शिक्षा दर्शन

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज
गाँधीजी महान शिक्षा-दार्शनिक भी थे।

शिक्षा का क्या प्रयोजन है और मानव जीवन के मूल उद्देश्य से इसका क्या संबंध है, यही शिक्षा दर्शन का विजिज्ञास्य प्रश्न है। चीन के दार्शनिक मानव को नीतिशास्त्र में दीक्षित कर उसे राज्य का विश्वासपात्र सेवक बनाना ही शिक्षा का उद्देश्य मानते थे। प्राचीन भारत में सांसारिक अभ्युदय और पारलौकिक कर्मकांड तथा लौकिक विषयों का बोध होता था और परा विद्या से नि:श्रेयस की प्राप्ति ही विद्या के उद्देश्य थे। अपरा विद्या से अध्यात्म तथा रात्पर तत्व का ज्ञान होता था। परा विद्या मानव की विमुक्ति का साधन मान जाती थी। गुरुकुलों और आचार्यकुलों में अंतेवासियों के लिये ब्रह्मचर्य, तप, सत्य व्रत आदि श्रेयों की प्राप्ति परमाभीष्ट थी और तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला आदि विश्वविद्यालय प्राकृतिक विषयों के सम्यक् ज्ञान के अतिरिक्त नैष्ठिक शीलपूर्ण जीवन के महान् उपस्तंभक थे। भारतीय शिक्षा दर्शन का आध्यात्मिक धरातल विनय, नियम, आश्रममर्यादा आदि पर सदियों तक अवलंबित रहा।

पाश्चात्य शिक्षादर्शन[संपादित करें]

प्लेटो (अफलातून) और अरस्तु दार्शनिक विचिंतन के समर्थक थे किंतु सांसारिक कर्म की उपेक्षा उन्हें इष्ट नहीं थी। प्लेटो का कहना है, बीस वर्ष की उम्र तक भावी राज्यशासकों को शारीरिक उन्नति, साहित्य, धर्मशास्त्र, पुरातत्व और संगीत की शिक्षा मिलनी चाहिए। बीस से तीस वर्ष तक रेखागणित, अंकगणित, ज्योतिर्गणित आदि का पारदर्शी ज्ञान उन्हें प्राप्त करना है। तीस से पैंतीस वर्ष तक उन्हें गंभीर दार्शनिक ऊहापोह कर प्रत्ययों (Ideas) का और शिवप्रत्यय (आयडिया ऑव दी गुड) का प्रकृष्ट ज्ञान प्राप्त करना है। गणित और दर्शन का इतना विशद ज्ञान प्राप्त करने पर भी सिर्फ चिंतन में निरत रहना उनका उद्देश्य नहीं है। दर्शन के उत्तुंग शिखर से उतरकर उन्हें फिर अज्ञानावृत्त संसार में आकर राज्य और समाज की बुराइयों का निराकरण करना है। पैंतीस से पचास वर्ष की अवस्था तक अवश्य ही उन्हें फिर अज्ञानावृत्त संसार में आकर राज्य और समाज की बुराइयों का निराकरण करना है। पैंतीस से पचास वर्ष की अवस्था तक अवश्य ही उन्हें राजकीय कर्मयोग का मार्ग अपनाना है और सामष्टिक कल्याण की सिद्धि करनी है। राजनीतिक दृष्टिकोण, प्लेटो की अपेक्षा अरस्तु में अधिक प्रबल है। मानव को राजनीतिक प्राणी मानकर शिक्षा को सदभ्यासप्राप्ति का वह परम साधन मानता है। विभिन्न नागरिकों में शिक्षा से ही राज्यनिमित्तक शील का विकास संभव है। शिक्षा से मानसिक उन्नयन तथा अवकाश का सदुपयोग होता है, ऐसा अरस्तु ने स्वीकार किया है किंतु प्लेटो के समान तात्विक और दार्शनिक शिक्षा पर उसने ध्यान नहीं दिया है। फिर भी प्लेटो की भाँति अरस्तु भी राज्य का पूरा नियंत्रण शिक्षा पर मानता है।

