पारिभाषिक शब्दावली
शब्दावली, "ग्लासरी" (glossary) का प्रतिशब्द है। "ग्लासरी" मूलत: "ग्लॉस" शब्द से बना है। "ग्लॉस" ग्रीक भाषा का glossa है जिसका प्रारंभिक अर्थ "वाणी" था। बाद में यह "भाषा" या "बोली" का वाचक हो गया। आगे चलकर इसमें और भी अर्थपरिवर्तन हुए और इसका प्रयोग किसी भी प्रकार के शब्द (पारिभाषिक, सामान्य, क्षेत्रीय, प्राचीन, अप्रचलित आदि) के लिए होने लगा। ऐसे शब्दों का संग्रह ही "ग्लॉसरी" या "शब्दावली" है।
ज्ञान की किसी विशेष विधा (कार्य क्षेत्र) में प्रयोग किये जाने वाले शब्दों की उनकी परिभाषा सहित सूची पारिभाषिक शब्दावली (glossary) या पारिभाशिक शब्दकोश कहलाती है। उदाहरण के लिये गणित के अध्ययन में आने वाले शब्दों एवं उनकी परिभाषा को गणित की पारिभाषिक शब्दावली कहते हैं।
महावीराचार्य ने गणितसारसंग्रहः के 'संज्ञाधिकारः' नामक प्रथम अध्याय में कहा है-
- न शक्यतेऽर्थोबोद्धुं यत्सर्वस्मिन् संज्ञया विना ।
- आदावतोऽस्य शास्त्रस्य परिभाषाभिध्यास्यते ।।
- ( विना संज्ञा (नाम या शब्दावली) के किसी भी विषय का अर्थ
समझाना सम्भव नही है। (अतः) इस शास्त्र के आरम्भ में ही परिभाषा दी जा रही है।)
इसके बाद उन्होने लम्बाई, क्षेत्रफल, आयतन, समय, सोना, चाँदी एवं अन्य धातुओं के मापन की इकाइयों के नाम और उनकी परिभाषा (परिमाण) दिया है। इसके बाद गणितीय संक्रियाओं के नाम और परिभाषा दी है तथा अन्य गणितीय परिभाषाएँ दी है।
द्विभाषिक शब्दावली में एक भाषा के शब्दों का दूसरी भाषा में समानार्थक शब्द दिया जाता है व उस शब्द की परिभाषा भी की जाती है।
अर्थ की दृष्टि से किसी भाषा की शब्दावली दो प्रकार की होती है- सामान्य शब्दावली और पारिभाषिक शब्दावली। ऐसे शब्द जो किसी विशेष ज्ञान के क्षेत्र में एक निश्चित अर्थ में प्रयुक्त होते हैं, वह पारिभाषिक शब्द होते हैं और जो शब्द एक निश्चित अर्थ में प्रयुक्त नहीं होते वह सामान्य शब्द होते हैं।
प्रसिद्ध विद्वान आचार्य रघुवीर बड़े ही सरल शब्दों में पारिभाषिक और साधारण शब्दों का अन्तर स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
"पारिभाषिक शब्द का अर्थ है जिसकी सीमाएं बांध दी गई हों। .... और जिनकी सीमा नहीं बांधी जाती, वे साधारण शब्द होते हैं।
पारिभाषिक शब्दों को स्पष्ट करने के लिए अनेक विद्वानों ने अनेक प्रकार से परिभाषाएं निश्चित करने का प्रयत्न किया है। डॉ. रघुवीर सिंह के अनुसार -
"पारिभाषिक शब्द वह होता है जिसका प्रयाग किसी विशेष अर्थ में संकेत रुप से होता है।
डॉ. भोलानाथ तिवारी 'अनुवाद' के सम्पादकीय में इसे और स्पष्ट करते हुए कहते हैं-
"पारिभाषिक शब्द ऐसे शब्दों को कहते हैं जो सामान्य व्यवहार की भाषा के शब्द न होकर भौतिकी, रसायन, प्राणिविज्ञान, दर्शन, गणित, इंजीनियरी, विधि, वाणिज्य, अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान, भूगोल आदि ज्ञान-विज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों के विशिष्ट शब्द होते हैं और जिनकी अर्थ सीमा सुनिश्चित और परिभाषित होती है। क्षेत्र विशेष में इन शब्दों का विशिष्ट अर्थ होता है।
चैम्बर्स टैक्नीकल डिक्शनरी की भूमिक में एक स्थान पर स्पष्ट लिखा है-
"....पारिभाषिक शब्द वास्तव में विशेषताओं और तकनीज्ञों द्वारा अपने विचारों को ठीक-ठाक लिखने के लिए गृहीत, अनूदित या आविष्कृत प्रतीक हैं।
