विभूति नारायण राय

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विभूति नारायण राय
जन्म 28 नवम्बर 1951 (1951-11-28) (आयु 62)
आज़मगढ़, उत्तर प्रदेश, भारत
राष्ट्रीयता भारतीय
राष्ट्रीयता भारतीय
शिक्षा एम.ए.(अंग्रेजी), बी.ए.(ऑनर्स)
शैलियाँ उपन्यासकार, संपादक, प्रशासक, सामाजिक कार्यकर्ता

विभूति नारायण राय(असमिया: বিভূতি নাৰায়ণ ৰায়, अंग्रेजी: Vibhuti Narain Rai)(२८ नवम्बर, १९५१) आज़मगढ़(उत्तर प्रदेश) में जन्मे| विभूति नारायण राय १९७५ बैच के यू.पी.कैडर के आई.पी.एस. अधिकारी हैं। विशिष्ट सेवा के लिये राष्ट्रपति पुरुस्कार तथा पुलिस मैडल से सम्मानित श्री राय एक संवेदनशील पुलिस अधिकारी के साथ-साथ एक उच्चकोटि के कथाकार के रूप में भी जाने जाते रहे हैं। प्रस्तुत उपन्यास "तबादला" पर उन्हें अंतरराष्ट्रीय इंदु शर्मा कथा सम्मान प्राप्त हुआ है। उनका उपन्यास "शहर में कर्फ्यू" हिंदी के अलावा अंग्रेजी, असमिया, पंजाबी, उर्दू, बांग्ला, मराठी आदि में भी अनूदित हो चुका है। उनके एक अन्य उपन्यास "किस्सा लोकतंत्र" के लिये उन्हें उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान का भी सम्मान प्राप्त हुआ है। उपन्यासों के अलावा उनका व्यंग्य-संग्रह "एक छात्र-नेता का रोजनामचा" भी बहुत लोकप्रिय है। वर्तमान में आप महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति हैं।

अनुक्रम

रचना[संपादित करें]

उपन्यास

  • घर
  • शहर में कर्फ्यू
  • प्रेम की भूतकथा
  • किस्सा लोकतंत्र

व्यंग्य संग्रह

  • एक छात्र नेता का रोजनामचा

वैचारिकी

  • कथा साहित्य के सॉ बरस
  • रणभूमि में भाषा

संस्मरण

  • हाशिमपुरा : उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास का एक काला अध्याय

संपादन[संपादित करें]

  • समकालीन हिंदी कहानियाँ
  • वर्तमान साहित्य(लगभग पंद्रह वर्षों तक)

अंग्रेजी ग्रंथ[संपादित करें]

,

  • Combating Communal Conflict
  • Communal Conflicts: Perception of Police Neutrality During Hindu-Muslim Riots in India, Renaissance Pub. House (1998)
  • Letter addressed to all IPS officers of the country during Gujrat riots of 2002


सम्मान[संपादित करें]

  • इंदु शर्मा अंतरराष्ट्रीय कथा सम्मान
  • उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान का सम्मान
  • सफदर हाशमी सम्मान


विभूति की बेबाकी विस्मयकारी - महाश्वेता देवी -[संपादित करें]

दैनिक हिन्दुस्तान, 27.5.2007[संपादित करें]

दंगे भारत के माथे पर कलंक है ! दंगों पर भारतीय भाषाओं में काफी कुछ लिखा गया है, लेकिन विभूति नारायण कृत शहर मे कर्फ्यू इस अर्थ में सबसे अलग है कि रचयिता ने ऐसे दंगों को एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के रूप में निकट से देखा और प्रामाणिक चित्र उपन्यास में खीचा ! विभूति का यह उपन्यास मैंने हिन्दी में ही पढा था ! बाद में मैंने इसका बाँग्ला में अनुवाद कराया, जो मासिक"भाषा बन्धन" के पूजा विशेषांक में छपा और अब ग्रंथ मित्र प्रकाशन से यह पुस्तकाकार छपा है! बांग्ला में यह औपन्यासिक कृति बहुत समाद्वत हुई है! इसके बारे में नवारुण भट्टाचार्य ने लिखा है, "शहर में कर्फ्यू एक विस्मयकारी द्स्तावेजी उपन्यास है . इसको साथ बाँग्ला ही क्यों, भारत की किसी भाषा की रचना से तुलना नहीं हो सकती ! सांप्रदायिक दंगे किस प्रकार होतें हैं और कौन इस नृशंसता के शिकार होतें हैं, यह जानने के लिये शहर में कर्फ्यू को पढना पडेगा !" नवारूण ने जो लिखा है, उसी में बांग्ला के आलोचकों और पाठकों की राय अंतर्निहित है! मेरी राय भी ! पुलिस सेवा में रहते हुये राज्य और जनता के रिश्तों पर जिस बेबाकी से विभूति ने कलम चलाई है वह मेरे लिये विस्मयकारी है !अपने बेबाक वर्णन विश्लेषण में विभूति ने पुलिस को भी नहीं बख्शा है ! विभूति एक व्यक्तव्य में कहतें हैं कि सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस और फौज का काम देश के सभी नागरिकों की रक्षा करना है, हिन्दुत्व के औजार की तरह काम करना नहीं है ! इस बेबाक वक्तव्य में ही हम विभूति की विलक्षणता और विशिष्टता का सन्धान आसानी से कर सकतें हैं ! विभूति की बेबाकी से सिर्फ मैं ही नहीं विस्मित हुई हूँ ! अनेक अन्य लोगों को भी भरोसा नहीं है कि पुलिस सेवा में वरिष्ठ पद पर रह्ते हुये उन्होंने सांप्रदायिक दंगों पर इस तरह कलम चलाई है ! इसीलिये मुस्लिम इंडिया के संपादक शहाबुद्दीन विभूति को रिटायर्ड पुलिस अफसर लिखतें हैं ! यह तथ्य दीगर है कि वे अभी भी पुलिस सेवा में हैं ! संप्रति वे उत्तर प्रदेश में अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (एडीजी) हैं ! विभूति ने शहर में कर्फ्यू तब लिखा जब इलाहाबाद में वे एस पी सिटी थे और उसी समय इलाहाबाद का पुराना हिस्सा दंगों की चपेट में था ! उसी दंगे की दरिदंगी विभूति के अनुभव संसार का अंग बन गई ! विभूति को भारतीय पुकलिस अकादमी की एक फेलोशिप भी मिली, जिसके तहत उन्होंने पिछली शताब्दी के आखिरी दशक में शोध भी किया ! फेलोशिप के तहत वही शोध प्रबन्ध है- सांप्रदायिक दंगे और भारतीय पुलिस ! विभूति नारायण इस धारणा को गलत साबित करतें हैं कि हिन्दू स्वभाव से अधिक उदार और सहिष्णु होता है और मुसलमान आनुवांशिक रूप से क्रूर होता है! वे यह भी बतातें हैं कि दंगों में मरने वालों में 70 प्रतिशत से ज्यादा मुसलमान होतें हैं ! विभूति बहुसंख्यक समुदाय के मनोविज्ञान की बात करतें हैं ! उनका यह मानना है कि इस देश में सांप्रदायिक दंगे नहीं रोके जा सकते ! शहर में कर्फ्यू में लेखक बताता है कि दंगे और उसके बाद लगने वाले कर्फ्यू के दौरान सबसे ज्यादा तकलीफ कौन उठतें हैं ! उपन्यास बताता है कि सईदा यानि एक औसत मुस्लिम औरत 13 गुना आठ फीट के कमरे मेँ किस तरह अपने पूरे परिवार के साथ गुजर-बसर करती है ! उपन्यास बताता है कि 15 साल की एक लडकी दंगे के दौरान किस तरह बलात्कार की शिकार हुयी और उसकी यातना तभी खत्म हुई, जब वह बेहोश हो गई ! इसके ठीक पहले वही लडकी एक लडके के प्रेम में पडी थी ! विभूति ने शहर में कर्फ्यू के अलावा तीन अन्य उप्न्यास घर, किस्सा लोकतंत्र, और तबादला भी लिखा है ! घर उनका पहला उपन्यास है ! जिसके छपते ही वे हिन्दी जगत में चर्चित हो गये थे ! शहर में कर्फ्यू उन्हें लोकप्रियता के शिखर पर ले गया ! किस्सा लोकतंत्र और तबादला भी चर्चा में रहे! चारों उपन्यासों के अनुभव संसार अलग हैं ! चारों के अनुकूल भाषा और शिल्प के सार्थक प्रयोग उन्होंने कियें हैं ! उपन्यासकार में जन के साथ प्रतिबद्धता भी है ! उनमें प्रतिबद्धता के साथ नवीनता और प्रयोग धर्मिता का मणिकांचन योग भी है ! उन्होंने धारदार व्यंग्य भी लिखें हैं ! विभूति ने पत्रिका वर्तमान साहित्य का 15 वषों तक संपादन किया ! वे आज़मगढ के अपने गाँव मेँ एक पुस्तकालय- श्री रामानन्द सरस्वती पुस्तकालय भी चलातें हैं . पुलिस मेँ रहते हुये भी रचनात्मक कार्य किये जा सकतें हैं, इसका विरल उदाहरण विभूति नारायण राय है!


हिन्दुस्तान,28सितम्बर 2008[संपादित करें]

जरूरत है भक्ति आन्दोलन जैसे झंझावात की - विभूति नारायण राय[संपादित करें]

विभूति नारायण राय अपने विचारों से वक्त -वक्त पर सामाजिक चिंतन को झकझोरने वाले पुलिस अफसर और साहित्यकार हैं.उन्हें हाल ही में महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय, वर्धा का कुलपति बनाया गया है. उनका कुलपति बनाया जाना उन लोगों को चौंकाता है जो विभूति के बारे में कम जानतें हैं . उन्हें आप एक साथ कई भूमिकाओं में देख सकतें हैं . वे खाकी वर्दी में राज्य के प्रतिनिधि हैं तो कभी दंगे की पडताल करते सामाजिक शोधकर्ता....और साहित्यकार के रूप में राज्य व समाज के क्रिटिक . उनका उपन्यास 'शहर में कर्फ्यू ' काफी चर्चित रहा है. कुलपति बनाये जाने के बाद नासिरुद्दीन ने उनसे कई मुद्दों पर बात की, जो कुछ इस रूप में आपके सामने है.

आमतौर पर संस्थागत साहित्य की श्रेणी में खालिस साहित्यकारों या फिर शिक्षकों के अलावा जल्दी किसी और को शामिल नहीं किया जाता है . ऐसे में आप महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय के कुलपति के अपने चुनाव को किस रूप में देखतें हैं ? यह सही है कि वर्षों तक हिन्दी समाज की यह मान्यता रही कि सिर्फ अध्यापक और पत्रकार ही हिन्दी के लेखक हो सकतें हैं . मैं भारतीय पुलिस सेवा में आने के पहले भी लिखता पढता था और सेवा में आने के बाद भी मेरा लेखन जारी रहा पर सेवा में आने के बाद कई बार बडे मजेदार अनुभव हुये . बहुत सारे सम्पादकों/ आलोचकों ने मेरे लेखन को एक वर्जित प्रदेश में अनधिकृत प्रवेश के रूप में लिया. अक्सर यह सलाह मिली कि भइये अपना काम धाम सम्भालो, लिखना पढना तुम्हारे वश का नहीं. पर पिछले कुछ दशकों में हिन्दी का परिदृश्य तेजी से बदला है. बडी संख्या में डाक्टर, इंजीनियर, किरानी, फौजी, वकील या चार्टेड एकाउंटेंट जैसे पेशों के लोग लेखन में सक्रिय हुयें हैं. ये लोग अपनी रचनाशीलता और गुणवत्ता के बल पर साहित्य की दुनियां में जगह बना रहें हैं. अलग अलग पोशों से आये ये लोग अपने अपने क्षेत्रों के अनुभव और वहां की भाषा साथ लेकर आ रहें हैं. निश्चित रूप से वे हिन्दी को समृद्ध और बहुआयामी बना रहें हैं.

महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय पिछले दिनों काफी विवाद में भी रहा. आपने वहाँ के लिये कुछ खास सोचा है ?

मेरा अभी तक महात्मा गाँधी हिन्दी विश्वविद्यालय से भौतिक साक्षात्कार नहीं हुआ है.हिन्दी समाज के किसी दूसरे उत्सुक सदस्य की भाँति मैं भी इस विश्वविद्यालय के साथ जुडे विवादों के बारे में सुनता रहा हूँ . मैं बिना किसी पूर्वाग्रह के क्लीन स्लेट की तरह वहाँ जा रहा हूं. मुझे आशा है हिन्दी समाज मेरी मदद करेगा.

साहित्य समाज का आईना माना जाता है. पुलिस की सामाजिक छवि से उलट साहित्य का दायरा है. ऐसे में आप इन दोनों के बीच कैसे सामंजस्य बना पातें हैं ?

