शिवकर बापूजी तलपदे

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
शिवकर बापूजी तलपदे
[[File:
शिवकर बापूजी तलपदे
|frameless|alt=]]
जन्म महाराष्ट्र, भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
शिक्षा कला,वेद
अल्मा मेटर Sir J J School of Art, Mumbai
धर्म सनातन वैदिक

शिवकर बापूजी तलपदे (१८६४ - १७ सितम्बर १९१७) कला एवं संस्कृत के विद्वान तथा आधुनिक समय के विमान के प्रथम आविष्कर्ता थे। उनका जन्म ई. १८६४ में मुंबई, महाराष्ट्र में हुआ था ।[1] वो ‘जे.जे. स्कूल ऑफ़ आर्ट, मुंबई’ से अध्ययन समाप्त कर वही शिक्षक नियुक्त हुये ।[2] उनके विद्यार्थी काल में गुरू श्री चिरंजीलाल वर्मा से वेद में वर्णित विद्याओं की जानकारी उन्हें मिली। उन्होनें स्वामी दयानन्द सरस्वती कृत ‘ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका’ एवं ‘ऋग्वेद एवं यजुर्वेद भाष्य’ ग्रंथों का अध्ययन कर प्राचीन भारतीय विमानविद्या पर कार्यकरने का निर्णय लिया। इसके लिए उन्होंने संस्कृत सीखकर वैदिक विमानविद्या पर अनुसंधान आरंभ किया ।[3]

शिवकर ने ई. १८८२ में एक प्रयोगशाला स्थापित किया और ऋग्वेद के मंत्रों के आधार पर आधुनिक काल का पहला विमान का निर्माण किया ।[4]इसका परीक्षण ई. १८९५ में मुंबई के चौपाटी समुद्र तट पर कियागया था । इस कार्यक्रम में उपस्थित प्रत्यक्षदर्शियों में सयाजीराव गायकवाड़, लालजी नारायण, महादेव गोविन्द रानाडे आदि प्रतिष्ठित सज्जन उपस्थित थे । शिवकर विमान को जनोपयोगी बनाना चाहते थे लेकिन उन्हें अंग्रेज सरकार से किसी भी प्रकार की सहायता नहीं मिली थी ।[5] शिवकर ने ई. १९१६ में पं. सुब्राय शास्त्री से महर्षि भरद्वाज की यन्त्रसर्वस्व - वैमानिक प्रकरण ग्रन्थ का अध्ययन कर ‘मरुत्सखा’ विमान का निर्माण आरंभ किया । किन्तु लम्बी समय से चलरही अस्वस्थता के कारण दि. १७ सितम्बर १९१७ को उनका स्वर्गवास हुआ एवं ‘मरुत्सखा’ विमान निर्माण का कार्य अधूरा रह गया ।[6]

परिवार[संपादित करें]

पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे का विवाह श्रीमती लक्ष्मीबाई से हुआ था । उनके दो पुत्र एवं एक पुत्री थे । जेष्ठ पुत्र मोरेश्वर मुंबई पौरपालिका के स्वास्थ विभाग में कार्यरत थे एवं कनिष्ठ पुत्र बैंक ऑफ़ बॉम्बे में लिपिक थे । पुत्री का नाम नवुबाई था । [7] [8]

साहित्य[संपादित करें]

पण्डित शिवकर बापूजी तलपदे ने निम्न पाँच पुस्तकें लिखी हैं ।[9]

  1. प्राचीन विमान कला का शोध
  2. ऋग्वेद-प्रथम सूक्त व उसका अर्थ
  3. पातञ्जलि योगदर्शनान्तर्गत शब्दों का भूतार्थ दर्शन
  4. मन और उसका बल
  5. गुरुमंत्र महिमा

संपादन[संपादित करें]

१- वैदिक धर्मस्वरुप(‘ऋग्वेदादिकभाष्यभूमिका’ का मराठी अनुवाद), १९०५ ।
२- राष्ट्रीय उन्नतीचीं तत्वें ।
३- ब्रह्मचर्य, १९०५ ।
४- राष्ट्रीसूक्त व त्याचा अर्थ ।
५- वैदिक विवाह व त्याचा उद्देश ।
६- सत्यार्थप्रकाश पूर्वार्ध, १९०७ ।
७- गृहस्थाश्रम, १९०८ ।
८- योगतत्त्वादर्श ।

अन्य कार्य एवं सम्मान[संपादित करें]

१- संपादक, ‘आर्यधर्म’
२- मंत्री, वेद विद्या प्रचारिणी पाठशाला
३- प्रकाशक, शामराव कृष्णअणि मंडली
४- सदस्य, वेदधर्म प्रचारिणी सभा
५- सदस्य, आर्य समाज, काकड़वाडी,मुंबई
६- कोल्हापूर शंकराचार्य से ‘विद्याप्रकाशप्रदीप’ उपाधि से समान्नित

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. अर्वाचीन भारतीय वैज्ञानिक, भाग २, प्रा. भालवा केलकर,१९६९ ।
  2. Story of Sir J J School of Art (1857-1957), Dean, Sir J J School of Art, Mumbai, 1957.
  3. प्राचीन विमान विद्या (पूर्वार्ध), पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, केसरी, १० मई १९५३ ।
  4. प्राचीन विमान विद्या (पूर्वार्ध), पं. श्रीपाद दामोदर सातवलेकर, केसरी, १० मई १९५३ ।
  5. विज्ञान-कथा, भाग दूसरा, प्रह्लाद नरहर जोशी, जनवरी १९५३ ।
  6. The Autobiography of Maharshi Pandit T. Subraya Sasthriji, G Venkatachala Sarma, 12 Mar 1972.
  7. पाठारे प्रभु महिला डिरेक्टरी, १९२१ ।
  8. The Prabhu Street and Mofussil Directory, 1913.
  9. विज्ञान-कथा, भाग दूसरा, प्रह्लाद नरहर जोशी, जनवरी १९५३ ।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]