शीर्षपाद

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शीर्षपाद या सेफैलोपोडा (Cephalopoda) अपृष्ठवंशी प्राणियों का एक सुसंगठित वर्ग जो केवल समुद्र ही में पाया जाता है। यह वर्ग मोलस्का (mollusca) संघ के अंतर्गत आता है। इस वर्ग के ज्ञात जीवित वंशों की संख्या लगभग १५० है। इस वर्ग के सुपरिचित उदाहरण अष्टभुज (octopus), स्क्विड (squid) तथा कटल फिश (cuttlefish) हैं। सेफैलोपोडा के विलुप्त प्राणियों की संख्या जीवितों की तुलना में अधिक है। इस वर्ग के अनेक प्राणी पुराजीवी (palaeozoic) तथा मध्यजीवी (mesozoic) समय में पाए जाते थे। विलुप्त प्राणियों के उल्लेखनीय उदाहरण ऐमोनाइट (Ammonite) तथा बेलेम्नाइट (Belemnite) हैं।

सेफैलोपोडा की सामान्य रचनाएँ मोलस्का संघ के अन्य प्राणियों के सदृश ही होती हैं। इनका आंतरांग (visceral organs) लंबा और प्रावार (mantle) से ढका रहता है। कवच (shell) का स्राव (secretion) प्रावार द्वारा होता है। प्रावार और कवच के मध्य स्थान को प्रावार गुहा (mantle cavity) कहते हैं। इस गुहा में गिल्स (gills) लटकते रहते हैं। आहार नाल में विशेष प्रकार की रेतन जिह्वा (rasping tongue) या रैड्डला (redula) होता है।

सेफोलोपोडा के सिर तथा पैर इतने सन्निकट होते हैं कि मुँह पैरों के मध्य स्थित होता है। पैरों के मुक्त सिरे कई उपांग (हाथ तथा स्पर्शक) बनाते हैं। अधिकांश जीवित प्राणियों में पंख (fins) तथा कवच होते हैं। इन प्राणियों के कवच या तो अल्प विकसित या ह्रसित होते हैं। इस वर्ग के प्राणियों का औसत आकार काफी बड़ा होता है। अर्किट्यूथिस (architeuthis) नामक वंश सबसे बड़ा जीवित अपृष्ठवंशी है। इस वंश के प्रिंसेप्स (princeps) नामक स्पेशीज की कुल लंबाई (स्पर्शक सहित) ५२ फुट है। सेफैलोपोडा, ह्वेल (whale), क्रस्टेशिआ (crustacea) तथा कुछ मछलियों द्वारा विशेष रूप से खाए जाते हैं।

बाह्य शरीर एवं सामान्य संगठन[संपादित करें]

नाटिलॉइड (nautiloids) तथा ऐमोनाइट संभवत: उथले जल में समुद्र के पास रहते थे। रक्षा के लिए इनके शरीर के ऊपर कैल्सियमी कवच होता था। इनकी गति (movement) की चाल (speed) संभवत: नगण्य थी। वर्तमान नाटिलस (nautilus) के जीवन में ये सभी संभावनाएँ पाई जाती हैं। डाइब्रैंकिया (dibranchia) इसके विपरीत तेज तैरने वाले हैं। इनके बाह्य संगठन के कुछ मुख्य लक्षण इस प्रकार हैं।

