विश्नोई समाज

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[[बिश्नोई समाज उत्तर भारत की एक जनजाति है।

उनतीस नियमों का पालन करना आवश्यक है[संपादित करें]

इस सम्बन्ध में एक कहावत बहुत प्रसिद्ध है, जो इस प्रकार है- उन्नतीस धर्म की आखडी हिरदे धरियो जोय, जम्भोजी कृपा करी नाम विश्नोई होय। १- प्रतिदिन प्रात:काल स्नान करना २- ३० दिन जनन – सूतक मानना, ३- ५ दिन रजस्वता स्री को गृह कार्यों से मुक्त रखना, ४- शील का पालन करना, ५- संतोष का धारण करना, ६- बाहरी एवं आन्तरिक शुद्धता एवं पवित्रता को बनाये रखना, ७- तीन समय संध्या उपासना करना, ८- संध्या के समय आरती करना एवं ईश्वर के गुणों के बारे में चिंतन करना, ९- निष्ठा एवं प्रेमपूर्वक हवन करना, १०- पानी, ईंधन व दूध को छान-बीन कर प्रयोग में लेना, ११- वाणी का संयम करना, दया एवं क्षमा को धारण करना, १२- चोरी, निंदा, झूठ तथा वाद–विवाद का त्याग करना, १३- अमावश्या के दिन व्रत करना, १४-विष्णु का भजन करना, १५- जीवों के प्रति दया का भाव रखना, १६- हरा वृक्ष नहीं कटवाना, १७- काम, क्रोध, मोह एवं लोभ का नाश करना, १८- रसोई अपने हाध से बनाना, १९- परोपकारी पशुओं की रक्षा करना, २०- अमल, तम्बाकू, भांग, मद्य तथा नील का त्याग करना, २१- बैल को बधिया नहीं करवाना

जम्भेश्वर महाराज की शिक्षाओं में अन्य धर्मों का मिश्रण[संपादित करें]

जाम्भोजी की शिक्षाओं पर अन्य धर्मों का प्रभाव स्पष्ट रुप से दृष्टिगोचर होता है। उन्होंने जैन धर्म से अहिंसा एवं दया का सिद्धान्त तथा इस्लाम धर्म से मुर्दों को गाड़ना, विवाह के समय फेरे लेना आदि सिद्धान्त ग्रहण किये हैं। उनकी शिक्षाओं पर वैष्णव सम्प्रदाय तथा नानकपंथ का भी बड़ा प्रभाव है। इस सम्प्रदाय में गुरु दीक्षा एवं डोली पाहल आदि संस्कार साधुओं द्वारा सम्पादित करवाये जाते हैं, जिनमें कुछ महन्त भी भाग लेते हैं। वे महन्त, स्थानविशेष की गद्दी के अधिकारी होते हैं परन्तु थापन नामक वर्ग के लोग नामकरण, विवाह एवं अन्तयेष्टि आदि संस्कारों को सम्पादित करवाते हैं। चेतावनी लिखने एवं समारोहों के अवसरों पर गाने बजाने आदि कार्यों के लिए गायन अलग होते हैं। इस सम्प्रदाय में परस्पर मिलने पर अभिवादन के लिए ‘नवम प्रणाम’, तथा प्रतिवचन में’ विष्णु नै जांभौजी नै’ कहा जाता है।

वेशभूषा[संपादित करें]