मध्ययुगीन यूरोप में देववाद की प्रधानता थी। संत अगस्तीन ने दिव्य नगर का संदेश दिया और टॉमस अक्वायनास ने सनातन नियम और नैसर्गिक नियम का उद्घोध किया। मध्ययुग के अंतिम चरण में ऑक्सफोर्ड, कैब्रिज, पेरिस विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई और उनमें भी प्रारंभ में धर्मशास्त्र के अध्ययन का ही महत्व रखा गया था। भारतवर्ष में भी मध्ययुग में शंकर, रामानुज, निंबार्क, मध्व, वल्लभ आदि ने ज्ञान, भक्ति और वैराग्य का ही संदेश प्रतिपादित किया।

मध्ययुग का अंत होने पर यूरोपीय पुनरुत्थान आंदोलन से पुनरपि प्रकृतिवाद और मानववाद पर बल पड़ा। यदि दाँते और कुसा के निकोलास दैवी विचिंतन और आध्यात्मिक संध्वनि के संदेशवाहक थे तो इरेसमस, मोर और मोंटेन ने "मनुष्य" पर ध्यान आकृष्ट किया। केपलर, गेलिलियो और न्यूटन ने भौतिकी के विकास कर क्रांतिकारी वैज्ञानिक दृष्टिकोण दिया। बेकन, डेकार्ट और लायब्नित्स ने ज्ञान को शक्तिप्रद माना। लॉक ने सदभ्यास के द्वारा चारित्रिक उत्थान पर बल दिया तथापि उसने शिक्षा में अभिजाततंत्री दृष्टिकोण समर्थित किया, यद्यपि वह राजनीतिक विचारों में नैसर्गिक अधिकारवाद का पोषक था। रूसो ने पूँजीवाद, सभ्यता और बुद्धिवाद का खंडन कर प्रकृतिवाद और शिशुशिक्षा का पोषण किया किंतु उसका ग्रंथ "एमिल" दार्शनिक शिक्षा के पश्न पर बिलकुल मौन है। मनोविज्ञान का महत्व स्वीकार कर पेष्टालॉज़ी ने शिशुओं के पूर्ण विकास को गौरव दिया। स्वत:प्रेरित विकास और निजाभिव्यक्ति को मूलोद्देश्य मानकर फ्रोबेल ने बालोद्यान (किंडरगार्टन) पद्धति का सूत्रपति किया।

हेगेल शिक्षा का आध्यात्मिक प्रयोजन स्वीकार करता था। शिक्षा का नियंत्रण वह राज्य के हाथ में न देकर नागरिक समाज को सुपुर्द करता था। तथापि उसने स्वतंत्रता पर बल नहीं दिया। हेगेल के अध्यात्मवादी दृष्टिकोण को अपनाकर शिक्षा को व्यक्तित्व के चैतन्य का अभिप्रकाशन जेंटीले (Gentile) ने माना है। समस्त विषयों का अध्यापन आध्यात्मिक उन्मेष के लिये ही वह अभीष्ट मानता है। प्रकृतिवादी और व्यवहारवादी जॉन डिवी शिक्षा और जीवन का अत्यंत निकट संबंध मानता है। ईश्वरवाद, आत्मवाद या अनुशासन को लोगों पर लादना उसे पसंद नहीं है। शिक्षा की प्रक्रिया को वह इतना आकर्षक और वृत्तियों को तन्निष्ठ करानेवाला बनाना चाहता है कि भयोत्पादक बाह्य अनुशासन लादना न पड़े। शिक्षा और लोकतंत्र में गहरा संबंध मानकर सामाजिकताप्राप्ति पर उसने जोर दिया है। ह्वायटहेड (Whitehead) शिक्षा के द्वारा सतत जागरूकता, सर्जनात्मकता, जीवनोत्साह, ओजस्विता आदि का संचार करना चाहता है। बट्रेंड रसल के अनुसार शिक्षा तथ्यसंग्रह न होकर ऐसी प्रक्रिया है जिससे मानव, समाज और जगत् में अपना वास्तविक स्थान समझ सके। राज्य और चर्च के आधिपत्य और पुछल्ले से शिक्षा विनिर्मुक्त रहनी चाहिए। शिक्षा में स्वातंत्र्य और वैज्ञानिक दृष्टिबिंदु का समर्थन रसल की बड़ी विशेषता है।

