमारे ईमेल... shriramjyotishsadan16gmail.com... पर भेजे. यथा संभव हिंदी में जानकारी भेजने का कष्ट करे..धन्यवाद.. नोट:-- ये मेरा शोख नही हैं कृप्या आप मुक्त सेवा के लिए कष्ट ना दे... हमसे ...आप .Mob.9411813740..Mob.9760924411. इसी नंबर पर संपर्क करें... ............... मनुष्य के जीवन में आए दिन परेशानियां आती रहती है। यदि कुछ साधारण तांत्रिक प्रयोग किए जाएं तो वह समस्याएं शीघ्र ही समाप्त भी हो जाती हैं। तांत्रिक प्रयोग में एक ऐसे पत्थर का उपयोग किया जाता है जो दिखने में साधारण होता है लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से अपना प्रभाव दिखाता है। उस पत्थर का नाम है गोमती चक्र। गोमती चक्र कम कीमत वाला एक ऐसा पत्थर है जो गोमती नदी में मिलता है। विभिन्न तांत्रिक कार्यों तथा असाध...्य रोगों में इसका प्रयोग होता है। इसका तांत्रिक उपयोग बहुत ही सरल होता है। जैसे-

1- पति-पत्नी में मतभेद हो तो तीन गोमती चक्र लेकर घर के दक्षिण में हलूं बलजाद कहकर फेंद दें, मतभेद समाप्त हो जाएगा।

2- पुत्र प्राप्ति के लिए पांच गोमती चक्र लेकर किसी नदी या तालाब में हिलि हिलि मिलि मिलि चिलि चिलि हुक पांच बोलकर विसर्जित करें, पुत्र प्राप्ति की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

3- यदि बार-बार गर्भ गिर रहा हो तो दो गोमती चक्र लाल कपड़े में बांधकर कमर में बांध दें तो गर्भ गिरना बंद हो जाता है।

4- यदि कोई कचहरी जाते समय घर के बाहर गोमती चक्र रखकर उस पर दाहिना पांव रखकर जाए तो उस दिन कोर्ट-कचहरी में सफलता प्राप्त होती है।

5- यदि शत्रु बढ़ गए हों तो जितने अक्षर का शत्रु का नाम है उतने गोमती चक्र लेकर उस पर शत्रु का नाम लिखकर उन्हें जमीन में गाड़ दें तो शत्रु परास्त हो जाएंगे ............ र्तमान समय में बेरोजगारी एक बहुत बड़ी समस्या है। नौकरी न होने के कारण न तो समाज में मान-सम्मान मिलता है और न ही घर-परिवार में। यदि आप भी बेरोजगार हैं और बहुत प्रयत्न करने पर भी रोजगार नहीं मिल रहा है तो निराश होने की कोई जरुरत नहीं है। नीचे लिखे साधारण उपाय कर आप कुछ ही दिनों में रोजगार पा सकते हैं।

उपाय

यह उपाय सोमवार से प्रारंभ करना है। सोमवार के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि नित्य कर्म करने... के बाद पास ही स्थित किसी शिव मंदिर में नंगे पैर जाएं और शिवजी को बिल्वपत्र तथा जल अर्पित करें। आते-जाते समय कहीं रुके नहीं तथा मार्ग में ऊँ नम: शिवाय: मंत्र का जप करते रहें। ऐसा लगातार 21 दिनों तक करें। जब आप कहीं इंटरव्यू देने जाएं तो उसके पहले लाल चंदन की माला से नीचे लिखे मंत्र का ११ बार जप करें-