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इतिहास [संपादित करें]
शब्दावली की परंपरा "एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका" में तथा अन्यत्र भी फिलेटस (Philetas) से मानी जाती है। इनका काल तीसरी सदी ई. पू. है। इन्होंने "अतक्ता" (Atakta) शीर्षक शब्दावली संगृहीत की थी। किंतु वस्तुत: शब्दावली का इतिहास अब बहुत पीछे चला गया है, और अब तक प्राप्त प्राचीनतम शब्दावली हित्ताइत (हित्ती) भाषा की है, जिसका समय ईसा से प्राय: 1000 वर्ष पूर्व से भी आगे है।
भारत में प्राचीनतम शब्दावली निघंटु रूप में मिलती है। संस्कृत भाषा में विकास के कारण जब वैदिक संस्कृत लोगों के लिए दुरूह सिद्ध होने लगी तो वैदिक शब्दों के संग्रह किए गए, जिन्हें "निघंटु" (निघण्टति शोभते, नि घण्टअकु) की संज्ञा दी गई। आज जो निघंटु उपलब्ध है वह यास्काचार्य का है, किंतु ऐसे विश्वास के पर्यांत प्रमाण हैं कि यास्क के समय में ऐसे 4-5 और भी निघंटु थे। यास्क का समय 8वीं सदी ई. पू. माना गया है। इसका आशय यह हुआ कि पश्चिमी विद्वान् फिलटस की जिस शब्दावली (glossary) को प्राचीनतम मानते हैं वह भारतीय निघंटुओं से कम से कम 4-5 सौ वर्ष बाद की है।
यूरोप में जो शब्दावलियाँ प्रारंभ में संगृहीत की गईं, एकभाषिक थीं किन्तु बाद में बहुभाषिक शब्दावलियों की परंपरा चली। यूरोप की प्राचीनतम ज्ञात द्विभाषिक शब्दावली लैटिनग्रीक की है, जिसके संग्रहकर्ता फिलॉक्सेनस माने जाते रहे हैं यद्यपि यह सिद्ध हो चुका है कि मूलत: यह रचना उनकी नहीं थी। इसका काल मोटे रूप से छठी सदी ई. है। यह उल्लेख है कि एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटैनिका आदि में इसे प्राचीनतम बहुभाषिक शब्दावली माना गया है, किंतु वस्तुत: पीछे जिस हित्ताइत शब्दावली का उल्लेख किया जा चुका है, वह द्विभाषिक ही नहीं त्रिभाषिक (हित्ती-सुमेरी-अक्कादी) है। इस प्रकार प्राचीनतम बहुभाषिक शब्दावली का काल लैटिन-ग्रीक से लगभग डेढ़ हजार वर्ष पीछे है। 1000 ई. के आसपास ग्रीक-लैटिन लैटिन-ग्रीक की कई शब्दावलियाँ बनीं।
भारत में बहुभाषिक शब्दावलि की परंपरा बहुत पुरानी नहीं है। अमरकोश के पूर्व - जैसे कात्य का "नाममाला", भागुरि का "त्रिकांड", अमरदत्त का "अमरमाला" या वाचस्पति का "शब्दार्णव" आदि-एवं बाद के - पुरुषोत्तम देव के "हारावली" तथा "त्रिकांडकोश", हलायुध का "अभिधान रत्नमाला", यादवप्रकाश का "वैजंती" आदि-कोश एकभाषिक ही हैं। प्राकृत अपभ्रंश - जैसे धनपालकृत "पाइअ लच्छीनाममाला", हेमचंद्र की "देशीनाममाला" तथा गोपाल, द्रोण आदि के देशी "कोश" एवं हिंदी के पुराने कोश - जैसे नंददास, बनारसीदास, बद्रीदास, हरिचरणदास, चेतनविजय, विनयसागर आदि की "नाममाला", प्रयागदास की "शब्दरत्नावली" या हरिचरणदास का "कर्णाभरण" आदि-उसी परंपरा में, अर्थात् एकभाषिक शब्दावलियाँ हैं। इस परंपरा में कदाचित् अंतिम ग्रंथ सुवंश शुक्ल का "उमरावकोश" (19वीं सदी) है।