विश्नोई औरतें लाल और काली ऊन के कपड़े पहनती हैं। वे सिर्फ लाख का चूड़ा ही पहनती हैं। वे न तो बदन गुदाती हैं न तो दाँतों पर सोना चढ़ाती है। विश्नोई लोग नीले रंगके कपड़े पहनना पसंद नहीं करते हैं। मानते हैं। साधु कान तक आने वाली तीखी जांभोजी टोपी एवं चपटे मनकों की आबनूस की काली माला पहनते हैं। महन्त प्राय: धोती, कमीज और सिर पर भगवा साफा बाँधते हैं। विश्नोईयों में शव को गाड़ने की प्रथा प्रचलित थी। विश्नोई सम्प्रदाय मूर्ति पूजा में विश्वास महीं करता है। अत: जाम्भोजी के मंदिर और साथरियों में किसी प्रकार की मूर्ति नहीं होती है। कुछ स्थानों पर इस सम्प्रदाय के सदस्य जाम्भोजी की वस्तुओं की पूजा करते हैं। जैसे कि पीपसार में जाम्भोजी की खड़ाऊ जोड़ी, मुकाम में टोपी, पिछोवड़ों जांगलू में भिक्षा पात्र तथा चोला एवं लोहावट में पैर के निशानों की पूजा की जाती है। वहाँ प्रतिदिन हवन – भजन होता है और विष्णु स्तुति एवं उपासना, संध्यादि कर्म तथा जम्भा जागरण भी सम्पन्न होता है। इस सम्प्रदाय के लोग जात – पात में विश्वास नहीं रखते। अत: हिन्दू -मुसलमान दोनों ही जाति के लोग इनको स्वीकार करते हैं। श्री जंभ सार लक्ष्य से इस बात की पुष्टि होती है कि सभी जातियों के लोग इस सम्प्रदाय में दीक्षीत हुए। उदाहरणस्वरुप, ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र, तेली, धोबी, खाती, नाई, डमरु, भाट, छीपा, मुसलमान, जाट, एवं साईं आदि जाति के लोगों ने मंत्रित जल (पाहल) लेकर इस सम्प्रदाय में दीक्षा ग्रहण की। राजस्थान में जोधपुर तथा बीकानेर राज्य में बड़ी संख्या में इस सम्प्रदाय के मंदिर और साथरियां बनी हुई हैं। मुकाम (तालवा) नामक स्थान पर इस सम्प्रदाय का मुख्य मंदिर बना हुआ है। यहाँ प्रतिवर्ष फाल्गुन की अमावश्या को एक बहुत बड़ा मेला लगता है जिसमें हजारों लोग भाग लेते हैं। इस सम्प्रदाय के अन्य तीर्थस्थानों में जांभोलाव, पीपासार, संभराथल, जांगलू, लोहावर, लालासार आदि तीर्थ विशेष रुप से उल्लेखनीय हैं। इनमें जांभोलाव विश्नोईयों का तीर्थराज तथा संभराथल मथुरा और द्वारिका के सदृश माने जाते हैं। इसके अतिरिक्त रायसिंह नगर, पदमपुर, चक, पीलीबंगा, संगरिया, तन्दूरवाली, श्रीगंगानगर, रिडमलसर, लखासर, कोलायत (बीकानेर), लाम्बा, तिलवासणी, अलाय (नागौर) एवं पुष्कर आदि स्थानों पर भी इस सम्प्रदाय के छोटे -छोटे मंदिर बने हुए हैं। इस सम्प्रदाय का राजस्थान से बाहर भी प्रचार हुआ। पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश आदि राज्यों में बने हुए मंदिर इस बात की पुष्टि करते हैं। जाम्भोजी की शिक्षाओं का विश्नोईयों पर बहुत अधिक प्रभाव पड़ा। इसीलिए इस सम्प्रदाय के लोग न तो मांस खाते हैं और न ही शराब पीते