पुलिस सेवा किसी भी अन्य नौकरशाही की तरह रचनात्मकता विरोधी है .मैंने पिचाले तैंतीस वर्षों की सेवा के दौरान यह अनुभव किया कि यदि आप अपनी नौकरी के अतिरिक्त दिलचस्पी के दूसरे क्षेत्र नहीं रखेंगे तो धीरे धीरे आप जानवर में तबदील होतें जायेंगे. नौकरी में आने के बाद मैंने पढने लिखने का सिलसिला जारी रखा और इस तरह मनुष्य बने रहने का प्रयास करता रहा. जब भी कभी मुझे पुलिस अथवा प्रशासन की किसी ट्रेनिंग अकादमी में जाने का मौका मिलता है मैं अपने जूनियर सहकर्मियों को यही समझाने की कोशिश करता हूं कि वे सरकारी नौकरी के अलावा साहित्य, संगीत, फोटोग्राफी, पेंटिंग, थियेटर, ट्रैकिंग- रचनात्मकता के किसी न किसी क्षेत्र से अपने को जोडें रहें अन्यथा उन्हें पता भी नहीं चलेगा और वे धीरे धीरे संवेदनशून्य होतें जायेगे. अपने तैंतीस वर्षों की पुलिस सेवा से एक लेखक के रूप में मुझे कोई शिकायत नहीं है. अपनी सेवा के दौरान मुझे जो अनुभव मिले वे दूसरी किसी सेवा मे रहते हुये नहीं मिल सकते थे. मेरे उपन्यासों में बिखरी तमाम घटनाएं और पात्र इन्हीं अनुभवों की उपज है . मेरी दिलचस्पी भारतीय समाज के साम्प्रदायिक पक्ष को समझने में रही है . पुलिस के ऊँचे ओहदों पर रहने के कारण अल्पसंख्यकों और राज्य के रिश्तों को समझने में मुझे मदद मिली है. मेरी मार्कसवादी समझ और साहित्य से रिश्ते ने मुझे उन क्षणों में भी जब मैं किसी भीषण दंगे की चपेट में आये शहर में खाकी कपडा पहने सडकों पर खडा होता था, मुझे हिन्दू होने से रोका.

हिन्दी को लेकर साम्प्रदायिक राजनीति भी होती है और क्षेत्रीय भी, वैसे में हिन्दी का बाकी भाषाओं, समुदायों और क्षेत्र से सहज रिश्ता कैसे बन सकता है ?

हिन्दी , अपने विविध रूपों में , देश में सबसे अधिक बोली और समझी जाने वाली भाषा है .सम्पर्क भाषा और प्रकारांतर से राष्ट्र भाषा का उसका दावा भी सबसे मजबूत है . दुर्भाग्य से हिन्दी भाषियों ने बडप्पन का परिचय नहीं दिया है और इसी से हिन्दी को देश के विभिन्न हिस्सों में समय समय पर विरोध का सामना करना पडा है . मैं सिर्फ एक उदाहरण दूँगा . देस्ह की भाषायी समस्या को सुलझाने के लिये त्रिभाषा फार्मूला लागू किया गया था . एक भी हिन्दी भाषी प्रदेश में हिन्दी और अँग्रेजी के अतिरिक्त किसी अन्य भारतीय भाषा को इस फार्मूले के तहत अपने बच्चों के लिये अनिवार्य नहीं किया गया . हम चाहतें हैं कि दूसरे भाषा भाषी हिन्दी पढें किंतु स्वयं कोई अन्य भारतीय भाषा सीखने के लिये तैयार नहीं हैं . यही कारण है कि अन्य अहिन्दी भाषी हिन्दी को लेकर बहुत उत्साहित नहीं रहते . हमें बडप्पन का परिचय देना होगा और दूसरी भाषाओं के प्रति आदर और उन्हें सीखने की ललक दिखानी होगी . पिछले कुछ दिनों में हिन्दी का प्रयोग एक खास तरह की साम्प्रदायिक राजनीति के लिये भी हुआ है . विशेषकर समाज में हाशिये पर खडे वर्गों यथा दलितों, महिलाओं और अल्पसंख्यकों को डराने के लिये भाषा का उपयोग बढा है . भाषा में बाहर खडे इन तबकों को भाषा के अन्दर लाना होगा .

आपने अपने पैतृक गाँव में एक पुस्तकालय की स्थापना की है. वहाँ कई तरह की सांस्कृतिक -साहित्यिक गतिविधियां लगातार हो रहीं हैं . पुस्तकालय ही क्यों ? इसका कोई फायदा दिख रहा है ?

श्री रामानन्द सरस्वती पुस्तकालय की स्थापना सन 1993 में पढने की सँस्कृति विकसित करने के लिए की गयी थी ! पिछले डॅढ दशकों में यह संस्था देश के एक मह्त्वपूर्ण साँस्कृतिक केन्द्र के रुप में मान्यता प्राप्त कर चुकी हॆ ! दस ह्जार से अधिक पुस्तकों एवँ डेढ सौ से अधिक लघु पत्रिकाऑ के अँको क़ॆ संग्रह वाला यह पुस्तकालय देश के सबसे पिछडे इलाकों में से एक- (जोकहरा, आजमगढ, उत्तर प्रदेश) में स्थित हॆ ! अपनी सक्रिय उपस्थिति से इसने न सिर्फ आसपास के इलाके में सामान्य लोगों में पुस्तक पढने की सँस्कृति विकसित की हॆ बल्कि विशेष रुप से समाज के हाशिये पर उपस्थिति दर्ज कराने वाले तबकों- दलितों , महिलाओं और भूमिहीन परिवारों के बच्चों की पुस्तकों तक पहुँच सम्भव बनाई हॆ .मेरा मानना है कि हिन्दी पट्टी को सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के जहर से बचाने के लिये एक बडे नवजागरण आन्दोलन की जरूरत है. यह आन्दोलन भूमि सम्बन्धों , वर्ण व्यवस्था तथा लैंगिक असमानता जैसे मुद्दों को केन्द्र में रखकर ही हो सकता है . मेरा मानना है कि हिन्दी समाज में भक्ति आन्दोलन जैसे बडे झंझावात की जरूरत है . भक्ति आन्दोलन ने जिस तरह वर्ण व्यवस्था की चूलें हिलायीं , कर्म काण्डी पाखण्डों का मजाक उडाया और संस्कृत के बरक्स लोक भाषाओं को प्रतिष्ठा दिलायी वैसा हिन्दी समाज में पहले कभी नहीं हुआ था .आज भी आवश्यकता इसी बात की है कि एक मजबूत नवजागरण का प्रयास हो जो गलीज वर्ण व्यवस्था के ढहते हुये खण्डहर को पूरी तरह से जमींदोज़ कर दे इसके साथ ही इस नवजागरण को लैंगिक असमानताओं के विरुद्ध भी खडा होना पडेगा और भू सम्बन्धों में बुनियादी परिवर्तन लाने का प्रयास भी करना होगा . मैं समझता हूं कि पुस्तकालयों को केन्द्र में रखकर ये सारे प्रयास किये जा सकतें हैं .

आपने पुलिस सेवा में रहते हुये शहर में कर्फ्यू जैसा उपन्यास लिखा, कई लेख लिखे जो पुलिस और राजनीति के साम्प्रदायिक चरित्र बयान करतें हैं. क्या आपके लेखन ने कभी आपको परेशानी में डाला है ? या आपके सेवा के लोगों ने इसे किस रूप में लिया है ?

पिछले कुछ वर्षों में भारतीय समाज में साम्प्रदायिकता और धार्मिक कट्टरता बडी तेजी के साथ बढी है . इसका असर पुलिस और दूसरी उन संस्थाओं पर भी पडा है जिनका मुख्य काम कानून व्यवस्था लागू करना है .लगभग हर साम्प्रदायिक दंगों में अल्पसंख्यकों की तरफ से पुलिस पर यह आरोप लगतें रहें हैं कि उसने दंगों के दौरान वह सब नहीं किया जो उसे करना चाहिये था या वह सब किया जो उसे नहीं करना चहिये था . मैं भी काफी हद तक इस बात से सहमत हूं और अलग अलग मौकों पर मैंने पुलिस में बढती साम्प्रदायिकता पर सवाल भी उठायें हैं . मेरे विचार इस मामले में बहुत स्पष्ट रहें हैं और मैं इन विषयों पर खुलकर लिखता बोलता रहा हूं . स्वाभाविक है कि मेरे बहुत से पुलिस सहकर्मियों और सत्ता के शीर्ष पर बैठे लोगों को ये विचार पसन्द नहीं आये और कई बार मुझे कुछ दिक्कतों का भी सामना करना पडा है . मैं कभी इस बात पर बहुत चिंतित नहीं रहा और मुझे नहीं लगता कि मुझे कोई बहुत बडी कीमत चुकानी पडी.


हमारे बीच से ही उभरेगा नेतृत्व[संपादित करें]

विभूति नारायण, कुलपति, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि[संपादित करें]