भारत में एकाधिक भाषाओं की शब्दावलियों की परंपरा मुसलमानों से आरंभ होती है। इसका सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ "खालिकबारी" है, जिसमें हिंदी, फ्रारसी, तुर्की के शब्द हैं। खालिकबारी परंपरा में इस प्रकार के कई ग्रंथ लिखे गए, जिनमें सबसे प्रसिद्ध रचना अमीर खुसरों की कही जाती है, यद्यपि इस संबंध में पर्याप्त विवाद है। अनेक विद्वानों के अनुसार खालिकबारी किसी "खुसरोशाह" की रचना है, जो प्रसिद्ध कवि खुसरो के बहुत बाद में हुए थे। शिवाजी ने भी राजनीति की फ़ारसी-संस्कृत शब्दावली बनाई थी, जिसमें लगभग 1500 शब्द थे। उसके बाद खालिकबारी परंपरा में हिंदी-फारसी के कई कोश लिखे गए। किंतु वैज्ञानिक ढंग से यह कार्य अंग्रेजों के संपर्क के बाद प्रारंभ हुआ। यूरोप में इस दिशा में कार्य को वैज्ञानिक स्तर पर लाने का श्रेय जे. स्कैलिसर (1540-1609) को है। 1573 में प्रकाशित हेनरी स्टेफेनस की द्विभाषिक शब्दावली इस क्षेत्र की प्रथम महत्वपूर्ण रचना मानी जाती है। भारत में अंग्रेज पादरियों ने धर्म एवं राजप्रचार की दृष्टि से यहाँ की कई भाषाओं के अंग्रेजी कोश प्रकाशित किए। हिंदी की दृष्टि से इस शृंखला के प्रथम कोश जे. फरगुसन की "ए डिक्शनरी ऑव हिंदोस्तान लैंग्विज" है जो 1773 ई. में लंदन से छपी थी। यह उल्लेख्य है कि इस परंपरा में होते हुए भी ये कोश शब्दावली की सीमा के बाहर हैं।
अब बहुभाषिक शब्दावलियों की परंपरा बहुत विकसित हो गई है तथा इधर 3-4 से लेकर 10-12 भाषाओं की विभिन्न विषयों की शब्दावलियाँ प्रकाशित हुई हैं। इस दिशा में इंग्लैंड, अमरीका, जर्मनी, फ्रांस तथा रूस ने पर्याप्त श्रम किया है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी इस दिशा में योग दिया है।
इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि शब्दावलियों का ही विकास कोशों के रूप में हुआ है, किंतु दोनों एक नहीं हैं। दोनों में अंतर यह है कि शब्दावली में एक या अधिक भाषाओं के शब्दों का संग्रह रहता है, किंतु कोश में शब्दों का अर्थ या उनकी व्याख्या आदि भी रहती है। कला, वाणिज्य, विज्ञान आदि के विज्ञान आदि के विभिन्न विषयों के द्विभाषिक या बहुभाषिक कोशों के अतिरिक्त, पर्याय एवं विलोमकोश (Thesaras) भी शब्दावलियों की ही परंपरा में आते हैं। मध्ययुगीन हिंदी साहित्य का "नाममाला" साहित्य इस दृष्टि से उल्लेख्य है। अब पर्याय कोशों की परंपरा बड़ी वैज्ञानिक हो गई है और लेखकों आदि के लिए ये बड़े उपयोगी सिद्ध हुए हैं।
शब्दावली संकलन का प्रारंभ तथा विकास [संपादित करें]
मध्यकाल की नाममालाओं की परम्परा के बाद पहला शब्दावली संकलन का कार्य आदम ने १८२९ में 'हिन्दवी भाषा का कोश' शीर्षक से तैयार किया जिसमें २०,००० शब्द थे. तद्भव तथा देशज शब्दों को प्रधानता दी गई. आदम साहब पहले व्यक्ति थे जिन्होंने लोक से बोलचाल के शब्द संगृहीत किये. आदम से पूर्व गिलक्राइस्ट, कर्कपैट्रिक, विलियम हंटर, शेक्सपियर, रॉबक के कोश और बाद में फ़ैलन, येट, डंकर फ़ोर्ब्स, थॉमसन तथा जॉन प्लाट्स के कार्य उल्लेखनीय हैं. इनमें से फ़ैलन, थॉमसन तथा जॉन प्लाट्स के कार्य महत्त्वपूर्ण हैं. थॉमसन के संकलन में शब्दसंख्या ३०,००० है, फ़ैलन के कोश में १२१६ पृष्ठ (रायल क्टेव) हैं. प्लाट्स के कोश का पूरा नाम है - "'ए डिक्शनरी आफ़ उर्दू, क्लासिकल हिंदी ऐंड इंगलिश" (१८७४) जिसकी प्रमुख विशेषताएँ हैं:
(१) शब्दों की व्युत्पत्ति पर प्रकाश तथा
(२) समान वर्तनी के अलग-अलग स्रोतों से आये शब्दों की अलग-अलग प्रविष्टियाँ,
(३) अकर्मक तथा सकर्मक क्रियाओं का उल्लेख,
(४) साहित्येतर शब्दों का संकलन.