हैं। इसके अतिरिक्त वे अपनी ग्राम की सीमा में हिरण या अन्य किसी पशु का शिकार भी नहीं करने देते हैं। इस सम्प्रदाय के सदस्य पशु हत्या किसी भी कीमत पर नहीं होने देते हैं। बीकानेर राज्य के एक परवाने से पता चलता है कि तालवा के महंत ने दीने नामक व्यक्ति से पशु हत्या की आशंका के कारण उसका मेढ़ा छीन लिया था। व्यक्ति को नियम विरुद्ध कार्य करने से रोकने के लिए प्रत्येक विश्नोई गाँव में एक पंचायत होती थी। नियम विरुद्ध कार्य करने वाले व्यक्ति को यह पंचायत धर्म या जाति से पदच्युत करने की घोषणा कर देती थी। उदाहरणस्वरुप संवत् २००१ में बाबू नामक व्यक्ति ने रुडकली गाँव में मुर्गे को मार दिया था, इस पर वहाँ पंचायत ने उसे जाति से बाहर कर दिया था। ग्रामीण पंचायतों के अलावा बड़े पैमाने पर भी विश्नोईयों की एक पंचायत होती थी, जो जांभोलाव एवं मुकाम पर आयोजित होने वाले सबसे बड़े मेले के अवसर पर बैठती थी। इसमें इस सम्प्रदाय के बने हुए नियमों के पालन करने पर जोर दिया जाता था। विभिन्न मेलों के अवसर पर लिये गये निर्णयों से पता चलता है कि इस पंचायत की निर्णित बातें और व्यवस्था का पालन करना सभी के लिए अनिवार्य था और जो व्यक्ति इसका उल्लंघन करता था, उसे विश्नोई समाज से बहिष्कृत कर दिया जाता था। विश्नोई गाँव में कोई भी व्यक्ति खेजड़े या शमी वृक्ष की हरी डाली नहीं काट सकता था। इस सम्प्रदाय के जिन स्री – पुरुषों ने खेजड़े और हरे वृक्षों को काटा था, उन्होंने स्वेच्छा से आत्मोत्सर्ग किया था। इस बात की पुष्टि जाम्भोजी सम्बन्धी साहित्य से होती है। राजस्थान के शासकों ने भी इस सम्प्रदाय को मान्यता देते हुए हमेशा उसके धार्मिक विश्वासों का ध्यान रखा है। यही कारण है कि जोधपुर व बिकानेर राज्य की ओर से समय – समय पर अनेक आदेश गाँव के पट्टायतों को दिए गए हैं, जिनमें उन्हें विश्नोई गाँवों में खेजड़े न काटने और शिकार न करने का निर्देश दिया गया है। बीकानेर ने संवत् १९०७ में कसाइयों को बकरे लेकर किसी भी विश्नोई गाँव में से होकर न गुजरने का आदेश दिया। बीकानेर राज्य के शासकों ने समय – समय पर विश्नोई मंदिरों को भूमिदान दिए गए हैं। ऐसे प्रमाण प्राप्त हुए हैं कि सुजानसिंह ने मुकाम मंदिर को ३००० बीघा एवं जांगलू मंदिर को १००० बीघा जमीन दी थी। बीकानेर ने संवत् १८७७ व १८८७ में एक आदेश जारी किया था, जिसके अनुसार थापनों से बिना गुनाह के कुछ भी न लेने का निर्देश दिया था। इस प्रकार जोधपुर राज्य के शासक ने भी विश्नोईयों को जमीन एवं लगान के सम्बन्ध में अनेक रियायतें प्रदान की थीं। उदयपुर के महाराणा भीमसिंह जी और जवानसिंह जी ने भी जोधपुर के विश्नोईयों की पूर्व परम्परा अनुसार ही मान – मर्यादा रखने और कर लगाने के परवाने दिये !


