वैदिक व्याकरण

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संस्कृत का सबसे प्राचीन (वेदकालीन) व्याकरण 'वैदिक व्याकरण' कहलाता है। यह पाणिनीय व्याकरण से कुछ भिन्न था।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

व्याकरण[संपादित करें]

अ-कार[संपादित करें]

अ-कार ([a] और [ɑː]) संज्ञा का सबसे बड़ा वर्ग है. नियमानुसार इस वर्ग से ताल्लुकाती संज्ञाएँ हृस्व-अ ([a]) पर खत्म होती हैं, या तो पु॰ या फ़िर नपुस॰. दीर्घ-आ ([ɑː]) पर खत्म होने वाली संज्ञाएँ अधिकतर स्त्री॰ होते हैँ. यह वर्ग बहुत बड़ा है क्योँकि इसमेँ प्राक्-हिंद-यूरोपीयाई ओ-कार भी सम्मिलित है.

पु॰ (वीर 'आदमी, पति, बहादुर') नपुस॰ (दिन 'वार या दिवस') स्त्री॰ (भार्या 'औरत, पत्नी')
एक॰ द्वि॰ बहु॰ एक॰ द्वि॰ बहु॰ एक॰ द्वि॰ बहु॰
कर्ता वीरस् वीराउ वीरास्(अस्) दिनम् दिनइ दिनानि भार्या भार्यइ भार्यास्
संबोधन वीर! वीराउ! वीरास्! दिन! दिनइ! दिनानि! भार्या! भार्यइ! भार्यास्!
कर्म वीरम् वीराउ वीरान् दिनम् दिनइ दिनानि भार्याम् भार्यइ भार्यास्
करण वीरइना वीराभ्याम् वीराइस् दिनइना दिनाभ्याम् दिनाइस् भार्याया भार्याभ्याम् भार्याभिस्
संप्रदान वीराय(इ) वीराभ्याम् वीरइभ्यस् दिनाय(इ) दिनाभ्याम् दिनइभ्यस् भार्यायाइ भार्याभ्याम् भार्याभ्यस्
आपादान वीरात् वीराभ्याम् वीरइभ्यस् दिनात् दिनाभ्याम् दिनइभ्यस् भार्यायास् भार्याभ्याम् भार्याभ्यस्
संबंध वीरस्य(स्) वीरयउस् वीरानाम् दिनस्य(स्) दिनयउस् दिनानाम् भार्यायास् भार्ययउस् भार्यानाम्
अधिकरण वीरइ वीरयउस् vīraiṣu वीरइषु दिनइ दिनयउस् dinaiṣu दिनइषु भार्यायाम् भार्ययउस् भार्यासु


इ-कार[संपादित करें]

पुल्लिङ्ग (पति) नपुंसकलिङ्ग (वारि 'पानी') स्त्रीलिङ्ग (मति 'सोच')
एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन एकवचन द्विवचन बहुवचन
कर्ता पतिस् पती पतयस् वारि वारिणी वारीणि मतिस् मती मतयस्
संबोधन पतइ! पती! पतयस्! वारि, वारइ! वारिणी! वारीणि! मतइ! मती! मतयस्!
कर्म पतिम् पती पतीन् वारि वारिणी वारीणि मतिम् मती मतीस्
करण पतिना पतिभ्याम् पतिभिस् वारिणा वारिभ्याम् वारिभिस् मत्या मतिभ्याम् मतिभिस्
संप्रदान पतयइ पतिभ्याम् पतिभ्यस् वारिणइ वारिभ्याम् वारिभ्यस् मत्याइ मतीभ्याम् मतिभ्यस्
आपादान पतइस् पतिभ्याम् पतिभ्यस् वारिणस् वारिभ्याम् वारिभ्यस् मत्यास् मतिभ्याम् मतिभ्यस्
संबंध पतइस् पत्यउस् पतीनाम् वारिणस् वारिणउस् वारिणाम् मत्यास् मत्यउस् मतीनाम्
अधिकरण पताउ पत्यउस् पतिषु वारिणि वारिणउस् वारिषु मत्याम् मत्यउस् मतिषु