संश्लिष्ट एवं पूर्ण शिक्षा (Integral and complete education) वही कही जा सकती है जो सदस्यों के अन्नमय कोष को तृप्त और बौद्धिक, नैतिक तथा आध्यात्मिक आदर्शों का अभिज्ञापन भी करा सके। समस्त व्यापारों का मूलाधार शरीर है अत: इसकी मजबूती परमावश्यक है। पहलवानी या दंगलीपन कुछ व्यक्तियें के लिये ही ठीक है किंतु समस्त नागरिकों का शरीर अवश्य ही कष्टसहिष्णु वन सके, ऐसी शिक्षा आवश्यक है। मानववादी साहित्य और ललित कला की शिक्षा अधिक लोगों को मिलनी चाहिए। इससे बर्बरता का नाश और भावनाओं का संशोधन होता है। साहित्य का प्रयोजन वासनाओं का विलास नहीं किंतु स्वस्थ आनंद की सृष्टि और चारित्रिक उन्नयन है। वैयक्तिक और सामाजिक जीवन नैतिकता के बिना नहीं चल सकता। अत: नैतिक शिक्षा प्रारंभिक अवस्था से ही मिलनी चाहिए और इस कार्य में धर्मग्रथों के चुने हुए स्थलों का शिक्षण होना चाहिए। वर्तमान सभ्यता वैज्ञानिक और यांत्रिक है और आज कोई भी राष्ट्र उद्योग और विज्ञान की उपेक्षा कर न तो नागरिकों के जीवनस्तर को उठा सकता है और न अपनी सत्ता ही कायम कर सकता है। डार्विन, हक्सले, स्पेंसर आदि ने भी वैज्ञानिक शिक्षा का पक्ष ग्रहण किया था। एक अंश तक आरंभिक विज्ञान की शिक्षा समस्त नागरिकों को मिलनी चाहिए और कुछ नागरिक इसे प्रमुख व्यवसाय बनाकर इसमें परम वैशारद्य प्राप्त करें। बुद्धि की उन्मुक्ति सतत जागरूकता के द्वारा व्यक्त होती है अत: विश्वप्रवाह की नानामुख अभिव्यक्तियों के विषय में जिज्ञासापूर्ण कुतूहल सर्वदा संवर्धित रखना शिक्षित मानव का लक्ष्य है। किंतु कुछ नागरिक इतने से ही संतुष्ट न हो, निखिल देश और मानवता की सेवा में अपने स्वार्थ का विसर्जन ही शिक्षा का अंतिम उद्देश्य मानेंगे। मनुष्य एक सावयव इकाई है अत: शरीर, मन, बुद्धि, चरित्र, हृदय और आत्मा इन सभी की पूर्णता परमाभिप्रेत है। जीविकाप्राप्ति और समाज के साथ सामंजस्य, तथा भद्र व्यक्तित्व की शिक्षा की इयत्ता नहीं बताते। मानव का सर्वविध विनिर्मुक्त विकास और पूर्णताप्राप्ति ही समग्र शिक्षा का उद्देश्य है।

प्राचीन भारतीय शिक्षा दर्शन[संपादित करें]

जीवन-दर्शन और शिक्षा-दर्शन के मध्य वैषम्य की कोई कल्पना नहीं की जा सकती है। वे एक-दूसरे के पूरक हैं और एक-दूसरे को प्रभावित भी करते हैं। जीवन-दर्शन की दृष्टि से प्राचीन भारतीय दर्शन के विभिन्न कालों के बीच गहरी रेखायें नहीं खींची जा सकती हैं। प्राचीन भारत की संस्कृति शाश्वत और सतत् रही है, अविभाज्य रही है। विद्वानों ने वैदिक संस्कृति से महाकाव्य (रामायण और महाभारत) कालीन संस्कृति में प्राथक्य स्थापित करने के प्रयत्न किये हैं; किन्तु बाद वाले काल में भी वैदिक संस्कृति और जीवन शैली का स्पष्ट प्रभाव है; साम्य भी है। वैदिक जीवन शैली महाकाव्यकालीन जीवन शैली में प्राचुर्य है। यह सत्य है कि रामायण और महाभारत में वर्णित कुछ जीवन पद्धतियाँ वैदिक काल में नहीं हैं। अत: वेदकालीन जीवन-दर्शन का अस्तित्व पृथक से स्वीकार किया जा सकता है। इसी तारतम्य में यदि हम महाकाव्यकालीन युग का पृथक अस्तित्व भी स्वीकार करते हैं तब भी वैदिक संस्कारों का युग में भी विद्यमान होना स्वीकार करना ही होगा।