मंत्र- ऊँ वक्रतुण्डाय हुं

मंत्र जप के बाद इंटरव्यू देने जाएं। अवश्य ही आपकी मनोकामना पूरी होगी।

प्रस्तुतकर्ता Pandit AshuBahuguna ...............................................................................पेड़-पौधों के टोटके हमारे आसपास पाए जाने वाले विभिन्न पेड़-पौधों के पत्तों, फलों आदि का टोटकों के रूप में उपयोग भी हमारी सुख-समृद्धि की वृद्धि में सहायक हो सकता है। यहां कुछ ऐसे ही सहज और सरल उपायों का उल्लेख प्रस्तुत है, जिन्हें अपना कर पाठकगण लाभ उठा सकते हैं। विल्व पत्र : अश्विनी नक्षत्र वाले दिन एक रंग वाली गाय के दूध में बेल के पत्ते डालकर वह दूघ निःसंतान स्त्री को पिलाने से उसे संतान की प्राप्ति होती है। अपामार्ग की जड़ : अश्विनी नक्षत्र में अपामार्ग की जड़ लाकर इसे तावीज में रखकर किसी सभा में जाएं, सभा के लोग वशीभूत होंगे। नागर बेल का पत्ता : यदि घर में किसी वस्तु की चोरी हो गई हो, तो भरणी नक्षत्र में नागर बेल का पत्ता लाकर उस पर कत्था लगाकर व सुपारी डालकर चोरी वाले स्थान पर रखें, चोरी की गई वस्तु का पला चला जाएगा। संखाहुली की जड़ : भरणी नक्षत्र में संखाहुली की जड़ लाकर तावीज में पहनें तो विपरीत लिंग वाले प्राणी आपसे प्रभावित होंगे। आक की जड़ : कोर्ट कचहरी के मामलों में विजय हेतु आर्द्रा नक्षत्र में आक की जड़ लाकर तावीज की तरह गले में बांधें। दूधी की जड़ : सुख की प्राप्ति के लिए पुनर्वसु नक्षत्र में दूधी की जड़ लाकर शरीर में लगाएं। शंख पुष्पी : पुष्य नक्षत्र में शंखपुष्पी लाकर चांदी की डिविया में रखकर तिजोरी में रखें, धन की वृद्धि होगी। बरगद का पत्ता : अश्लेषा नक्षत्र में बरगद का पत्ता लाकर अन्न भंडार में रखें, भंडार भरा रहेगा। धतूरे की जड़ : अश्लेषा नक्षत्र में धतूरे की जड़ लाकर घर में रखें, घर में सर्प नहीं आएगा और आएगा भी तो कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा। बेहड़े का पत्ता : पूर्वा फाल्गुनी नक्षत्र में बेहड़े का पत्ता लाकर घर में रखें, घर ऊपरी हवाओं के प्रभाव से मुक्त रहेगा। नीबू की जड़ : उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र में नीबू की जड़ लाकर उसे गाय के दूध में मिलाकर निःसंतान स्त्री को पिलाएं, उसे पुत्र की प्राप्ति होगी। चंपा की जड़ : हस्त नक्षत्र में चंपा की जड़ लाकर बच्चे के गले में बांधें, बच्चे की प्रेत बाधा तथा नजर दोष से रक्षा होगी। चमेली की जड़ : अनुराधा नक्षत्र में चमेली की जड़ गले में बांधें, शत्रु भी मित्र हो जाएंगे। काले एरंड की जड़ : श्रवण नक्षत्र में एरंड की जड़ लाकर निःसंतान स्त्री के गले में बांधें, उसे संतान की प्राप्ति होगी। तुलसी की जड़ : पूर्वा भाद्रपद नक्षत्र में तुलसी की जड़ लाकर मस्तिष्क पर रखें, अग्निभय से मुक्ति मिलेगी।..............................................चमत्कारी तांत्रिक टोटको से करें भाग्य वृद्धि: ................ तांत्रिक टोटकों में काम आने वाली चीजों में सियार सिंगी, हत्था जोड़ी, काले घोड़े की नाल और श्वेतार्क का अपना अलग ही महत्व है क्योंकि इनके विभिन्न प्रयोगों से चमत्कार घटित होते हैं। ऐसे ही कुछ उपायों की जानकारी भाग्य में चमत्कार उत्पन्न कर सकती है। लाभ की सीमा अनुभव करके जानी जा सकती है। तंत्र का टोटका-साधना भौतिक वस्तुओ पर आधारित होता है। विभिन्न प्रकार की चमत्कारी वनस्पतियों एवं प्रकृति की अनोखी वस्तुओ का विधि-विद्गोष के साथ प्रयोग ही व्यवाहारिक तंत्र का आधार है। तंत्र-टोटका केवल तन को सुख देने वाला होता है। साधना- क्रिया मे मंत्र की भी आवद्गयकता होती है। पर जिस प्रकार प्राण-धारण के लिए शरीर आवद्गयक है उसी प्रकार तंत्रटोटका मे अदुभुत दुर्लभ वस्तुओं की परम आवद्गयकता होती है। यहां अनुभव सिद्व तांत्रिक टोटका वस्तुओ की पूर्ण जानकारी के लिये तांत्रिक प्रयोग के बारे में विशेष सतर्कता आवश्यक है। आजकल बाजारों में नकली सियारसिंगी व हत्थाजोडी अधिक मिलती है अतः इनसे वांच्छित प्रभाव नही की जा सकती। प्रामाणिक असली वस्तु परीक्षण कर सावधानी पूर्वक खरीदकर लाभ प्राप्त करें। उससे सफलता अवद्गय मिलती है। असली सामग्री सिद्ध होकर साधक का सभी कार्य पूर्ण करती है ! 1-सिंयार सिंगीः-यह पद्गाु तंत्र शास्त्र की अमूल्य निधि है इसको गीदडसिंगी भी कहते है। वन्य-पद्गाुओं में नरसियार के सिर पर एक प्रकार की गांठ होती हैं उसे ही सिंयार सिंगी कहा जाता है। सियारसिंगी की गाठें तंत्र शास्त्र में अदुभुत शक्ति सम्पन्न बतायी गई है। सिंयारसिगी में सुरक्षा, सम्मोहन, वंद्गाीकरण, सम्पति वर्द्धन की दिव्य-शक्ति होती हैं। इसे किसी विद्गवसनीय तात्रिंक से ही प्राप्त कर निम्न मंत्र द्वारा 'सिद्व कुरू-कुरू नमः' मंत्र से शुभ मुहुर्त में एक आक के पते पर रखना चाहिए। पूर्व में मुख करके सिंयार सिंगी को रखना चाहिए। साधक 108 बार एक रूद्राक्ष माला से 11 दिन तक फूंक मारे। आक-पत्र को रोजाना बदलना चाहिए। ऐसा करने पर सियारसिंगी सिद्व होगी। सिद्व होने पर इसे चांदी या स्टील की डिब्बी के अन्दर रखना चाहिए, साथ मे सिंदूर, लौंग व इलायची रखनी चाहिए। जिस के पास गीदड सिंगी होती है उसे आने वाली दुर्घटना या शुभ घटना की सत्य सूचना स्वप्न में प्राप्त हो जाती है। ऐसे व्यक्ति के घर में सदैंव लक्ष्मी का वास रहता हैं, उसके नाम की विजय पताका फहराती हैं तथा कोई संकट भी उसे छू नही सकता। सिंयारसिंगी के अन्य तंत्र-टोटकेः 1. वंद्गाीकरण प्रयोगः 'क्क नमः नर-मादा सिंयारसिगायः अमुक मम वद्गय कुरू-कुरू स्वाहाः। जिस स्त्री पुरूष को अपने वद्गा में करना हो तब अमुक के स्थान पर इच्छित व्यक्ति का नाम आक के पते पर लिखकर सिंयारसिगी को उसके ऊपर रखे। उपरोक्त मंत्र का जाप 108 बार कर के फूंक मारें। मंत्र जाप के समय अमुक के स्थान पर नाम का प्रयोग अवद्गय करें। सियारसिंगी को डिब्बी में बन्द करके लौंगइलायची के साथ रखें। दूसरे दिन सामने वाले व्यक्ति को डिब्बी में रखी लौंग इलायची खिला दिया जाय तो वह व्यक्ति चाहे वह स्त्री हो या पुरुष या सरकारी अधिकारी, या कितनी ही कठोर हृदय वाली स्त्री, पूर्णरूप से आपके वश में होगा। यह चमत्कारी प्रयोग पति-पत्नी पर, गृह क्लेद्गा से परेद्गाान परिवार पर कर के लाभ उठायें, तलाक एवं आत्म हत्या जैसी समस्याओं का गारण्टी से इलाज संभव है। योग्य व्यक्ति साक्षात्कार एंव प्रतियोगिता में भी प्रयोग करके उचित लाभ प्राप्त कर सकता हैं। 2 धनवृद्वि के लिएः-क्क नमः नर-मादा सिंयारसिगाय मम् घर धन वर्षा कुरू-कुरू स्वाहाः' इस मंत्र का प्रयोग ऋण-मुक्ति एंव धन वृद्धि करने में सक्षम होता है। पूजा स्थल पर डिब्बी का ढक्कन खोल कर आक के पते पर अपना नाम लिखकर रखें। दीपावली की रात्रि को जब तक नीदं आये तब तक उपरोक्त मंत्र का एक रूद्राक्ष माला से दक्षिणावर्ती शंख के सामने जाप कर फूंक मारें, ऐसा करने से लक्ष्मी की अपार कृपा होगी। साधक के घर धनवर्षा होने लगेगी, व्यापार स्थल पर रखने पर बन्द व्यापार भी चलने लग जाता है। स्थाई लक्ष्मी की चमत्कारी कृपा बनी रहती है। यह प्रयोग सभी साधक कर सकते है। रवि-पुष्य, गुरु-पुष्य नक्षत्र योग में भी यह प्रयोग सम्पन्न किया जा सकता है। 3-द्गारीर सुरक्षा के लिएः-नमः सियांरसिगाय मम् स्वरक्षा कुरू-कुरू स्वाहा इस मंत्र की साधना साधक को अपनी सुरक्षा हेतु करनी चाहिए। जंगल में किसी एकान्त स्थान पर जाकर उतरामुखी बैठकर 108 बार धूप-दीपक के साथ सियारसिंगी को अभिमंत्रित करे शत्रु एंव भुत-प्रेत भय, एक्सीडेन्ट और असाध्य रोग से सुरक्षा बनी रहती है। साधक की दीर्घायु होकर हमेद्गाा सुखी जीवन बना रहता है। यह शरीर के सुरक्षा कवच का काम करती है। उच्चाटन एंव तांत्रिक क्रियाओं का प्रकोप नही होता हैं, साधक को अनायास भय से तुरन्त मुक्ति मिलती है। यह प्रयोग स्त्री या पुरूष कोई भी साधक कर सकता है। 4-जिन स्त्रियों के पति कुसंगति के कारण किसी गलत स्त्री की चुंगल में फंस गये हो तो नर-मादा सिंयारसिगी के साथ वालें सिन्दूर से मांग भरे एवं मासिक धर्म के समय पत्नी रात को पति के बाल काट कर जलाकर भस्म को सिंदूर के साथ केले के रस मे तिलक करे तो सब ठीक हो जायेगा, नारी की कुसंगति उसी दिन से छूट जायेगी 5. अगर स्त्री अपनी माहवारी का रक्त एवं सिद्ध सिंयारसिगी के साथ के सिंदूर को मिलाकर पति को टीका लगा दे, तो पति निद्गिचत रूप से वद्गा मे रहता है। यह प्रयोग अन्य स्त्री-पुरुष भी कर सकते हैं 2. हत्था जोडीः तंत्र विद्या में हत्थाजोडी अपना महत्वपूर्ण स्थान रखती है। वास्तव में यह एक पौधे की जड है। परन्तु अपनी अदभुत रूपाकृति और विचित्र संरचना के कारण साधको के मन को मोह लेती है। इसके निर्माण में बारीकी के साथ सौंदर्य का पूर्ण समावेद्गा है। यह वस्तु वनस्पति श्रेणी में आती है। इसकी उत्पति भारत, ईरान, इराक, फ्रांस, ्जर्मनी, पाकिस्तान, एद्गिाया महाद्वीप में सभी जगह होती है। वनस्पति होने के कारण यह औषधीय गुणो मे प्रभावकारी मानी गई है। परन्तु तांत्रिको द्धारा बहुत मान्यता प्राप्त तंत्र है। तंत्र शास्त्र में इसके अनेक अद्भुत् प्रयोग वर्णित है हत्थाजोडी तंत्र जगत की शीघ््रा प्रभावी चमत्कारी विचित्र वस्तु है। जिस व्यक्ति के पास असली सिद्ध हाथाजोडी होती है उसके भाग्य को चमका देती है। उसके खिलाफ कोई भी व्यक्ति कुछ नही कर पाता है। कोर्ट के मुकदमे में विजय प्राप्ति तथा शत्रु को वशीभूत करने में कमाल दिखाती है। इसे पास रखने से राजा व अधिकारी भी वंद्गाीभूत हो जाते हैं। हाथाजोडी को स्टील की डिब्बी में लौंग, इलायची व सिन्दूर के साथ ही रखना चाहिए। असली प्रमाणिक हाथाजोडी प्राप्त कर प्रयोग करके लाभ उठावें। यदि किसी का बच्चा रोता अधिक है एवं जल्दी-जल्दी बीमार हो जाता है तो शाम के समय, हत्थाजोडी के साथ रखे लौंग-इलायची को लेकर धूप देना चाहिए। यह शनिवार के दिन अधिक लाभ देता है। हत्थाजोडी के तांत्रिक टोटका प्रयोग 1-क्क हत्थाजोडी मम् सर्व कार्य सिद्ध कुरू-कुरू स्वाहाः' मंत्र से पीपल के पते पर अपना नाम लिखकर हत्थाजोड़ी को पत्ते पर रखें। रुद्राक्ष - माला से रोजाना तीन माला पांच दिन तक जाप करें। इसे सिद्ध-अभिमंत्रित होने पर पूजा-स्थल पर रखें। साधक के सभी कार्य करने हेतु जागृत हो जाती है। 2. वद्गाीकरण के लिएः-क्क हत्थाजोड़ी अमुक मम् वद्गय कुरू-कुरू स्वाहाः' श्वेत आक के पते पर सामने वाले व्यक्ति का नाम लिख कर हत्थाजोड़ी को डिब्बी से निकाल कर पते पर रखना चाहिए। फिर उपरोक्त मंत्र 108 बार स्फटिक माला से जप कर फूंक मारें तथा उसी दिन वद्गाीकरण प्रयोग करने वाले व्यक्ति के पास जाना चाहिए एवं अपने काम की बात करनी चाहिए। निद्गचय ही कार्य सफल होगा, साघक के कहे अनुसार कार्य करेगा। 3-कन्या के शीध्र विवाह हेतुः-क्क नमः हत्थाजोडी मम् विवाह विलंब पतन कुरू-कुरू स्वाहाः' हर सोमवार को इस मंत्र के जाप से कन्या का विवाह शीध्र हो जाता है। इसके अलावा कन्या गायत्री मंत्र भी सिद्धकर सकती है। इसमें माता जी का वास होता है। आज कल तो माता-पिता अपनी कन्याओं को कार-बंगले की जगह हाथाजोडी दहेज में देते हैं जिससे पति व सास वद्गा में रहती हैं परिवारिक गृह क्लेद्गा भी नही होता हैं। दापत्यजीवन सफलतापूर्वक सम्पन्न होता है, तलाक व आत्महत्या जैसे महापापो से भी मुक्ति मिलती है। 4-जीवन में सफलता हेतुः-क्क ऐं हीं क्ली चामुण्डायै विच्चे इस मंत्र द्वारा सिद्ध की गई हाथाजोडी जीवन के विभिन्न क्षेत्रो में साधक को सफलता प्रदान करती है। जिस घर में विधिवत सिद्ध की गई असली हाथाजोडी की पूजा होती है, वह साघक सभी प्रकार से सुरक्षित और श्री सम्पन्न रहता है। इसका प्रभाव अचूक होता है। इसका प्रयोग कोई भी साधक स्त्री-पुरूष कर सकता है। यह जिसके पास भी होगी वह व्यक्ति अवश्य ही अद्भूत रूप से प्रभावद्गााली होगा। उसमे सम्मोहन, वशीकरण, सुरक्षा और सम्पत्तिवर्द्धन की चमत्कारी शक्ति आ जाती है। यात्रा, विवाद, प्रतियोगिता, साक्षात्कार, यु़द्ध क्षेत्र आदि मे साघक की रक्षा करके उसे विजय प्रदान करती है। भूत-प्रेत, वायव्य आत्माओं का कोई भय नही रहता है, धन सम्पति देने मे बहुत चमत्कारिक व प्रामाणिक सिद्ध हुई है। हत्थाजोडी के साथ चान्दी का सिक्का या एक नेपाली रुपया रख देना चाहिए। दैनिक पूजन-दर्द्गान करना बहुत ही लाभकारी होता है। इसकी शक्ति को उतरोतर बढाने के लिए नर-मादा सिंयारसिगी को सामने आक के पते पर रखकर उपरोक्त मंत्र से हवन करना चाहिए। होली, दीपावली ्नवरात्र को मंत्र जाप से तीव्र वंद्गाीकरण प्रयोग सम्पन्न किये जा सकते हैं! 5-पति को वद्गा में करने के लिएः-स्त्री अपनी माहवारी के रक्त के साथ तीन-तीन लौंग व इलायची, ्सियारसिगीं की डिब्बी से निकाल कर भस्म बनायें। महावारी के रक्त में मिलाकर पति को टीका लगाने से सब ठीक हो जाता है। पति दूसरी स्त्री का साथ छोड देता है, अपनी स्त्री को अघिक प्यार करना शुरू कर देगा। यह प्रयोग गारण्टी से लाभ देता है। 6-यदि किसी का बच्चा रोता अधिक है एवं जल्दी-जल्दी बीमार हो जाता है तो शाम के समय, हत्थाजोडी के साथ रखे लौंग-इलायची को लेकर धूप देना चाहिए। यह शनिवार के दिन अधिक लाभ देता है। 7-यदि घर में लडाई-झगडा व क्लेद्गा अधिक होता हैं तो शुक्ल पक्ष में परिवार में सभी सदस्यों के नाखून काटकर हाथाजोडी वाले लोग-इलायची को नाखून के साथ भवन कें ब्रह्यस्थान पर जलाकर भस्म बनाकर सभी को टीका लगायें एवं स्त्री मांग भरे तो परिवार मे सुख शान्ति होती है ! 3-काले धोडे की नालः-द्गानिवार के दिन काले घोडे की नाल को खुलवा कर घर लेजाने से पूर्व किसी चौराहे पर तीन बार नाल से मारे, तत्पश्चात नाल को गंगा जल व कच्चे दूध से स्नान कराकर अगरबत्ती, धूप व दीपक के साथ पूजन करना चाहिये। यह नाल पृथ्वी तत्व से भरपूर होती है क्योकि अद्गव जब दोड लगाता है तब बार-बार नाल पृथ्वी पर टकराने के कारण सकारात्मक उर्जा एकत्रित कर पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण बल एवं घर्षण के कारण चुम्बकीय प्रवाह के रुप मे काम करती है। शुद्ध-प्रामाणिक नाल प्राप्त कर तांत्रिक प्रयोग करें तो सफलता मिलती है।................सुखी दांपत्य जीवन हेतु यदि आपके दांपत्य सुख में कमी है, आपको शत्रु परेशान कर रहे हैं, कारोबार में हमेशा उठा-पटक लगी रहती हो घर में धन की कमी रहती हो या आप शारीरिक रोगों से ग्रस्त है तो हर रोज तुलसी के पौधे में जल चढ़ाएं। ऊँ नमो भगवते वासुदेवाय नम:मंत्र का जाप करें।೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦೦ ೦೦೦೦೦೦೦೦टोटकों द्वारा चमत्कार:- मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक कष्टों का निवारण टोटके जैसे उपायों से हो सकता है लेकिन उसके लिए मन में विश्वास की पूर्ण शक्ति होनी चाहिए तभी मनका चाहा अवश्य में मिलता है क्योंकि विश्वास ही फलदायक होता है। ऐसे ही कुछ टोटकों की जानकारी प्रस्तुत है इस लेख मेंकृ आर्थिक समृद्धि के लिए :- बहुत समय से आर्थिक स्थिति खराब चल रही हो तो 5 वीरवार महालक्ष्मी की श्रृंगार सामग्री मंदिर में पुजारिन को दान में दें। लेकिन दी हुई सामग्री दुबारा उस पुजारिन को न दें। इससे आपका व्यापार या आय का साधन सुधरता जायेगा। धीरे-धीरे आप महसूस करेंगे। मेहनत करने पर भी आय के पर्याप्त साधन नहीं जुटा पाने की स्थिति में 9 वीरवार केसर वाले मिठे चावल गरीब या मजदूरी करने वाले मजदूरों को बांटें, 3 वीरवार के बाद आपकी मेहनत आपको अच्छा फल देने लगेगी। इस उपाय को आप 45 दिनों के बाद दोबारा कर सकते हैं, परन्तु साल में 1 या दो बार ही कर सकते हैं। आर्थिक संपन्नता एवं घर में अन्न की बरकत बनाये रखने के लिए गेहूं को पिसवाते वक्त उसमें केसर की पत्तियां एवं तुलसी दल मिलाकर पिसा लें और उस आटे की बनी हुई रोटी घर में खाने से अन्न और धन की कभी कमी नहीं रहती। नजर के लिए :-यदि आप को एवं आपके व्यवसाय को बार बार किसी की नजर लग रही हो तो सेंधा नमक शुक्रवार को पानी में भिगोकर रात को रखें और शनिवार को सुबह अपने व्यावसायिक स्थल पर उस पानी का पौंछा लगवायें। 21 शनिवार लगातार करने से बुरी नजर से बचा जा सकता है और जातक खुद रात को फिटकरी से दांत साफ करके सोएं। इस उपाय से नजर दोष से बचा जा सकता है। बुरी नजर से बचने के लिए तांबे का 9ग9 एवं सवा इंच मोटा स्वास्तिक बनाकर मेन गेट पर लगाने से बुरी नजर वाले लोगों से बचा जा सकता है। बुरी नजर का जातक पर यदि बहुत ज्यादा प्रभाव हो रहा हो तो उस जातक को गले में गोमती चक्र चांदी के अंदर बनाकर धारण कर लेना चाहिए। पन्ना नग धारण करने से भी बुरी आत्माओं एवं नजर से बचा जा सकता है। कर्ज मुक्ति के उपाय : बार-बार कर्ज उतारने के बाद यदि कोई जातक फिर से कर्ज से युक्त हो जाता है तो उस जातक को अपने आस-पास के धर्म स्थान में घर से नंगे पैर जाकर परमात्मा से माफी मांगनी चाहिए एवं शिवजी पर गन्ने का जूस चढ़ाते हुए क्क नमो शिवाय मंत्र का जाप करें। लगातार 108 दिन करने से धीरे धीरे जातक कर्ज से मुक्त हो जाएगा। किसी हनुमान मंदिर में शनिवार की रात्रि के समय जहां पीपल का वृक्ष हो, आटे का चौमुखी दीपक सरसों का तेल डालकर पीपल के नीचे जलाएं और हनुमान मूर्ति की तरफ मुंह करके 11 हनुमान चालीसा का पाठ करें। 21 शनिवार लगातार श्रद्ध ापूर्वक करने से व्यवसाय की उन्नति होगी एवं कर्ज से मुक्ति मिलेगी। रोग मुक्ति के लिए : बार बार दवा लेने पर भी किसी जातक का रोग दूर न हो रहा हो तो उस जातक को रात के 9 बजे सवा किलो कच्चा दूध लेकर शिवलिंग पर पतली धार में 'क्क नमः शिवाय' मंत्र का जाप करते हुए चढ़ाना चाहिए। यह ध्यान रहे कि वह दूध शिवलिंग की जलेरी से होते हुए वापिस किसी बर्तन में ही आएं। उस दूध को किसी काले रंग के सांड को पिलाएं। 45 दिन लगातार ऐसा करने से जातक को दवा लगने लगेगी और रोग से मुक्ति प्राप्त होगी। ...............मनोवांछित श्रेष्ठ वर-प्राप्ति प्रयोग १॰ भगवती सीता ने गौरी की उपासना निम्न मन्त्र द्वारा की थी, जिसके फलस्वरुप उनका विवाह भगवान् श्रीराम से हुआ। अतः कुमारी कन्याओं को मनोवाञ्छित वर पाने के लिये इसका पाठ करना चाहिए। “ॐ श्रीदुर्गायै सर्व-विघ्न-विनाशिन्यै नमः स्वाहा। सर्व-मङ्गल-मङ्गल्ये, सर्व-काम-प्रदे देवि, देहि मे वाञ्छितं नित्यं, नमस्ते शंकर-प्रिये।। दुर्गे शिवेऽभये माये, नारायणि सनातनि, जपे मे मङ्गले देहि, नमस्ते सर्व-मङ्गले।।” विधि- प्रतिदिन माँ गौरी का स्मरण-पूजन कर ११ पाठ करे। २॰ कन्याओं के विवाहार्थ अनुभूत प्रयोग इसका प्रयोग द्वापर में गोपियों ने श्रीकृष्ण को पति-रुप में प्राप्त करने के लिए किया था। ‘नन्द-गोप-सुतं देवि’ पद को आवश्यकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है, जैसे- ‘अमुक-सुतं अमुकं देवि’। “कात्यायनि महा-माये महा-योगिन्यधीश्वरि। नन्द-गोप-सुतं देवि, पतिं मे कुरु ते नमः।” विधि- भगवती कात्यायनी का पञ्चोपचार (१ गन्ध-अक्षत २ पुष्प ३ धूप ४ दीप ५ नैवेद्य) से पूजन करके उपर्युक्त मन्त्र का १०,००० (दस हजार) जप तथा दशांश हवन, तर्पण तथा कन्या भोजन कराने से कुमारियाँ इच्छित वर प्राप्त कर सकती है। ३॰. लड़की के शीघ्र विवाह के लिए ७० ग्राम चने की दाल, ७० से॰मी॰ पीला वस्त्र, ७ पीले रंग में रंगा सिक्का, ७ सुपारी पीला रंग में रंगी, ७ गुड़ की डली, ७ पीले फूल, ७ हल्दी गांठ, ७ पीला जनेऊ- इन सबको पीले वस्त्र में बांधकर विवाहेच्छु जातिका घर के किसी सुरक्षित स्थान में गुरुवार प्रातः स्नान करके इष्टदेव का ध्यान करके तथा मनोकामना कहकर पोटली को ऐसे स्थान पर रखें जहाँ किसी की दृष्टि न पड़े। यह पोटली ९० दिन तक रखें। ४॰ श्रेष्ठ वर की प्राप्ति के लिए बालकाण्ड का पाठ करे। ५॰ किसी स्त्री जातिका को अगर किसी कारणवश विवाह में विलम्ब हो रहा हो, तो श्रावण कृष्ण सोमवार से या नवरात्री में गौरी-पूजन करके निम्न मन्त्र का २१००० जप करना चाहिए- “हे गौरि शंकरार्धांगि यथा त्वं शंकर प्रिया। तथा मां कुरु कल्याणी कान्त कान्तां सुदुर्लभाम।।” ६॰ “ॐ गौरी आवे शिव जी व्याहवे (अपना नाम) को विवाह तुरन्त सिद्ध करे, देर न करै, देर होय तो शिव जी का त्रिशूल पड़े। गुरु गोरखनाथ की दुहाई।।” उक्त मन्त्र की ११ दिन तक लगातार १ माला रोज जप करें। दीपक और धूप जलाकर ११वें दिन एक मिट्टी के कुल्हड़ का मुंह लाल कपड़े में बांध दें। उस कुल्हड़ पर बाहर की तरफ ७ रोली की बिंदी बनाकर अपने आगे रखें और ऊपर दिये गये मन्त्र की ५ माला जप करें। चुपचाप कुल्हड़ को रात के समय किसी चौराहे पर रख आवें। पीछे मुड़कर न देखें। सारी रुकावट दूर होकर शीघ्र विवाह हो जाता है। ७॰ जिस लड़की के विवाह में बाधा हो उसे मकान के वायव्य दिशा में सोना चाहिए। ८॰ लड़की के पिता जब जब लड़के वाले के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें तो लड़की अपनी चोटी खुली रखे। जब तक पिता लौटकर घर न आ जाए तब तक चोटी नहीं बाँधनी चाहिए। ९॰ लड़की गुरुवार को अपने तकिए के नीचे हल्दी की गांठ पीले वस्त्र में लपेट कर रखे। १०॰ पीपल की जड़ में लगातार १३ दिन लड़की या लड़का जल चढ़ाए तो शादी की रुकावट दूर हो जाती है। ११॰ विवाह में अप्रत्याशित विलम्ब हो और जातिकाएँ अपने अहं के कारण अनेक युवकों की स्वीकृति के बाद भी उन्हें अस्वीकार करती रहें तो उसे निम्न मन्त्र का १०८ बार जप प्रत्येक दिन किसी शुभ मुहूर्त्त से प्रारम्भ करके करना चाहिए। “सिन्दूरपत्रं रजिकामदेहं दिव्याम्बरं सिन्धुसमोहितांगम् सान्ध्यारुणं धनुः पंकजपुष्पबाणं पंचायुधं भुवन मोहन मोक्षणार्थम क्लैं मन्यथाम। महाविष्णुस्वरुपाय महाविष्णु पुत्राय महापुरुषाय पतिसुखं मे शीघ्रं देहि देहि।।” १२॰ किसी भी लड़के या लड़की को विवाह में बाधा आ रही हो यो विघ्नहर्ता गणेशजी की उपासना किसी भी चतुर्थी से प्रारम्भ करके अगले चतुर्थी तक एक मास करना चाहिए। इसके लिए स्फटिक, पारद या पीतल से बने गणेशजी की मूर्ति प्राण-प्रतिष्ठित, कांसा की थाली में पश्चिमाभिमुख स्थापित करके स्वयं पूर्व की ओर मुँह करके जल, चन्दन, अक्षत, फूल, दूर्वा, धूप, दीप, नैवेद्य से पूजा करके १०८ बार “ॐ गं गणेशाय नमः” मन्त्र पढ़ते हुए गणेश जी पर १०८ दूर्वा चढ़ायें एवं नैवेद्य में मोतीचूर के दो लड्डू चढ़ायें। पूजा के बाद लड्डू बच्चों में बांट दें। यह प्रयोग एक मास करना चाहिए। गणेशजी पर चढ़ये गये दूर्वा लड़की के पिता अपने जेब में दायीं तरफ लेकर लड़के के यहाँ विवाह वार्ता के लिए जायें। १३॰ पति-स्तवनम् नमः कान्ताय सद्-भर्त्रे, शिरश्छत्र-स्वरुपिणे। नमो यावत् सौख्यदाय, सर्व-सेव-मयाय च।। नमो ब्रह्म-स्वरुपाय, सती-सत्योद्-भवाय च। नमस्याय प्रपूज्याय, हृदाधाराय ते नमः।। सती-प्राण-स्वरुपाय, सौभाग्य-श्री-प्रदाय च। पत्नीनां परनानन्द-स्वरुपिणे च ते नमः।। पतिर्ब्रह्मा पतिर्विष्णुः, पतिरेव महेश्वरः। पतिर्वंश-धरो देवो, ब्रह्मात्मने च ते नमः।। क्षमस्व भगवन् दोषान्, ज्ञानाज्ञान-विधापितान्। पत्नी-बन्धो, दया-सिन्धो दासी-दोषान् क्षमस्व वै।। ।।फल-श्रुति।। स्तोत्रमिदं महालक्ष्मि, सर्वेप्सित-फल-प्रदम्। पतिव्रतानां सर्वासाण, स्तोत्रमेतच्छुभावहम्।। नरो नारी श्रृणुयाच्चेल्लभते सर्व-वाञ्छितम्। अपुत्रा लभते पुत्रं, निर्धना लभते ध्रुवम्।। रोगिणी रोग-मुक्ता स्यात्, पति-हीना पतिं लभेत्। पतिव्रता पतिं स्तुत्वा, तीर्थ-स्नान-फलं लभेत्।। विधिः- १॰ पतिव्रता नारी प्रातः-काल उठकर, रात्रि के वस्त्रों को त्याग कर, प्रसन्नता-पूर्वक उक्त स्तोत्र का पाठ करे। फिर घर के सभी कामों से निबट कर, स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण कर, भक्ति-पूर्वक पति को सुगन्धित जल से स्नान करा कर शुक्ल वस्त्र पहनावे। फिर आसन पर उन्हें बिठाकर मस्तक पर चन्दन का तिलक लगाए, सर्वांग में गन्ध का लेप कर, कण्ठ में पुष्पों की माला पहनाए। तब धूप-दीप अर्पित कर, भोजन कराकर, ताम्बूल अर्पित कर, पति को श्रीकृष्ण या श्रीशिव-स्वरुप मानकर स्तोत्र का पाठ करे। २॰ कुमारियाँ श्रीकृष्ण, श्रीविष्णु, श्रीशिव या अन्य किन्हीं इष्ट-देवता का पूजन कर उक्त स्तोत्र के नियमित पाठ द्वारा मनो-वाञ्छित पति पा सकती है। ३॰ प्रणय सम्बन्धों में माता-पिता या अन्य लोगों द्वारा बाधा डालने की स्थिति में उक्त स्तोत्र पाठ कर कोई भी दुखी स्त्री अपनी कामना पूर्ण कर सकती है। ४॰ उक्त स्तोत्र का पाठ केवल स्त्रियों को करना चाहिए। पुरुषों को ‘विरह-ज्वर-विनाशक, ब्रह्म-शक्ति-स्तोत्र’ का पाठ करना चाहिए, जिससे पत्नी का सुख प्राप्त हो सकेगा।.....................सर्व -मनोकामना पूर्ति हेतू भैरव साबर मंत्र प्रयोग दिन :- कृष्ण पक्ष की अष्टमी से शुरु करे (७ दिन की साधना है ) समय :- रात्रि (९;35) पर दिशा :- दक्षिण आसन:- कम्बल का होना चाहिए पूजन सामग्री :- कनेर या गेंदे के फूल ,,बेसन के लड्डू ,,सिंदूर ,,दो लौंग ,,चौमुखा तेल का दीपक,,ताम्बे की प्लेट ,,लोबान ,,गाय का कच्चा दूध ,,गंगाजल ,, साधना सामग्री :- भैरव यन्त्र ,, साफल्य माला या काले हकीक की माला मंत्र :-""ॐ ह्रीं बटुक भैरव ,बालक वेश ,भगवान वेश ,सब आपत को काल ,भक्त जन हट को पाल ,कर धरे सिर कपाल,दूजे करवाला त्रिशक्ति देवी को बाल ,भक्त जन मानस को भाल ,तैतीस कोटि मंत्र का जाल ,प्रत्यक्ष बटुक भैरव जानिए ,मेरी भक्ति गुरु की शक्ति ,फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा "" विधि :- सर्व प्रथम गुरु पूजन कर के गुरुदेव से प्रयोग की आज्ञा ले ले ,,फिर अपनी मनोकामना एक कागज में लिख कर गुरु यन्त्र के नीचे रख दे ,,और मन ही मन गुरुदेव से साधना की सफलता के लिए विनती करे ,, फिर ताम्बे की प्लेट में भैरव यन्त्र स्थापित करे उसे दूध से स्नान कराए ,,फिर गंगाजल से स्नान कराकर यन्त्र को पोछ ले ,,इस के बाद यन्त्र में सिंदूर से तिलक लगाये ,,और यन्त्र के सामने दो लौंग स्थापित करे,,और उस यन्त्र को लोबान का धुप दे ,,तेल का दीपक अपने बायीं ओर जला के रख ले ,,साधना काल तक दीपक अखंड जलना चाहिए ,,फिर साफल्य माला या काले हकीक की माला से निम्न मंत्र का दो माला जप करे,,यह प्रक्रम सात दिन तक करना है ,,आठवे दिन यन्त्र और माला को जल में प्रवाहित कर दे.................टोटके का प्रयोग टोटके का प्रयोग करते समय उसके अनुरुप मुहूर्त्त का ध्यान अवश्य रखना चाहिए, ताकि कार्य की सिद्धि निर्विघ्न हो सके और करने में कोई बाधा या अड़चन न पड़े । आकाश में स्थित ग्रह, नक्षत्र प्रतिक्षण ब्रह्माण्ड के पर्यावरण को बदलते रहते हैं और उनका प्रभाव जड़ व चेतन सभी पदार्थों पर अवश्य ही पड़ता है । अतः साधना के सम्पादन में दिन, समय, तिथि, नक्षत्र सभी का ध्यान रखना आवश्यक है । लग्न* वृष, धनु और मीन लग्न में किसी भी प्रकार की साधना या अनुष्ठान नहीं करना चाहिए, क्योंकि इन लग्नों का प्रभाव साधक को निराशा, असफलता, दुःख और अवमानना देने वाला होता है ।* मिथुन लग्न भी अनुष्ठान के लिये प्रतिकुल फलदायी होती है, जिसका दुष्प्रभाव साधक की संतान को भोगना पड़ सकता है ।* मेष, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, मकर और कुम्भ लग्न में किये गये अनुष्ठान शुभ, सुफलदायक, श्रीसम्पत्ति-दायक और मान बढ़ाने वाले होते हैं । दिशा* पूर्व दिशाः- सम्मोहन, देव-कृपा, सात्त्विक कर्म के उपयुक्त ।* पश्चिमः- सुख-समृद्धि, लक्ष्मी-प्राप्ति, मान-प्रतिष्ठा के लिये शीघ्रफलदायक ।* उत्तरः- रोगों की चिकित्सा, मानसिक-शान्ति, आरोग्य-प्राप्ति हेतु ।* दक्षिणः- अभिचार-कर्म, मारण, उच्चाटन, शत्रु-शमन हेतु । मास तथा ऋतुमासः-चैत्र - दुःसह-कारक, वैशाख – धनप्रद, ज्येष्ठ - मृत्यु, आषाढ - पुत्र, श्रावण – शुभ, भाद्रपद - ज्ञान-हानि,आश्विन - सर्व-सिद्धि, कार्तिक - ज्ञान-सिद्धि, मार्गशीर्ष - शुभ, पौष – दुःख, माघ - मेघावृद्धि, फाल्गुन – वशीकरण कारक होता है ।ऋतुः-हेमन्त - शान्ति, पुष्टि के अनुष्ठान । वसन्त - वशीकरण । शिशिर - स्तम्भन । ग्रीष्म – विद्वेषण, मारण । वर्षा – उच्चाटन । शरद – मारण ।तिथि तथा पक्षतिथिः- सुख-साधन, संपन्नता के लिए सप्तमी तिथि, ज्ञान एवं शिक्षा के लिए द्वितीया, पंचमी व एकादशी शुभ मानी गयी है । शत्रुनाश के लिये दशमी, सभी कामनाओं के लिए द्वादशी श्रेष्ठ होती है ।पक्षः- ऐश्वर्य, शान्ति, पुष्टिकर मन्त्रों की साधना शुक्ल पक्ष में और मुक्तिप्रद मन्त्रों की साधना कृष्ण पक्ष में प्रारम्भ की जाती है।...................टोटकों द्वारा चमत्कार:- मानसिक, आर्थिक एवं शारीरिक कष्टों का निवारण टोटके जैसे उपायों से हो सकता है लेकिन उसके लिए मन में विश्वास की पूर्ण शक्ति होनी चाहिए तभी मनका चाहा अवश्य में मिलता है क्योंकि विश्वास ही फलदायक होता है। ऐसे ही कुछ टोटकों की जानकारी प्रस्तुत है इस लेख मेंकृ आर्थिक समृद्धि के लिए :- बहुत समय से आर्थिक स्थिति खराब चल रही हो तो 5 वीरवार महालक्ष्मी की श्रृंगार सामग्री मंदिर में पुजारिन को दान में दें। लेकिन दी हुई सामग्री दुबारा उस पुजारिन को न दें। इससे आपका व्यापार या आय का साधन सुधरता जायेगा। धीरे-धीरे आप महसूस करेंगे। मेहनत करने पर भी आय के पर्याप्त साधन नहीं जुटा पाने की स्थिति में 9 वीरवार केसर वाले मिठे चावल गरीब या मजदूरी करने वाले मजदूरों को बांटें, 3 वीरवार के बाद आपकी मेहनत आपको अच्छा फल देने लगेगी। इस उपाय को आप 45 दिनों के बाद दोबारा कर सकते हैं, परन्तु साल में 1 या दो बार ही कर सकते हैं। आर्थिक संपन्नता एवं घर में अन्न की बरकत बनाये रखने के लिए गेहूं को पिसवाते वक्त उसमें केसर की पत्तियां एवं तुलसी दल मिलाकर पिसा लें और उस आटे की बनी हुई रोटी घर में खाने से अन्न और धन की कभी कमी नहीं रहती। नजर के लिए :-यदि आप को एवं आपके व्यवसाय को बार बार किसी की नजर लग रही हो तो सेंधा नमक शुक्रवार को पानी में भिगोकर रात को रखें और शनिवार को सुबह अपने व्यावसायिक स्थल पर उस पानी का पौंछा लगवायें। 