उ-कार[संपादित करें]

पु. (वायु 'हवा') नपुस. (मधु 'शहद') स्त्री. (शत्रु 'वह दुश्मन औरत')
एक द्वि बहु एक द्वि॰ बहु॰ एक॰ द्वि॰ बहु॰
कर्ता वायुस् वायू वायवस् मधु मधुनी मधूनी शत्रुस् शत्रू शत्रवस्
संबोधन वायउ! वायू! वायवस्! मधु! मधुनी! मधूनि! शत्रउ! शत्रू! शत्रवस्!
कर्म वायुम् वायू वायून् मधु मधुनी मधूनि शत्रुम् शत्रू शत्रूस्
करण वायुऩा वायुभ्याम् वायुभिस् मधुना मधुभ्याम् मधुभिस् शत्र्वा शत्रुभ्याम् शत्रुभिस्
संप्रदान वायवइ वायुभ्याम् वायुभ्यस् मधुनइ मधुभ्याम् मधुभ्यस् शत्र्वाइ शत्रुभ्याम् शत्रुभ्यस्
अपादान वायउस् वायुभ्याम् वायुभ्यस् मधुनस् मधुभ्याम् मधुभ्यस् शत्र्वास् शत्रुभ्याम् शत्रुभ्यस्
संबंध वायउस् वाय्वउस् वायूनाम् मधुनस् मधुनउस् मधूनाम् शत्र्वास् शत्र्वउस् शत्रूऩाम्
अधिकरऩ वायाउ वाय्वउस् वायुषु मधुनि मधुनउस् मधुषु शत्र्वॅम शत्र्वउस् शत्रुषु



ऋ-कार[संपादित करें]

ऋ-कार का प्रयोग ऋ अंत वाले शब्दोँ जैसे नपुसक. दातृ 'देनेवाला', पु. पितृ 'बाप', नप्तृ 'भतीजा', और स्त्री. मातृ 'माँ', दुहितृ 'बेटी' और स्वसृ 'बहन'.



पु. (पितृ 'बाप') नपुसंक. (दातृ 'देने वाला') स्त्री. (मातृ 'माँ')
एक द्वि बहु एक द्वि बहु एक द्वि बहु
कर्ता पिता पितराउ पितरस् दातृ दातृणी दातृणि माता माताराउ मातारस्
संबोधन पीतर्! पितराउ! पितरस्! दातृ! दातृणी! दातृणि! मातार! माताराउ! मातारस्!
कर्म पितरम् पितराउ पितृन् दातृ दातृणी दातृणि मातारम् माताराउ मातृस्
करण पित्रा पितृभ्याम् पितृभिस् दातृणा दातृभ्याम् दातृभिस् मातारा मातृभ्याम् मातृभिस्
संप्रदान पित्रइ पितृभ्याम् पितृभ्यस् दातृणइ दातृभ्याम् दातृभ्यस् मातारइ मातृभ्याम् मातृभ्यस्
अपादान पितुर, पित्रस् पितृभ्याम् पितृभ्यस् दातृणस् दातृभ्याम् दातृभ्यस् मातारस् मातृभ्याम् मातृभ्यस्
संबंध पितुर, पित्रस् पित्रउस् पितृणाम् दातृणस् दातृणउस् दातृणाम् मातारस् मातरउस् मातृणाम्
अधिकरण पितरि पित्रउस् पितृषु दातृणि दातृणउस् दातृषु माताराम् मातरउस् मातृषु

ध्वनिशास्त्र[संपादित करें]