इस परिप्रेक्ष्य में प्राचीन भारत के इतिहास को एक इकाई के रूप में होना चाहिए। इसी तारतम्य में प्राचीन भारतीय शिक्षा-दर्शन को भी सर्वप्रथम एक इकाई के रूप में ही मान्य किया जाना चाहिए। यह हो सकता है कि सूक्ष्म दृष्टि से विचार करने के लिए उपर्युक्त दोनों युगों की सीमायें निर्धारित की जायें किन्तु विशेषकर बाद वाले युग में प्रथम युग की इतनी अधिक विशेषतायें विद्यमान हैं कि दोनों युगों के जीवन-दर्शन और शिक्षा-दर्शन पर एक साथ विचार करना भी उपयोगी होगा।

प्राचीन भारतीय जीवन-दर्शन धर्ममय था। जीवन के सभी कार्यकलाप धर्म से ओत-प्रोत थे, धर्म से नियंत्रित थे। धर्म द्वारा, धर्म के लिए और धर्ममय जीवन शैली प्राचीन भारत की विशेषता थी। वर्तमान जीवन में राजनीति का प्रभुत्व है। धर्म, समाज, अर्थ आदि सभी में राजनीति का प्रवेश है। सभी पर राजनीति हावी है। प्राचीन युग की प्रधानता होने से राजनीति में हिंसा और शत्रुता, द्वेष और ईर्ष्या, परिग्रह और स्वार्थ का बहुल्य न होकर, प्रेम, सदाचार त्याग और अपरिग्रह महत्वपूर्ण थे। उदात्त भावनायें बलवती थीं। दिव्य सिद्धान्त जीवन के मार्गदर्शक थे। सामाजिक व्यवस्था में व्यक्ति प्रधान नहीं था, अपितु वह परिवार और समाज के लिए व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग करने को तत्पर था। उदात्त वृत्ति की सीमा सम्पूर्ण वसुधा थी। जीवन का आदर्श ‘वसुधैवकुटुम्बकम्’ था। जीवन का उद्देश्य धर्म था। धर्ममय जीवन भौतिक उपलब्धियों से श्रेष्ठ माना जाता था।

प्राचीन भारत का शिक्षा-दर्शन भी धर्म से ही प्रभावित था। शिक्षा का उद्देश्य धर्माचरण की वृत्ति जाग्रत करना था। शिक्षा, धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के लिए थी। इनका क्रमिक विकास ही शिक्षा का एकमात्र लक्ष्य था। धर्म का सर्वप्रथम स्थान था। धर्म से विपरीत होकर अर्थ लाभ करना मोक्ष प्राप्ति का मार्ग अवरुद्ध करना था। मोक्ष जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य था और यही शिक्षा का भी अन्तिम लक्ष्य था। प्राचीन काल में जीवन-दर्शन ने शिक्षा के उद्देश्यों को निर्धारित किया था। जीवन की आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का प्रभाव शिक्षा दर्शन पर भी पड़ा था। उस काल के शिक्षकों, ऋषियों आदि ने चित्त-वृत्ति-निरोध को शिक्षा का उद्देश्य माना था। शिक्षा का लक्ष्य यह भी था कि आध्यात्मिक मूल्यों का विकास हो। उस समय भौतिक सुविधाओं के विकास की ओर ध्यान देना किंचित भी आवश्यक नहीं था क्योंकि भूमि धन-धान्य से पूर्ण थी, भूमि पर जनसंख्या का भार नहीं था। किन्तु इसका यह भी अर्थ नहीं था कि लोकोपयोगी शिक्षा का आभाव था। प्रथमत: लोकोपयोगी शिक्षा परिवार में, परिवार के मध्यम से ही सम्पन्न हो जाती थीं। वंश की परंपरायें थीं और ये परम्परायें पिता से पुत्र को हस्तान्तरित होती रहती थीं। व्यवसायों के क्षेत्र में प्रतियोगिता नहीं के बराबर थीं। सभी के लिए काम उपलब्ध था। सभी की आवश्यकताएँ पूर्ण हो जाती थीं।

चाहे वैदिक युग में हो अथवा महाकाव्य काल में हो, प्राचीन भारतीय जीवन पद्धति में ऋषिगण समाज के मित्र, दार्शनिक और मार्गदर्शक थे। वे सभी शिक्षक के समधर्मी थे। वे सदा ही आध्यात्मिक सत्ता के गुण गाते थे। उनका जीवन भौतिकता से मुक्त और आध्यात्मिकता में लिप्त रहता था। समाज को भी वे यही शिक्षा और मार्गदर्शन देते थे। वैदिक काल से प्रारम्भ होकर, महाकाव्य काल में यह जीवन-दर्शन परवान चढ़ा। इस प्रकार प्राचीन काल में भारतीय जीवन-दर्शन पूर्णत: आध्यात्मिक रहा और शिक्षा को भी यही दिशा मिली। गुरु परंपरा अत्यंत ही महत्वपूर्ण रही। वेदों का प्रादुर्भाव भी गुरु परंपरा से ही हुआ। तत्पश्चात भी शिक्षा गुरु परम्परा के माध्यम से ही दी जाती रही।

