संत तुकाराम
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| तुकाराम | |
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संत तुकाराम |
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| जन्म तिथि | अज्ञात |
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| जन्म स्थान | देहू, पुणे के निकट, भारत |
| मृत्यु तिथि | १६५० ईस्वी |
| मृत्यु स्थान | पंधारपुर, महाराष्ट्र |
| दर्शन | वर्कारी |
| शीर्षक/सम्मान | संत मराठी में जिसका अर्थ है "संत" |
| साहित्यिक कार्य | अभांगा भक्ति कविता |
संत तुकाराम (१६०८-१६५०), जिन्हें तुकाराम के नाम से भी जाना जाता है सत्रहवीं शताब्दी एक महान संत कवि थे जो भारत में लंबे समय तक चले भक्ति आंदोलन के एक प्रमुख स्तंभ थे।
अनुक्रम |
[संपादित करें] तुकाराम का जीवन चरित
[संपादित करें] तुकाराम की मूल शिक्षाएँ
संत तुकाराम ने इस बात पर बल दिया है कि सभी मनुष्य परमपिता ईश्वर की संतान हैं और इस कारण समान हैं। संत तुकाराम तथा गुरू समर्थ रामदास आदि द्वारा 'महाराष्ट्र धर्म' का प्रचार हुआ जिसके सिद्धांत भक्ति आंदोलन से प्रभावित थे। महाराष्ट्र धर्म का तत्कालीन सामाजिक विचारधारा पर बहुत गहरा प्रभाव पङा। यद्यपि इसे जाति और वर्णव्यवस्था पर कुठाराघात करने में सफलता प्राप्त नहीं हुई, किंतु इससे इंकार नहीं किया जा सकता है कि समानता के सिद्धांत के प्रतिपादन द्वारा इसके प्रणेता वर्णव्यवस्था को लचीला बनाने में अवश्य सफल हुए। महाराष्ट्र धर्म का उपयोग शिवाजी ने उच्चवर्गीय मराठों तथा कुन्बियों को एकसूत्र में बाँधने के लिए किया।
[संपादित करें] जीवन-संध्या
[संपादित करें] यह भी देखें
[संपादित करें] बाहरी कड़ियाँ
- संत तुकाराम का जीवन चरित्र
- तुकाराम के बारे में जानकारी (बहुभाषिकेवं विस्तृत जानकारी)
- तुकाराम की गाथा (मराठी)
निर्गुण भक्ति के विशेष अध्ययन के लिए देखे:
