वीर तेजाजी मँदिर युवा समिति,दईकङा

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लेखन संबंधी नीतियाँ

श्री सत्यवादी वीर तेजाजी महाराज मँदिर युवा समिति

श्री वीर तेजाजी युवा समिति,द्वारा प्रतिवर्ष वीर तेजा दशमी को यहाँ मँदिर प्रागण मे रात्रिकालिन महाभजन सँध्या आयोजित होती है, भजन सँध्या मे ख्यातिप्राप्त लोककलाकारो द्वारा भजन मँङली, का सभी ग्रामवासियो के सहयोग से आयोजन होता है,हजारो की तादाद मै श्रोता भजनो का लाभ लेने पहूचते है।वही तेजाजी मँदिर प्रागण मे मेले का आयोजन होता है, जाट समुदाय के लोग हजारो की सख्या मे सामिल होकर तेजाजी महाराज के दर्शन कर अपने को धन्य़ करते है।युवा समिति द्वारा वहाँ विभिन कार्य मे अपना योगदान देते है। आज तक भामाशाहो दवारा 30 लाख कि सहयोग राशी मिल चुकी है जाट कौम जैसी मार्शल कौम के ईतिहास को अपने आने वाली भावी पीढी तक पहुचाना।

 श्री वीर तेजाजी महाराज मँदिर खरनाल (नागौर) के बाद जोधपुर रियासत का पहला ऐतिहासिक मँदिर के रूप मे खयाति हासिल करना।आने वाली भावी पीढी ईस मँदिर का ईतिहास मे बखान कर सके ।कोई भी कौम का भामाशाह मँदिर मे अपनी सहयोग राशी दे सकता है 


वीर तेजाजी मँदिर युवा समिति,दईकङा

1) अध्यक्ष, चौधरी हीराराम जी गुरू (गुरूजी) - आयु- 91 वर्ष 

2) वयवस्थापक, चौधरी हीराराम जी गुरू (गुरूजी) - आयु- 91 वर्ष 3) कोषाध्यक्ष, चौधरी हीराराम जी गुरू (गुरूजी) - आयु- 91 वर्ष

4) उपकोषाध्यक्ष 1, रघुनाथ जी भांम्भु 

5) उपकोषाध्यक्ष 2, गोकुलराम जी ढाका 6) सदस्य,आपका अजीज अनुज जाटबँधु रामनिवास गुरू (बी.ए.,बी.एड,) मोबाईल न. 8559955579,9660430952,दईकङा,(सारण नगर,बनाङ रोङ,जोधपुर)&

सभी युवा वर्ग (वयस्क,जाट बँधु)

मेरा परिचय (ठिकाणौ)

रामनिवास गुरू (बी.ए.,बी.एड,)

मारो ठिकाणौ

रामनिवास चौधरी (गुरू)...(रामुड़ो जाट) मुकामः. दईकड़ा (देवीखेड़ो) कागजियो आवन रो ठिकाणो (पोस्ट) दईकड़ा (देवीखेड़ो) जोधपुर-भोपालगढ़ रोड़ वायाःबनाड़ जिलोः जोधाणौ (हरियालौ राजस्थान)

वर्तमान ठिकाणौः सारण नगर (भारत स्कुल के पिछे) बनाड़ रोड़,जोधपुर Origin Guru

(गुरु) Gur (गुर) is gotra of Jats in Rajasthan.

This gotra originated from people of fair colour. Guru is also name of shresha (श्रेष्ठ) or superior people. Descendants of such people got the gotra name Guru. [1] History Bhim Singh Dahiya identifies Goruai of Greek with Guru/Gaur/Ghor of Indian clan.[2] Distribution in Rajasthan Villages in Churu district Guru Jats live in villages: Bidasar,

भाई के दुश्मन भाई ना होते, महल आशा के धराशाई ना होते, काश, यहाँ इंसान बनकर जीते सभी, तो हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई ना होते. अंतर्मन से सोचें देश आज़ाद है, हम आज़ाद नहीं. मानसिक रूप से आज भी हम अंग्रेज़ो के गुलाम हैं और मुक्ति का प्रयास भी नहीं करते, क्योंकि हमारी सोच में हम आज़ाद हैं। मुझ जैसे तो लाखों हैं, मुझमें कुछ नहीं, पर तुम लाखों में एक हो, तुम जैसा कोई नहीं,