यद्यपि व्यवसायों का शिक्षण अधिकतर गृह प्रांगण में ही होता था किन्तु गुरु-गृह भी गृहस्थी की शिक्षा के समुन्नत केन्द्र थे। भारत उस काल में भी कृषि प्रधान देश था। कृषि, वनोपज और पशुपालन का शिक्षण प्राय: गुरु-गृह में निवास कर प्राप्त होता था। मानव प्रकृति की गोद से दूर नहीं रहता था। गुरु-गृह अधिकतर बस्तियों से दूर रहते थे। उनमें रहने वाले विद्याभ्यामी प्रकृति के प्रांगण में निवास करते थे, विचरते थे, शिक्षा प्राप्त करते थे और अभ्यास एवं अनुप्रयोग करते थे। चाहे धनवान-पुत्र हो या निर्धन-पुत्र, कृषि कार्य एवं वनवास और वनविचरण के कार्यों एवं प्रवृत्तियों द्वारा शिक्षा प्राप्त करते थे। दोनों ही वर्ग के शिष्यों के लिए ऐसे कार्यों द्वारा श्रम का गौरव आत्मसात करना और व्यवहार में लाना उपयोगी माना जाता था। श्रम का गौरव समाज में पूर्णरूपेण प्रतिष्ठित और महिमा मण्डित था। इसके अतिरिक्त सेवा-कार्य को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त था। गुरु-गृह में गुरु, गुरु-परिवार तथा सहपाठियों की सेवा को उत्कृष्ठ कार्य माना जाता था। गुरु की गायों की सेवा भी शिष्य का कर्त्तव्य था। गुरुकुल में मानवोपयोगी पशुओं की संख्या सैकड़ों और हजारों में होती थी।

सामूहिकता का अत्याधिक महत्व था। गुरु सैकड़ों की संख्या में गौपालन इसलिए नहीं करता था कि उसे निजी लाभ हो और उसका परिवार भौतिक सुविधायें भोग सके अपितु इस उद्यम का लाभ गुरुकुल में निवास करने वाले सभी शिष्य आदिवासियों को मिलता था। छान्दोग्य उपनिषद् में महासन्त सत्यकाम की कथा का वर्णन है। प्रारम्भ में तो वे गुरु की गौवों की रक्षा में रत रहते थे बाद में उनकी देख-रेख में सहस्त्र गायों का पालन करते थे। विभिन्न प्रकार के दानों में गौदान का सार्वाधिक महत्व था। गौदान को स्वर्णदान से भी अधिक महान माना जाता था। शिक्षा की आर्थिक व्यवस्था में गोधन सर्वोपरि था। गृहस्थाश्रम के लिए उपयुक्त इस शिक्षा की पृष्ठभूमि में वही सिद्धान्त था जिसको वर्तमान में हम ‘क्रिया से शिक्षा’ की संज्ञा देते हैं। उच्चतम शिक्षा में भी ‘शारीरिक श्रम’ और ‘क्रिया’ का अत्याधिक महत्व था। आध्यात्मिक उन्नति में संलग्न ऋषि एवं शिष्य भी शारीरिक श्रम से दूर नहीं रहते थे।

इसका यही अर्थ है कि शिक्षा केवल सैद्धान्तिक नहीं थी। व्यवहार और वास्तविकता का भी शिक्षा से उतना ही गहन संबंध था जितना सैद्धांतिक अध्ययन-अध्यापन का। किसी भी कार्य को छोटा नहीं समझा जाता था। ऋग्वेद में ऐसे उदाहरण हैं कि ऋषि स्वयं कवि थे, उनके पिता चिकित्सक थे, उनकी माता उपल प्रक्षिणी अर्थात् आटा पीसने वाली थी और परिवार के तीनों ही सदस्य शिक्षा दान में कार्यरत थे।