भारतीयों द्वारा बनाये गये कोशों में जिन दो कोशों का सर्वाधिक प्रचार-प्रसार हुआ, वे हैं - "श्रीधर भाषा कोश' (सन् १८९४), श्रीधर त्रिपाठी, लखनऊ, पृष्ठ सं. ७४४ तथा 'हिन्दी शब्दार्थ पारिजात' (सन् १९१४), द्वारका प्रसाद चतुर्वेदी, इलाहाबाद। पहले कोश में लगभग २५,००० शब्द संख्या है जबकि दूसरे में ब्रजभाषा-अवधी आदि विभाषाओं के शब्दों की पर्याप्त संख्या रहने के कारण शब्द संख्या अधिक है. अनुमान किया जा सकता है कि २०वी शताब्दी के प्रारंभ तक शब्द संकलन ५०,००० तक पहुँच गया.
आधुनिक काल में बाबू श्याम सुन्दर दास, रामचन्द्र शुक्ल, रामचन्द्र वर्मा के सत्प्रयासों से नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी से 'हिन्दी शब्दसागर' (१९२२-२९) प्रकाशित हुआ जिसकी योजना २३-८-१९०७ की सभा के परम हितैषी और उत्साही सदस्य श्रीयुत रेवरेंड ई. ग्रीब्ज़ के उस प्रस्ताव के अनुसार बनी जिसमें प्रार्थना की गई थी कि "हिन्दी के एक बृहत् और सर्वांगपूर्ण कोश का भार सभा अपने ऊपर ले." सन् १९१० के आरंभ में शब्द संग्रह का कार्य समाप्त हुआ. १० लाख स्लिप बनाई गई जिनमें से लगभग एक लाख शब्दों का आंकलन किया गया. यह कोश वस्तुत: सागर था जो शब्दों, अर्थों, मुहावरों, लोकोक्तियों, उदाहरणों तथा उद्धरणओं से भरपूर अर्थच्छटाएँ देने में सर्वोत्तम माना जाएगा. इसके बाद कोश कला में दीर्घकालीन अनुभव प्राप्त आचार्य रामचन्द्र वर्मा के प्रयासों से वाराणसी से 'प्रामाणिक हिन्दी कोश' (पृ.सं. ३९६६;१९६२-१९६६) प्रकाशित हुआ. 'वृहद् हिन्दी कोश' के तीसरे संस्करण में एक लाख अड़तालीस हज़ार शब्द हैं. इस बीच 'हिन्दी शब्दसागर' का नवीन संशोधित और परिवर्धित संस्करण (१९६५-७५) में प्रकाशित हुआ जिसमें कुल पृष्ठ सं. ५५७० है, संयोजक श्री करूणापति त्रिपाठी के दिनांक १८-२-६५ के वक्तव्य के अनुसार "मूल शब्द सागर से इसकी शब्द संख़्या में दुगुनी वृद्धि हुई है." इस प्रकार कोशों के आधार पर शब्दावली की संख्या दो लाख है.