21 शनिवार लगातार करने से बुरी नजर से बचा जा सकता है और जातक खुद रात को फिटकरी से दांत साफ करके सोएं। इस उपाय से नजर दोष से बचा जा सकता है। बुरी नजर से बचने के लिए तांबे का 9ग9 एवं सवा इंच मोटा स्वास्तिक बनाकर मेन गेट पर लगाने से बुरी नजर वाले लोगों से बचा जा सकता है। बुरी नजर का जातक पर यदि बहुत ज्यादा प्रभाव हो रहा हो तो उस जातक को गले में गोमती चक्र चांदी के अंदर बनाकर धारण कर लेना चाहिए। पन्ना नग धारण करने से भी बुरी आत्माओं एवं नजर से बचा जा सकता है। कर्ज मुक्ति के उपाय : बार-बार कर्ज उतारने के बाद यदि कोई जातक फिर से कर्ज से युक्त हो जाता है तो उस जातक को अपने आस-पास के धर्म स्थान में घर से नंगे पैर जाकर परमात्मा से माफी मांगनी चाहिए एवं शिवजी पर गन्ने का जूस चढ़ाते हुए क्क नमो शिवाय मंत्र का जाप करें। लगातार 108 दिन करने से धीरे धीरे जातक कर्ज से मुक्त हो जाएगा। किसी हनुमान मंदिर में शनिवार की रात्रि के समय जहां पीपल का वृक्ष हो, आटे का चौमुखी दीपक सरसों का तेल डालकर पीपल के नीचे जलाएं और हनुमान मूर्ति की तरफ मुंह करके 11 हनुमान चालीसा का पाठ करें। 21 शनिवार लगातार श्रद्ध ापूर्वक करने से व्यवसाय की उन्नति होगी एवं कर्ज से मुक्ति मिलेगी। रोग मुक्ति के लिए : बार बार दवा लेने पर भी किसी जातक का रोग दूर न हो रहा हो तो उस जातक को रात के 9 बजे सवा किलो कच्चा दूध लेकर शिवलिंग पर पतली धार में 'क्क नमः शिवाय' मंत्र का जाप करते हुए चढ़ाना चाहिए। यह ध्यान रहे कि वह दूध शिवलिंग की जलेरी से होते हुए वापिस किसी बर्तन में ही आएं। उस दूध को किसी काले रंग के सांड को पिलाएं। 45 दिन लगातार ऐसा करने से जातक को दवा लगने लगेगी और रोग से मुक्ति प्राप्त होगी।...................(कुछ अनुभूत टोटके कौऐ का एक एक पूरा काला पंख कही से मिल जाए जो अपने आप ही निकला हो उसे “ॐ काकभूशुंडी नमः सर्वजन मोहय मोहय वश्य वश्य कुरु कुरु स्वाहा”इस मंत्र को बोलते जाए और पंख पर फूंक लगाते जाए, इस प्रकार १०८ बार करे. फिर उस पंख को आग लगा कर भस्म कर दे. उस भस्म को अपने सामने रख कर लोबान धुप दे और फिर से १०८ बाद बिना किसी माला के अपने सामने रख कर दक्षिण दिशा की और मुख कर जाप करे. इस भस्म का तिलक ७ दिन तक करे. तिलक करते समय भी मंत्र को ७ बार बोले. ऐसा करने पर सर्व जन साधक से मोहित होते है मोर के पंख को घर के मंदिर मे रखने से समृद्धि की वृद्धि होती है गधे के दांत पर “ॐ नमो कालरात्रि सर्वशत्रु नाशय नमः”का जाप १०८ बार कर के उसे निर्जन स्थान मे रात्री काल मे गाड दे तो सर्व शत्रुओ से मुक्ति मिलती है. उल्लू का पंख मिले तो उसे अपने सामने रख कर “ॐ उल्लुकाना विद्वेषय फट”का जाप १००० बार कर उसे जिस के घर मे फेंक दिया जाए वहा पर विद्वेषण होता है आक के रुई से दीपक बना कर उसे शिव मंदिर मे प्रज्वल्लित करने से शिव प्रस्सन होते है, ऐसा नियमित रूप से करने से ग्रह बाधा से मुक्ति मिलती है धतूरे की जड़ अपने आप मे महत्वपूर्ण है, इसे अपने घर मे स्थापित कर के महाकाली का पूजन कर “क्रीं” बीज का जाप किया जाए तो धन सबंधी समस्याओ से मुक्ति मिलती है अपने घर मे अपराजिता की बेल को उगाए, उसे रोज धुप दे कर “ॐ महालक्ष्मी वान्छितार्थ पूरय पूरय नमःका जाप १०८ बार करे तो मनोकामना की पूर्ति होती है निर्जन स्थान मे “प्रेत मोक्षं प्रदोमभवः”का ११ बार उच्चारण कर के खीर तथा जल रख कर आ जाए ऐसा ३ दिन करे तो मनोकामना पूर्ति मे सहायता मिलती है. धुप करते समय चन्दन का टुकड़ा ड़ाल कर धुप करने से ग्रह प्रस्सन रहते है किसी चेतनावान मज़ार पर मिठाई को बांटना अत्यंत ही शुभ माना गया है ऐसा विवरण कई प्राच्य ग्रंथो मे प्राप्त होता है, इससे सभी प्रकारसे उन्नति की प्राप्ति होती है.................................‘साबर’ मन्त्रों की साधना के पूर्व ‘सर्वार्थ-साधक’ मन्त्र को 21 बार जप लेना चाहिए । इसके बाद अपने अभीष्ट मन्त्र की साधना करें । ‘सर्वार्थ-साधक’ मन्त्र का जप करते समय ध्यान रखें कि इसका कोई भी शब्द या वर्ण उच्चारण में अशुद्ध न हो । सर्वार्थ-साधक-मन्त्र- “गुरु सठ गुरु सठ गुरु हैं वीर, गुरु साहब सुमरौं बड़ी भाँत । सिंगी टोरों बन कहौं, मन नाऊँ करतार । सकल गुरु की हर भजे, घट्टा पकर उठ जाग, चेत सम्भार श्री परम-हंस ।” इसके पश्चात् गणेश जी का ध्यान करके निम्न मन्त्र की एक माला जपें - ध्यानः- “वक्र-तुन्ड, माह-काय ! कोटि-सूर्य-सम-प्रभ ! निर्विघ्नं कुरु मे देव ! सर्व-कार्येषु सर्वदा ।।” मन्त्रः- “वक्र-तुण्डाय हुं ।” फिर निम्न-लिखित मन्त्र से दिग्बन्धन कर लें - “वज्र-क्रोधाय महा-दन्ताय दश-दिशो बन्ध बन्ध, हूं फट् स्वाहा ।” उक्त मन्त्र से दशों दिशाएँ सुरक्षित हो जाती है और किसी प्रकार का विघ्न साधक की साधना में नहीं पड़ता । नाभि में दृष्टि जमाने से ध्यान बहुत शीघ्र लगता है और मन्त्र शीघ्र सिद्ध होते हैं । इसके बाद मन्त्र को सिद्ध करने के लिए उसका जप करना चाहिए । किसी मन्त्र को सिद्ध करने के लिए ‘दशहरा’, ‘दीपावली’, ‘होली’, ‘ग्रहण-काल′, ‘शिवरात्रि’, नवरात्रि आदि स्वयं सिद्ध पर्व माने जाते हैं....................काली के अलद-अलग तंत्रों में अनेक भेद हैं । कुछ पूर्व में बतलाये गये हैं । अन्यच्च आठ भेद इस प्रकार हैं - १॰ संहार-काली, २॰ दक्षिण-काली, ३॰ भद्र-काली, ४॰ गुह्य-काली, ५॰ महा-काली, ६॰ वीर-काली, ७॰ उग्र-काली तथा ८॰ चण्ड-काली । ‘कालिका-पुराण’ में उल्लेख हैं कि आदि-सृष्टि में भगवती ने महिषासुर को “उग्र-चण्डी” रुप से मारा एवं द्वितीयसृष्टि में ‘उग्र-चण्डी’ ही “महा-काली” अथवा महामाया कहलाई । योगनिद्रा महामाया जगद्धात्री जगन्मयी । भुजैः षोडशभिर्युक्ताः इसी का नाम “भद्रकाली” भी है । भगवती कात्यायनी ‘दशभुजा’ वाली दुर्गा है, उसी को “उग्र-काली” कहा है । कालिकापुराणे – कात्यायनीमुग्रकाली दुर्गामिति तु तांविदुः । “संहार-काली” की चार भुजाएँ हैं यही ‘धूम्र-लोचन’ का वध करने वाली हैं । “वीर-काली” अष्ट-भुजा हैं, इन्होंने ही चण्ड का विनाश किया “भुजैरष्टाभिरतुलैर्व्याप्याशेषं वमौ नमः” इसी ‘वीर-काली’ विषय में दुर्गा-सप्तशती में कहा हैं । “चण्ड-काली” की बत्तीस भुजाएँ हैं एवं शुम्भ का वध किया था । यथा – चण्डकाली तु या प्रोक्ता द्वात्रिंशद् भुज शोभिता । समयाचार रहस्य में उपरोक्त स्वरुपों से सम्बन्धित अन्य स्वरुप भेदों का वर्णन किया है । संहार-काली – १॰ प्रत्यंगिरा, २॰ भवानी, ३॰ वाग्वादिनी, ४॰ शिवा, ५॰ भेदों से युक्त भैरवी, ६॰ योगिनी, ७॰ शाकिनी, ८॰ चण्डिका, ९॰ रक्तचामुण्डा से सभी संहार-कालिका के भेद स्वरुप हैं । संहार कालिका का महामंत्र १२५ वर्ण का ‘मुण्ड-माला तंत्र’ में लिखा हैं, जो प्रबल-शत्रु-नाशक हैं । दक्षिण-कालिका -कराली, विकराली, उमा, मुञ्जुघोषा, चन्द्र-रेखा, चित्र-रेखा, त्रिजटा, द्विजा, एकजटा, नीलपताका, बत्तीस प्रकार की यक्षिणी, तारा और छिन्नमस्ता ये सभी दक्षिण कालिका के स्वरुप हैं । भद्र-काली - वारुणी, वामनी, राक्षसी, रावणी, आग्नेयी, महामारी, घुर्घुरी, सिंहवक्त्रा, भुजंगी, गारुडी, आसुरी-दुर्गा ये सभी भद्र-काली के विभिन्न रुप हैं । श्मशान-काली – भेदों से युक्त मातंगी, सिद्धकाली, धूमावती, आर्द्रपटी चामुण्डा, नीला, नीलसरस्वती, घर्मटी, भर्कटी, उन्मुखी तथा हंसी ये सभी श्मशान-कालिका के भेद रुप हैं । महा-काली - महामाया, वैष्णवी, नारसिंही, वाराही, ब्राह्मी, माहेश्वरी, कौमारी, इत्यादि अष्ट-शक्तियाँ, भेदों से युक्त-धारा, गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा इत्यादि सब नदियाँ महाकाली का स्वरुप हैं । उग्र-काली - शूलिनी, जय-दुर्गा, महिषमर्दिनी दुर्गा, शैल-पुत्री इत्यादि नव-दुर्गाएँ, भ्रामरी, शाकम्भरी, बंध-मोक्षणिका ये सब उग्रकाली के विभिन्न नाम रुप हैं । वीर-काली -श्रीविद्या, भुवनेश्वरी, पद्मावती, अन्नपूर्णा, रक्त-दंतिका, बाला-त्रिपुर-सुंदरी, षोडशी की एवं काली की षोडश नित्यायें, कालरात्ति, वशीनी, बगलामुखी ये सभी वीरकाली ये सभी वीरकाली के नाम भेद रुप हैं ।............................श्री बटुक-बलि-मन्त्रः- घर के बाहर दरवाजे के बायीं ओर दो लौंग तथा गुड़ की डली रखें । निम्न तीनों में से किसी एक मन्त्र का उच्चारण करें - १॰ “ॐ ॐ ॐ एह्येहि देवी-पुत्र, श्री मदापद्धुद्धारण-बटुक-भैरव-नाथ, सर्व-विघ्नान् नाशय नाशय, इमं स्तोत्र-पाठ-पूजनं सफलं कुरु कुरु सर्वोपचार-सहितं बलि मिमं गृह्ण गृह्ण स्वाहा, एष बलिर्वं बटुक-भैरवाय नमः।” २॰ “ॐ ह्रीं वं एह्येहि देवी-पुत्र, श्री मदापद्धुद्धारक-बटुक-भैरव-नाथ कपिल-जटा-भारभासुर ज्वलत्पिंगल-नेत्र सर्व-कार्य-साधक मद्-दत्तमिमं यथोपनीतं बलिं गृह्ण् मम् कर्माणि साधय साधय सर्वमनोरथान् पूरय पूरय सर्वशत्रून् संहारय ते नमः वं ह्रीं ॐ ।।” ३॰ “ॐ बलि-दानेन सन्तुष्टो, बटुकः सर्व-सिद्धिदः। रक्षां करोतु मे नित्यं, भूत-वेताल-सेवितः।।”೦೦೦जो तंत्र से भय खाता हैं, वह मनुष्य ही नहीं हैं, वह साधक तो बन ही नहीं सकता! गुरु गोरखनाथ के समय में तंत्र अपने आप में एक सर्वोत्कृष्ट विद्या थी और समाज का प्रत्येक वर्ग उसे अपना रहा था! जीवन की जटिल समस्याओं को सुलझाने में केवल तंत्र ही सहायक हो सकता हैं! परन्तु गोरखनाथ के बाद में भयानन्द आदि जो लोग हुए उन्होंने तंत्र को एक विकृत रूप दे दिया! उन्होंने तंत्र का तात्पर्य भोग, विलास, मद्य, मांस, पंचमकार को ही मान लिया ! हैं:....................पुराणों में श्लोक संख्या सुखसागर के अनुसारः (1) ब्रह्मपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं। (2) पद्मपुराण में श्लोकों की संख्या पचपन हजार हैं। (3) विष्णुपुराण में श्लोकों की संख्या तेइस हजार हैं। (4) शिवपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं। (5) श्रीमद्भावतपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं। (6) नारदपुराण में श्लोकों की संख्या पच्चीस हजार हैं। (7) मार्कण्डेयपुराण में श्लोकों की संख्या नौ हजार हैं। (8) अग्निपुराण में श्लोकों की संख्या पन्द्रह हजार हैं। (9) भविष्यपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार पाँच सौ हैं। (10) ब्रह्मवैवर्तपुराण में श्लोकों की संख्या अठारह हजार हैं। (11) लिंगपुराण में श्लोकों की संख्या ग्यारह हजार हैं। (12) वाराहपुराण में श्लोकों की संख्या चौबीस हजार हैं। (13) स्कन्धपुराण में श्लोकों की संख्या इक्यासी हजार एक सौ हैं। (14) वामनपुराण में श्लोकों की संख्या दस हजार हैं। (15) कूर्मपुराण में श्लोकों की संख्या सत्रह हजार हैं। (16) मत्सयपुराण में श्लोकों की संख्या चौदह हजार हैं। (17) गरुड़पुराण में श्लोकों की संख्या उन्नीस हजार हैं। (18) ब्रह्माण्डपुराण में श्लोकों की संख्या बारह हजार हैं।.............................रोग एवं अपमृत्यु-निवारक प्रयोग ।। श्री अमृत-मृत्युञ्जय-मन्त्र प्रयोग ।। किसी प्राचीन शिवालय में जाकर गणेश जी की “ॐ गं गणपतये नमः” मन्त्र से षोडशोपचार पूजन करे । तदनन्तर “ॐ नमः शिवाय” मन्त्र से महा-देव जी की पूजा कर हाथ में जल लेकर विनियोग पढ़े - विनियोगः- ॐ अस्य श्री अमृत-मृत्युञ्जय-मन्त्रस्य श्री कहोल ऋषिः, विराट् छन्दः, अमृत-मृत्युञ्जय सदा-शिवो देवता, अमुक गोत्रोत्पन्न अमुकस्य-शर्मणो मम समस्त-रोग-निरसन-पूर्वकं अप-मृत्यु-निवारणार्थे जपे विनियोगः । ऋष्यादि-न्यासः- श्री कहोल ऋषये नमः शिरसि, विराट् छन्दसे नमः मुखे, अमृत-मृत्युञ्जय सदा-शिवो देवतायै नमः हृदि, मम समस्त-रोग-निरसन-पूर्वकं अप-मृत्यु-निवारणार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे । कर-न्यासः- ॐ अंगुष्ठाभ्यां नमः, जूं तर्जनीभ्यां नमः, सः मध्यमाभ्यां नमः, मां अनामिकाभ्यां नमः, पालय कनिष्ठिकाभ्यां नमः, पालय कर-तल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः । षडङ्ग-न्यासः- ॐ हृदयाय नमः, जूं शिरसे स्वाहा, सः शिखायै वषट्, मां कवचाय हुं, पालय नेत्र-त्रयाय वोषट्, पालय अस्त्राय फट् । ध्यानः- स्फुटित-नलिन-संस्थं, मौलि-बद्धेन्दु-रेखा-स्रवदमृत-रसार्द्र चन्द्र-वन्ह्यर्क-नेत्रम् । स्व-कर-लसित-मुद्रा-पाश-वेदाक्ष-मालं, स्फटिक-रजत-मुक्ता-गौरमीशं नमामि ।। मूल-मन्त्रः- “ॐ जूं सः मां पालय पालय ।” पुरश्चरणः- सवा लाख मन्त्र-जप के लिए पाँच हजार जप प्रतिदिन करना चाहिए । जप के बाद न्यास आदि करके पुनः ध्यान करे । फिर जल लेकर - ‘अनेन-मत् कृतेन जपेन श्री-अमृत-मृत्युञ्जयः प्रीयताम्’ कहकर जल छोड़ दे । जप का दशांश हवनादिक करे । ‘हवन’ हेतु ‘तिलाज्य’ में ‘गिलोय’ भी डालनी चाहिए । हवनादि न कर सकने पर ‘चतुर्गुणित जप’ करने से अनुष्ठान पूर्ण होता है एवं आरोग्यता मिलती है, अप-मृत्यु-निवारण होता है.........................शरीर रक्षा शाबर मन्त्र मन्त्रः- “ॐ नमः वज्र का कोठा, जिसमें पिण्ड हमारा बैठा । ईश्वर कुञ्जी, ब्रह्मा का ताला, मेरे आठों याम का यति हनुमन्त रखवाला ।” प्रयोग एवं विधिः- किसी मंगलवार से उक्त मन्त्र का जप करे । दस हजार जप द्वारा पुरश्चरण कर लें । श्री हनुमान् जी को सवाया रोट का चूरमा (गुड़, घी मिश्रित) अर्पित करें । कार्य के समय मन्त्र का तीन बार उच्चारण कर शरीर पर हाथ फिराएँ, तो शरीर रक्षित हो जाता है ।.........................नवग्रह शाबर मन्त्र रविदेव हवन - हवन सामग्रीः- गौघृत तथा अर्क की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “सत नमो आदेश । गुरुजी को आदेश । ॐ गुरुजी । सुन बा योग मूल कहे बारी बार । सतगुरु का सहज विचार ।। ॐ आदित्य खोजो आवागमन घट में राखो दृढ़ करो मन ।। पवन जो खोजो दसवें द्वार । तब गुरु पावे आदित्य देवा ।। आदित्य ग्रह जाति का क्षत्रिय । रक्त रंजित कश्यप पंथ ।। कलिंग देश स्थापना थाप लो । लो पूजा करो सूर्य नारायण की । सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-मंगल शुक्र शनि । बुध-गुरु-राहु-केतु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ सूर्य मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