हम देख सकते हैं कि हिंदी पट्टी में पिछले दो दशकों में जीवन बहुत तेजी से बदला है. खास तौर से यह बदलाव जाति और लैंगिक असमानताओं से जुड़ा हुआ है. 1967 के आसपास 1967 के आस पास हिन्दी पट्टी में पिछडी जातियों का जबरदस्त उभार दिखाई देता है .कर्पूरी ठाकुर और चौधरी चरण सिंह जैसे नेतृत्व में इस उभार नें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश , राजस्थान, हरियाणा हर जगह कांग्रेस के वर्चस्व को झटका दिया. जाट, अहिर, कुर्मी, गूजर जैसी जातियों का पावर स्ट्रक्चर में भागीदारी हासिल करने का प्रयास था. लेकिन एक दिक्कत पूरे इस बदलाव के बीच में नजर आती है. वह यह कि ये पिछडी ज़ातियां अपने से पिछड़ी जातियों यानी दलित जातियों को वह स्थान देने को तैयार नहीं थीं, जो वह अपने लिए चाहती हैं. इसके डेढ़ दशक बाद 1990 के आसपास के चुनावों को देखें तो पता चलता है कि दलित जातियां को यह समझ् में आने लगा था कि वह भी अपनी संख्या के अनुपात में राजनैतिक परिदृश्य में अपने लिए जगह की मांग कर सकती हैं. हिंदी पट्टी में यह एक बड़ा राजनैतिक परिवर्तन आया है और इसीलिए पूरा राजनैतिक नेतृत्व बदला है, जिस पर गौर किया जा सकता है. दूसरी बात, लैंगिक असमानताओं को लेकर भी इस पट्टी में बड़ा बदलाव आया है. यह बदलाव मुख्य रूप से आर्थिक कारणों से है. लडकियों के लिये शिक्षा के दरवाजे खुले और बडी संख्या में लडकियों ने इसका लाभ उठाया . वह नौकरियां करने लगीं, घर से बाहर निकलने लगीं. आर्थिक कारणों ने उस पुरुष जिद को कमजोर किया है जो महिलाओं को घर में कैद रखने और काम पर न जाने देने में विश्वास करती थी. पंचायती राज में परिवर्तन हुए, जिसमें बड़े पैमाने पर महिलाओं के लिए आरह्नण किया गया, उससे भी उन्हें घर से बाहर निकलने में मदद मिली. बावजूद इसके कि अभी भी पंचायती राज में हम प्रधान पति' जैसी संस्था देख रहे हैं जिसमें कहने के लिए तो महिला प्रधान है, लेकिन उसका पति ही सारा काम कर रहा है. स्थितियां बदल रही हैं, जिसमें महिलाएं अपनी जगह के लिए जद्दोजहद भी कर रही हैं और उसे हासिल भी कर रही हैं. इस पूरे विमर्श में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण भी एक महत्वपूर्ण मसला है. यह बहुत दुखद है कि हिंदुओं के मध्य वर्ग का तेजी से सांह्णदायिककरण हुआ है. इसका मुख्य रूप से श्रेय राम जन्मभूमि आंदोलन को जाता है. 1970 के दशक के अंतिम वर्षों में धीरे-धीरे जिस आंदोलन की रूपरेखा बनी उसने दस सालों के भीतर ही पूरी हिंदी पट्टी में झंझवात का रूप ले लिया और 1980 और 1990 के दशक में यह वहां की सबसे महत्वपूर्ण घटना के तौर पर दर्ज हुआ. इस आंदोलन ने बुरी तरह से हिंदी पट्टी को बावरी मस्जिद के टूटने के बाद भी यह आन्दोलन समाप्त नहीं हुआ है. साम्प्रदायिक ध्रूवीकरण और मजबूत हुआ है. इस ध्रूवीकरण ने हिन्दी पट्टी को बुरी तरह विभाजित किया है. 1947 में जिस तरह का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण नहीं हुआ था, वह हमें इस दौर में दिखाई देता है. उसके खामियाजे भी भुगतने पड़े. जाति और धर्म पर बँटे इस समाज में जिस चीज की सबसे पहले बलि चढी है वह सुशासन है. हिन्दी पट्टी में पिछले कई चुनाओं में सुशासन निर्णायक मुद्दा नहीं बन पाया है दरअसल इस तरह की सारी जद्दोजहद में जिस चीज की सबसे पहले बलि चढ़ी वह सुशासन ही था. हिंदी पट्टी में सुशासन मुद्दा नहीं बन पाया है. एक अच्छी सरकार जो बिजली दे, पानी दे, सड़क दे, शिक्षा दे, सामाजिक सुरक्षा दे और आगे बढ़ने की चेतना पैदा करे उसके लिए अभी तक कोई बड़ी मांग हिंदी पट्टी में उभरती हुई दिखाई नहीं देती. यह स्थिति कई बार निराश भी करती है, लेकिन मेरा मानना है कि यह स्थिति अधिक दिनों तक नहीं चल पाएगी. ऐसे समय जब महाराष्ट्र में कोई नेतृत्व यह मांग कर रहा है कि बिहार या उत्तर प्रदेश के लोग मुंबई में आकर रोजगार हड़प रहे हैं और स्थानीय लोगों का हक मार रहे हैं तो हम उस नेतृत्व के पक्ष में खड़े नहीं हो सकते. जाहिर है, वह नेतृत्व देश को तोड़ने की बात कर रहा है. लेकिन हमें यह भी सोचना चाहिए कि आखिर ऐसी कौन-सी वजहें हैं कि इतने सारे लोग बिहार और उत्तर ह्णदेश या दूसरे हिंदीभाषी ह्नेत्रों से मुंबई या ऐसी ही दूसरी जगहों की ओर भाग रहे हैं? हम स्थानीय स्तर पर उन्हें क्यों रोजगार मुहैया नहीं करा पा रहे हैं? इससे क्षेत्रीय असंतुलन तो पैदा हो ही रहा है बल्कि एक खास तरह का पहचान का संकट भी बन रहा है. दरअसल हिंदी पट्टी की एक बड़ी समस्या भू-सुधार की है. औद्योगिकरण नहीं होने की वजह से हमारे यहां आज भी उत्पादन का सबसे बड़ा स्रोत खेत हैं. खेत उन जातियों के पास हैं, जो हाथ से श्रम करने में शर्म महसूस करते हैं. हमें खेत उन लोगों के हाथ में देने होंगे जो श्रम करते हैं. तभी हम उत्पादकता भी बढ़ा पाएंगे. खेती की अपनी सीमा है और बिना औद्योगिकरण के हम समाज को आगे नहीं बढ़ा सकते. औद्योगिकरण के लिए भूमि की आवश्यकता होगी, लिहाजा हमें इन दोनों में संतुलन कायम करना होगा. जिनकी भूमि ली जा रही हैं उन्हें इस तरह की क्षतिपूर्ति देनी होगी जिससे न केवल वे बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ी की भी क्षतिपूर्ति हो सके क्योंकि खेत किसी एक पीढ़ी के धरोहर नहीं होते. हमारे यहां जो उद्योगपति आना चाहते हैं या आ रहे हैं, वह भ्रष्टाचार से, अपराध से ब्लैकमेलिंग से त्रस्त हो जाते हैं और दूसरे प्रदेशों में चले जाते हैं. जाहिर है, किसी भी समाज को आगे जाना है तो उसको उत्पादकता के सारे नियम बदलने होंगे तभी वह आगे जा सकता है. धूमिल ने लोकतंत्र के बरअक्स सही प्रश्न उठाया था. यह भी सही है कि हिंदी पट्टी के एक बड़े हिस्से में नक्सली सक्रिय हैं. नक्सलवाद वहीं है, जहां वंचित लोग हैं और जहां सुविधाएं नहीं हैं. जब तक वे हथियार नहीं उठाते तब तक हमें याद नहीं आता कि हमारे आंगन में कोई पिछड़ा हुआ ह्नेत्र है, वहां सार्वजनिक वितरण प्रणाली नहीं है, ऐसी परिस्थितियों के कारण ही नक्सलवादियों को खाद-पानी मिल रहा है. वास्तव में हमारा समय ही ऐसा है, जिसमें हम धीरोदात्त नायक की कल्पना नहीं कर सकते, हमारे वाड्.मय में जिसकी परिकल्पना की गई हैऐसा नायक जो अपनी कद-काठी, रूप-रंग में उदात्त तो होगा ही अपनी सोच से भी बड़ा होगा. दरअसल हमारे समय में बत सारी चीजें हमारे सामने घट रही हैं. एक उत्तर आधुनिकता का दौर चल रहा है और हमें समझाया जा रहा है कि सब कुछ नष्ट हो गया है, विचारधारा, इतिहास और कहानी का अंत हो गया. लेकिन हमें अपने बीच से ही वे सारे ह्नण या वे सारे नेतृत्व तलाशने होंगे जो हमारे भीतर ऊर्जा भर दें, हमारे भीतर आशा भर दें, हमें आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करें और कहीं-न-कहीं यह एहसास कराएं कि जीवन में अभी भी बत कुछ सुंदर बचा है अभी भी बत कुछ हासिल किया जा सकता है, हमारे आसपास जो समाज और जीवन है उसे और सुंदर बनाया सकता है. मुझे यह संभावना हर जगह नजर आ रही है. मसलन, महिलाओं की जिंदगी में बड़ा परिवर्तन दिख रहा है, 10-15 सालों में यह परिवर्तन आया है अन्यथा वह कई सौ बरसों में आता. बहुत तेजी के साथ सीमाएं टूट रही हैं, जाति की सीमाएं टूट रही हैं. युवा ह्नेत्र में भी आप हिंदी पट्टी में पाएंगे कि विश्वविद्यालय और ह्णौद्योगिकी संस्थान बड़ी संख्या में योग्य लोगों को निकाल रहे हैं जो पूरी दुनिया में जा रहे हैं. यह दुर्भाग्य की बात है कि हम उनके लिए ऐसी स्थितियां नहीं पैदा कर पा रहे हैं कि वे मुंबई या अमेरिका जाने के बजाए यहीं रहें. विज्ञान, ह्णौद्योगिकी और खेल के ह्नेत्र में हिंदी पट्टी के बहुत से लोग आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं, ऐसे सारे लोग हमारी आशा की किरणें हैं. हिंदी पट्टी को आप ऊपर से देखें तो यह एक निराशा का बोध कराती है, हमें एक ऐसा पिछड़ा और जड़, स्थिर समाज नजर आता है जिसमें आशा की किरण तलाशना मुश्किल होता है. लेकिन इसी के भीतर एक कुलबुलाहट नजर आती है, यह कुलबुलाहट सुशासन की है. मुझे लगता है कि एक-दो चुनाव के बाद स्थितियां बदलेंगी.

एसोसिएट कॉपी एडीटर सुदीप ठाकुर से बातचीत के आधार


राष्ट्रीय सहारा -शनिवार २४ जुलाई २०१० -[संपादित करें]

दंगों में दिखता पुलिस का असल चेहरा- विभूति नारायण राय[संपादित करें]

साम्प्रदायिक हिंसा के विरुद्ध बिल के बहाने सबसे पहले इसके द्वारा बढे अधिकारों का उपयोग करने वाली संस्थाओं की क्षमता , इच्छा शक्ति और पूर्व मे उनके द्वारा विधि से प्राप्त अधिकारों के उपयोग अथवा दुरुपयोग के इतिहास को खगाँलना आवश्यक है । मुझे पूर्व मे इसी बिल के ड्राफ्ट पर विचार करने के लिये आयोजित एक गोष्ठी की याद आ रही है जिसमे सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जे.एस.वर्मा ने बहुत अच्छा सवाल उठाया कि क्या भारत के मौजूदा कानून साम्प्रदायिक हिंसा से निपटने के लिये पर्याप्त नही हैं ? वे सम्भवत: पूछ्ना चाहते थे कि अगर भारतीय राज्य मे मौजूदा कानूनों की तरह इस नये कानून को लागू करने के भी लिये जरूरी इच्छा शक्ति का अभाव रहा तो इसका भी हश्र उन्ही जैसा तो नही हो जायेगा?अब जब यह कानून की शक्ल लेने जा रहा तो मेरे मन मे एक और सवाल कौधँ रहा है । क्या भारतीय राज्य की जिस संस्था को मुख्यरूप से इन प्राविधानों का उपयोग करना है वह इसके योग्य है भी या नही ? अदालतों तक पहुचने के पहले पुलिस इस नये कानून का उपयोग या दुरुपयोग करेगी । पिछ्ला अनुभव बताता है कि विधि मे उपलब्ध प्राविधानों का उपयोग पुलिस ने इस तरह किया है कि दंगों मे पीडितों , खास तौर से अल्पसंख्यकों , के मन मे हमेशा यह कसक रही है कि भारतीय राज्य नें वह सब नही किया जो उसे ऐसी स्थिति मे करना चाहिए था या उसने वह सब किया जो उसे नही करना चाहिये था । 1960 के बाद के हर साम्प्रदायिक दंगे मे पुलिस के ऊपर पक्षपात के आरोप लगे हैं। आरोप लगाने वालों में सिर्फ मुसलमान ही नही बल्कि मानवाधिकार संगठनों से जुडे लोग, स्वतंत्र मीडिया और विभिन्न जांच आयोगों की रपटें शामिल है । यदि हम सरकारी आकँडों का ही यकीन करें तब भी हम यही पायेंगे कि हर दंगे में मरने वालों में ज्यादातर मुसलमान थे । न सिर्फ ज्यादा बल्कि अधिकांश मामलों मे तो तीन चौथाई से भी ज्यादा। उस पर तुर्रा यह कि इनमे पुलिस कार्यवाही भी अधिकतर मुसलमानों के खिलाफ ही हुई। अर्थात जिन दगों मे मरने वले अधिकतर मुसलमान थे उनमे भी पुलिस की गाज उनपर ही गिरी ।मतलब ज्यादा मुसलमान गिरफ्तार हुए, अधिकतर तलाशियाँ भी उन्ही के घरों की हुयी और उन दंगों मे भी जहां मरने वाले तीन चौथायी से अधिक मुसलमान थे वहां भी अगर पुलिस नें गोली चलायी तो उनके शिकार भी मुख्य रूप से मुसलमान ही हुए ।मुसलमानों में पुलिस के प्रति अविश्वास इतना अधिक है कि अपने एक शोध के दौरान जब मैने दंगा पीडितों से एक बहुत साधारण सा प्रश्न पूंछा कि क्या उस समय जब उनकी जान और माल खतरे मे हो तो क्या वे मदद के लिये पुलिस के पास जाना चाहेंगे ? दुनिया के किसी भी दूसरे मुल्क में इस तरह का सवाल केवल पागल ही पूंछ सकता है क्योकि कही भी खतरे में पड्नें पर नागरिक राज्य की तरफ ही स्वाभाविक रूप से देखेंगे। राज्य का मुख्य कर्तव्य ही नागरिकों की जान माल की हिफाजत करना है और राज्य का सबसे दृश्यमान अंग पुलिस इस भूमिका को निभाता है।पर आप इस पर क्या कहेंगे कि मेरे प्रश्न के उत्तर मे अल्पसंख्यक दंगा पीडितों की बहुसंख्या ने कहा कि वे उस समय भी जब उनकी जान माल खतरे मे हो पुलिस के पास नही जाना चाहेंगे। उनका यह संकोच किसी शून्य नही उपजा है।इसके पीछे ठोस ऐतिहासिक कारण हैं । उन्होने विभिन्न साम्प्रदायिक दंगों में पुलिस के पक्षपात पूर्ण व्यवहार का दंश झेला है ।मैनें खुद अपने शोध के दौरान और 35 वर्षो की भारतीय पुलिस सेवा की अवधि मे ऐसे बहुत से मामले देखे हैं जब साम्प्रदायिक हिंसा की आग मे लुटा पिटा कोई मुसलमान पुलिस के पास पहुचा तो बजाय कन्धों पर आश्वस्तिकारक थपथपाहट के उसने अपने गालों पर एक झन्नाटेदार झापड पाया । 1984 मे सिक्खों के अनुभव भी कुछ कुछ ऐसे ही थे जब दिल्ली जैसे शहर मे भी पुलिस नें अधिकांश मामलों मे मुसीबतजदा सिक्खों की मदद करने की जगह बलवाइयों का साथ दिया और कई मामलों तो अगर पुलिस न पहुची होती तो सिक्ख अपनी जान बचाने मे कामयाब हो गये होते । मैने ऊपर जिन परिस्थितियों का जिक्र किया है उनमे किसी मे भी वर्तमान कानूनों की अपर्याप्तता अथवा अक्षमता जिम्मेदार नही है। सभी के पीछे एक ही कारण है और वह है हमारे मनों के अन्दर गहरे पैठीं गहरी दुर्भावना जो हमें खाकी पहनने के बाद भी हिन्दू या मुसलमान बनाये रखता है । भारतीय राज्य के विभिन्न अवयव आज भी हम और वे की मनोग्रंथि से पीडित हैं । मुसलमान उनके लिये अभी भी वे हैं ।पुलिस के अधिकांश लोग मानते है कि दंगा मुसलमान शुरू करते हैं और दंगे को रोकने के लिये उनके पास सबसे आसान नुस्खा है मुसलमानो के साथ सख्ती । इसी लिये उन दंगो मे भी, जिनमे शुरुआत से हिन्दू हमलावर दिखते हैं, पुलिस की कार्यवाही मुसलमानो के विरुद्ध ही होती दिखती है । एक औसत पुलिसकर्मी के मन मे यह बात इतने गहरे बैठी है कि आम तौर से मुसलमान हिंसक और क्रूर होता है कि उसके लिये यह मान पाना कि कोई दंगा हिन्दुओं ने शुरू किया है या किसी दंगे मे हिन्दू हमलावर हो सकते हैं लगभग असम्भव है।उसके लिये औसत हिन्दू आमतौर से उदार या अहिंसक होता है ।मुझे याद है कि 1990 में जब रामजन्मभूमि आन्दोलन अपने चरम पर था और मै इलाहाबाद मे नियुक्त था , मुझे यह देख कर आश्चर्य हुआ कि पुलिस थानों मे साम्प्रदायिकता के मोर्चे पर सिर्फ मुसलमानों के विरुद्ध इंटेलिजेंस उपलब्ध था ।विश्व हिन्दू परिषद जैसे संगठन , जो खुले आम हिंसा भड्का रहे थे, के बारे मे न के बराबर सूचनायें थीं ।पुलिसकर्मियों को यह समझाने मे मुझे बहुत मेहनत करनी पडी कि उन परिस्थितियों मे हमारे रडार पर हिन्दू संगठन होने चाहिये न कि मुस्लिम । ऐसा नहीं कि भारतीय राज्य के अवयओं मे सिर्फ पुलिस ही इस ग्रंथि से पीडित है ।न्यायपालिका ने बहुत से मौकों पर निराश किया है । राजनैतिक नेतृत्व् ने तो हमेशा उस इच्छाशक्ति का अभाव दिखाया है जो साम्प्रदायिक हिसां से निपटंने के लिये जरूरी है।भारतीय समाज की सच्चाई जानने वाले सहमत होंगे कि दंगे भडक तो सकते हैं पर लम्बे तभी खिचते हैं जब राज्य चाहता है। मेरा तो दृढ विश्वास है कि यदि कोई द्ंगा 24 घंटे से अधिक चल रहा है तो इस बात की जाचं होनी चाहिये कि क्या राज्य का कोई अंग उसमे शरीक तो नही है । उपरोक्त के सन्दर्भ मे हमें साम्प्रदायिक हिंसा के खिलाफ बनने वाले किसी भी कानून को परखना चाहिये । जब इस बिल का पहला ड्राफ्ट विचार विमर्श के लिये वितरित हुआ था तब से आज तक कई बार इस पर विस्तार से चर्चा हुई है । इस पर हुये विमर्शो मे राजनीतिक दलो , नागरिक अधिकार संघटनो तथा साम्प्रदायिकता से जुडे मुद्दो पर काम क़रने वाली संस्थाओ से जुडे लोगों ने भाग लिया है । मुझे भी कई बार इनमे भाग लेने का मौका मिला है । हर जगह एक आम राय बनी कि इस नये कानून मे पहले से ही बहुत अधिकार प्राप्त पुलिस को और अधिक अधिकार दिये जा रहे है।क्या पुलिस इन अधिकारो का प्रयोग अल्पसख्यकों की हिफाजत के लिये करेगी य इनका प्रयोग भी उनके खिलाफ ही होगा? ये बढे हुए अधिकार भारतीय राज्य को फासिस्ट तो नही बनायेंगे? इन सारे सवालो पर हमें विस्तार से विचार करना होगा । इस नये कानून मे एक बहुत अच्छी बात यह हुई है कि पह्ली बार किसी कानून मे हिंसा के शिकार व्यक्तियों के लिये क्षतिपूर्ति की वैधानिक व्यवस्था की गयी है। साथ ही अपने कर्तव्यों मे असफल सरकारी कर्मचारियो को उनका उत्तरदायित्व निर्धारित करते हुए दंडित करने के प्रविधान भी इसमे है। मेरे विचार से यह एक बहुत महत्वपूर्ण कदम है। अंत मे फिर वही एक प्रश्न—क्या महज कानून को अधिक सख्त बनाने से साम्प्रदायिकता की समस्या से निजात पायी जा सकती है? या इसके लिये भारतीय राज्य की संस्थाओ को अधिक सम्वेदनशील और वैज्ञानिक चेतना से लैस करना होगा? मुझे लगता है कि कानूनो से अधिक हमें अपने दिमागी जालों को साफ करना होगा । । विभूति नारायण राय