पारिभाषिक शब्दावली का विकास [संपादित करें]
प्राचीन भारत में ही दर्शन, ज्योतिष, आयुर्वेद आदि कुछ विषयों में प्रचुर भारतीय शब्दावली उपलब्ध थी. उन्नीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ही वैज्ञानिक उपलब्धियों से संबंधित शब्दावली हिन्दी भाषा में आने लगी थी. काशी नागरी प्रचारिणी सभा, वाराणसी ने वैज्ञानिक शब्दावलियों के रूप में सर्वप्रथम पुस्तकाकार प्रकाशन किये। इस दिशा में डॉ. सत्यप्रकाश (विज्ञान परिषद, इलाहाबाद) तथा डॉ. रघुवीर के कार्य विशेष उल्लेखनीय हैं।
डॉ. रघुवीर के कोश कार्य की एक ओर अत्यधिक प्रशंसा हुई, दूसरी ओर अत्यधिक आलोचना. वस्तुत: यह प्रशंसनीय कार्य था, जिसको अत्यधिक श्रम से वैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया गया. संपूर्णत: संस्कृत पर आधारित होने के कारण इसकी व्यावहारिकता पर संदेह किया जाने लगा. उन्होंने सर्वप्रथम भाषा-निर्माण में यांत्रिकता तथा वैज्ञानिकता को स्थान दिया. उपसर्ग तथा प्रत्ययों के धातुओँ के योग से लाखों शब्द सहज ही बनाये जा सकते हैं:
उपसर्गेण धात्वर्थो बलादन्यत्र नीयते। प्रहार-आहार-संहार-विहार-परिहार वत् ।।
इस प्रक्रिया को कोश की भूमिका में समझाया. यदि मात्र दो संभावित योग लें, मूलांश ४०० और तीन प्रत्यय लें तो ८००० रूप बन सकते हैं, जबकि अभी तक मात्र ३४० योगों का उपयोग किया गया है. यहाँ शब्द-निर्माण की अद्भुत क्षमता उद्घाटित होती है. उन्होंने विस्तार से उदाहरण देकर समझाया कि किस प्रकार गम् धातु मात्र से १८० शब्द सहज ही बन जाते हैं. प्रगति, परागति, परिगति, प्रतिगति, अनुगति, अधिगति, अपगति, अतिगति, आगति, अवगति, उपगति, उद्गति, सुगति, संगति, निगति, निर्गति, विगति, दुर्गति, अवगति, अभिगति, गति, गन्तव्य, गम्य, गमनीय, गमक, जंगम, गम्यमान, गत्वर, गमनिका आदि कुछ उदाहरण हैं. मात्र 'इ' धातु के साथ विभिन्न एक अथवा दो उपसर्ग जोड़कर १०७ शब्दों का निर्माण संभव है. उन्होंने स्पष्ट किया कि ५२० धातुओं के साथ २० उपसर्गों तथा ८० प्रत्ययों के योग से लाखों शब्दों का निर्माण किया जा सकता है. अगर धातुओं की संख्या बढ़ा ली जाए तो १७०० धातुओं से २३८०० मौलिक तथा ८४,९६,२४००० शब्दों को व्युत्पन्न किया जा सकता है.
इस प्रकार संस्कृत में शब्द निर्माण की अद्भुत क्षमता है, जिसका अभी नाममात्र का ही उपयोग किया जा सका है. अतिवादी दृष्टि से बचकर भी लाखों ऐसे सरल शब्दों को प्रयोग में लाया जा सकता है, जो हिन्दी की प्रवृत्ति के अनुकूल हैं।
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रयोग में आने वाले तथा पूर्व स्वीकृत वैज्ञानिक शब्दों को स्वीकार कर लेना चाहिए। प्रयोग के आधार पर कुछ शब्द पूर्ण पारिभाषिक (ध्वनिग्राम, संस्वन, प्रकरी, दशमलव), कुछ अर्धपारिभाषिक, जैसे अक्षर, संगति, आपत्ति. ऐतिहासिक आधार पर तत्सम, तद्भव के साथ विदेशी शब्दावली का विशेष महत्त्व है।
वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग [संपादित करें]
मुख्य लेख वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग
स्वतंत्रता के बाद वैज्ञानिक-तकनीकी शब्दावली के लिए शिक्षा मंत्रालय ने सन् १९५० में बोर्ड की स्थापना की. सन् १९५२ में बोर्ड के तत्त्वावधान में शब्दावली निर्माण का कार्य प्रारंभ हुआ. अन्तत: १९६० में केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय की स्थापना हुई. इस प्रकार विभिन्न अवसरों पर तैयार शब्दावली को 'पारिभाषिक शब्द संग्रह' शीर्षक से प्रकाशित किया गया, जिसका उद्देश्य एक ओर वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग के समन्वय कार्य के लिए आधार प्रदान करना था और दूसरी ओर अन्तरिम अवधि में लेखकों को नई संकल्पनाओं के लिए सर्वसम्मत पारिभाषिक शब्द प्रदान करना था.