सोमदेव हवन - हवन सामग्रीः- गौघृत तथा पलाश की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, सोमदेव मन धरी बा शून्य । निर्मल काया पाप न पुण्य ।। शशी-हर बरसे अम्बर झरे । सोमदेव गुण येता करें । सोमदेव जाति का माली । शुक्ल वर्णी गोत्र अत्री ।। ॐ जमुना तीर स्थापना थाप लो । कन्हरे पुष्प शिव शंकर की पूजा करो ।। सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । मंगल रवि शुक्र शनि । बुध-गुरु-राहु-केतु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ सोम मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

मंगलदेव हवन - हवन सामग्रीः- गौघृत तथा खैर की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, मंगल विषय माया छोड़े । जन्म-मरण संशय हरै । चन्द्र-सूर्य दो सम करै । जन्म-मरण का काल । एता गुण पावो मंगल ग्रह ।। मंगल ग्रह जाति का सोनी । रक्त-रंजित गोत्र भारद्वाजी ।। अवन्तिका क्षेत्र स्थापना थापलो । ले पूजा करो नवदुर्गा भवानी की ।। सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-रवि शुक्र शनि । बुध-गुरु-राहु-केतु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ भोम मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

बुधग्रह हवन - हवन सामग्रीः- गौघृत तथा अपामार्ग की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, बुध ग्रह सत् गुरुजी दिनी बुद्धि । विवरो काया पावो सिद्धि ।। शिव धीरज धरे । शक्ति उन्मनी नीर चढ़े ।। एता गुण बुध ग्रह करै । बुध ग्रह जाति का बनिया ।। हरित हर गोत्र अत्रेय । मगध देश स्थापना थापलो । ले पूजा गणेशजी की करै । सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-रवि शुक्र शनि । मंगल-गुरु-राहु-केतु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ बुध मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

गुरु (बृहस्पति) हवन - हवन सामग्रीः- गौघृत तथा पीपल की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, बृहस्पति विषयी मन जो धरो । पाँचों इन्द्रिय निग्रह करो । त्रिकुटी भई पवना द्वार । एता गुण बृहस्पति देव ।। बृहस्पति जाति का ब्राह्मण । पित पीला अंगिरस गोत्र ।। सिन्धु देश स्थापना थापलो । लो पूजा श्रीलक्ष्मीनारायण की करो ।। सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-रवि शुक्र शनि । मंगल-बुध-राहु-केतु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ गुरु मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

शुक्रदेव हवन हवन सामग्रीः- गौघृत तथा गूलर की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, शुक्रदेव सोधे सकल शरीर । कहा बरसे अमृत कहा बरसे नीर ।। नवनाड़ी बहात्तर कोटा पचन चढ़ै । एता गुण शुक्रदेव करै । शुक्र जाति का सय्यद । शुक्ल वर्ण गोत्र भार्गव ।। भोजकर देश स्थापना थाप लो । पूजो हजरत पीर मुहम्मद ।। सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-रवि मंगल शनि । बुध-गुरु-राहु-केतु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ शुक्र मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

शनिदेव हवन हवन सामग्रीः- गौघृत तथा शमी की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, शनिदेव पाँच तत देह का आसन स्थिर । साढ़े सात, बारा सोलह गिन गिन धरे धीर । शशि हर के घर आवे भान । तौ दिन दिन शनिदेव स्नान । शनिदेव जाति का तेली । कृष्ण कालीक कश्यप गोत्री ।। सौराष्ट्र क्षेत्र स्थापना थाप लो । लो पूजा हनुमान वीर की करो ।। सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-मंगल शुक्र रवि । बुध-गुरु-राहु-केतु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ शनि मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