=राजस्थान का राज्य पशु चिंकारा एक तरफ तो अपनी खूबसूरती के कारण आभिजात्य लोगों की रुचि और तस्करों के निशाने पर है तो दूसरी तरफ इसे सरकार की बेरुखी का भी सामना करना पड़ रहा है। हाल में बाड़मेर और बीकानेर जिलों में इसके शिकार के मामले सामने आए हैं। इन निरीह पशुओं की समस्या यह है कि फिल्मी सितारों से लेकर सरहद पर देश की रक्षा करने वाले सैनिकों तक की क्रूरता का सामना करना पड़ रहा है। इन वन्यजीवों के लिए निराशा भरे इस माहौल में मरु प्रदेश की बिश्नोई जाति ने लगातार आशा की किरण जरूर जला रखी है। ये लोग सैकड़ों सालों से इन वन्यजीवों की रक्षा के लिए अपनी जान तक देने से नहीं चूक रहे। बहरहाल, चिंकारा के शिकार की हाल की क्रूर घटना नवंबर महीने के अंतिम दिनों में बाड़मेर जिले की शिव तहसील में सामने आई।

सीमा पर चल रहे सेना के युद्धाभ्यास के दौरान नीमला साजीतडा सैन्य क्षेत्र में सेना की 88 आर्म्ड वर्कशॉप मेस से राजस्थान वन विभाग की टीम ने 25 नवम्बर को चिंकारा के तीन कटे सिर और कुछ पैरों सहित 15 किलो मांस बरामद किए। वन विभाग ने पांच सैन्यकर्मियों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज किया। सेना ने भी इस मामले में कोर्ट ऑफ इनक्वायरी का आदेश जारी कर दिया है। इसके साथ ही बीकानेर इलाके में सेना की महाजन फायरिंग रेंज में भी चिंकारा के शिकार का कथित मामला सामने आया, हालांकि सेना ने यहां पर ऐसे किसी भी वन्यजीव के शिकार का खंडन किया है। उन्होंने कहा है कि यहां से बरामद मांस मुर्गे का था। फिलहाल मामले की जांच चल रही है।

संरक्षित क्षेत्र में निश्चिंत भिड़ते काले हिरणसंरक्षित क्षेत्र में निश्चिंत भिड़ते काले हिरणराजस्थान में ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि जब चिंकारा का शिकार सुर्खियों में आया है। वर्ष 1998 में भी अभिनेता सलमान खान जोधपुर में अपनी एक फिल्म की शूटिंग के दौरान चिंकारा का शिकार किया था। मामले में उन्हें निचली अदालत से पांच साल की सजा भी हो चुकी है। सलमान पर आरोप था कि सितंबर 1998 में "हम साथ-साथ हैं" की शूटिंग के दौरान उन्होंने काले हिरण और चिंकारा के शिकार किए थे। निचली अदालत सलमान को 26 सितंबर की रात ककानी गांव में काले हिरण और 28 सितंबर की रात भावद गांव घोड़ा फार्म में दो चिंकारा के शिकार मामले में दोषी मानती है। इस मामले में सैफ अली खान, सोनाली बेंद्रे और तब्बू पर भी आरोप तय हो चुके हैं।

दरअसल, चिंकारा राजस्थान का राज्य पशु ही नहीं है बल्कि वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के अंतर्गत बाघ की तरह ही शेड्यूल 1 का वन्यजीव है और इसका शिकार करने पर सात वर्ष तक की जेल का प्रावधान है। फिर भी इनकी संख्या में तेज गिरावट देखी जा रही है। वर्ष 2009 में प्रदेश में 37,758 चिंकारा थे जो वर्ष 2010 में घटकर 34,970 ही रह गए। पश्चिमी राजस्थान में भी इनकी तादाद घट रही है। थार के मरुस्थल में वर्ष 2009 में 3,076 चिंकारा थे जो अगले साल घटकर 2,743 रह गए। साफ जाहिर है कि बड़े पैमाने पर चिंकारा का शिकार किया जा रहा है। राजस्थान वन्यजीव और पर्यावरण कमेटी के सदस्य राजपाल सिंह कहते हैं कि थार के मरुस्थल में रहने वाले स्थानीय निवासी चिंकारा के शिकार की शिकायत लगातार करते आ रहे हैं लेकिन प्रशासन मसले को गंभीरता से नहीं ले रही है। चिंता की बात यह है कि इस अवैध कार्य में सेना का नाम भी सामने आया है।

बिश्नोई समुदाय के एक व्यक्ति के पास निर्भय विचरण करते चिंकाराबिश्नोई समुदाय के एक व्यक्ति के पास निर्भय विचरण करते चिंकारादूसरी तरफ स्थानीय लोग, खासकर पश्चिमी राजस्थान के बिश्नोई लोग चिंकारा के साथ परिवार के सदस्य की तरह व्यवहार करते हैं और उनसे बेइंतहा प्यार करते हैं। बिश्नोइयों के गांवों में हिरण और चिंकारा परिवार के बच्चों की भांति पाले जाते हैं। यूं भी बिश्नोइयों का वन्यजीवों और पर्यावरण के प्रति समर्पण अनुपम है। चिंकारा शिकार मामले में भी सलमान खान को सलाखों के पीछे पहुंचाने में बिश्नोई समाज की भूमिका अहम रही है। पर्यावरण संरक्षण के लिए मर मिटने की इस जाति ने ऐसी मिसाल कायम की है जो इतिहास के पन्नों पर सुनहरे अक्षरों में दर्ज है। सन 1730 में जोधपुर के पास खेजडली गांव में राजा की सेना से खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा करते बिश्नोई समाज के 363 स्त्री-पुरुषों को पेड़ों के साथ ही काट डाला था। इस घटना में एक महिला अमृता देवी के नेतृत्व में 83 गांवों के 363 बिश्नोई लोग पेड़ों को काटने से बचाने के लिए उससे लिपट गए थे। इनमें बच्चे, बूढ़े, जवान, महिलाएं सभी शामिल थे। बिश्नोइयों के लिए पर्यावरण और वन्यजीवों की रक्षा करना उनका जीवन सिद्धांत है।