विभूति नारायण राय का इंटरव्यू[संपादित करें]

विभूति जी, दो दिनों का आयोजन बड़ा शानदार रहा. सेमिनार आयोजन और इसके पीछे विजन क्या था, कैसे प्लान किया आपने?[संपादित करें]

-देखिये ब्लॉगिंग एक बहुत महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में उभरने जा रही है. ये एक महत्वपूर्ण माध्यम बन ही गयी है. हिंदी में भी आप पायेंगे कि धीरे धीरे इसके प्रति अवेरनेस बढ़ रही है. और महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय मुख्य रूप से बना ही इसलिए है कि हिंदी की जो भी रचनात्मकता है उसके लिए समन्वयक का काम कर सके. उस माध्यम में काम करने वाले लोगों को आपस में जोड़ने का काम कर सके. माध्यम को विकसित करने के लिए तकनीक और कंटेंट के स्तर पर जो कुछ संभव हो सके, वह कर सके. तो महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय ने ब्लॉगर्स का जो सम्मलेन कराया वह मुख्य रूप से इसी को रेखांकित करने के लिए किया है कि इस माध्यम का ज्यादा बेहतर रचनात्मक इस्तेमाल कैसे हो सकता है और हिंदी को विश्व भाषा बनाने में किस तरह से माध्यम मददगार हो सकता है.

आपका अनुभव कैसा रहा?

-मुझे तो बहुत अच्छा लगा,. मैंने देखा है, और यह एक सच्चाई भी है कि इन्टरनेट पर हिंदी मुख्य रूप से निजी प्रयासों से पहुंची है. जो ब्लॉगर्स हैं उनका बहुत बड़ा योगदान हैं. ये जो फ़ॉन्ट्स विकसित हुए हैं इन्टरनेट पर, उनमें भी आप पायेंगे कि मुख्य रूप से निजी श्रम और निजी पूंजी लगी है. ब्लॉगर्स जो आये थे उनसे बात करके सबसे अच्छा मुझे ये लगा कि इनके मन में हिंदी को लेकर खास तरह की रागात्मक चिंता है. ये चाहते हैं कि हिंदी न सिर्फ एक समृद्ध भाषा बने, हिंदी न सिर्फ अलग अलग माध्यमों को अभिव्यक्त करने का एक मंच बने बल्कि हिंदी सही रूप में एक विश्व भाषा बन सके. आपने देखा होगा इसमें कुछ अंतरराष्ट्रीय ब्लॉगर भी थे, कविता वाचक्कनवी जी थीं, उन सभी से बात करके मुझे लगा कि सचमुच ये लोग हिंदी के लिए कुछ करना चाहते हैं.

ब्लॉग को लेकर आपका निजी तौर पर खट्टा मीठा अनुभव रहा है. इसके भविष्य को किस रूप में देखते हैं?

-दो दिनों के इस कार्यक्रम का जो शीर्षक था, केंद्र में जो चिंता थी वो ब्लॉगिंग के नैतिकता को लेकर थी. ब्लॉगिंग में क्या हम कोई आत्मनुशासन लागू कर पाएंगे? अपनी लक्ष्मण रेखा खुद खीच पायेंगे, या हम सरकारों को मौका देंगे कि सरकार हमारे साथ, हमारे लिए लक्ष्मण रेखा खींचे. अभी हाल में आईटी एक्ट आया भारत में, और वो एक यही प्रयास है. मेरा जो व्यक्तिगत अनुभव है उसे यहां शेयर करना नहीं चाहूँगा, लेकिन वो शायद एक खास तौर की हड़बड़ी थी या खास तौर पर उदंड किस्म का एक माहौल, वो उसकी देन था. क्योंकि आप बिना तथ्यों को जांचे परखे, बिना अपनी भाषा के बारे में सतर्क हुए, कुछ लिखते हैं या कुछ पब्लिश करते हैं ब्लॉग पर, तो आप एक खास तरह का जोखिम अपने लिए भी निमंत्रित कर रहे हैं. क्योंकि जो नया आईटी एक्ट आया है उसमें बहुत सारी चीजे दंडनीय बनाई गयी हैं. आप उस व्यक्ति के साथ निश्चित रूप से ज्यादती कर ही रहे हैं जिसके बारे में आप इस तरह की चीजे लिख रहे हैं, क्योंकि आपका वो उदंड किया हुआ उसका बहुत कुछ डैमेज करती है. साइबर एक्सपर्ट पवन दुग्गल जी ने कुछ उदहारण भी दिए. पवन दुग्गल जी ने बहुत अच्छा बोला, मुझे लगता हैं कि इन दो दिनों के कार्यक्रम की सबसे अच्छी उपलब्धि वही थी. पवन जी ने उन खतरों की तरफ हमारे जो नए ब्लॉगर्स थे, जो उत्साही ब्लॉगर्स हैं उनका ध्यान आकर्षित किया जो इस तरह के असावधानी से उत्पन्न हो सकते हैं, जिसमें आप भाषा के बारे में बहुत सावधान न रहें, जिसमें तथ्यों की पुष्टि करने के बारे में बहुत सावधान न रहें, ऐसा करके आप किस तरह के जोखिम उठा सकते हैं, पवन दुग्गल जी ने उसकी तरफ हमारा ध्यान खींचा.

सांप्रदायिकता के खिलाफ आप अभियान चलाते रहे हैं. फिलहाल इन दिनों क्या कर रहे हैं. और कैसे देखते हैं भारतीय समाज को, अयोध्या प्रकरण पर हाल-फिलहाल जो फैसला आया है, उसके बाद.

-मैं भारतीय समाज के लिए एक सबसे बड़े नासूर के तौर पर साम्प्रदायिकता की समस्या को मानता हूँ. क्योंकि जो ये एक राष्ट्र-राज्य बनने की प्रक्रिया चल रही है, उसमें ये सबसे बड़ी बाधा है. भारत एक राष्ट्र बन सके और एक ताकतवर राष्ट बन सके और अगर हम इसमें विश्वास रखते हैं, तो हमें साम्प्रदायिकता की समस्या को एक चुनौती के तौर पर लेना चाहिए. दुर्भाग्य से हमारे देश में जो परिस्थितियाँ रही हैं, उसमें खास तौर से अल्पसंख्यक जो इस देश के रहे हैं, उनके मन में कहीं न कहीं ये भाव हमेशा रहा है कि भारतीय राज्य ने उनके लिए वह सब नहीं किया जो उसे करना चाहिए था या बहुत सारे दंगों में आपने पाया होगा कि भारतीय राज्य की सबसे दृश्यमान जो अंग है, पुलिस, उसने वह सब चीजें की जो उसे नहीं करनी चाहिए थी. तो मेरी दिलचस्पी अकादमिक स्तर पर इस समस्या में हुई थी और मैंने अपने छात्र जीवन से भारतीय समाज को समझने की कोशिश की और बाद में जब मैं पुलिस में आया तो मुझे इसका एक प्रैक्टिकल रूप दिखाई दिया. तब मैं तो सिस्टम के बाहर भीतर दोनों तरफ देखता था. जो चीजे मैं अकादमिक स्तर पर सोचता था उससे भी ज्यादा भयानक स्थितियां थी. उससे भी ज्यादा अनास्था थी अल्पसंख्यकों के मन में, भारतीय राज्य को लेकर के और पुलिस को लेकर के, तो अयोध्या उसी की परिणति है. अयोध्या में जो कुछ हुआ, वह नहीं हो सकता. 1949 में चाहे रामलला प्रकट हुए हों, या बाद में अस्सी के दशक में रामजन्म भूमि का ताला खुला हो या 6 दिसम्बर 1992 में मस्जिद गिराई गयी. ये सब नहीं हुआ होता, अगर राज्य ने अल्पसंख्यको के साथ वो व्यवहार किया होता जो एक राज्य से अपेक्षा की जाती है. राज्य का काम क्या है? अपने सारे नागरिकों की जानमाल की हिफाजत करना, तो वहां पर कहीं न कहीं हमसे चूक हुई और हमें उसका, हमें से मेरा मतलब हिंदू समाज से है, बहुसंख्यक समाज इस देश का, उसको कहीं न कहीं इसका पश्चाताप करना चाहिए.

आपका कोई ब्लाग भी है?

-ब्लॉग है. ब्लॉगर के तौर पर मैंने बहुत गंभीर काम नहीं किया क्योंकि मेरा तो दूसरा माध्यम है. मैं मुख्य रूप से कलम के माध्यम से लिखता पढ़ता हूँ. जब कोई दिलचस्पी की चीज मिलती है तो मैं अपने ब्लाग में डाल देता हूँ. मेरे ब्लाग का नाम है विभूतिनारायण.ब्लागस्पाट.कॉम.

आप हमेशा चर्चा में बने रहते हैं किसी न किसी वजह से. लोग कहते हैं कि आप चर्चा में रहने के मामले में राजेंद्र यादव को भी मात दे रहे हैं..