राहु ग्रह हवन - हवन सामग्रीः- गौघृत तथा दूर्वा की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, राहु साधे अरध शरीर । वीर्य का बल बनाये वीर ।। धुंये की काया निर्मल नीर । येता गुण का राहु वीर । राहु जाति का शूद्र । कृष्ण काला पैठीनस गोत्र ।। राठीनापुर क्षेत्र स्थापना थाप लो । लो पूजा करो काल भैरो ।। सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-रवि शुक्र शनि । मंगल केतु बुध-गुरु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ राहु मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः स्वाहा ।”

केतु ग्रह हवन हवन सामग्रीः- गौघृत तथा कुशा की लकड़ी । दिशाः- पूर्व, मुद्रा-हंसी, संख्याः- ९ बार या १०८ बार । मन्त्रः- “ॐ गुरुजी, केतु ग्रह कृष्ण काया । खोजो मन विषय माया । रवि चन्द्रा संग साधे । काल केतु याते पावे । केतु जाति का असरु जेमिनी गोत्र काला नुर ।। अन्तरवेद क्षेत्र स्थापना थाप लो । लो पूजा करो रौद्र घोर ।। सत फुरै सत वाचा फुरै श्रीनाथजी के सिंहासन ऊपर पान फूल की पूजा चढ़ै । हमारे आसन पर ऋद्धि-सिद्धि धरै, भण्डार भरे । ७ वार, २७ नक्षत्र, ९ ग्रह, १२ राशि, १५ तिथि । सोम-रवि शुक्र शनि । मंगल बुध-राहु-गुरु सुख करै, दुःख हरै । खाली वाचा कभी ना पड़ै ।। ॐ केतु मन्त्र गायत्री जाप । रक्षा करे श्री शम्भुजती गुरु गोरखनाथ । नमो नमः.............................धर्मं-Sanskar 16 संस्कारों में लाइफ मैनेजमेंट के सूत्र हिंदू धर्म में किए जाने वाले 16 संस्कार केवल कर्मकांड या रस्में नहीं हैं। इनमें जीवन प्रबंधन के कई सूत्र छुपे हैं। आज के भागदौड़ भरे जीवन में ये सूत्र हमें जीवन के भौतिक और आध्यात्मिक दोनों विकास को आगे बढ़ाते हैं। हमें इन संस्कारों में खुद के वैवाहिक, विद्यार्थी और व्यवसायिक जीवन के सूत्र तो मिलते ही हैं साथ ही अपनी संतान को कैसे संस्कारवान बनाएं इसके तरीके भी मिलते हैं। पुंसवन संस्कार : इस संस्कार के अंतर्गत भावी माता-पिता को यह समझाया जाता है कि शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक दृष्टि से परिपक्व यानि पूर्ण समर्थ हो जाने के बाद, समाज को श्रेष्ठ, तेजस्वी नई पीढ़ी देने के संकल्प के साथ ही संतान उत्पन्न करें। नामकरण संस्कार: बालक का नाम सिर्फ उसकी पहचान के लिए ही नहीं रखा जाता। मनोविज्ञान एवं अक्षर-विज्ञान के जानकारों का मत है कि नाम का प्रभाव व्यक्ति के स्थूल-सूक्ष्म व्यक्तित्व पर गहराई से पड़ता रहता है। इन्हीं बातों को ध्यान में रखकर नामकरण संस्कार किया जाता है। चूड़ाकर्म संस्कार: (मुण्डन, शिखा स्थापना) सामान्य अर्थ में, माता के गर्भ से सिर पर आए वालों को हटाकर खोपड़ी की सफाई करना आवश्यक होता है। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि से नवजात शिशु के व्यवस्थित बौद्धिक विकास, कुविचारों के परिस्कार के लिये भी यह संस्कार बहुत आवश्यक है। अन्नप्राशसन संस्कार: जब शिशु के दांत उगने लगें, तो मानना चाहिए कि प्रकृति ने उसे ठोस आहार, अन्नाहार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी है। स्थूल (अन्नमयकोष) के विकास के लिए तो अन्न के विज्ञान सम्मत उपयोग को ध्यान में रखकर शिशु के भोजन का निर्धारण किया जाता है। इन्हीं तमाम बातों को ध्यान में रखकर यह महत्वपूर्ण संस्कार संपन्न किया जाता है। विद्यारंभ संस्कार: जब बालक/ बालिका की उम्र शिक्षा ग्रहण करने लायक हो जाय, तब उसका विद्यारंभ संस्कार कराया जाता है । इसमें समारोह के माध्यम से जहां एक ओर बालक में अध्ययन का उत्साह पैदा किया जाता है, वहीं ज्ञान के मार्ग का साधक बनाकर अंत में आत्मज्ञान की और प्रेरित किया जाता है। यज्ञोपवीत संस्कार : जब बालक/ बालिका का शारीरिक-मानसिक विकास इस योग्य हो जाए कि वह अपने विकास के लिए आत्मनिर्भर होकर संकल्प एवं प्रयास करने लगे, तब उसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक एवं सामाजिक अनुशासनों का पालन करने की जिम्मेदारी सोंपी जाती है। विवाह संस्कार : सफल गृहस्थ की, परिवार निर्माण की जिम्मेदारी उठाने के योग्य शारीरिक, मानसिक एवं आर्थिक सामथ्र्य आ जाने पर युवक-युवतियों का विवाह संस्कार कराया जाता है। यह संस्कार जीवन का बहुत महत्वपूर्ण संस्कार है जो एक श्रेष्ठ समाज के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। वानप्रस्थ संस्कार : गृहस्थ की जिम्मेदारियां यथा शीघ्र संपन्न करके, उत्तराधिकारियों को अपने कार्य सौंपकर अपने व्यक्तित्व को धीरे-धीरे सामाजिक, उत्तरदायित्व, पारमार्थिक कार्यों में पूरी तरह लगा देना ही इस संस्कार का उद्देश्य है। अन्येष्टि संस्कार : मृत्यु जीवन का एक अटल सत्य है । इसे जरा-जीर्ण को नवीन-स्फूर्तिवान जीवन में रूपान्तरित करने वाला महान देवता भी कह सकते हैं । मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार): मरणोत्तर (श्राद्ध संस्कार) जीवन का एक अबाध प्रवाह है । शरीर की समाप्ति के बाद भी जीवन की यात्रा रुकती नहीं है । आगे का क्रम भी अच्छी तरह सही दिशा में चलता रहे, इस हेतु मरणोत्तर संस्कार किया जाता है। जन्म दिवस संस्कार : मनुष्य को अन्यान्य प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ माना गया है । जन्मदिन वह पावन पर्व है, जिस दिन ईश्वर ने हमें श्रेष्ठतम मनुष्य जीवन में भेजा। श्रेष्ठ जीवन प्रदान करने के लिये ईश्वर का धन्यवाद एवं जीवन का सदुपयोग करने का संकल्प ही इस संस्कार का मूल उद्देश्य है। विवाह दिवस संस्कार : जैसे जीवन का प्रांरभ जन्म से होता है, वैसे ही परिवार का प्रारंभ विवाह से होता है। श्रेष्ठ परिवार और उस माध्यम से श्रेष्ठ समाज बनाने का शुभ प्रयोग विवाह संस्कार से प्रारंभ होता है।

1.

सही रुद्राक्ष पहनकर करें कालसर्प दोष निवारण

कालर्सप योग पर अनेक शोध हुए है। ज्योतिष इसके प्रभाव कम करने के लिए अनेक उपाय बताते है। कुंडली में मुख्य रूप से बारह तरह के कालसर्प योग बताए गए हैं। आपने काल सर्प दोष शांति के लिए अनेक तरह के उपायों के बारे में सुना होगा, लेकिन क्या आप जानते हैं कि केवल सही रुद्राक्ष धारण करके भी कालसर्प योग के प्रभाव को कम किया जा सकता है। - प्रथम भाव में बनने वाले कालसर्प योग के लिए एकमुखी, आठमुखी और नौ मुखी रुद्राक्ष काले धागे में डालकर गले में धारण करें। - दूसरे भाव में बनने वाले कालसर्प योग के लिए पांचमुखी, आठमुखी और नौमुखी रुद्राक्ष गुरुवार के दिन काले धागे में डालकर गले में पहनें। - यदि कालसर्प योग तीसरे भाव में बन रहा हो तो तीनमुखी, आठमुखी और नौ मुखी रुद्राक्ष लाल धागे में मंगलवार को धारण करें। - चतुर्थ भाव में यदि कालसर्प योग हो तो दोमुखी, आठमुखी, नौमुखी रुद्राक्ष सफेद धागे में डालकर सोमवार को रात्रि के समय धारण करें। - पंचम भाव में बनने वाला कालसर्पयोग हो तो पांचमुखी, आठमुखी, नौमुखी रुद्राक्ष पीले धागे में गुरुवार के दिन धारण करें। छटे भाव के कालसर्प योग के लिए मंगलवार के दिन तीनमुखी आठमुखी और नौमुखी रुद्राक्ष एक लाल धागे में पहनें। - सप्तम भाव में कालसर्प योग हो तो छहमुखी, आठमुखी और नौमुखी रुद्राक्ष एक चमकीले या सफेद धागे में रात्रि के समय पहनना चाहिए। - अष्टम भाव में कालसर्प योग बन रहा हो तो नौ मुखी रुद्राक्ष धारण करें। - नवम् भाव में कालसर्प योग हो तो गुरुवार के दिन दोपहर में पीले धागे में पांचमुखी आठमुखी और नौमुखी रुद्राक्ष पहनना चाहिए। - दशम भाव में कालसर्प योग हो तो बुधवार के दिन संध्या के समय चारमुखी, आठमुखी और नौमुखी रुद्राक्ष हरे रंग के धागे में डालकर धारण करें। - एकादश भाव में यदि कालसर्प योग हो तो एक पीले धागे में दशमुखी, तीनमुखी, चारमुखी रुद्राक्ष धारण करना चाहिए। - यदि द्वादश भाव में कालसर्प योग हो तो शनिवार के दिन शाम को सातमुखी, आठमुखी, और नौमुखी रुद्राक्ष काले धागे में डालकर गले में धारण करे उसके बाद कालसर्प दोष शांति की पूजा के बाद ये रुद्राक्ष धारण करने से कालसर्प योग वाले के जीवन से कालसर्प योग का प्रभाव कम हो जाएगा। इस दोष वाले जातक अद्भुत मानसिक शांति एवं सुख का अनुभव करेंगे।

Puja भगवान की पूजा में ध्यान रखने योग बातें सामान्यत: पूजा हम सभी करते हैं परंतु कुछ छोटी-छोटी बातें जिन्हें ध्यान रखना और उनका पालन करना अतिआवश्यक है। इन छोटी-छोटी बातें के पालन से भगवान जल्द ही प्रसन्न होते हैं और मनोवांछित फल प्रदान करते हैं। यह बातें इस प्रकार हैं- - सूर्य, गणेश, दुर्गा, शिव, विष्णु- यह पंचदेव कहे गए हैं, इनकी पूजा सभी कार्यों में करनी चाहिए।- भगवान की केवल एक मूर्ति की पूजा नहीं करना चाहिए, अनेक मूर्तियों की पूजा से कल्याण की कामना जल्द पूर्ण होती है। - मूर्ति लकड़ी, पत्थर या धातु की स्थापित की जाना चाहिए।- गंगाजी में, शालिग्रामशिला में तथा शिवलिंग में सभी देवताओं का पूजन बिना आवाहन-विसर्जन किया जा सकता है।- घर में मूर्तियों की चल प्रतिष्ठा करनी चाहिए और मंदिर में अचल प्रतिष्ठा।- तुलसी का एक-एक पत्ता कभी नहीं तोड़ें, उसका अग्रभाग तोड़ें। मंजरी को भी पत्रों सहित तोड़ें।- देवताओं पर बासी फूल और जल कभी नहीं चढ़ाएं।- फूल चढ़ाते समय का पुष्प का मुख ऊपर की ओर रखना चाहिए।

Devi यह शक्ति मंत्र पूरी करे हर आरजू़ जीवन में इच्छाओं का अंत नहीं होता। एक पूरी होते ही दूसरी इच्छा पैदा हो जाती है। इसी कवायद में उम्र बढ़ती है और समय बीतता जाता है। इस दौरान कुछ इच्छाएं पूरी होती भी है, किंतु जो अधूरी रह जाती है। उसके मलाल में इंसान परेशान या बैचेन रहता है। सलिए इच्छाओं पर नियंत्रण के लिए धर्म के रास्ते अनेक उपाय बताए गए है। इन उपायों में जप, पूजा, हवन आदि प्रमुख है। इसी कड़ी में शक्ति आराधना के विशेष काल में मातृशक्ति के आवाहन और जप का एक ऐसा उपाय है। जिससे जीवन से जुड़ी हर इच्छा जैसे धन, संपत्ति, स्वास्थ्य, योग्य जीवनसाथी आदि पूरी करने में आने वाली बाधा एक ही मंत्र द्वारा दूर की जा सकती है। जानते है नवरात्रि के विशेष समय में किया जाने वाला यह उपाय - - नवरात्रि के किसी भी दिन दुर्गा पूजा के समय पूर्व दिशा में मुख करके बैठ जाएं।- नवरात्रि के दिन अनुसार दुर्गा रुप की यथाविधि पूजा कर 21 नारियल लाल कपड़े पर रखकर लाल चंदन, अक्षत से पूजा करें। - इसके बाद अपनी कामनापूर्ति का संकल्प लेकर 21 माला नीचे लिखे मंत्र का जप करें - ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै। - मंत्र जप रुद्राक्ष की माला से ही करें। - मंत्र जप पूरे होने पर 21 नारियल लाल कपड़े में बांधकर बहते जल में प्रवाहित करें या किसी योग्य ब्राह्मण को दान करें।- श्रद्धा और आस्था से किया गया यह उपाय मनोरथ पूर्ति में बहुत प्रभावी माना गया है।