संक्षिप्त रूपों द्वारा नई शब्दावली [संपादित करें]
आज इस भागदौड़ के युग में हर आदमी की यह आदत बनती जा रही है कि कम से कम समय में कम से कम शब्दों में अपने मन के भावों को अभिव्यक्त करे. इस स्वाभाविक प्रवृत्ति के फलस्वरूप ही संस्थाओं तथा संगठनों के लम्बे-लम्बे नाम संक्षिप्त होते जा रहे हैं. नई प्रकार की यह शब्दावली अंग्रेज़ी में 'एक्रोनिम' से अभिहित की जाती है. प्रत्येक काल में ऐसे शब्द बनते रहे हैं. कालान्तर में जब ये शब्द बहुप्रयुक्त होकर कोश के अन्तर्गत अपना समुचित स्थान बना लेते हैं, तो प्राय: भूल जाते हैं कि इनका निर्माण इस विधि से हुआ होगा, जैसे अंग्रेज़ी 'न्यूज़'. हिन्दी में प्रचलित 'बदी' तथा 'सुदी' शब्द भी इसी प्रक्रिया के फलस्वरूप हैं, 'स' सुदि: [शु.(शुक्लपक्ष) तथा 'ब' बहुल(कृष्णपक्ष)] हिन्दी में अंकटाड, सैम, मीडो, सीटो, इंटक, नाटो, यूनेस्को आदि पर्याप्त शब्द इसी कोटि के हैं. पिछली बार चीन के आक्रमण के समय नेफ़ा, मिग तथा रडार तीन शब्द काफ़ी प्रचलित हो गये. युद्ध में 'लेसर', 'मिग' प्रचलित हैं, प्रबंधशास्त्र में 'प्रिन्स' 'पर्ट' इसी प्रकार के शब्द हैं. हिन्दी पत्रकारिता में प्रचलित अंनिआ, उर्वसी, उपूसी, इंका, लोद इसी प्रकार के शब्द हैं.
हिन्दी की विभाषा तथा बोलियों का महत्त्व [संपादित करें]
किसी बोली का लोकजीवन से अभिन्न संबंध है. बोलियों का ही परिष्कृत, सामान्यीकृत तथा संस्कृत रूप भाषा है. भाषा को ही बोलियों से ही सहज शक्ति प्राप्त होती है. गंगा का आदिस्रोत हिमखंडों से निर्मित गोमुख है, उसी प्रकार हिन्दी की गंगा को उसकी बोलियों से सारभूत तत्त्व तथा प्राणशक्ति मिलती है. व्यावहारिक लोकभाषा से शब्द संग्रह करना सरल कार्य नहीं. लोकबोली के स्थायी तत्त्व लोकगीत तथा लोककहानियों में समाहित रहते हैं. शब्द रूपों के स्रोत तथा उनके विकास की परम्परा और साथ ही अर्थ विकास की श्रृंखला निर्धारित करने में लोकजीवन का विशेष महत्त्व है. बोलियों में जब कोई बोली शिक्षित लोगों के मुख्य नगर या अन्य शिष्ट सामाजिक वर्ग की भाषा के पद पर प्रतिष्ठित हो जाती है तब वह मानक भाषा कहलाती है।
हिन्दी का शब्द-सामर्थ्य [संपादित करें]
किस भाषा को विकसित-विकासशील माना जाए और किसको नहीं इसके लिए प्रो. फर्गुसन ने बड़ी गहराई से विचार किया है। लिखित रूप में प्राप्त जिस भाषा में निम्न्ललिखित विशेषताएँ हों वह भाषा विकसित मानी जाएगी -
(क) आपसी पत्र-व्यवहार होता हो,
(ख) पत्र-पत्रिकाएं प्रकाशित होती हों,
(ग) मौलिक पुस्तकों का लेखन कार्य होता हो,
इस कसौटी पर हिन्दी बिल्कुल खरी उतरती है। हाँ, उन्होंने जो आगे की अवस्थाएँ स्वीकार की हैं कि
(१) उसमें वैज्ञानिक साहित्य निरन्तर प्रकाशित होता रहे तथा
(२) अन्य भाषाओं में हुए वैज्ञानिक कार्य का अनुवाद तथा सार संक्षेप प्रकाशित होता रहे
उस दृष्टि से अभी हिन्दी विकासशील भाषा है और भविष्य में उसमें अनन्त संभावनाएँ निहित हैं।
हॉगन ने विकसित भाषा के जो चार तत्त्व स्वीकार किये हैं उनमें से 'आधुनिकता' पर विशेष बल दिया है। 'भाषा की आधुनिकता' से तात्पर्य है: शब्दावली में वृद्धि तथा नई शैली तथा अभिव्यक्तियों का विकास । इस कसौटी पर भी हिन्दी खरी उतरती है।