घोडा रेस में बिक रहा है, वकील केस में बिक रहा है, अदालत में जज बिक रहा है, वर्दी में फर्ज बिक रहा है ! यहाँ सब कुछ बिक रहा मज़बूरी में इंसान बिक रहा है, जुल्म का हैवान बिक रहा है, पैसों कि खातिर ईमान बिक रहा है, गरीबों का प्राण बिक रहा है ! यहाँ सब कुछ बिक रहा है। फिल्मों में गाना बिक रहा है, गरीब बच्चों का दाना बिक रहा है, स्कूल का मास्टर बिक रहा है, अस्पताल का डाक्टर बिक रहा है ! यहाँ सब कुछ बिक रहा है सड़कों पर मन बिक रहा है, ब्यूटी पार्लरों में तन बिक रहा है, गरीबों का गुर्दा बिक रहा है, शर्म-हया का पर्दा बिक रहा है ! यहाँ सब कुछ बिक रहा है सर्कस का जोकर बिक रहा है, बैंक का लाकर बिक रहा है, अखबार का हाकर बिक रहा है, कोठी का नोकर बिक रहा है ! यहाँ सब कुछ बिक रहा है गेट का संत्री बिक रहा है, पार्टी का मंत्री बिक रहा है, खिलाडी खेल में बिक रहा है, कानून जेल में बिक रहा है ! यहाँ सब कुछ बिक रहा है दोस्ती में दोस्त बिक रहा है, बच्चों का गोश्त बिक रहा है, पत्थर मिला दाल बिक रहा है, हर मोड़ पर दलाल बिक रहा है।.

JAT SAMAJवह होता है जो सुसंगठित व एकता-समता के संवेदनात्मक सूत्र से बंधा हो। सुविचारों वाला तथा प्रगतिशील व उदार दृष्टिकोणवाला हो। जिसमें समयानुकूल सुपरिवर्तन करने की क्षमता हो तथा रूढवाद, जडता व अन्ध परम्पराओं एवम् विश्वासों से मुक्त हो। सामाजिक उत्थान व विकास के लिए प्रतिबद्ध होने के साथ-साथ भेदभाव, ऊँच-नीच की संकीर्णताओं से विमुक्त हो स्वार्थान्धता, स्वकेन्द्रीयता से स्वतन्त्र व अपनी भावी-पीढयों के उज्ज्वल भविष्य के प्रति जागरूक एवम् सक्रिय हो। जिस समाज का हर जन समाज के लिए समर्पित व िहत चिन्तक हो तथा अपने समाज को श्रेष्ट बनाने के लिए कटिबद्ध हो। बालक-युवा, नारी-वृद्ध के प्रति संवेदनशील व कल्याणकारी हो तथा समाज को हर क्षेत्र में आगे बढाने की भावना से संकल्पित हो। समाज के आर्थिक उत्थान के प्रति चिन्तनशील व प्रयासरत होते हुए समाज के सदस्यों का हाथ पकड उन्हें ऊँचा उठाने के लिए कार्यरत हो। संक्षेप में समाज के सभी वर्ग पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, संास्कृतिक, शैक्षणिक, व्यवसायिक, प्रशासनिक, राजनीतिक, तकनीकी, वैज्ञानिक, उद्योग व रोजगार आदि जीवनोपयोगी क्षेत्रों में समाज के निरन्तर विकास तथा प्रगति के लिए चिन्तन व चिन्तायुक्त हो।