यह बिश्नोइयों के गुरू जंभेश्वर द्वारा तय 29 जीवन-सिद्धांतों में से एक है। यह समाज राजस्थान में मुख्य रूप से पश्चिमी इलाके मारवाड़ में निवास करता है। मारवाड़ का ज्यादातर भाग रेगिस्तानी होने के कारण वैसे ही यहां वनों और वन्यजीवों की कमी है उस पर पिछले कुछ सालों के दौरान सरकारी जमीनों विशेषकर गोचर भूमि पर अतिक्रमण ने वन्यजीवों की रक्षा के प्रति चिंता और बढ़ाई है। सरकार ने चिंकारा को राज्य पशु तो घोषित कर दिया है लेकिन उसकी सुरक्षा के प्रति वह कोई खास प्रयास करती नजर नहीं आ रही है। यहां तक कि ग्रामीण जब अपनी आंखों के सामने इसका शिकार होता देखते हैं और शिकायत करते हैं तब भी सरकारी अमला उसके प्रति गंभीरता नहीं दिखाता है।

पर्यावरण प्रेम की डोर से बंधी बिश्नोई समुदाय की महिलाएं वृक्ष पूजती हुईंपर्यावरण प्रेम की डोर से बंधी बिश्नोई समुदाय की महिलाएं वृक्ष पूजती हुईंबहरहाल, थार में रहने वाले ग्रामीण विशेषकर बिश्नोई जाति आज भी पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा के प्रति ग्रामीण संकल्प नहीं भूली है। ये लोग आज भी इनकी रक्षा के लिए अपनी जान देने तक से नहीं चूकते। करीब एक दशक पहले एक बिश्नोई युवक निहालचंद वन्यजीवों की रक्षा की कोशिश में शिकारियों से लड़ते हुए अपनी जान पर खेल गया। बाद में इस घटना पर ‘विलिंग टू सैक्रीफाइस’ फिल्म भी बनाई गई। फिल्म को स्लोवाक गणराज्य में हुए फिल्म महोत्सव में पुरस्कृत भी किया गया। अपने स्तर पर वन्यजीवों की रक्षा में जुटे बिश्नोई समाज को यदि सरकार का समर्थन मिल जाए तो इलाके में एक भी वन्यजीव शिकारियों के हत्थे न चढ़े।

थार में रहने वाले ग्रामीण विशेषकर बिश्नोई जाति आज भी पेड़ों और वन्यजीवों की रक्षा के प्रति ग्रामीण संकल्प नहीं भूली है। ये लोग आज भी इनकी रक्षा के लिए अपनी जान देने तक से नहीं चूकते। करीब एक दशक पहले एक बिश्नोई युवक निहालचंद वन्यजीवों की रक्षा की कोशिश में शिकारियों से लड़ते हुए अपनी जान पर खेल गया। बाद में इस घटना पर ‘विलिंग टू सैक्रीफाइस’ फिल्म भी बनाई गई। फिल्म को स्लोवाक गणराज्य में हुए फिल्म महोत्सव में पुरस्कृत भी किया गया।