हिन्दी के सुप्रसिद्ध कवि तथा विचारक सच्चिदानन्द हीरानन्द वात्स्यायन की मान्यता है कि "भाषा कल्पवृक्ष है। जो उससे आस्थापूर्वक माँगा जाता है, भाषा वह देती है। उससे कुछ माँगा ही न जाए क्योंकि वह पेड़ से लटका हुआ नहीं दीख रहा है, तो कल्पवृक्ष भी कुछ नहीं देता।"
बीसवीं शताब्दी के लब्धप्रतिष्ठ भाषाविद्, ब्लूमफ़ील्ड के अनुसार "भाषा की शक्ति अथवा सम्पत्ति रूपिमों और व्याकरणिमों में है (वाक्य प्रतिरूपों, संरचनाओं और स्थानापत्तियों में) है। रूपिमों और व्याकरणिमों की संख्या भाषाविशेष में हज़ारों में पहुँचती है। ।।।यह साधारणतया माना जाता है कि भाषा सम्पत्ति विभिन्न प्रयुक्त शब्दों पर निर्भर है किन्तु यह संख्या अनिश्चित है क्योंकि रूपीय संरचनाओं के सादृश्य पर शब्द मनचाहे ढंग से बनते रहते हैं।" (भाषा, पृ।३३२)
वस्तुत: भाषा मूलत: अभिव्यक्ति की संरचना तथा शब्दावली का संयुक्त रूप है जो परस्पर संगुम्फित है। शब्दावली आती-जाती, नई बनती रहती है, पुराने शब्दों में नवीन अर्थ भरते जाते हैं, जैसे आज अधिक्रम, अधिवक्ता, अभिलेख, अभ्यर्थी, आख्यापन से सर्वथा नवीन अर्थों की अभिव्यंजना होती है। हिन्दी की आक्षरिक संरचना भी बड़ी सम्पन्न है। आक्षरिक साँचों में पर्याप्त रिक्त स्थान होने के कारण विकास की अभूतपूर्व क्षमता स्पष्ट होती है। 'व्यंजन स्वर-व्यंजन दीर्घ स्वर' साँचे में यदि मात्र 'क्' तथा 'ल्' व्यंजन क्रमश: लिए जाएँ तो २१ संभव शब्द बन सकते हैं, जिनमें से १९ स्थान रिक्त पड़े हुए थे। इन रिक्त स्थानों में से चार स्थानों पर क़िला, क़िले, कुली, किलो शब्द बड़ी आसानी से खप गये।
अब तक के प्रमुख भाषाविद् उपयुक्त सभी दृष्टियों से हिन्दी की अभूतपूर्व क्षमता तथा सामर्थ्य में विश्वास करते हैं।
- "हिन्दी इसी मिट्टी की बोली है और अरबी या फ़ारसी से अधिक जनमानस के निकट है।" - फ़ैलन
- "भारतीय भाषा में कोई भी मानवीय भावना व्यक्त करने की पूर्ण सामर्थ्य है और वह उच्चतम वैज्ञानिक शिक्षा के लिए उपयुक्त है।" - क्रस्ट
- "हिन्दी के पास ऐसा शब्द कोश और अभिव्यक्ति की ऐसी सामर्थ्य है, जो अंग्रेजी से किसी प्रकार कम नहीं।" - १९०१ की जनगणना रिपोर्ट
- "यही (हिन्दी) एक भाषा है जिसमें दो विभिन्न प्रान्तों के लोग आपस में बातचीत कर सकते हैं। यह भारत में सर्वत्र समझी जाती है, क्योंकि इसका व्याकरण भारत की अधिकांश भाषाओं के समान है और इसका शब्दकोश सबकी सम्मिलित सम्पत्ति है।" - ग्रियर्सन
भारतीय संविधान में (३५१) हिन्दी के 'शब्द भंडार के लिए मुख्यत: संस्कृत से तथा गौणत: अन्य भाषाओं से शब्दग्रहण कर समृद्ध' करने की व्यवस्था है।
भारत के लिये संस्कृत आधारित पारिभाषिक शब्दावली का महत्व [संपादित करें]
- अधिकांश शब्द सभी भारतीयों के लिये परिचित हैं,
- शब्दों से नये शब्द बनाने आसान और तर्कसंगत होंगे, जैसे 'कोशिका' से कोशिकीय, कोशिकाद्रव्य, बहुकोशीय, एककोशीय, कोशिकाक्षय आदि।
- जिस प्रकार स्वभाषा में पठन-पाठन से छात्रों में मौलिकता आती है, रटने की प्रवृत्ति पर अंकुश लगता है; उसी प्रकार स्वभाषा की शब्दावली से भी विषय की गहराई से समझ पैदा करने में सहायता मिलती है।