इस कसौटी पर यदि समाज को कसें तो हमारा समाज काफी पिछडा हुआ नजर आता है। अपने आप को सबमें श्रेष्ठ और सुसंस्कृत तथा उत्तम आचार-विचार मानने वाला हमारा समाज मोहान्ध स्वार्थान्ध व परम्परान्ध है, भूत-उपासक और स्वप्नजीवी है। हम आचार-विचार-व्यावहारहीन होते हुए भी अपनी श्रेष्ठता व उच्चता का गर्वन-गान करते है। क्या ऐसा करके कोई भी समाज समय के साथ कदम मिला सकता है ? नहीं, उसे अपना आत्म-चिन्तन व आत्म-विश्लेषण करना होगा। आत्म-मंथन से ही अमृत मिल सकता है। पारिवारिक रूप से हम टूटन-विखण्डन की ओर अग्रसर हो रहे हैं। आंगन में दीवारें बन रही हैं - व्यक्ति आंगन की बजाय अपने कक्ष का हो रहा है। उसका कक्ष उसका परिवार (मैं, पत्नी, बच्चे) ही उसके लिए सर्वोपरि हैं। स्वार्थ सिकुडता जा रहा है। मुखिया का नियंत्रण घट रहा है - अनुशासन हीनता बढी जा रही है, मर्यादा, आचरण, संस्कार व खान-पान सब दूषित होते जा रहे हैं। परिवार बिखर रहे हैं। यह हमारे घर-घर की कहानी है। इस पत्रिका द्वारा हमारा प्रयास आत्म मंथन करना है, न कि कोई विवाद उत्पन्न करना। ‘‘पीर पर्वत सी हो गई, अब पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा उतरनी चाहिए, बखेडा खडा करना हमारा मकसद नहीं, मकसद तो यह है कि सूरत बदलनी चाहिए’’ BY:ramniwas choudhary(guru)daikara,jodhpur (B.A,.B.ed)

जाट जाति की उत्पत्ति के सिद्धान्त

ज्येष्ठ शब्द से जाट - कुछ इतिहासकार जाट जाति की उत्पत्ति ज्येष्ठ शब्द से मानते है। ऐसी धरणा है कि राजसूय-यज्ञ करने के बाद युधिष्ठिर को 'ज्येष्ठ' घोसित किया गया था। आगे चल कर उनकी सन्तान 'ज्येष्ठ' से 'जेठर' तथा 'जेटर' और फ़िर 'जाट' कहलाने लगे. कुछ अन्य इतिहासकार मानते हैं कि पाण्डवों को महाभरत में विजय दिलाने के कारण श्रीकृष्ण को युधिष्ठिर की सभा में ज्येष्ठ की उपाधि दी गयी थी। अलबरुनी श्रीकृष्ण को जाट मानते हैं। (अलबिरुनी, भारत, पृ. 176).

शिव और जाट एक अन्य सिद्धान्त के अनुसार शिव की जटाओं से जाट की उत्पत्ति मानी जाती है। यह सिद्धान्त देव संहिता में उल्लेखित है। देव संहिता की इस कहानी में कहा गया है कि शिव के ससुर राजा दक्ष ने हरिद्वार के पास कनखल में एक यज्ञ किया था। सभी देवताओं को तो यज्ञ में बुलाया पर न तो महादेवजी को ही बुलाया और न ही अपनी पुत्री सती को ही निमंत्रित किया। शिव की पत्नि सती ने शिव से पिता के घर जाने के लिये पूछा तो शिव ने कहा- तुम अपने पिता के घर बिना बुलाये भी जा सकती हो. सती जब पिता के घर गयी तो वहां शिव के लिये कोई स्थान निर्धारित नहीं था, न उनके पति का भाग ही निकाला गया है और न उसका ही सत्कार किया गया। ulte शिवाजी का अपमान किया और बुरा भला कहा गया। अपने पति का अपमान देखकर, पिता तथा ब्रह्मा और विष्णु की योजना को ध्वस्त करने के उद्देश्य से उसने यज्ञ-कुण्ड में छलांग लगा कर प्राण दे दिये. इससे क्रुद्ध शिव ने अपने जट्टा से वीरभद्र नामक गण को उत्पन्न किया। वीरभद्र ने जाकर यज्ञ को भंग कर दिया. आगन्तुक राजाओं का मान मर्दन किया। ब्रह्मा और विष्णु को यज्ञ से जाना पडॉ॰ वीरभद्र ने दक्ष का सिर काट दिया. ब्रह्मा और विष्णु शिव को मनाने उनके पास गये। उन्होने शिव से कहा कि आप भी हमारे बराबर हैं। इस समझोते के बाद शिव और उसके गण जाटों को बराबर का दर्जा मिला. शिव ने दक्ष का सिर जोड दिया. कहते हैं कि दक्ष को बकरे का सिर जोडा गया था। यह भी धारणा है कि ब्राह्मण इसी अपमान के कारण जाटों का इतिहास नहीं बताते