-कोई चीज सायास नहीं करता. ये बात सही है कि साम्प्रदायिकता को लेकर एक खास तरह से मैं सोचता हूं. और पुलिस में आने के बाद भी उस पर लिखता पढ़ता रहा, बोलता रहा. लोगों को कई बार आश्चर्य भी होता था कि सर्विस में रहते हुए एक आईपीएस अफसर कैसे बोल सकता है. उसके अपने जोखिम थे, जाहिर है कि उसके लिए मेरे मन में कोई पश्चाताप नहीं है, क्योंकि वो तो जानबूझकर के उठाया गया जोखिम था. अगर कुछ नुकसान हुआ होगा तो उसके लिए मुझे कोई अफसोस नहीं है. पर ये जो विवाद अभी हाल में उठा नया ज्ञानोदय के मेरे इंटरव्यू को लेकर के, उसके लिए मुझे तो सिर्फ इतना कहना है कि वो एक गंभीर विमर्श का मौका था, जिसे मैं अपनी असावधानी भी मानता हूँ, कुछ शब्दों का मैंने इस्तेमाल किया जिनका इस्तेमाल नहीं करना चाहिए था और उससे वो गंभीर विमर्श का मौका चला गया. बजाये उस पर गंभीर विमर्श करने के, हम लोग गालीगलौज पर उतारू हो गए. और, कुछ लोगों का व्यक्तिगत एजेंडा था, कालिया जी को कुछ लोग ज्ञानोदय से हटाना चाहते थे. कुछ मुझसे इर्ष्या करते थे. तो वो सारे लोगों ने मिलकर इस तरह का पूरा माहौल बनाया, जिससे लगा कि मैं स्त्री विरोधी हूँ, और पिछले 35-40 सालों का जो मेरा लेखन था, मेरे सोचने का जो तरीका है, उसे खारिज करने की कोशिश की.. जाहिर है कि आप एक लेखक को उसके लेखन से ही पहचानते हैं. बहुत कम लोगों को उसके व्यक्तिगत जीवन में झांकने का या उससे मिलने जुलने का मौका मिलता है. 35-40 साल का, जो कुछ था, उसको नकारने की कोशिश की गयी. लेकिन उसमें मैं अपनी गलती भी स्वीकारता हूँ, कुछ शब्दों का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए था, पर मैं ये भी मानता हूँ कि अब जब ये सब कुछ ठंढा पड़ गया है, और जो शुरुआती आवेग था, जो लोग उसमें लगे हुए थे, विवाद को हवा देने में, उस विवाद के बहाने, कालिया जी को या मुझे नुकसान पहुचाने में, अब ठंढे पड़ गए हैं तो शायद इस पर गंभीर चर्चा हो सकती है.

वर्धा में हम लोगों को दिखाया गया कि आपके समय में विवि में काफी कुछ डेवलपमेंट हुआ है. आपसे पहले कुछ खास नहीं हुआ. क्या सच है.

-उचित नहीं है कि किसी एक कार्यकाल को महत्व दिया जाए क्योंकि मेरा मानना है कि विश्वविद्यालय मेरे पहले भी था और मेरे बाद भी रहेगा, ये जरूर है कि शुरू के पांच साल विवि ने गंवा दिए, और पांच सालों तक यहां कुछ नहीं हो पाया. जब मैं आया तो मुझे लगा कि अगर हम इसका जो भौतिक स्वरूप है, उसको इस लायक नहीं बना पाए कि ये एक धड़कता हुआ आवासीय विश्वविद्यालय बन सके, तो इसमें किसी तरह के इंटेलेक्चुअल कंटेंट के डेवलपमेंट के क्षेत्र में भी हम काम नहीं कर पायेंगे. मैं आते ही इसी बात पर ध्यान देने लगा कि विश्वविद्यालय में सड़के बने, छात्रावास बने, आवासीय परिसर विकसित होना चाहिए, हमारे स्कूलों में इमारते बने और मुझे संतोष है कि पिछले दो सालों में ये काफी हद तक, अब एक आवासीय विश्वविद्यालय दिखने लगा है.

कल कोई कह रहा था कि विवि में जो टीले हैं, उनका नामकरण होना है. क्या ये टीले हैं या पहाड़.

-नहीं पहाड़ तो नहीं कहेंगे, पहाड़ से तो आप एक खास तरह की ऊंचाई का बोध करते हैं, ये जो विदर्भ के क्षेत्र की जो श्रृंखलाएं हैं, टीलों के तौर पर हैं और दुर्भाग्य से पर्यावरण के प्रति जो उपेक्षा का भाव है, उसकी वजह से यहाँ वृक्ष बहुत कटे और ये टीले भी नष्ट हो रहे हैं. जो पांच टीले इस विश्वविद्यालय में हमें मिले हैं, हमें उनको सुरक्षित रखना चाहिए और उन पर घना वृक्षारोपण करके उनको एक खूबसूरत स्थल के रूप में विकसित करना चाहिए. उन्ही में से एक टीले का नाम गांधी जी के नाम पर रखा गया गांधी हिल, दूसरा टीला अब हम विकसित कर रहे हैं जो कबीर हिल है, जिसमें हिंदी के दलित परंपरा के नायकों को, उसके रचनाकारों, जो बड़े आइकन्स हैं उनकी प्रतिमायें लगाईं जाएँ, उनकी मूर्तियां लगाइ जाएँ ताकि उनकी रचनात्मकता से छात्रों को और यहां आने वाले समुदाय को अवगत कराया जा सके.

बाकी टीलों का नामकरण बाकी है?

-बाकी में जैसे भगत सिंह के नाम पर एक टीले को विकसित करने का विचार हैं मेरा, दो और टीलों के नामों के लिए, जो यहां के शैक्षणिक और गैर शैक्षणिक समुदाय के मित्र हैं, उनसे आग्रह किया है कि वे नाम बताएं सुझाएं. मैं पूरे हिंदी समाज से आग्रह करूँगा कि वे हमें सुझाव दें कि बाकी दो टीलों के नाम किनके नाम पर रखे जायें और उन्हें किस तरह से विकसित किया जाये.

विश्वविद्यालय के लिए अभी आपकी योजना क्या है?

-ये विश्वविद्यालय खास तरह के मकसद को लेकर बना था 1975 में. जो पहला विश्व हिंदी सम्मलेन हुआ था नागपुर में, उसकी परिणिति है यह विश्वविद्यालय, और उस सम्मलेन में जो केंद्रीय विषय था वो इस भाषा को एक विश्व भाषा बनाने से सम्बंधित था, उसी के सिलसिले में इस विश्व विद्यालय की परिकल्पना की गयी, और विश्वविद्यालय बना, मेरा मानना है कि ये विश्वविद्यालय, पूरी दुनिया भर में जहां कहीं भी हिंदी पढ़ी-पढाई जा रही है, हिंदी में गंभीर काम हो रहा है, शोध हो रहा है, उन सबके बीच में एक समन्वयक का काम करे. अभी 2011 में हमने दुनिया भर के डेढ़ सौ विश्वविद्यालय में जहाँ हिंदी पढाई जाती है, या हिंदी से सम्बंधित कोई काम होता है, उनके अध्यापकों को निमंत्रित किया है. और उनमें से कुछ ने अपनी सहमति दे दी है, यहाँ आने के लिए, वे यहाँ इकट्ठे होंगे और हम लोग उन क्षेत्रों को रेखांकित करने की कोशिश करेंगे जहाँ ये विश्वविद्यालय उनकी मदद कर सके. वो पाठ्यक्रम के विकास का क्षेत्र हो सकता है वो व्याकरण या वर्तनी से सम्बंधित समस्यायें हो सकती हैं. तो उनके लिए पाठ्यसामग्री तैयार करने का या पुनश्र्चर्या कार्यक्रम आयोजित करने जैसा क्षेत्र हो सकता है. जनवरी में इसको हम अंतिम रूप देंगे.

कोई ऐसी बात आप सोचते हैं जिसे शेयर कर नहीं पाते किसी से.

-देखिये शीर्ष का एकांत अपने आप में बड़ा भयानक होता है. जब किसी ऐसी स्थिति में होते हैं जहां आपके ऊपर कोई नहीं होता तो आपकी जिम्मेदारी भी बढ़ती है और आपका एकांत भी बढ़ता है. वो एक समस्या है, चूंकि मैं तो एक सामाजिक प्राणी हूँ. सामूहिकता में विश्वास करता हूँ. रोज शाम को मैं चाहता हूँ कि लोग मेरे पास बैठें या मैं लोगो के पास जाऊं. तब भी, जो शीर्ष का एकांत है, वह भयावह रूप में कायम रहता है. आप बहुत सारी चीजे जो अपने मित्रों के साथ पहले ठहाकों के साथ शेअर कर सकते थे अब नहीं कर पाते हैं. लेकिन मुझे तो ऐसा लगता है, जो भी मित्र यहाँ, अलग अलग पदों पर, अलग अलग क्षेत्रों में इस विश्वविद्यालय से जुड़े हैं, लगभग सभी जानते हैं कि मैं खुलकर के अपनी बात कहता हूँ और कई बार ऐसी बातें कह देता हूँ जिसे लोग कहते हैं कि आपको नहीं कहना चाहिए. इस तरह से यहां के साथियों की बेबाक राय या खुली राय भी मिलती है और विश्वविद्यालय के भविष्य को लेकर जो योजनाएं बनती हैं, उनमें एक सामूहिक भागीदारी जैसी चीज भी होती है.

विभूति जी, आपका उपन्यास है- शहर में कर्फ्यू, उसके बारे में जानना चाहेंगे. एक पुलिस अधिकारी के रूप में कितना वो आपके यथार्थ अनुभव का हिस्सा था, और कितना एक रचनाकार के रूप में?

-दोनों का मिलाजुला परिणाम है. मेरी दिलचस्पी साम्प्रदायिकता की समस्या में अपने छात्र जीवन से थी. मैं भारतीय समाज को जब भी समझने की कोशिश करता तो यहीं पर जा कर अटक जाता था, क्योंकि बहुत संश्लिष्ट और जटिल जमीन है वो. बाद में जब मैं पुलिस में आया तो, जो कुछ मैंने पढ़ा था, सोचता था, जो मेरा फॉरमुलेशन था, वो और दृढ हुआ. मेरा विश्वास इसमें बढ़ा कि भारतीय राज्य अल्पसंख्यकों के साथ, जिस तरह का व्यवहार करना चाहिए, उस तरह का बहुत सारे मौके पर नहीं करता हैं, और जो गुस्सा या जो ज्यादती का भाव अल्पसंख्यकों के मन में है वो बहुत गलत नहीं है. बाद में सन अस्सी में इलाहाबाद में मैंने अपनी नौकरी शुरू ही की थी, और मेरी तैनाती वहाँ हुई एसपी सिटी के रूप में, तो एक दंगे को देखने का मुझे मौका मिला, जिसके बैकग्राउंड पर ये उपन्यास शहर में कर्फ्यू लिखा.

ऐसे अनुभव हुए जो मुझे लगता था कि अगर पुलिस में नहीं रहा होता तो मुझे नहीं होते, हालांकि एक पुरानी कहावत है कि लैंग्वेज इज द वेरी पूअर सबस्टीच्युट ऑफ थॉट, आप जो कुछ देखते हैं, सोचते हैं, कई बार जब आप हाथ से लिखने लगते हैं तो फिसल जाते हैं. यथार्थ और भाषा उसको अभिव्यक्त नहीं कर पाती. तो शहर में कर्फ्यू लिखते समय मुझे लगा कि जो कुछ मैंने देखा था, या उन दस पन्द्रह दिनों में जो कुछ भोगा था, उस नर्क को, उसे पूरी तरह से मैं लिख नहीं पाया, बार बार वो चीजे हाथ से फिसल जाती हैं. लेकिन इसके बाद भी सही है कि शहर में कर्फ्यू काफी हद तक उस दंगे के अनुभवों पर आधारित है, और जाहिर है कि जब आप कोई चीज, कोई रचनात्मक प्रयास करते हैं, उसमें कुछ अस्ल हैं, कुछ ख्वाब हैं, कुछ तर्जे बयां हैं.

एक लेखक है, वो संवेदनशील होता है, बाहर से देखता-महसूस करता है. पर आप वहां एक पुलिस अधिकारी के रूप में तैनात थे, लेकिन उनकी अंदर की जो जिन्दगी है, उसके साथ किस तरह आप तादात्म्य स्थापित करते हैं, आइडेंटीफाइड करते हैं, वो कितनी परेशानी में हैं, वो जो पूरा एक घेट्टो है, जिसमें वे रह रहे हैं, जिसमें उनकी मृत्यु हो गयी है, उसको दफनाने के लिए नहीं निकल पा रहे हैं, इतनी जो बहुत ही बेचैनी वाली चीजे हैं, किस तरह से आप उनके साथ अपने को आइडेंटिफाई कर पाएंगे, आप तो एक तरह से फैन्स के इधर हैं.