इन्हें भी देखें [संपादित करें]
- महाव्युत्पत्ति
- शब्दकोश
- समान्तर कोश
- अमरकोश
- शब्दकोशों का इतिहास
- हिन्दी शब्दसागर
- पारिभाषिक शब्दावली- हिन्दी साहित्य
वाह्य सूत्र [संपादित करें]
- शब्द का उदय : विकास एवं अनुप्रयोग (गूगल पुस्तक ; लेखक - दयानन्द पन्त)
- अंग्रेजी-हिन्दी पारिभाषिक शब्दावली - इसमें करीब १ लाख ६६ हजार वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्द हैं। यह 'सिम्पल डिक्शनरी अप्लिकेशन' (SDA) नामक प्रोग्राम के साथ प्रयुक्त होने के लिये बनायी गयी है किन्तु साधारण टेक्स्ट एडिटरों में भी इसे देखा जा सकता है। यह 7Z (जिप) प्रारूप में है और इसका आकार लगभग 1.4 मेगाबाइट है।
- वैज्ञानिक एवं तकनीकी शब्दावली आयोग, भारत सरकार
- Subject-wise listing of various glossaries (वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग)
- विषयवार सूची (वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग)
- हिन्दी की वैज्ञानिक, तकनीकी तथा अन्य शब्दावलियाँ
- विशिष्ट शब्दावली - बैंकिंग, प्रशासन आदि विविध कार्य-क्षेत्रों में प्रयोग में आने वाले विशिष्ट शब्दों के लिये हिन्दी शब्द
- अंग्रेजी-हिन्दी कम्प्यूटर शब्दकोश मुफ़्त में डाउनलोड करें
- आरम्भिक विज्ञान कोश (गूगल पुस्तक ; लेखक - गोविन्द झा)
- हिन्दी की शब्द सम्पदा (गूगल पुस्तक ; लेखक - विद्यानिवास मिश्र )
- प्रयोजनमूलक हिन्दी
- संस्कृत : विज्ञान और कंप्यूटर की समर्थ भाषा
- वैज्ञानिक तथा अभियंता हेतु अनुप्रयुक्त संस्कृत
- वैज्ञानिक तथा तकनीकी हिन्दी गूगल समूह
- bio dictionary जीव विज्ञान हेतु लघु पारिभाषिक शब्द-संग्रह (होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केन्द्र)
- रसायन विज्ञान हेतु लघु पारिभाषिक शब्द-संग्रह (होमी भाभा विज्ञान शिक्षण केन्द्र)
- GlossaryDirect - searchable directory format
- Introduction to GlossML This article presents Glossary Markup Language (GlossML), an open XML vocabulary specially designed to facilitate the exchange of glossaries.
- The Glossarist - Large list of glossaries
- The TAO of Topic Maps
- Babel Linguistics Glossaries Selected Multilingual Glossaries by Industry
- आधुनिक बैंकिंग में शब्द निर्णय (गूगल पुस्तक ; लेखक - ओमप्रकाश बिल्लौरे)
- Hindi agrotags version-II (3054 Terms)
- हिंदी की दशा और दिशा (प्रवासी दुनिया)
- Inter-Active terminology for Europe (IATE)
लेख
- पारिभाषिक शब्दावली की विकास-प्रक्रिया (मधुमती)
- हिन्दी में विज्ञान लेखन - शब्दावली की समस्याएँ और समाधान
- वैज्ञानिक तथा अभियंता हेतु अनुप्रयुक्त संस्कृत
- How the Japanese made science their own
- संस्कृत उपसर्ग और उनके अर्थ
- शब्दावली से आएगी भाषा में एकरूपता
कम्प्यूटर प्रोग्राम:
- Online glossary software - Make your own public glossaries
- Glossarytool - tool for glossary generation (German, Windows only)
- GlossExtractor - A web application to automatically learn specialized glossaries from the web