  • (१) मोलस्का तथा टेट्राब्रैंकिया (tetrabranchia) के प्राणियों के प्रादार लगभग निष्क्रिय तथा केवल आंतरांग को ढके रहता है परंतु इस उपवर्ग में प्रावार चलन (locomotion) में भी सहायक होता है। प्रावार के संकुचन तथा प्रसार से चलन जलधारा प्रावार गुहा के अंदर आती है और कीप सदृश रचना से बाहर निकल जाती है। तेज गति से पानी बाहर निकलने के कारण प्राणियों में पश्चगति पैदा होती है।
  • (२) नॉटिलस में कीप सदृश रचना दो पेशीय वलनों (muscular folds) की बनी होती है। ये वलन मध्य रेखा में जुड़े रहते हैं। डाइब्रैंकिआ में इन वलनों का आपस में पूर्ण मिलन हो जाने के कारण एक नलिका बन जाती है।
  • (३) पंख के आकार के अतिरिक्त गमन उपांग (additional locomotory appendages) प्रावार के एक किनारे से जुड़े होते हैं। ये उपांग बड़े आकार के हो सकते हैं। इनका मुख्य कार्य जल में प्राणों का संतुलन बनाए रखना है।
  • (४) तेद गति के कारण डाइब्रैंकिआ के प्राणियों के परिमुखीय (circumoral) उपांग छोटे होते हैं। डेकापोडा (decapoda) में ये उपांग बड़े तथा शृंगी होते हैं। इनकी ऊपरी सतह चूषक भी पाए जाते हैं।

आंतरिक शरीर[संपादित करें]

सभी सेफौलोपोडा में तंत्रिका तंत्र के मुख्य गुच्छिका (gangleon) के ऊपर आंतरिक उपास्थि का आवरण रहता है। डाइब्रैंकिआ उपवर्ग में यह आवरण अधिक विकसित होकर करोटि सदृश रचना बनाता है। इस उपवर्ग में करोटि सदृश रचना के अतिरिक्त पेशियों के कंकाली आधार भी पंख, ग्रीवा, गिल हाथ आदि पर होते हैं। ये प्राणियों को अधिक गतिशीलता प्रदान करते हैं।

आंतरिक अंग[संपादित करें]

सेफैलोपोडा के आहार तंत्र में पेशीय मुख्य गुहा जिसमें एक जोड़े जबड़े तथा कर्तन जिह्वा, ग्रसिका, लाला ग्रंथि (Salivary gland), आमाशय, अंधनाल, यकृत तथा आंध्र होते हैं। कुशल चर्णण का कार्य शक्तिशाली जबड़ों तथा रेतन जिह्वा के दाँतों द्वारा होता है। रेतन जिह्वा किसी-किसी सेफैलोपोडा में नहीं होती। डाइब्रैंकिआ के लगभग सभी प्राणियों में गुदा के करीब आंत्र का एक अधवर्ध (diverticulum) होता है, जिसमें एक प्रकार के गाढ़े द्रव जिसे सीपिआ (Sepia) या स्याही कहते हैं, स्रवण होता है। प्राणियों द्वारा इसके तेज विसर्जन से जल में गहरी धुँधलाहट उत्पन्न होती है। इससे प्राणी अपने शत्रु से अपना बचाव करता है।

परिसंचरण एवं श्वसन तंत्र[संपादित करें]

सेफैलोपोडा में ये तंत्र सर्वाधिक विकसित होते हैं। रुधिर प्रवाह विशिष्ट वाहिकाओं द्वारा होता है। डाइब्रैंकिआ में परिसंचरण तथा ऑक्सीजनीकरण का विशेष रूप से केंद्रीकरण हो जाता है। इसमें नॉटिलस की तरह चार गिल तथा चार आलिंद (auricles) के स्थान पर दो गिल तथा दो आलिंद ही होते हैं। डाइब्रैंकिआ में श्वसन के लिए प्रावार के प्रवाहपूर्ण संकुचन तथा प्रसार से जलधारा गिल के ऊपर से गुजरती है। सेफैलोपोडा के गिल पर (feather) की तरह होते हैं।

वृक्कीय अंग[संपादित करें]

नाइट्रोजनी उत्सर्ग का उत्सर्जन वृक्क द्वारा होता है। यकृत जो अन्य मोलस्का में पाचन के साथ-साथ उत्सर्जन का भी कार्य करता है, इसमें केवल पाचन का ही कार्य करता है। नॉटिलस में वृक्क चार तथा डाइब्रैंकिआ में दो होते हैं।

तंत्रिका तंत्र[संपादित करें]