-ये बात बहुत सही कही कि फैन्स के इधर रहकर के उधर का जीवन देखना, उसको महसूस करना, फिर उसको लिख पाना, निश्चित रूप से मुश्किल काम है, और इसीलिए तो मैं अपनी असफलता भी मान रहा हूँ. कई बार मुझे लगा कि बहुत सारी चीजें जो मैं देख रहा था या सोच रहा था वो मेरे हाथ से फिसल गयीं, वो मेरी भाषा उसको पूरी तरह से अभिव्यक्त नहीं कर पाई, लेकिन उसके साथ साथ, जो कुछ थोड़ा बहुत मैं लिख पाया, मैं समझता हूँ कि अगर मैं सिर्फ पुलिस अधिकारी होता, या सिर्फ लेखक होता तो नहीं लिख पाता. उसमें उस वैज्ञानिक समझ का भी हाथ है, जो छात्र जीवन के दौरान मैंने थोड़ी बहुत हासिल की थी. जिसे मार्क्सवाद भी आप कह सकते हैं. उसने दंगे के दौरान मनुष्य बने रहने में मेरी मदद की. बहुत सारी कठिन परिस्थितियों में मनुष्य बनने में मदद करता है मार्क्सवाद, और खास तौर पर साम्प्रदायिकता जैसी जटिल स्थिति में, बहुत ज्यादा करता है, क्योंकि पहली बार आपको लगता है कि आपने, आप एक हिंदू परिवार में पैदा जरूर हुए हैं लेकिन इस समय आप जब एक ऐसी स्थिति में हैं, जहाँ पर हिंदू ज्यादती कर रहे हैं, वहां आपका फर्ज यह बनता है कि फिर आप हिंदू या मुसलमान न रहें और एक मनुष्य के रूप में आचरण करें, और एक पुलिस अधिकारी के रूप में भी, जाहिर है कि पुलिस अधिकारी से जिस संविधान की उसे शपथ दिलाई जाती है, उससे अपेक्षा तो यही की जा सकती हैं कि वो ऐसे किसी भी परिस्थिति में, मजबूती के साथ खड़ा होगा, और हिंदू या मुसलमान नहीं बनेगा. तो ये वैज्ञानिक समझ जो थोड़ी बहुत विकसित कर पाया, उसने भी मुझे इसमें मदद की.

अक्सर कहा जाता है कि जब कोई फिक्शन लिखते हैं तो बड़े लेखक जो होते हैं, पहले उस बारे में सैद्धांतिक रूप से उनका एक बड़ा अध्ययन करते हैं, आपने भी क्या ये जो साम्प्रदायिकता की समस्या है, अपने उपन्यासों में उठाई है, तो कोई ऐसा सैद्धांतिक काम लंबे समय तक किया जो आपका कनविक्शन बन गया हो.

-मैंने पहले कहा कि मैं नौकरी में आने के पहले ही इस तरह की चीजों में दिलचस्पी रखता था, जो भारतीय समाज को समझने में मेरी मदद करे, भरतीय समाज अपने आप में जटिल समाज है, आप जानते हैं, व्यवस्था ने उसे और ज्यादा जटिल बना दिया है, लेकिन उसमें ये जो एक खास मुद्दा था साम्प्रदायिकता का, जिसने हमारा पूरा, आप कह सकते हैं, चार पांच सौ साल का इतिहास बिल्कुल रक्तरंजित किया है, इतिहास के साथ साथ हमारा भूगोल भी कलंकित किया है, उस पर जा कर के, मेरी दिलचस्पी का बिंदु टिका. तब जाकर मैंने पढ़ना लिखना शुरू किया. अलग अलग लोगों से जो इस विषय पर काम कर रहे थे, उनके साथ बैठ करके उनसे सीखने का प्रयास किया. और जब मैं पुलिस में आया तो एक तरह से आप कह सकते हैं जो कुछ सैद्धांतिकी मेरे पास थी, उसको एक प्रयोगशाला मिल गयी यहां आ करके. राज्य और अल्पसंख्यकों के रिश्ते, और राज्य का जो सबसे दृश्यमान अंग हैं पुलिस, आखिर राज्य एक सांप्रदायिक दंगे की स्थिति में जहाँ हिंसा हो रही है, वहां लॉ एंड ऑर्डर जैसी समस्या हो, वहां पुलिस के द्वारा ही, राज्य पहचाना जाता है, तब जो पुलिस और अल्पसंख्यको के रिश्ते थे इस देश में, वो मुझे समझने में, जब मैं इस सेवा में आ गया तो आसानी हुई, और बाद में शहर में कर्फ्यू, उपन्यास लिखा. इससे भी मुझे मदद मिली. मुझे एक शोध का काम मिला. एक फेलोशिप मिली. उसमें भी मैंने सांप्रदायिक दंगों के दौरान जो विभिन्न समुदाय हैं, जो पीड़ित होते हैं, उनके किस तरह से रिश्ते बनते हैं राज्य और पुलिस के साथ, उनको समझने के लिए काम किया.

शहर में कर्फ्यू के बहुत सारे भाषाओं में अनुवाद हुए, ऐसे एक दो अनुवाद जिसने आपको बहुत संतोष प्रदान किया हो?

-'शहर में कर्फ्यू' के करीब दस भाषाओं में अनुवाद हुए, और उर्दू में तो सौ से ज्यादा उसके संस्करण निकले हैं, अलग अलग अखबारों में, अलग अलग पत्रिकाओं ने, प्रकाशकों ने, ज्यादतर ने बिना मुझे सूचना दिए या बिना मुझसे इजाजत लिए उन्हें छापा, मुझे इसका बुरा भी नहीं लगता क्योंकि मैं तो विश्वास करता हूँ कि भाई जब तक वो लेखक के रूप में मेरा नाम न हटा दें या उसके कंटेंट में कोई फेरबदल न करे तो अच्छा है, ज्यादा लोगों तक पहुचने का मौका मिलेगा, तो शहर में कर्फ्यू का उर्दू में एक अनुवाद है वकार नासरी का जिसने मुझे बहुत संतोष दिया, और चौधरी मोहम्मद नईम जो शिकागो में उर्दू पढ़ाते थे, उन्होंने इसका अंग्रेजी अनुवाद किया वो भी बहुत अच्छा लगा. मतलब एक लेखक के तौर पर मुझे बहुत संतोष हुआ इन दोनों अनुवादों से.

-आपके ताजा उपन्यास 'प्रेम की भूत कथा', ये कहना चाहिए की अदभुत प्रेम कथा, आपके जो बाकी उपन्यास हैं उनसे ये शिल्प के स्तर पर, काफी अलग है. आप अपनी कथा यात्रा में इस उपन्यास को किस तरह लेते हैं?

-ये उपन्यास तो अनायास ही लिखा गया. मैं मसूरी गया हुआ था, और रस्किन बॉड की एक पुस्तक पढ़ रहा था, मसूरी के बारे में, उसमें एक ह्त्या का जिक्र आता है जो 1909 में हुई है, और उसमें छोटे मोटे सन्दर्भ इधर उधर बिखरे पड़े हैं. उनको पढ़ते-पढ़ते एकाएक मुझे लगा कि ये तो, अदभुत प्रेम कथा बन सकती है. प्रेम कथा की जो बुनियादी शर्त है, वो मुझे लगता है कि वो त्याग या बलिदान या दुखांत होना है. मैं इसे थोड़ा सा एक्प्लेंन करूं कि अगर आप, गुलेरी जी के उपन्यास के अन्तिम दृश्य याद कीजिये, जब लहना सिंह घायल है और सूबेदारनी का बेटा भी घायल है. और एम्बुलेंस आती है ले जाने के लिए, गुलेरी जी ने कहीं ये नहीं लिखा, कि उस एम्बुलेंस में सिर्फ एक घायल जा सकता है, उसमें सूबेदारनी का बेटा भी जा सकता था, दिलीप सिंह या नाम मैं भूल रहा हूँ, और लहना सिंह भी जा सकता था लेकिन अगर लहना सिंह चला गया होता और बच जाता तो वो प्रेम कथा नहीं बन सकती थी. प्रभावशाली नहीं बन सकती थी. तो मेरे इस कथा का नायक भी जो एक अंग्रेज फौजी है, वो एक ऐसी हत्या के लिए फांसी चढ़ जाता है, जो पाठकों को पूरा यकीन है लेखक के तौर पर मुझे भी यकीन है. क्योंकि कहानी को खोजने के लिए मैंने बहुत जगह-जगह जा करके वो सरकारी रिकॉर्ड खंगाले, जेल के, अदालतों के, उस जमाने के मसूरी के अखबारों के, फाइलें, और मैं तो पूरी तरह से आश्वस्त था कि ये हत्या इसने नहीं की है, लेकिन अगर एलेन को फांसी नहीं लगती, और एलेन बच गया होता तो ये फिर प्रेम कथा नहीं बन सकती थी, एक विक्टोरियन नैतिकता की बलिबेदी पर जिसमें सिर्फ एक लड़की को रुसवाई से बचाने के लिए, क्योंकि जिस समय हत्या हुई थी, एलेन उसके पास था, और उस लड़की को अदालत में पेश नहीं किया जा सका. वो लड़की खुद भी जाहिर है 1909 का जो माहौल था वो आज का तो था नहीं कि वो अपनी मर्जी से अदालत में आकर के और जज को बताये कि नहीं ये मेरे पास था. और एलेन चुपचाप फांसी पर चढ़ जाता है. जो पादरी उसको कंफेशन कराने के लिए, उसके जीवन के अन्तिम तीन-चार हफ़्तों तक उसके पास जाता है, वो पादरी खुद अंत में बहुत भ्रमित हो करके निकलता है. वो ये भी नहीं समझ पाता कि कैसे इस अंग्रेज हुकूमत ने, जहां पर कि चूंकि वो खुद भी गोरा है, इटली का पादरी है, ये मानता है कि वो न्याय पर टिकी व्यवस्था है, कैसे एक अंग्रेज को, बिना किसी दोष के फांसी पर चढ़ाया जा सकता है. एक तो उसे यही स्वीकार करने में, बड़ी दिक्कत है पादरी को, लेकिन साथ साथ एलेन का जो पूरा का पूरा आँखों का, चेहरे का और उसके बोलने का जो भाव है, उसमें और तथ्य धीरे-धीरे पादरी के सामने खुलते हैं. उसमें ये भी यकीन नहीं कर पाता कि, एलेन सचमुच हत्यारा है, तो वो एक कन्फ्यूज्ड भर्मित व्यक्ति की तरह, एलेन से उसकी अंतिम मुलाकात के बाद निकलता है. जब मैं खुद भी इस कहानी पर शोध कर रहा था, और अलग अलग जगहों से रिकॉर्ड खंगाल रहा था, मैं खुद इस बारे में पूरी तरह से आश्वस्त था कि एलेन हत्यारा नहीं था, लेकिन एक लड़की को रुसवाई से बचाने के लिए वो फांसी चढ जाता है, मुझे सबसे ज्यादा इस चीज ने आकर्षित किया, और मुझे लगा कि एक प्रेम कथा या अदभुत प्रेम कथा है और बन सकती है. शिल्प के स्तर पर जरूर मैंने इसमें वो सारे प्रयोग किये जो इसके पहले के मेरे चार उपन्यासों में कहीं नहीं आते, लेकिन वो तो फिर रचनात्मकता की अपनी मांग है, स्थितियों की अपनी मांग है जिससे की आप एक कहानी, गढते हैं, बुनते हैं और उसे विकसित करते हैं.

प्रेम की भूत कथा एक रहस्य रोमांच का उपन्यास भी लगता है, प्रेम का उपन्यास भी है, नैतिकता का उपन्यास भी है, और काफी हद तक एक प्रयोगशील उपन्यास भी, आप खुद इस उपन्यास को क्या कहेंगे?

-जब राजेन्द्र यादव जी ने इसे पढ़ा तो उन्होंने मुझे एक एसएमएस भेजा कि भाई ये तो पता ही नहीं चलता कि हत्यारा कौन है? जेम्स का हत्यारा कौन है? जेम्स को मारा किसने? और भी बहुत सारे लोगों ने जिसमें हमारे समय के बड़े रचनाकार भी हैं, उन्होंने भी ये बाते मुझसे कही कि अंत तक ये उत्सुकता बनी रहती है कि हत्यारा कौन है? मेरा ये मानना है कि ये कोई मर्डर मिस्ट्री नहीं है, हत्यारा कोई भी हो सकता है. मैं जिस चीज को समझने की कोशिश कर रहा हूँ वो यह है कि कैसे एक व्यक्ति की इतनी उदाम और ऐसी उत्कट भावना हो सकती है जिसमें व्यक्ति अपनी प्रेमिका को रुसवाई से बचाने के लिए, अपनी प्रेमिका को बदनामी से बचाने के लिए फांसी पर चढ़ जाता है, और किसी तरह का कोई प्रोटेस्ट नहीं करता. किसी तरह का उफ़ नहीं करता बल्कि वह जो अंतिम पत्र लिखता है अपनी प्रेमिका को उसमें एक पंक्ति लिखता है नो रिगरेट्स माय लव, मेरे प्रिय मुझे कोई पश्चाताप नहीं मरते हुए, तो मैं इसे समझने की कोशिश कर रहा हूँ और वह किसी भी तरह से मर्डर मिस्ट्री जैसा उपन्यास नहीं है, जिसमें हत्यारा कौन था? हत्या किसने की? और किस हथियार से की? इत्यादि. उपन्यास का शीर्षक ही इस बात को बयां कर देता है कि मूलतः यह प्रेम कथा है.