राजस्थान में एक कहावत प्रचलित है- ‘सर साठे रुंख रहे तो भी सस्तो जाण’, यानी सिर कटवा कर भी वृक्षों की रक्षा हो सके, तो इसे फायदे का सौदा ही समझिए। जोधपुर के खेजड़ली गांव में संवत् 1787 (सन् 1730) की भादवा सुदी दशमी, दिन मंगलवार को खेजड़ी के पेड़ों की रक्षा के लिए विश्नोई जाति के सैकड़ों लोगों की कुर्बानी की गाथा इसका ज्वलंत उदाहरण है। इस ‘चिपको आंदोलन’ में स्त्रियां हरावल में थीं। कालांतर में उत्तरांचल में सुंदरलाल बहुगुणा द्वारा उत्प्रेरित वन रक्षा के ‘चिपको अभियान’ को साधारण गृहणियों ने ही परवान चढ़ाया था। आज जिस तरह सुनियोजित तरीके से जंगलों को उजाड़ने का अभियान खुद सरकारों तक की ओर से चलाया जा रहा है, वैसी स्थिति में वनों को बचाने के लिए ‘चिपको अभियान’ जैसी सामाजिक प्रतिबद्धता की जरूरत है।

खेजड़ली के बलिदान की गाथा रोमांचक और प्रेरणास्पद है। जोधपुर किले के निर्माण में काम आने वाली लकड़ियों की आपूर्ति के लिए वहां खेजड़ी के वृक्षों की कटाई का निर्णय लिया गया। इस पर खेजड़ली गांव के लोगों ने अपनी जान की कीमत पर भी वन की रक्षा करने का निश्चय किया। चौरासी गांवों को इस फैसले की सूचना दे दी गई। सैकड़ों की तादाद में लोग खेजड़ली गांव में इकट्ठे हो गए और पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनसे चिपक गए। लेकिन शासन ने इसकी परवाह नहीं की और जब बर्बरतापूर्वक पेड़ों को काटा जाने लगा उन पर चिपके हुए लोगों के शरीर के टुकड़े-टुकड़े होकर गिरने लगे। एक व्यक्ति के कटने पर तुरंत दूसरा व्यक्ति उसी पेड़ से चिपक जाता। इस बलिदान में अमृतादेवी और उनकी दो पुत्रियां हरावल में रहीं। पुरुषों में सर्वप्रथम अणदोजी ने बलिदान दिया था और बाद में विरतो बणियाल, चावोजी, ऊदोजी, कान्होजी, किसनोजी, दयाराम आदि पुरुषों और दामी, चामी आदि स्त्रियों ने अपने प्राण दिए। कुल मिला कर तीन सौ तिरसठ स्त्री-पुरुषों ने अपनी जान दे दी। जब इस घटना की सूचना जोधपुर के महाराजा को मिली तब जाकर उन्होंने पेड़ों की कटाई रुकवाई और भविष्य में वहां पेड़ न काटने के आदेश दिए। खेजड़ली के इन वीरों की स्मृति में यहां हर वर्ष भादवा सुदी दशमी को मेला लगता है, जिसमें हजारों की संख्या में लोग इकट्ठे होते हैं।

इस घटना का वर्णन करते हुए कवि गोकुजी ने खेजड़ली की साखी में लिखा है- ‘ऊदो सार समाही आयो, सिर सौंपा रुंखा सट्टै/ सिर सौंपा अर नहीं कंपा, मरण सूं मत को डरो।’ वन की रक्षार्थ स्वेच्छा से प्राण देने की ऐसी अनेक घटनाएं हैं, जिन्हें ‘खेजड़ली के खड़ाणे’ से जाना जाता है। खेजड़ली के अप्रतिम बलिदान से पूर्व भी, राजस्थान की मरुभूमि के अनेक स्त्री-पुरुषों ने वनों की रक्षा के लिए स्वेच्छा से अपने प्राणों की आहुति दी थी। इतिहास के पन्नों में दफन हो चुके ये स्त्री-पुरुष जांभोजी के अनुयायी थे। जांभोजी ने संवत 1542 की कार्तिक वदी अष्टमी को विश्नोई धर्म का प्रवर्तन किया और अपने अनुयायियों को ‘सबद वाणी’ में उपदेश दिया कि वनों की रक्षा करें। जांभोजी के भक्त कवि ऊदोजी नैण ने विश्नोई धर्म के अनुयायियों के लिए उनतीस नियमों में वृक्षों की रक्षा पर जोर देते हुए लिखा- ‘करै रुंख प्रतिपाल खेजड़ा रखत रखावै।’ कवि वील्होजी ने ‘बतीस आखड़ी’ में ‘राख दया घट माही, वृक्ष घावै नहीं’ कह कर वृक्षों की कटाई को निषिद्ध बताया। जांभोजी के अनुयायियों ने अपने गांवों के चारों ओर ओरण में पेड़ लगाए और उनकी रक्षा की। विश्नोई समाज में वन और वन्य जीवों की रक्षा के लिए वह उत्सर्ग या बलिदान का जज्बा आज भी जिंदा है।