सेफैलोपोडा का मुख्य गुच्छिका केंद्र सिर में स्थित होता है तथा गुच्छिकाएँ बहुत ही सन्निकट होती हैं। केंद्रीय तंत्रिका का इस प्रकार का संघनन पाया जाता है। सेफैलोपोडा की ज्ञानेंद्रियां आँखें, राइनोफोर (Rhinophore) या घाण अंग, संतुलन पट्टी (तंत्रिका-नियंत्रण-अंग) तथा स्पर्शक रचनाएँ आदि हैं। डाइब्रैंकिआ की आँखें जटिल तथा कार्यक्षमता की दृष्टि से पृष्ठवंशियों की आँखों के समान होती हैं।

जनन तंत्र[संपादित करें]

सेफैलोपोडा में लिंगभेद पाया जाता है। उभयलिंगी प्राणी इस वर्ग में नहीं पाए जाते हैं। लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism) विकसित होती है। वेलापवर्ती (Pelagic) ऑक्टोपोडा (Octopoda) मे नर, मादा की तुलना में अत्यधिक छोटा होता है। कटलफिश के नर की पहचान उसके पंख की लंबी पूँछ सदृश रचना से की जाती है। लगभग सभी सेफैलोपोडा के नरों में एक या दो जोड़े उपांक 'मैथुन अंग' में परिवर्तित हो जाते हैं। नर जनन तंत्र मादा की अपेक्षा अधिक जटिल होता है। नर सुक्राणुओं को एक नलिका सदृश रचना या शुक्राणुधर (Spermatophore) में स्थानांतरित करता है। वे शक्राणुधर विशेष कोश में स्थित रहते हैं। ये नलिकाएँ मादा के मुँह के समीप जैसा नाटिलस, सीपिआ (sepia), लॉलिगो (loligo) आदि में होता है अथवा मैथुन अंगों की सहायता से प्रावार गुहा में निक्षेपित कर दी जाती है जैसे अष्टभुज में। अष्टभूज के एक उपांग का मुक्त सिरा साधारण चम्मच सदृश रचना में परिवर्तित होकर मैथुन अंग बनाता है। डेकापोडा (Decapoda) से विभिन्न प्रकार के परिवर्तन पाए जाते हैं। इन प्राणियों में एक या एक से अधिक उपांग मैथुन अंग में परिवर्तित हो सकते हैं।

रंग परिवर्तन तथा संदीप्त[संपादित करें]

त्वचा के स्थायी रंग के अतिरिक्त डाइब्रैंकिआ में संकुचनशील कोशिकाओं का एक त्वचीय तंत्र होता है। इन कोशिकाओं का रंज्यालव (Chromatophore) कहते हैं। इन कोशिकाओं में वर्णक होते हैं। इन कोशिकाओं के प्रसार तथा संकुचन से त्वचा का रंग अस्थायी तौर पर बदल जाता है।

कुछ डेकापोडा में, विशेषकर जो गहरे जल में पाए जाते हैं, प्रकाश अंग (light organ) पाए जाते हैं। ये अंग प्रावार, हाथ तथा सिर के विभिन्न भागों में पाए जाते हैं।

परिवर्धन[संपादित करें]

सभी सेफैलोपोडा के अंडों मं पीतक (Yolk) की असाधारण भाषा में पाई जाने के कारण अन्य मोलस्का के विपरीत इनका खडीभवन (Segmentation) संपूर्ण तथा अंडे के एक सिरे तक ही सीमित रहता है। भ्रूण का विकास भी इसी सिरे पर होता है। पीतक के एक सिरे से बाह्य त्वचा का निर्माण होता है। बाद में इसी बाह्य त्वचा के नीचे कोशिकाओं की एक चादर (sheet) बनती है। यह चादर बाह्य त्वचा के उस सिरे से बननी आरंभ होती है जिससे बाद में गुदा का निर्माण होता है। इसके बाद बाह्य त्वचा से अंदर की ओर जाने वाला कोशिकाओं से मध्यजन स्तर (mesoderm) का निर्माण होता है। यह उल्लेखनीय है कि मुँह पहले हाथों के आद्यांशों (rudiments) से नहीं घिरा रहता है। हाथ के आद्यांग उद्वर्ध (outgrowth) के रूप में मौलिक भ्रूणीय क्षेत्र के पार्श्व (lateral) तथा पश्च (posterior) सिरे से निकलते हैं। ये आद्यांग मुँह की ओर तब तक बढ़ते रहते हैं जब तक वे मुँह के पास पहुँचकर उसको चारों ओर से घेर नहीं लेते हैं। कीप एक जोड़े उद्वर्ध से बनती है। सेफैलोपोडा में परिवर्तन, जनन स्तर (germlayers) बनने के बाद विभिन्न प्राणियों में विभिन्न प्रकार का होता है। परिवर्धन के दौरान अन्य मोलस्का की भाँति कोई डिंबक अवस्था (larval stage) नहीं पाई जाती है।