जैसा कि आपने कहा कि जो नायक है वह एक स्त्री को रुसवाई से बचाने के लिए मौत को गले लगा लेता है. साथ ही आपने एक जगह भूत का जो प्रसंग है, स्त्री भूत को स्त्री भूत कहना पसंद करते हैं, भूतनी कहना पसंद नहीं करते. एक तरफ ये संवेदनशीलता है और दूसरी तरफ जो ये आरोप है कि आपने बड़े असंवेदनशील होकर लेखिकाओं के बारे में एक टिप्पणी की, इन दोनों को आप किस तरह से देखते हैं?

-मैं पहले भी कह चुका हूँ, फिर कह रहा हूँ जिस इंटरव्यू का आप जिक्र कर रहे हैं उसके माध्यम से कुछ गंभीर चर्चा मैं करना चाहता था, स्त्री विमर्श सिर्फ देह का विमर्श होगा, स्त्री मुक्ति में देह की मुक्ति किस अर्थ तक सहायक है. मैं इन सारी चीजों पर बात करना चाहता था और खुले ढंग से बात करना चाहता था. अब इसमें दो दिक्कतें हुई. मैंने असावधानी से कुछ शब्दों का इस्तेमाल किया, जिनका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए था. उसके लिए मैंने क्षमा भी अपनी महिला लेखिका मित्र हैं, उन सबसे मांगी. वह तो मुझे लगता है कि मेरी असावधानी थी लेकिन इसका खासा जो दूसरी दिक्कत हुई, इसमें बहुत सारे लोग सायास कूद पड़े. कुछ को कालिया जी का सर चाहिए था. कुछ को मेरा सर चाहिए. और वह शुरू के महीने डेढ़ महीने जब तक उनको लगा. जब तक खून की गंध आती रही तब तक वे हिंसक जानवरों की तरह हमला करते रहे लेकिन वो बहुत छोटी संख्या थी. ज्यादातर जो साहित्यिक समाज के लोग जो हमारे खिलाफ थे, मैं ये मान के चलता हूँ वे सचमुच इमानदारी के साथ इस बात से आहत थे कि मैंने उन शब्दों का इस्तेमाल किया, उन शब्दों के लिए मैंने क्षमा मांग ली. तो अब जब ये सब कुछ खत्म हो गया है. कई महीने बीत चुके हैं और जो लोग विवाद को जिन्दा रखने में, जिनकी दिलचस्पी थी वे भी मुझे लगता है शायद अब थक गए होंगे, और मैंने भी क्षमा मांग ली. तो मुझे लगता है कि अब इस पर कोई गंभीर विमर्श हो सकता है.

शहर में कर्फ्यू बहुत चर्चित रहा और इतना चर्चित रहा कि बाकी आपकी रचनाएं लगभग पृष्ठभूमि में चली गयीं. आगे आपकी क्या योजना है?

-सही कहा कि जब मेरी कहीं भी चर्चा होती है तो शहर में कर्फ्यू ही सबसे सामने आ जाता है, लेकिन शहर में कर्फ्यू के अलावा चार और मेरे उपन्यास हैं- पहला उपन्यास 'घर', जो अभी भी मैं अपना सबसे महत्वपूर्ण उपन्यास मानता हूँ, उसके बाद दूसरा उपन्यास 'शहर में कर्फ्यू', फिर आया 'किस्सा लोकतंत्र', 'तबादला' और 'प्रेम की भूतकथा'. ये मेरे पांच उपन्यास अभी तक आये हैं. शुरुआती दौर में कहानियाँ भी लिखीं, कुछ कहानियाँ इधर-उधर छपी भी, 'कल्पना' में भी छपी लेकिन जल्द ही मेरी समझ में आ गया कि कहानियाँ लिखना मेरे बस का नहीं है. कविताएं भी लिखी, यह अहसास हो गया, कविताएं मेरे बस की नहीं हैं. फिर मैंने अपने आप को उपन्यास तक सीमित किया और व्यंग्य मैं शुरू से लिखते आया हूँ, अपने छात्र जीवन से. मैं व्यंग्य लेखन करता रहा हूँ. बीच बीच में छिटपुट लिख देता हूँ, इस समय मैं जो काम कर रहा हूँ फिक्शन पीस है.

आपने शायद हाशिमपुरा का नाम सुना हो, 1987 के दंगे में मेरठ में एक बहुत खौफनाक हादसा हुआ था. हालांकि हाशिमपुरा को लोग मलियाना से कन्फ्यूज कर देते हैं, मलियाना अलग चीज है, एक घटना उसी समय वहां भी हुई थी. लेकिन हाशिमपुरा की उससे खराब स्थिति थी, जिसमें तीस से पैंतीस मुसलमानों को ट्रक में भरा और उनको मेरठ के हाशिमपुरा मोहल्ले से ला कर के, गाजियाबाद में ही दो जगहों पर मार दिया था. मैं उस समय गाजियाबाद में एसपी था तो मैंने उनके खिलाफ मुक़दमा कायम कराया, और तब से मैं लगातार उसका पीछा कर रहा था. ये मामला अभी दिल्ली के एक अदालत में अपने अंतिम चरण में है, अब देखते हैं उसका क्या फैसला होगा? मुझे हमेशा से ये चीज हंट करती, विचलित करती थी कि आखिर आप कैसे किसी जवान आदमी, पैंतीस-चालीस लोगों को, जो स्वस्थ थे, तंदुरुस्त थे, इनको कैसे, बिना किसी दुश्मनी के आप पकड़ लेंगे और मार देंगे. और जो पीएसी के लोग इसमें शरीक थे, उसमें एक दो लोगों से मेरी विस्तार से बात भी हुई. इसका नायक था सुरेन्द्र पाल सिंह, इत्तेफाक से उसकी मृत्यु हो चुकी है, उससे भी मेरी कभी बात हुई तो मैं समझने की कोशिश कर रहा था कि क्या क्या चीज है? कौन सी चीज आपको इस तरह के काम करने के लिए मोटिवेट करती है? प्रोत्साहित करती है? और आप बिना किसी झिझक के, बिना किसी पश्चाताप के किसी की जान ले सकते हैं, और उसमें बहुत सारे अनुभव मुझे हुए और मेरे लिए ये हाशिमपुरा एक कर्ज की तरह मेरे सर पर लदा था, मैं अब उसे उतार रहा हूँ, और पेंग्विन ने मुझसे अनुबंध किया है. मैं इस समय उसी पर काम कर रहा हूँ, मुझे लगता हैं कि अगले चार छह महीने में ये काम खत्म हो जाएगा. उन्होंने दोनों भाषाओं, हिंदी और अंग्रेजी में छापने का अनुबंध किया है.

आपके पसंदीदा रचनाकार कौन हैं? क्या आप गाते-गुनगुनाते भी हैं... अकेले में या कभी-कभी?

-मेरी दिलचस्पी का क्षेत्र फिक्शन है, कथा साहित्य है. कविता होता तो एक गुनगुनाने वाली बात जरुर आती, लेकिन जाहिर है कि कथा साहित्य को आप गुनगुना तो नहीं सकते लेकिन आप बार-बार, आप कुछ रचनाओं को पढ़ते हैं. मारखेज मेरे सबसे प्रिय लेखक हैं. मारखेज को मैं बार-बार पढ़ता हूँ, प्रेमचंद को मैं बार-बार पढ़ता हूँ, बावजूद इसके कि कई लोगो को लग सकता है कि हमारे समय की जो भाषा है, हमारे समय का जो शिल्प है, प्रेमचंद उस अर्थ में पुराने पर गए हैं. लेकिन मुझे तो लगातार वो नए लगते हैं, जब-जब मैं पढ़ता हूँ. कवियों में भी मेरी एक खास तरह की दिलचस्पी है. निरंतरता हिंदी कविता में जो है, उसमें कबीर से शुरू होती है, वो धूमिल, मुक्तिबोध, नागार्जुन, त्रिलोचन से होती हुई गोरख पाण्डेय या आज के नए कवियों में दिनेश कुमार शुक्ल, इन सब तक आती है, तो इन सबको मैं जब समय मिलता है, तो पढ़ता हूँ, और इनमें से बहुत सारे लोगों को गुनगुनाता भी हूँ. ये सही हैं कि अच्छी कविता, अच्छा शेर अगर कहीं सुन लें तो आप उसे दोहराते हैं. लेकिन मुख्य रूप से मैं गद्य का आदमी हूँ, तो उस अर्थ में तो गुनगुनाना नहीं कहा जा सकता,

-आखिरी सवाल हैं, आपको गुस्सा ज्यादा आता हैं क्या? या कब आता हैं?

-मैं 35 साल पुलिस में रहा, एक खास तरह की जिंदगी जीने की आदत पड़ी. जिसमें खास तौर से अनुशासनहीनता मैं कहीं देखता हूँ तो झुंझलाहट होती हैं, और अपने को कई बार काबू में नहीं रख पाता हूँ. लेकिन मेरे साथ एक अच्छी स्थिति ये भी है कि मैं बहुत जल्दी ये महसूस कर लेता हूँ कि मैं जिस तरह से रिएक्ट कर रहा हूँ वो उचित नहीं है, तो मैं जल्दी अपने ऊपर नियंत्रण भी कर लेता हूँ.

शुक्रिया आपने बात की, यहाँ पर आने का मौका मिला हमलोगों को. धन्यवाद.

आप लोगों को भी धन्यवाद .


हाशिमपुरा - उत्तर प्रदेश पुलिस के इतिहास का एक काला अध्याय[संपादित करें]