खेजड़ली में पेड़ों की रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग का ऐसा सामूहिक स्वैच्छिक अनुष्ठान विश्व भर में अनूठा और अद्वितीय है। इस बलिदान की गौरवमयी विरासत से प्रेरित होकर हर राजस्थानी को वन संरक्षण और संवर्धन के लिए संकल्पबद्ध होना चाहिए। अनुसूचित जनजातियों (वनवासियों) का भी जन्मजात जुड़ाव जल, जंगल, जमीन से रहा है। इसलिए समाज को ही वन संपदा का ‘रखवाला’ बनाया जाए। भारत की दो लाख तेईस हजार पंचायतों को वन रक्षण संस्कृति का संवाहक बनाया जाए। हर पंचायत मुख्यालय में ‘स्मृति वन’ की स्थापना हो। हर शिक्षण संस्थान, सरकारी दफ्तर के प्रांगण में वृक्षारोपण कार्यक्रम चलाया जाए। हर शहर हरा शहर बने। जहां भी वृक्षों की कटाई करके औद्योगिक इकाइयों, खनिज उत्खनन और सड़क विस्तार की इकाइयों की स्थापना की जाती है, वहां पहले से चार गुना वृक्षों को लगाने के बाद ही उत्पादन शुरू करने की इजाजत दी जाए। केवल कागजी सरकारी प्रयासों से मरुस्थल हरा-भरा नहीं हो सकता।

   पर्यावरण प्रेमी राणाराम बिश्नोई जिन्होने पूर्व प्रधानमंत्री इंद्रागाँधी के राजनीति मे आने के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था I जिसके लिए  सोना  भी पत्थर है आपको यह बात सुनने मे अजीब और आश्चर्य लग रही हो लेकिन यह सत्य है धन दोलत शान-शोहरत  को छोड़कर बस एक ही जुनून है पेड़-पोधो व वन्य जिवो की सेवा जो भगवान मे भी विश्वास नही रखते है जिन्होने कभी जिंदगी मे किसी मंदिर मे प्रसाद तक नही चड़ाई जो जिन्होने  कभी देवी देवताओ के सामने हाथ नही जोड़े Iजो कभी किस्मत को नही मानते Iबस गुरु जंभेस्वर (बिश्नोई संप्रदाय के सस्थापक) को ही अपना गुरु माना उन्ही की शिक्षाओ पर चले I रेगिस्तान  मे रेत के टीले जहा पत्थर भी नही टिकते वहा पर लाखो पेड़  लगा चुके है I  बस ज़रूरत है इनको इनके निस्वार्थ भाव से किए गये कार्य  के लिए सम्मानित  करवाने की इनके कार्य को राष्ट्रीय स्तर पर लाने की ताकि दूसरे लोग भी प्रेरणा ले सके I राष्ट्रीय मीडिया  के वक्ततियो  आपकी एक कोशिश् राणाराम को पूरी जिंदगी की मेहनत का फल दिला सकती है और भारत रत्न भी दिला सकती है I

स्वैच्छिक सामाजिक संस्थाओं के सहयोग, आम जन में उत्तरादायित्व की भावना का विकास और सरकारी योजनाओं के यथासंभव सही क्रियान्वयन से ही इस उद्देश्य की पूर्ति की जा सकती है। वृक्षारोपण, संरक्षण, संवर्धन जन-जन का अभियान बने, तभी वन विस्तार की हरीतिमा राजस्थान की मरुभूमि में पसर सकती है। सघन वन ही मेघों को आमंत्रित कर बरसात के लिए प्रेरित करता है। वन नहीं तो वर्षा नहीं, वर्षा नहीं तो सुजलां-सुफलां धरती नहीं।