2. मालामाल बनाती है श्रीयंत्र पूजा

दौलतमंद बनाती है ऐसी लक्ष्मी पूजा धन या पैसा जीवन की अहम जरुरतों में एक है। आज तेज रफ्तार के जीवन में कईं अवसरों पर यह देखा जाता है कि युवा पीढ़ी चकाचौंध से भरी जीवनशैली को देखकर प्रभावित होती है और बहुत कम समय में ज्यादा कमाने की सोच में गलत तरीकें अपनाती है। जबकि धन का वास्तविक सुख और शांति मेहनत, परिश्रम की कमाई में ही है। ऐसा कमाया धन न केवल आत्मविश्वास के साथ दूसरों का भरोसा भी देता है, बल्कि रुतबा और साख भी बनाता है। धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति ऐसे ही तरीकों में विश्वास रखता है। इसलिए मातृशक्ति की आराधना के इस काल में यहां बताया जा रहा है, एक ऐसा ही उपाय जिसको अपनाकर जीवन में किसी भी सुख से वंचित नहीं रहेंगे और धन का अभाव कभी नहीं सताएगा। यह उपाय है श्रीयंत्र पूजा। धार्मिक दृष्टि से लक्ष्मी कृपा के लिए की जाने वाली श्रीयंत्र साधना संयम और नियम की दृष्टि से कठिन होती है। इसलिए यहां बताई जा रही है श्रीयंत्र पूजा की सरल विधि जिसे कोई भी साधारण भक्त अपनाकर सुख और वैभव पा सकता है। सरल शब्दों में यह पूजा मालामाल बना देती है। श्रीयंत्र पूजा की आसान विधि कोई भी भक्त नवरात्रि या उसके बाद भी शुक्रवार या प्रतिदिन कर सकता है। श्रीयंत्र पूजा के पहले कुछ सामान्य नियमों का जरुर पालन करें - - ब्रह्मचर्य का पालन करें और ऐसा करने का प्रचार न करें। - स्वच्छ वस्त्र पहनें।- सुगंधित तेल, परफ्यूम, इत्र न लगाएं।- बिना नमक का आहार लें। - प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र की ही पूजा करें। यह किसी भी मंदिर, योग्य और सिद्ध ब्राह्मण, ज्योतिष या तंत्र विशेषज्ञ से प्राप्त करें। - यह पूजा लोभ के भाव से न कर सुख और शांति के भाव से करें। इसके बाद श्रीयंत्र पूजा की इस विधि से करें। इसे किसी योग्य ब्राह्मण से भी करा सकते हैं - नवरात्रि या किसी भी दिन सुबह स्नान कर एक थाली में श्रीयंत्र स्थापित करें। - इस श्रीयंत्र को लाल कपड़े पर रखें। - श्रीयंत्र का पंचामृत यानि दुध, दही, शहद, घी और शक्कर को मिलाकर स्नान कराएं। गंगाजल से पवित्र स्नान कराएं।- इसके बाद श्रीयंत्र की पूजा लाल चंदन, लाल फूल, अबीर, मेंहदी, रोली, अक्षत, लाल दुपट्टा चढ़ाएं। मिठाई का भोग लगाएं।- धूप, दीप, कर्पूर से आरती करें। - श्रीयंत्र के सामने लक्ष्मी मंत्र, श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती या जो भी श्लोक आपको आसान लगे, का पाठ करें। किंतु लालच, लालसा से दूर होकर श्रद्धा और पूरी आस्था के साथ करें।- अंत में पूजा में जाने-अनजाने हुई गलती के लिए क्षमा मांगे और माता लक्ष्मी का स्मरण कर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करें। श्रीयंत्र पूजा की यह आसान विधि नवरात्रि में बहुत ही शुभ फलदायी मानी जाती है। इससे नौकरीपेशा से लेकर बिजनेसमेन तक धन का अभाव नहीं देखते। इसे प्रति शुक्रवार या नियमित करने पर जीवन में आर्थिक कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता।

Devi गायत्री के पांच मुखों का रहस्य धार्मिक पुस्तकों में ऐसे कई प्रसंग या वृतांत पढऩे में आते हैं, जो बहुत ही आश्चर्यजनक हैं। लाखों-करोड़ों देवी-देवता, स्वर्ग-नर्क, आकाश-पाताल, कल्पवृक्ष, कामधेनु गाय, इन्द्रलोक....और भी न जाने क्या-क्या। इन आश्चर्यजनक बातों का यदि हम शाब्दिक अर्थ निकालें तो शायद ही किसी निर्णय पर पहुंच सकते हैं। अधिकांस घटनाओं का वर्णन प्रतीकात्मक शैली में किया गया है। गायत्री के पांच मुखों का आश्चर्यजनक और रहस्यात्मक प्रसंग भी कुछ इसी तरह का है। यह संपूर्ण ब्रह्माण्ड जल, वायु, पृथ्वी, तेज और आकाश के पांच तत्वों से बना है। संसार में जितने भी प्राणी हैं, उनका शरीर भी इन्हीं पांच तत्वों से बना है। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव के भीतर गायत्री प्राण-शक्ति के रूप में विद्यमान है। ये पांच तत्व ही गायत्री के पांच मुख हैं। मनुष्य के शरीर में इन्हें पांच कोश कहा गया है। इन पांच कोशों का उचित क्रम इस प्रकार है:- - अन्नमय कोश - प्राणमय कोश - मनोमय कोश - विज्ञानमय कोश - आनन्दमय कोश ये पांच कोश यानि कि भंडार, अनंत ऋद्धि-सिद्धियों के अक्षय भंडार हैं। इन्हें पाकर कोई भी इंसान या जीव सर्वसमर्थ हो सकता है। योग साधना से इन्हें जाना जा सकता है, पहचाना जा सकता है। इन्हें सिद्ध करके यानि कि जाग्रत करके जीव संसार के समस्त बंधनों से मुक्त हो जाता है। जन्म-मृत्यु के चक्र से छूट जाता है। जीव का 'शरीर' अन्न से, 'प्राण' तेज से, 'मन' नियंत्रण से, 'ज्ञान' विज्ञान से और कला से 'आनन्द की श्रीवृद्धि होती है। गायत्री के पांच मुख इन्हीं तत्वों के प्रतीक हैं।

Devi गायत्री की दस भुजाओं का रहस्य वैज्ञानिक तरीके से शोध-अनुसंधान करने के बाद ही देवी-देवता सम्बंधी मान्यता की स्थापना हुई है। आज के तथाकथित पढ़े लिखे लोग देवी-देवता सम्बंधी बातों को अंधविश्वास या अंध श्रृद्धा कहते हैं, किन्तु उनका ऐसा सोचना, उनके आधे-अधूरे ज्ञान की पहचान है। चित्रों और मूर्तियों में देवी-देवताओं को एक से अधिक हाथ और कई मुखों वाला दिखाया जाता है। इन बातों के वास्तविक अर्थ क्या है? इस तरह के सारे प्रश्रों और जिज्ञासाओं का समाधान हम लगातार करते रहेंगे। इसी कड़ी में आज यह जानेगे कि गायत्री की दश भुजाओं का क्या अर्थ है:- इंसान के जीवन में दस शूल यानि कि कष्ट हैं। ये दस कष्ट है—दोषयुक्त दृष्टि, परावलंबन ( दूसरों पर निर्भर होना) , भय, क्षुद्रता, असावधानी, क्रोध, स्वार्थपरता, अविवेक, आलस्य और तृष्णा। गायत्री की दस भुजाएं इन दस कष्टों को नष्ट करने वाली हैं। इसके अतिरिक्त गायत्री की दाहिनी पांच भुजाएं मनुष्य के जीवन में पांच आत्मिक लाभ—आत्मज्ञान, आत्मदर्शन, आत्म-अनुभव, आत्म-लाभ और आत्म-कल्याण देने वाली हैं तथा गायत्री की बाईं पांच भुजाएं पांच सांसारिक लाभ—स्वास्थ्य, धन, विद्या, चातुर्य और दूसरों का सहयोग देने वाली हैं। दस भुजी गायत्री का चित्रण इसी आधार पर किया गया है। ये सभी जीवन विकास की दस दिशाएं हैं। माता के ये दस हाथ, साधक को उन दसों दिशाओं में सुख और समृद्धि प्रदान करते हैं। गायत्री के सहस्रो नेत्र, सहस्रों कर्ण, सहस्रों चरण भी कहे गए हैं। उसकी गति सर्वत्र है। Devi कौन हैं लक्ष्मी, काली और सरस्वती ? सेकड़ों देवी-देवताओं वाले हिन्दू धर्म को अज्ञानतावश कुछ लोग अंधश्रृद्धा वाला धर्म कह देते हैं, किन्तु संसार में सर्वाधिक वैज्ञानिक धर्म कोई है तो वह सनातन हिन्दू धर्म ही है। सामान्य इंसान भी धर्म के मर्म यानि गहराई को समझ सके, यह सौच कर ही ऋषि-मुनियों ने विश्व की विभिन्न सूक्ष्म शक्तियों को देवी-देवताओं के रूप में चित्रित किया है। ईश्वर या परमात्मा अपने तीन कर्तव्यों को पूरा करने के लिए तीन रूपों में प्रकट हुआ- ब्रह्म, विष्णु और महेश। ब्रह्म को रचनाकार, विष्णु को पालनहार और महेश को संहार का देवता कहा गया है। इस त्रिमूर्ति की तीन शक्तियां हैं- ब्रह्म की महासरस्वती, विष्णु की महालक्ष्मी और महेश की महाकाली।इस तरह परमात्मा अपनी शक्ति से संसार का संचालन करता है। हम किसी भी वस्तु के बारे में उसका इतिहास इसी क्रम से जानते हैं- उसका निर्माण, उसकी अवस्था और उसका अंत। इसी क्रम में ब्रह्म-विष्णु-महेश का क्रम भी त्रिमूर्ति में कहा गया है। किंतु जब जीवन में शक्ति की उपासना होती है तो यह क्रम उलटा हो जाता है - महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती। संहार- हम उन बुराइयों का संहार करें, जो बीमारी की तरह हमारे समूचे जीवन को नष्ट कर देती है। बीमारी को जड़ से काट कर जीवन को बचाएं। पोषण- जब बीमारी कट जाए तो शरीर की ताकत बढ़ाने वाला आहार लेना चाहिए। बुराइयां हटाकर जीवन में सद्गुणों का रोपण करें, जिससे आत्मविश्वास मजबूत हो। रचना- जब जीवन बुराइयों से मुक्त होकर सद्गुणों को अपनाता है तो हमारे आदर्श व्यक्तित्व का निर्माण शुरू होता है। संसार संचालन के लिए परमात्मा को अतुलनीय शक्ति, पर्याप्त धन और निर्मल विद्या की आवश्यकता होती है, इसीलिए उसकी शक्ति महाकाली का रंग काला, महालक्ष्मी का रंग पीला (स्वर्ण) और सरस्वती का रंग सफेद (शुद्धता) है। हमें जीवन में यही मार्ग अपनाना चाहिए अर्थात समाज से बुराइयों का नाश और सदाचार का पोषण करें, तभी आदर्श समाज का नवनिर्माण होगा। यह हम तब ही कर सकते हैं जब हमारे पास वीरता, धन और शिक्षा जैसी शक्तियां हों।


भगवान् से विनती प्रार्थना अर्थात् भगवान से विनती जब भी हम किसी भी परेशानी में फंस जाते हैं, जिसका हल हमारे पास नहीं होता या भगवान से हमें कोई मनोकामना पूर्ण कराना हो तो ऐसी परिस्थिति में हम भगवान से जो विनती करते हैं उसे प्रार्थना कहते हैं। प्रार्थना कई प्रकार से की जाती है, जैसे: - इच्छापूर्ति के लिए प्रार्थना- किसी मनोकामना की पूर्ति के लिए भगवान से जो विनती की जाती है उसे इच्छापूर्ति की प्रार्थना कहते हैं।- सामान्य प्रार्थना- कई बार बिना किसी कामना या समस्या के श्रद्धा और भक्ति से भगवान की प्रार्थना की जाती है, वह सामान्य प्रार्थना कहलाती है।- बुराइयों से मुक्ति के लिए प्रार्थना- अपनी कमजोरी व बुराइयों को दूर करने या उनसे लडऩे की शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान से प्रार्थना की जाती है। स्वीकारने की प्रार्थना- कुछ लोग ईश्वर की महिमा, सत्ता, प्रभुता को समझकर उसे स्वीकार कर या मानकर भी प्रार्थना करते हैं।- धन्यवाद की प्रार्थना- मनोकामना की पूर्ति हो जाने पर या जीवन सुखमय होने पर भगवान की कृपा का धन्यवाद देने के लिए भी प्रार्थना की जाती है।- मौन प्रार्थना- पूर्ण समर्पण भावना से मौन होकर प्रार्थनाशील हो जाना। कैसे करें प्रार्थना - सरल, हृदय से।- सबके कल्याण को ध्यान में रखकर। - हर पल हर समय प्रार्थनामय बनें (कामनामय नहीं)।- यदि इच्छा भी करें तो उसे पूर्ण करने की आजादी ईश्वर को दें।- जीवन और अस्तित्व के प्रति श्रद्धावान बनें।