जातिवृत्त तथा विकास[संपादित करें]

जीवाश्म (fossil) सेफैलोपोडा के कोमल अंगों की रचना का अल्प ज्ञान होने के कारण इस वर्ग के कैंब्रियन कल्प में प्रथम प्रादुर्भाव का दावा मात्र कवचों के अध्ययन पर ही आधारित है। इस प्रकार इस वर्ग का दो उपवर्गों डाइब्रैंकिआ तथा टेट्राब्रैंकिआ (tetrabranchia) में विभाजन नॉटिलस के गिल की रचना तथा आंतरांग लक्षणों के विशेषकों पर ही आधारित है। इस विभाज का आद्य नाटिलॉइड तथा ऐमोनाइड की रचनाओं से बहुत हु अल्प संबंध है। इसी प्रकार ऑक्योपोडा के विकास का ज्ञान, जिसमें कवच अवशेषी तथा अकैल्सियमी होता है, सत्यापनीय (varifiable) जीवाश्मों की अनुपस्थिति में एक प्रकार का समाधान है।

भूवैज्ञानिक अभिलेखों द्वारा अभिव्यक्त सेपैलोपोडा के विकास का इतिहास जानने के लिए नॉटिलस के कवच का उल्लेख आवश्यक है। अपने सामान्य संगठन के कारण वह सर्वाधिक आद्य जीवित सेफैलोपोडा है। यह कवच कई बंद तथा कुंडलित कोष्ठों में विभक्त रहता है। अंतिम कोष्ठ में प्राणी निवास करता है। कोष्ठों के इस तंत्र में एक मध्य नलिका या काइफन (siphon) पहले कोष्ठ से लेकर अंतिम कोष्ठ तक पाई जाती है। सबसे पहला सेफैलोपोडा कैंब्रियन चट्टानों में पाया था। ऑरथोसेरेस (Orthoceras) में नाटिलस की तरह कोष्ठवाला कवच तथा मध्य साइफन पाया जाता है; हालाँकि यह कवच कुंडलित न होकर सीधा होता था। बाद में नॉटिलस की तरह कुंडलित कवच भी पाया गया। सिल्यूरियन (Silurion) ऑफिडोसेरेस (Ohidoceras) में कुंडलित कवच पाया गया है। ट्राइऐसिक (triassic) चट्टानों में वर्तमान नॉटिलस के कवच से मिलते-जुलते कवच पाए गए हैं। लेकिन वर्तमान नॉटिलस का कवच तृतीयक समय (Tertiary period) के आरंभ तक नहीं पाया गया था।

इस संक्षिप्त रूपरेखा सेफैलोपोडा के विकास की प्रथम अवस्था का संकेत मिल जाता है। यदि हम यह मान लें कि मोलस्का एक सजातीय समूह है, तो यह अनुमान अनुचित न होगा कि आद्य मोलस्का में, जिनसे सेफैलोपोडा की उत्पत्ति हुए हैं। साधारण टोपी के सदृश कवच होता था। इनसे किन विशेष कारणों या तरीकों द्वारा सेफैलोपोडा का विकास हुआ, यह स्पष्ट रूप से ज्ञात नहीं है। सर्वप्रथम आद्य टोपी सदृश कवच के सिर पर चूनेदार निक्षेपों के कारण इसका दीर्घीकरण होना आरंभ हुआ। प्रत्येक उत्तरोत्तर वृद्धि के साथ आंतरांग के पिछले भाग से पट (Septum) का स्रवण होता गया। इस प्रकार नॉटिलाइड कवच का निर्माण होने का भय था। गैस्ट्रोपोडा (Gastropoda) में इन्हीं नुकसानों से बचने के कवच लिए कुंडलित हो गया। वर्तमान गेस्ट्रोपोडा में कुंडलित कवच ही पाए जाते हैं।