क्रिया द्वारा शिक्षा के लिए जीवन एक प्रयोगशाला के समान था। ऋषि कुल में जीवनयापन के मध्य शिक्षा संबंधी प्रयोग और परीक्षण सम्पन्न होते थे। इन प्रयोगों के आधार पर ही शिक्षाशास्त्र विकसित हुआ था। यहाँ तक शिक्षण विधि का प्रश्न है, श्रवण, मनन और चिंतन, प्रयोग और व्यवहार को समुचित स्थान प्राप्त था। स्मरण शक्ति का यथोचित उपयोग किया जाता था। गुरु परंपरा का महत्व भी अत्यधिक था। यह गुरु परंपरा की ही देन है कि वेद आज तक जीवित हैं। प्राचीन भारतीय शिक्षा का विकास, आध्यात्मिकता, चित्त-वृत्ति-निरोध, लोकोपयोग, गृहस्थ-जीवन-प्रशिक्षण, श्रम की पूजा, कृषि का प्रायोगिक ज्ञान आदि को सम्मिलित कर हुआ था।

ऋषिकुल अथवा गुरुकुल में निवास करने वाले किसी भी शिष्य या उसके परिवार से शुल्क लेने की प्रथा नहीं थी। प्राय: वे आश्रम आत्म-निर्भर होते थे। पशुपालन या कृषि उत्पादन से इन आश्रमों या गुरुकुल का सम्पूर्ण व्यय वहन होता था। अनेक आश्रम ऐसे भी थे जिनके लिए इस प्रकार से व्यय पूर्ति संभव नहीं थी। उनके लिए भिक्षा प्राप्त करने का उपाय था। शिष्यगण और स्वयं गुरु भी भिक्षा माँगने को अधम अथवा हीन नहीं मानते थे। भिक्षा स्वयं माँगने वाले के लिए नहीं होकर समूह के लिए होती थी। वे भिक्षा प्राप्त करने में किसी प्रकार की लज्जा या ग्लानि का अनुभव नहीं करते थे। निर्धन और धनिक दोनों ही प्रकार के परिवारों से आये शिष्य भिक्षा प्राप्ति में समान रूप से भाग लेते थे। ‘एक सब के लिए और सब एक के लिए’ वाले सिद्धान्त पर सम्पूर्ण व्यवस्था आधारित थी।

गुरु भी भिक्षा माँगने में किसी प्रकार का संकोच नहीं करते थे। भिक्षा उनके स्वयं के उदर पोषण या भौतिक सुविधाओं के लिए नहीं होती थी अपितु आश्रम के संचालन और विकास के लिए वे राजा या धनिकों के द्वार पर दान प्राप्त करने के लिए भिक्षु के रूप में उपस्थित होते थे। वे दान में गौएं और स्वर्ण प्राप्त करते थे। जब शिष्य अपने ब्रह्मचर्य आश्रम की समाप्ति पर अपने परिवार में पहुँचते थे और गृहस्थ का जीवन अपनाते थे तब उन्हें इस भिक्षा की वृत्ति की उपादेयता ज्ञात रहती थी। उनके पास उनका स्वयं का अनुभव होता था कि किस प्रकार उनके शिष्य काल में प्राप्त भिक्षा सर्वाहिताय होती थी। अत: वे मुक्त हृदय से दान देने में पीछे नहीं रहते थे।

ऋषि की ख्याति के अनुरूप आश्रम चयन की सुविधा शिष्य के परिवार को रहती थी किन्तु आश्रम, धनवानों के आश्रम और निर्धनों के आश्रम में बंटे नहीं थे। आश्रम में सभी स्तर के शिष्य एक साथ शिक्षा प्राप्त करते थे। राजा और रंक में किसी प्रकार का भेद नहीं था। सभी एक साथ गुरु की छत्र-छाया में निवास करते थे, विद्याभ्यास करते थे। महाकाव्य काल में संपादिनी ऋषि के आश्रम में कृष्ण और सुदामा राजपुत्र और रंक-पुत्र के एक साथ शिक्षा प्राप्त करने और जीवनपर्यन्त मित्रता निभाने का उदाहरण स्मरणीय है। गुरु का महत्व अत्यधिक था। शिक्षा, शिल्प-केन्द्रित थी। ऋषियों के अपने आश्रम थे। आश्रम उनके ही नाम से विख्यात थे। उनके स्थान निश्चित थे। गुरु परंपरा में एक पीढ़ी के पश्चात् दूसरी पीढ़ी आती रहती थी।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]