3. क्या है भद्रा? जब कोई मांगलिक, शुभ कर्म या व्रत-उत्सव की घड़ी आती है, तो पंचक की तरह ही भद्रा योग को भी देखा जाता है। क्योंकि भद्रा काल में मंगल और उत्सव की शुरुआत या समाप्ति अशुभ मानी जाती है। हालांकि हर धार्मिक व्यक्ति भद्रा के विषय में पूरी जानकारी नहीं रखता, किंतु परंपराओं में चली आ रही भद्रा काल की अशुभता को मानकर शुभ कार्य नहीं करता। इसलिए जानते हैं कि आखिर क्या होती है - भद्रा। पुराण अनुसार भद्रा भगवान सूर्य देव की पुत्री और शनिदेव की बहन है। शनि की तरह ही इसका स्वभाव भी क्रूर बताया गया है। इस उग्र स्वभाव को नियंत्रित करने के लिए ही भगवान ब्रह्मा ने उसे कालगणना या पंचाग के एक प्रमुख अंग करण में स्थान दिया। जहां उसका नाम विष्टी करण रखा गया। भद्रा की स्थिति में कुछ शुभ कार्यों, यात्रा और उत्पादन आदि कार्यों को निषेध माना गया। किंतु भद्रा काल में तंत्र कार्य, अदालती और राजनैतिक चुनाव कार्यों सुफल देने वाले माने गए हैं। अब जानते हैं पंचांग की दृष्टि भद्रा का महत्व। हिन्दू पंचांग के पांच प्रमुख अंग होते हैं। यह है - तिथि, वार, योग, नक्षत्र और करण। इनमें करण एक महत्वपूर्ण अंग होता है। यह तिथि का आधा भाग होता है। करण की संख्या ग्यारह होती है। यह चर और अचर में बांटे गए हैं। चर या गतिशील करण में बव, बालव, कौलव, तैतिल, गर, वणिज और विष्टि गिने जाते हैं। अचर या अचलित करण में शकुनि, चतुष्पद, नाग और किस्तुघ्न होते हैं। इन ग्यारह करणों में सातवां करण विष्टि का नाम ही भद्रा है। यह सदैव गतिशील होती है। पंचाग शुद्धि में भद्रा का खास महत्व होता है। भद्रा का शाब्दिक अर्थ कल्याण करने वाली होता है। किंतु इस अर्थ के विपरीत भद्रा या विष्टी करण में शुभ कार्य निषेध बताए गए हैं। धर्मग्रंथो और ज्योतिष विज्ञान के अनुसार अलग-अलग राशियों के अनुसार भद्रा तीनों लोकों में घूमती है। इसी दौरान जब यह पृथ्वी या मृत्युलोक में होती है, तो सभी शुभ कार्यों में बाधक या या उनका नाश करने वाली मानी गई है। लेकिन अब यह जानना भी जरुरी है कि कैसे मालूम हो कि भद्रा पृथ्वी पर विचरण कर रही है, तो शास्त्रों में यह जानकारी भी स्पष्ट है। जिसके अनुसार - जब चंन्द्रमा, कर्क, सिंह, कुंभ व मीन राशि में विचरण करता है और भद्रा विष्टी करण का योग होता है, तब भद्रा पृथ्वीलोक में रहती है। इस समय सभी कार्य शुभ कार्य वर्जित होते है। इसके दोष निवारण के लिए भद्रा व्रत का विधान भी धर्मग्रंथों में बताया गया है। भद्रा का वर्णन हिन्दू धर्म के पुराणों में भी मिलता है। भद्रा कौन है, उसका स्वरुप क्या है, वह कि सकी पुत्री है। इस बारे में विस्तार से जाने इसी वेबसाईट के भद्रा संबंधित अन्य आर्टिकल में।


Devi दौलतमंद बनाती है ऐसी लक्ष्मी पूजा

शारदीय नवरात्रि में शक्ति पूजा का महत्व है। शक्ति के अलग-अलग रुपों में महालक्ष्मी की धन-वैभव, महासरस्वती की ज्ञान और विद्या और महादुर्गा की बल और शक्ति प्राप्ति के लिए उपासना का महत्व है। दुनिया में ताकत का पैमाना धन भी होता ह इस बार नवरात्रि का आरंभ शुक्रवार से हो रहा है। इस दिन देवी की पूजा महत्व है। शुक्रवार के दिन विशेष रुप से महालक्ष्मी पूजा बहुत ही धन-वैभव देने वाली और दरिद्रता का अंत करने वाली मानी जाती है। पुराणों में भी माता लक्ष्मी को धन, सुख, सफलता और समृद्धि देने वाली बताया गया है। नवरात्रि में देवी पूजा के विशेष काल में हर भक्त देवी के अनेक रुपों की उपासना के अलावा महालक्ष्मी की पूजा कर अपने व्यवसाय से अधिक धनलाभ, नौकरी में तरक्की और परिवार में आर्थिक समृद्धि की कामना पूरी कर सकता है। जो भक्त नौकरी या व्यवसाय के कारण अधिक समय न दे पाएं उनके लिए यहां बताई जा रही है लक्ष्मी के धनलक्ष्मी रुप की पूजा की सरल विधि। इस विधि से लक्ष्मी पूजा नवरात्रि के नौ रातों के अलावा हर शुक्रवार को कर धन की कामना पूरी कर सकते हैं - - आलस्य छोड़कर सुबह जल्दी उठकर स्नान करें। क्योंकि माना जाता है कि लक्ष्मी कर्म से प्रसन्न होती है, आलस्य से रुठ जाती है। - घर के देवालय में चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर उस पर चावल या अन्न रखकर उस पर जल से भरा मिट्टी का कलश रखें। यह कलश सोने, चांदी, तांबा, पीतल का होने पर भी शुभ होता है। - इस कलश में एक सिक्का, फूल, अक्षत यानि चावल के दाने, पान के पत्ते और सुपारी डालें।- कलश को आम के पत्तों के साथ चावल के दाने से भरा एक मिट्टी का दीपक रखकर ढांक दें। जल से भरा कलश विघ्रविनाशक गणेश का आवाहन होता है। क्योंकि वह जल के देवता भी माने जाते हैं। - चौकी पर कलश के पास हल्दी का कमल बनाकर उस पर माता लक्ष्मी की मूर्ति और उनकी दायीं ओर भगवान गणेश की प्रतिमा बैठाएं। - पूजा में कलश बांई ओर और दीपक दाईं ओर रखना चाहिए।- माता लक्ष्मी की मूर्ति के सामने श्रीयंत्र भी रखें। - इसके अलावा सोने-चांदी के सिक्के, मिठाई, फल भी रखें। - इसके बाद माता लक्ष्मी की पंचोपचार यानि धूप, दीप, गंध, फूल से पूजा कर नैवेद्य या भोग लगाएं।- आरती के समय घी के पांच दीपक लगाएं। इसके बाद पूरे परिवार के सदस्यों के साथ पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ माता लक्ष्मी की आरती करें।- आरती के बाद जानकारी होने पर श्रीसूक्त का पाठ भी करें। - अंत में पूजा में हुई किसी भी गलती के लिए माता लक्ष्मी से क्षमा मांगे और उनसे परिवार से हर कलह और दरिद्रता को दूर कर सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना करें।- आरती के बाद अपने घर के द्वार और आस-पास पूरी नवरात्रि या हर शुक्रवार को दीप जलाएं।

देवी आपकी राशि के लिए किस देवी की पूजा? पंचोपचार नवरात्रि आराधना का श्रेष्ठ फल पाने का अवसर होता है। हर राशि के लोगों के लिए नवरात्रि में अलग-अलग देवी की उपासना बताई गई है। जिससे वे अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए सही पूजा पाठ कर सकें। हर राशि के ग्रह और नक्षत्रों के आधार पर उनकी अलग-अलग देवियां मानी गई हैं। दश महाविद्या के मुताबिक हर राशि के लिए एक अलग महाविद्या की उपासना करने से, उनके बीज मंत्रों के जप से किसी भी काम में आसानी से सफलता पाई जा सकती है। मेष- मेष राशि के जातक शक्ति उपासना के लिए द्वितीय महाविद्या तारा की साधना करें। ज्योतिष के अनुसार इस महाविद्या का स्वभाव मंगल की तरह उग्र है। मेष राशि वाले महाविद्या की साधना के लिए इस मंत्र का जप करें। मंत्र- ह्रीं स्त्रीं हूं फट् वृषभ- वृषभ राशि वाले धन और सिद्धि प्राप्त करने के लिए श्री विद्या यानि षोडषी देवी की साधना करें और इस मंत्र का जप करें। मंत्र- ऐं क्लीं सौ: मिथुन- अपना गृहस्थ जीवन सुखी बनाने के लिए मिथुन राशि वाले भुवनेश्वरी देवी की साधना करें। साधना मंत्र इस प्रकार है। मंत्र- ऐं ह्रीं कर्क- इस नवरात्रि पर कर्क राशि वाले कमला देवी का पूजन करें। इनकी पूजा से धन व सुख मिलता है। नीचे लिखे मंत्र का जप करें। मंत्र- ऊं श्रीं सिंह - ज्योतिष के अनुसार सिंह राशि वालों को मां बगलामुखी की आराधना करना चाहिए। जिससे शत्रुओं पर विजय मिलती है। मंत्र- ऊं हृी बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिहृं कीलय कीलय बुद्धिं विनाशाय हृी ऊं स्वाहा कन्या- आप चतुर्थ महाविद्या भुवनेश्वरी देवी की साधना करें आपको निश्चित ही सफलता मिलेगी। मंत्र- ऐं ह्रीं ऐं तुला- तुला राशि वालों को सुख व ऐश्वर्य की प्राप्ति के लिए षोडषी देवी की साधना करनी चाहिए। मंत्र- ऐं क्लीं सौ: वृश्चिक- वृश्चिक राशि वाले तारा देवी की साधना करें। इससे आपको शासकीय कार्यों में सफलता मिलेगी। मंत्र- श्रीं ह्रीं स्त्रीं हूं फट् धनु - धन और यश पाने के लिए धनु राशि वाले कमला देवी के इस मंत्र का जप करें। मंत्र- श्रीं मकर- मकर राशि के जातक अपनी राशि के अनुसार मां काली की उपासना करें। मंत्र- क्रीं कालीकाये नम: कुंभ- कुंभ राशि वाले भी काली की उपासना करें इससे उनके शत्रुओं का नाश होगा। मंत्र- क्रीं कालीकाये नम: मीन- इस राशि के जातक सुख समृद्धि के लिए कमला देवी की उपासना करें। मंत्र- श्री कमलाये नम:

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पितरों को नहीं भूलें अंतिम मौका है, न भूलें पितरों की खुशी के ऐसे उपाय

हिन्दू पंचांग के आश्विन माह के कृष्णपक्ष यानि श्राद्धपक्ष में पितरों की प्रसन्नता के लिए अंतिम अवसर सर्वपितृ अमावस्या माना जाता है। यह तिथि इस बार (7 अक्टूबर) को आएगी। कोई श्राद्ध का अधिकारी पितृपक्ष की सभी तिथियों पर पितरों का श्राद्ध या तर्पण चूक जाएं या पितरों की तिथि याद न हो तब इस तिथि पर सभी पितरों का श्राद्ध कर सकते हैं। इसलिए यह पितृमोक्ष अमावस्या या सर्वपितृ अमावस्या के नाम से प्रसिद्ध है।

जिन दंपत्तियों के यहां ३ पुत्रियों के बाद एक पुत्र जन्म लेता है या जुड़वां संतान पैदा होती है। उनको सर्वपितृ अमावस्या का श्राद्ध जरुर करना चाहिए।

सर्वपित् अमावस्या को पितरों के श्राद्ध से सौभाग्य और स्वास्थ्य प्राप्त होता है। धार्मिक मान्यता है कि इस तिथि पर पितृ आत्मा अपने परिजनों के पास वायु रुप में ब्राह्मणों के साथ आते हैं। उनकी संतुष्टि पर पितर भी प्रसन्न होते हैं। परिजनों के श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने से वह तृप्त और प्रसन्न होकर आशीर्वाद देकर जाते हैं, किंतु उनकी उपेक्षा से दु:खी होने पर श्राद्धकर्ता का जीवन भी कष्टों से बाधित होता है।

सर्वपितृ अमावस्या के दिन पितरों की तृप्ति से परिवार में खुशियां लाने का श्राद्धपक्ष का अंतिम अवसर न चूक जाएं। इसलिए यहां बताए जा रहे हैं कुछ उपाय जिनका अपनाने से भी आप पितरों की तृप्ति कर सकते हैं -

- सर्वपितृ अमावस्या को पीपल के पेड़ के नीचे पुड़ी, आलू व इमरती या काला गुलाब जामुन रखें। - पेड़ के नीचे धूप-दीप जलाएं व अपने कष्टों को दूर करने की प्रार्थना करें। पितरों का ध्यान कर नमस्कार करें। ऐसा करने पर आप जीवन में खुशियां व अनपेक्षित बदलाव जरुर देखेंगे। - घर के मुख्य प्रवेश द्वार सफेद फूल से सजाएं। - इस दिन पांच फल गाय को खिलाएं। - पितरों के निमित्त धूप देकर इस दिन तैयार भोजन में से पांच ग्रास गाय, कुत्ता, कौवा, देवता और चींटी या मछली के लिए जरुर निकालें और खिलाएं। - यथाशक्ति ब्राह्मण को भोजन कराएं। वस्त्र, दक्षिणा दें। जब ब्राह्मण जाने लगे तो उनके चरण छुएं, आशीर्वाद लें और उनके पीछे आठ कदम चलें। - ब्राह्मण के भोजन के लिए आने से पहले धूपबत्ती अवश्य जलाएं।

इस तरह सर्वपितृ अमावस्या को श्रद्धा से पूर्वजों का ध्यान, पूजा-पाठ, तर्पण कर पितृदोष के कारण आने वाले कष्ट और दुर्भाग्य को दूर करें। इस दिन को पितरों की प्रसन्नता से वरदान बनाकर मंगलमय जीवन व्यतीत किया जा सकता है। ...........................