डाइब्रैंकिएटा उपवर्ग के आधुनिक स्क्विड, अष्टभुज तथा कटलफिश में आंतरिक तथा हृसित कवच होता है। इसी आधार पर ये नॉटिलॉइड से विभेदित किए जाते हैं। इस उपवर्स में मात्रा स्पाइरूला (Spirula) ही ऐसा प्राणी है जिसमें आंशिक बाह्य कवच होता है। डाइब्रैंकिआ के कवच की विशेष स्थिति प्राय: द्वारा कवच की अति वृद्धि तथा कवच के चारों ओर द्वितीयक स्वच्छंद (secondary sheath) के निर्माण के कारण होती है। अंत में इस आच्छाद के अन्य स्वयं कवच से बड़े हो जाते हैं। सक्रिय तरण स्वभाव अपनाने के कारण कवच धीरे-धीरे लुप्त होता गया तथा बाह्य रक्षात्मक खोल का स्थान शक्तिशाली प्रावार पेशियों में ले लिया। इस प्रकार की पेशियों से प्राणियों को तैरने में विशेष सुविधा प्राप्त हुई। साथ ही साथ नए अभिविन्यास (orientation) के कारण प्राणियों के गुरुत्वाकर्षण केंद्र के पुन: समजन की भी आवश्यकता पड़ी क्योंकि भारी तथा अपूर्ण अंतस्थ कवच क्षैतिज गति में बाधक होते हैं।

जीवित अष्टभुजों में कवच का विशेष स्थूलीकरण हो जाता है। इनमें कवच एक सूक्ष्म उपास्थिसम शूकिका (cartilagenous stylet) या पंख आधार जिन्हें 'सिरेटा' (cirreta) कहते हैं, के रूप में होता है। ये रचनाएँ कवच का ही अवशेष मानी जाती है। यद्यपि विश्वासपूर्वक यह नहीं कहा जा सकता है कि ये कवच के ही अवशेष हैं। वास्तव में इस समूह के पूर्वज परंपरा (ancestory) की कोई निश्चित जानकारी अभी तक उपलब्ध नहीं है।

वितरण तथा प्राकृतिक इतिहास[संपादित करें]

सेफैलोपोडा के सभी प्राणी केवल समुद्र में ही पाए जाते हैं। इन प्राणियों के अलवण या खारे जल में पाए जाने का कोई उत्साहजनक प्रमाण नहीं प्राप्त हैं। यद्यपि कभी-कभी ये ज्वारनज मुखों (estuaries) तक आ जाते हैं फिर भी ये कम लवणता को सहन नहीं कर सकते हैं।

जहाँ तक भौगोलिक वितरण का प्रश्न है कुछ वंश तथा जातियाँ सर्वत्र पाई जाती हैं। क्रैंचिआस्कैब्रा (Cranchiascabra) नामक छोटा सा जीव ऐटलैंटिक, हिंद तथा प्रशांत महासागरों में पाया जाता है। सामान्य यूरोपीय ऑक्टोपस वलगेरिसश् (Octopus vulgaris) तथा ऑक्टोपस मैक्रापस (O. macropus) सुदूर पूर्व में भी पाए जाते हैं। साधारणतया यह कहा जा सकता है कि वंशों तथा जातियों का वितरण उसी प्रकार का है जैसा अन्य समुद्री जीवों के बड़े वर्गों में होता है। बहुत सी भूमध्यसागरीय जातियाँ दक्षिणी ऐटलैंटिक तथा इंडोपैसेफिक क्षेत्र में पाई जाती है।