जैसे होमेरिक ग्रीक क्लासिकल ग्रीक से भिन्न है वैसै ऋग्वैदिक भाषा

संस्कृत भाषा से भिन्न है. तिवारी ([1955] 2005) ने  दोनोँ के बीच अंतर को निम्न सिद्धांत स्वरूप सूचित किया:
  • ऋग्वैदिक भाषा मेँ voiceless bilabial fricative ([ɸ], जो उपधमानीय कहलाता था और एक अघोष वर्त्य संघर्षी voiceless velar fricative ([x], यानि ख़ जो जिह्वामूलीय कहलाता था)—यह तब प्रयोग होता है जब श्वास विसर्ग अः क्रमशः अघोष ओष्ठ्य और velar व्यंजनोँ के ठीक पहले आता है. दोनोँ ही संस्कृत मेँ लुप्त हो गए और विसर्ग बन गए। उपधमानीय पp और फph, जिह्वामूलीय कk और खkh से ठीक पहले आता है.
  • ऋग्वैदिक भाषा मेँ retroflex lateral approximant ([ ɭ ]) और इसका बलाघाती सहायक [ɭʰ] ळ्ह भी, संस्कृत मेँ लुप्त हो गए, [ɖ] (ड़) और [ɖʱ] (ढ़) मेँ बदल गए. (क्षेत्रानुसार; वैदिक उच्चारण अभी तक कुछ क्षेत्रोँ मेँ मौलिक हैँ, जैसे. दक्षिण भारत, महाराष्ट्र सहित.)
  • अक्षरात्मक [ɻ̩] (ऋ), [l̩] (लृ) और उनके दीर्घ स्वर उत्तर ऋग्वैदिक काल मेँ लुप्त हो गए। बाद मेँ [ɻi] (रि) और [li] (ल्रि) के रूप उच्चारित होने लगा.
  • स्वर e (ए) और o (ओ) वैदिक मेँ अइ [ai] और अउ [au] रूप मेँ उच्चारित हो, पर बाद मेँ संस्कृत मेँ ये पूर्ण शुद्ध ए [eː] और ओ [oː] हो गए।.
  • स्वर ai (ऐ) और au (औ) वैदिक मेँ [aːi] (आइ) और [aːu] (आउ) हो गए, पर संस्कृत मे ये [ai] (अइ) और [au] (अउ) हो गए.
  • प्रातिशाख्यस् का दावा है कि दंत्य व्यंजन वस्तुतः दाँतोँ की जड़ (दंतमूलीय) थे, पर बाद मेँ पूर्ण दंत्य हो गए. इसमेँ [r] र भी है जो बाद मेँ retroflex हो गया.
  • वैदिक मेँ सुर का बड़ा महत्व था जो कभी भी शब्द का अर्थ बदल देता था, और पाणिनि से पहले तक सुरक्षित था. आजकल, सुरभेद केवल पारंपरिक वैदिक मेँ पाया जाता है, बजाय इसके संस्कृत एक राग भेदी भाषा है।
  • वैदिक में प्राय संधि के दौरान दो स्वर बिना विकार के उच्चारित होते हैं।

रूपविज्ञान[संपादित करें]

संज्ञा और विशेषण के लिए आधारभूत शब्दरूप प्रत्यय पद्धति[संपादित करें]

आधारभूत पद्धति नीचे तालिका मेँ दी गई है — लगभग सभी संज्ञाओँ और विशेषणोँ के लिए वैध और तर्कसंगत. फिर भी, लिङ्ग और शब्दमूल के अंतिम व्यंजन/स्वर अनुसार, अनिवार्य संधि के कुछ पुर्वनिर्धारित सुत्र हैं जो अंतिम सर्वमान्य शब्द को बनाते हैँ. नपुसकलिङ्ग के लिए अलग से प्रत्यय दिए गए होएंगे, बाकि के पु॰ और स्त्री॰ के लिए होएंगे. जहाँ दो या तीन रूप दिए होंगे वहाँ पहला पु॰ (और नपुस॰), पर दुसरा और तीसरा स्त्री॰ होगा.

एकवचन द्विवचन बहुवचन
कर्ता -स् (-म्) -आउ, -ई, -ऊ ( -नी) -अस् ( -नि)
संबोधन -स् (-) -आउ, -ई, -ऊ (-नी) -अस् ( -नी)
कर्म -अम् (-म्) -आउ, -ई, -ऊ (-नी) -न्, -अस् ( -नी)
करण -ना, -या -भ्याम् -भिस्
संप्रदान -अइ -भ्याम् -भ्यस्
आपादान -अस् -भ्याम् -भ्यस्
संबंद्ध -अस् -अउस् -नाम्
अधिकरण -इ, -आम् -अउस् -षु