छोटा सा भंगुर क्रैंचिआस्कैब्रा प्रौढ़ावस्था में प्ल्वकों की तरह जीवन व्यतीत करता है अर्थात् यह पानी की धारा के साथ अनियमित रूप से इधर-उधर होता रहता है। ऑक्टोपोडा मुख्यत: समुद्र तल पर रेंगते अथवा तल से कुछ ऊपर तैरते हैं। कुछ जातियाँ समुद्र तल पर ही सीमित न होकर मध्य गहराई में भी पाई जाती है। यद्यपि ऑक्टोपोडा के कुल मुख्यत: उथले जल में ही पाए जाते हैं परंतु कुछ नितांत गहरे जल में भी पाए जाते हैं।

जनन ऋतु का इन प्राणियों के वितरण पर विशेष प्रभाव पड़ता है। सामान्य कटल फिश (सीपिआ ऑफिसिनेलिस- Sepia officinalis) वसंत तथा गरमी में प्रजनन के लिए उथले तटवर्ती जल में आ जाते हैं। इस प्रकार के प्रवास (migration) अन्य प्राणियों में भी पाए जाते हैं।

सेफैलोपोडा की मैथुन विधि विशेष रूप से ज्ञात नहीं है। सीपिआ, लॉलिगो (Loligo) आदि के संबंध में यह कहा जाता है कि इनके प्रकाश अंग लैंगिक प्रदर्शन का काम करते हैं। लैंगिक द्विरूपता (sexual dimorphism) नियमित रूप से पाई जाती हैं।

अधिकांश सेफैलोपोडा द्वारा अंडे तटवर्ती स्थानों पर दिए जाते हैं। ये अंडे अकेले अथवा गुच्छों में होते हैं। वेलापवर्ती (pelagic) जीवों में अंडे देने की विधि कुछ जीवों को छोड़कर लगभग अज्ञात है।

अधिकांश सेफैलोपोडा मांसाहारी होते हैं तथा मुख्यत: क्रस्टेशिआ (crustacea) पर ही जीवित रहते हैं। छोटी मछलियाँ तथा अन्य मोलस्का आदि भी इनके भोजन का एक अंग हैं। डेक्रापोडा (Decapoda) की कुछ जातियाँ छोटे-छोटे कोपेपोडा (copepoda) तथा टेरोपोडा (pteropoda) आदि को भी खाती हैं। सेफैलोपोडा; ह्वेल (whale), शिंशुक (porpoises), डॉलफिन (dolphin) आदि द्वारा खाए जाते हैं।

आर्थिक उपयोग[संपादित करें]

सेफैलोपोडा मनुष्यों के लिए महत्वपूर्ण जीव हैं। मनुष्यों की कुछ जातियों द्वारा ये खाए भी जाते हैं। दुनिया के कुछ भाग में सेफैलोपोडा मछलियों को पकड़ने के लिए चारे के रूप में प्रयुक्त होते हैं। नियमित रूप से इन प्राणियों के खाने वाले लोगों के बारे में स्पष्ट रूप से कुछ नहीं कहा जा सकता है परंतु अधिकांश मांसाहारियों द्वारा ये कभी-कभी ही खाए जाते हैं। सेफैलोपोडा से कटल बोन (cuttle bone) नामक एक महत्वपूर्ण वस्तु निकाली जाती थी तथा आदिम जातियों द्वारा कोढ़ तथा हृदय की बीमारियों में प्रयुक्त होती थी।

सेफैलोपोडा का प्रथम अध्ययन अरस्तू द्वारा शुरू किया गया था। उसने इस समूह पर अपना विशेष ध्यान केंद्रित किया था। सेफैलोपोडा के आधुनिक आकृति विज्ञान (morphology) का अध्ययन कूवियर (Cuvier) के समय से शुरू हुआ। सर्वप्रथम कूवियर ने ही इन प्राणियों के समूह का नाम सेफैलोपोडा रखा।