जीवन के कुछ अनुभव ऐसे होतें हैं जो जिन्दगी भर आपका पीछा नहीं छोडतें . एक दु:स्वप्न की तरह वे हमेशा आपके साथ चलतें हैं और कई बार तो कर्ज की तरह आपके सर पर सवार रहतें हैं. हाशिमपुरा भी मेरे लिये कुछ ऐसा ही अनुभव है. 22/23 मई सन 1987 की आधी रात दिल्ली गाजियाबाद सीमा पर मकनपुर गाँव से गुजरने वाली नहर की पटरी और किनारे उगे सरकण्डों के बीच टार्च की कमजोर रोशनी में खून से लथपथ धरती पर मृतकों के बीच किसी जीवित को तलाशना- सब कुछ मेरे स्मृति पटल पर किसी हॉरर फिल्म की तरह अंकित है. उस रात द्स-साढे दस बजे हापुड से वापस लौटा था. साथ जिला मजिस्ट्रेट नसीम जैदी थे जिन्हें उनके बँगले पर उतारता हुआ मैं पुलिस अधीक्षक निवास पर पहुँचा. निवास के गेट पर जैसे ही कार की हेडलाइट्स पडी मुझे घबराया हुआ और उडी रंगत वाला चेहरा लिये सब इंसपेक्टर वी•बी•सिंह दिखायी दिया जो उस समय लिंक रोड थाने का इंचार्ज था. मेरा अनुभव बता रहा था कि उसके इलाके में कुछ गंभीर घटा है. मैंने ड्राइवर को कार रोकने का इशारा किया और नीचे उतर गया. वी•बी•सिंह इतना घबराया हुआ था कि उसके लिये सुसंगत तरीके से कुछ भी बता पाना संभव नहीं लग रहा था. हकलाते हुये और असंबद्ध टुकडों में उसने जो कुछ मुझे बताया वह स्तब्ध कर देने के लिये काफी था. मेरी समझ में आ गया कि उसके थाना क्षेत्र में कहीं नहर के किनारे पी•ए•सी• ने कुछ मुसलमानों को मार दिया है. क्यों मारा? कितने लोगों को मारा ? कहाँ से लाकर मारा ? स्पष्ट नहीं था. कई बार उसे अपने तथ्यों को दुहराने के लिये कह कर मैंने पूरे घटनाक्रम को टुकडे-टुकडे जोडते हुये एक नैरेटिव तैयार करने की कोशिश की. जो चित्र बना उसके अनुसार वी•बी•सिंह थाने में अपने कार्यालय में बैठा हुआ था कि लगभग 9 बजे उसे मकनपुर की तरफ से फायरिंग की आवाज सुनायी दी. उसे और थाने में मौजूद दूसरे पुलिस कर्मियों को लगा कि गाँव में डकैती पड रही है. आज तो मकनपुर गाँव का नाम सिर्फ रेवेन्यू रिकार्ड्स में है . आज गगनचुम्बी आवासीय इमारतों, मॉल और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों वाले मकनपुर में 1987 में दूर-दूर तक बंजर जमीन पसरी हुयी थी. इसी बंजर जमीन के बीच की एक चक रोड पर वी•बी•सिंह की मोटर सायकिल दौडी. उसके पीछे थाने का एक दारोगा और एक अन्य सिपाही बैठे थे. वे चक रोड पर सौ गज भी नहीं पहुँचे थे कि सामने से तेज रफ्तार से एक ट्रक आता हुआ दिखायी दिया. अगर उन्होंने समय रहते हुये अपनी मोटर सायकिल चक रोड से नीचे न उतार दी होती तो ट्रक उन्हें कुचल देता. अपना संतुलन संभालते-संभालते जितना कुछ उन्होंने देखा उसके अनुसार ट्रक पीले रंग का था और उस पर पीछे 41 लिखा हुआ था, पिछली सीटों पर खाकी कपडे पहने कुछ लोग बैठे हुये दिखे.किसी पुलिस कर्मी के लिये यह समझना मुश्किल नहीं था कि पी•ए•सी• की 41 वीं बटालियन का ट्रक कुछ पी•ए•सी• कर्मियों को लेकर गुजरा था. पर इससे गुत्थी और उलझ गयी. इस समय मकनपुर गाँव में पी•ए•सी• का ट्रक क्यों आ रहा था ? गोलियों की आवाज के पीछे क्या रहस्य था ? वी•बी•सिंह ने मोटर सायकिल वापस चक रोड पर डाली और गाँव की तरफ बढा. मुश्किल से एक किलोमीटर दूर जो नजारा उसने और उसके साथियों ने देखा वह रोंगटे खडा कर देने वाला था मकनपुर गाँव की आबादी से पहले चक रोड एक नहर को काटती थी. नहर आगे जाकर दिल्ली की सीमा में प्रवेश कर जाती थी. जहाँ चक रोड और नहर एक दूसरे को काटते थे वहाँ पुलिया थी. पुलिया पर पहुँचते- पहुँचते वी•बी•सिंह के मोटर सायकिल की हेडलाइट जब नहर के किनारे उस सरकंडे की झाडियों पर पडी तो उन्हें गोलियों की आवाज का रहस्य समझ में आया. चारों तरफ खून के धब्बे बिखरे पडे थे. नहर की पटरी, झाडियों और पानी के अन्दर ताजा जख्मों वाले शव पडे थे. वी•बी•सिंह और उसके साथियों ने घटनास्थल का मुलाहिजा कर अन्दाज लगाने की कोशिश की कि वहाँ क्या हुआ होगा ? उनकी समझ में सिर्फ इतना आया कि वहाँ पडे शवों और रास्ते में दिखे पी•ए•सी• की ट्रक में कोई संबन्ध जरूर है. साथ के सिपाही को घटनास्थल पर निगरानी के लिये छोडते हुये वी•बी•सिंह अपने साथी दारोगा के साथ वापस मुख्य सडक की तरफ लौटा. थाने से थोडी गाजियाबाद-दिल्ली मार्ग पर पी•ए•सी• की 41वीं बटालियन का मुख्यालय था. दोनो सीधे वहीं पहुँचे. बटालियन का मुख्य द्वार बंद था .काफी देर बहस करने के बावजूद भी संतरी ने उन्हें अंदर जाने की इजाजत नहीं दी. तब वी•बी•सिंह ने जिला मुख्यालय आकर मुझे बताने का फैसला किया.जितना कुछ आगे टुकडों टुकडों में बयान किये गये वृतांत से मैं समझ सका उससे स्पष्ट हो ही गया था कि जो घटा है वह बहुत ही भयानक है और दूसरे दिन गाजियाबाद जल सकता था. पिछले कई हफ्तों से बगल के जिले मेरठ में सांप्रादायिक दंगे चल रहे थे और उसकी लपटें गाजियाबाद पहुँच रहीं थीं.मैंने सबसे पहले जिला मजिस्ट्रेट नसीम जैदी को फोन किया. वे सोने ही जा रहे थे. उन्हें जगने के लिये कह कर मैंने जिला मुख्यालय पर मौजूद अपने एडिशनल एस•पी•, कुछ डिप्टी व्स•पी• और मजिस्ट्रेटों को जगाया और तैयार होने के लिये कहा. अगले चाली-पैंतालीस मिनटों में सात-आठ वाहनों में लदे-फंदे हम मकनपुर गाँव की तरफ लपके. नहर की पुलिया से थोडा पहले हमारी गाडियाँ खडीं हो गयीं. नहर के दूसरी तरफ थोडी दूर पर ही मकनपुर गाँव की आबादी थी लेकिन तब तक कोई गाँव वाला वहाँ नहीं पहुँचा था. लगता था कि दहशत ने उन्हें घरों में दुबकने को मजबूर कर दिया था. थाना लिंक रोड के कुछ पुलिस कर्मी जरूर वहाँ पहुँच गये थे. उनकी टार्चों की रोशनी के कमजोर वृत्त नहर के किनारे उगी घनी झाडियों पर पड रहे थे पर उअनसे साफ देख पाना मुश्किल था. मैंने गाडियों के ड्राइवरों से नहर की तरफ रुख करके अपने हेडलाइट्स ऑन करने के लिये कहा. लगभग सौ गज चौडा इलाका प्रकाश से नहा उठा. उस रोशनी में मैंने जो कुछ देखा वह वही दु;स्वप्न था जिसका जिक्र मैंने शुरु में किया है. गाडियों की हेडलाइट्स की रोशनियाँ झाडियों से टकरा कर टूट टूट जा रहीं थीं इसलिये टार्चोंं का भी इस्तेमाल करना पड रहा था. झाडियों और नहरों के किनारे खून के थक्के अभी पूरी तरह से जमे नहीं थे , उनमें से खून रिस रहा था. पटरी पर बेतरतीबी से शव पडे थे- कुछ पूरे झाडियों में फंसे तो कुछ आधे तिहाई पानी में डूबे. शवों की गिनती करने या निकालने से ज्यादा जरूरी मुझे इस बात की पडताल करना लगा कि उनमें से कोई जीवित तो नहीं है. सबने अलग-अलग दिशाओं में टार्चों की रोशनियाँ फेंक फेंक कर अन्दाज लगाने की कोशिश की कि कोई जीवित है या नहीं. बीच बीच में हम हांक भी लगाते रहे कि यदि कोई जीवित हो तो उत्तर दे. हम दुश्मन नहीं दोस्त हैं. उसे अस्पताल ले जायेंगे. पर कोई जवाब नहीं मिला. निराश होकर हममें से कुछ पुलिया पर बैठ गये.मैंने और जिलाधिकारी ने तय किया कि समय खोने से कोई लाभ नहीं है. हमें दूसरे दिन की रणनीति बनानी थी इसलिये जूनियर अधिकारियों को शवों को निकालने और जरूरी लिखा-पढी करने के लिये कह कर हम लिंक रोड थाने के लिये मुडे ही थे कि नहर की तरफ से खाँसने की आवाज सुनायी दी. सभी ठिठक कर रुक गये. मैं वापस नहर की तरफ लपका. फिर मौन छा गया. स्पष्ट था कि कोई जीवित था लेकिन उसे यकीन नहीं था कि जो लोग उसे तलाश रहें हैं वे मित्र हैं. हमने फिर आवाजें लगानी शुरू कीं, टार्च की रोशनी अलग-अलग शरीरों पर डालीं और अंत में हरकत करते हुये एक शरेर पर हमारी नजरें टिक गयीं. कोई दोनो हाथों से झाडियाँ पकडे आधा शरीर नहर में डुबोये इस तरह पडा था कि बिना ध्यान से देखे यह अन्दाज लगाना मुश्किल था कि वह जीवित है या मृत ! दहशत से बुरी तरह वह काँप रहा और काफी देर तक आश्वस्त करने के बाद यह विश्वास करने वाला कि हम उसे मारने नहीं बचाने वालें हैं, जो व्यक्ति अगले कुछ घंटे हमे इस लोमहर्षक घटना की जानकारी देने वाला था, उसका नाम बाबूदीन था.गोली उसे छूते हुये निकल गयी थी.भय से वह नि;श्चेष्ट होकर वह झाडियों में गिरा तो भाग दौड में उसके हत्यारों को यह जाँचने का मौका नहीं मिला कि वह जीवित है या मर गया. दम साधे वह आधा झाडियों और आधा पानी में पडा रहा और इस तरह मौत के मुँह से वापस लौट आया. उसे कोई खास चोट नहीं आयी थी और नहर से चलकर वह गाडियों तक आया. बीच में पुलिया पर बैठकर थोडी देर सुस्ताया भी. लगभग 21 वर्षों बाद जब हाशिमपुर पर एक किताब लिखने के लिये सामग्री इकट्ठी करते समय मेरी उससे मुलाकात हुयी जहाँ पी•ए•सी• उसे उठा कर ले गयी थी तो उसे याद था कि पुलिया पर बैठे उसे किसी सिपाही से माँग कर बीडी दी थी. बाबूदीन ने जो बताया उसके अनुसार उस दिन अपरान्ह तलाशियों के दौरान पी•ए•सी• के एक ट्रक पर बैठाकर चालीस पचास लोगों को ले जाया गया तो उन्होंने समझा कि उन्हें गिरफ्तार कर किसी थाने या जेल ले जाया जा रहा है. मकनपुर पहुँचने के लगभग पौन घण्टा पहले एक नहर पर ट्रक को मुख्य सडक से उतारकर नहर की पटरी पर कुछ दूर ले जाकर रोक दिया गया. पी•ए•सी• के जवान कूद कर नीचे उतर गये और उन्होंने ट्रक पर सवार लोगों को नीचे उतरने का आदेश दिया. अभी आधे लोग ही उतरे थे कि पी•ए•सी• वालों ने उनपर फायर करना शुरु कर दिया. गोलियाँ चलते ही ऊपर वाले गाडी में ही दुबक गये. बाबू दीन भी उनमें से एक था.बाहर उतरे लोगों का क्या हुआ वह सिर्फ अनुमान ही लगा सकता था. शायद फायरिंग की आवाज आस पास के गाँवों में पहुँची जिसके कारण आस पास से शोर सुनायी देने लगा और पी•ए•सी• वाले वापस ट्रक में चढ गये. ट्रक तेजी से बैक हुआ और वापस गाजियाबाद की तरफ भागा. यहाँ वह मकनपुर वाली नहर पर आया और एक बार फिर सबसे उतरने के लिये कहा गया. इस बार डर कर ऊपर दुबके लोगों ने उतरने से इंकार कर दिया तो उन्हें खींच खींच कर नीचे घसीटा गया. जो नीचे आ गये उन्हें पहले की तरह गोली मारकर नहर में फेंक दिया गया और जो डर कर ऊपर दुबके रहे उन्हें ऊपर ही गोली मारकर नीचे ढकेला गया. बाबूदीन जब यह विवरण बता रहा था तो हमने पहले घटनास्थल का अन्दाज लगाने की कोशिश की . किसी ने सुझाव दिया कि पहला घटनास्थल मेरठ से गाजियाबाद आते समय रास्ते में मुरादनगर थाने में पडने वाली नहर हो सकती है. मैंने लिंक रोड थाने के वायरलेस सेट से मुरादनगर थाने को कॉल किया तो स्पष्ट हुआ कि हमारा सोचना सही था. कुछ देर पहले ही मुरादनगर थाने को भी ऐसी ही स्थिति से गुजरना पडा था . वहाँ भी कई मृत शव नहर में पडे मिले थे और कुछ लोग जीवित थाने लाये गये थे. इसके बाद की कथा एक लंबा और यातनादायक प्रतीक्षा का वृतांत है जिसमें भारतीय राज्य और अल्पसंख्यकों के रिश्ते, पुलिस का गैर पेशेवराना रवैया और घिसट घिसट कर चलने वाली उबाऊ न्यायिक प्रणाली जैसे मुद्दे जुडे हुयें हैं. मैंने 22 मई 1987 को जो मुकदमें गाजियाबाद के थाना लिंक रोड और मुरादनगर पर दर्ज कराये थे वे पिछले 21 वर्षों से विभिन्न बाधाओं से टकराते हुये अभी भी अदालत में चल रहें हैं और अपनी तार्किक परिणति की प्रतीक्षा कर रहें हैं


श्री विभूति नारायण राय


“शहर में कर्फ्यू” के संदर्भ में[संपादित करें]

लेखक की ओर से

“शहर में कर्फ्यू” लिखना मेर लिए एक त्रासदी से गुजरने जैसा था। उन दिनों मैं इलाहाबाद में नियुक्त था और शहर का पुराना हिस्सा दंगों की चपेट में था। हर दूसरे तीसरे साल होने वाले दंगों से यह दंगा मेरे लिए कुछ भिन्न था। इस बार हिंसा और दरिंदगी अखबारी पन्नों से से निकलकर मेरे अनुभव संसार का हिस्सा बनने जा रही थीं- एक ऐसा अनुभव जो अगले कई सालों तक दुःस्वप्न की तरह मेरा पीछा नहीं छोड़ने वाला था। मुझे लगा कि इस दुःस्वप्न से मुक्ति का सिर्फ एक ही उपाय है इन अनुभवों को लिख डाला जाए। लिखते समय लगातार मुझे लगता रहा है कि भाषा मेरा साथ बीच-बीच में छोड़ देती थी। अंग्रेजी की एक पुरानी कहावत है ‘लैंग्वेज इज अ पूअर सब्स्टीट्यूट फॉर थाट’। इस उपन्यास को लिखते समय यह बात बड़ी शिद्दत से याद आई। दंगों में मानवीय त्रासदी के जितने शेड्स जितने संघनित रूप मेरे अनुभव संसार में जुड़े उन सबको लिख पाना न संभव था और न ही इस छोटे से उपन्यास को खत्म करने के बाद मुझे लगा कि मैं उस तरह से लिख पाया जिस तरह से उपन्यास के पात्रों और घटनाओं से मेरा साक्षात हुआ था। यह एक स्वीकारोक्ति है और मुझे इस पर कोई शर्म नहीं महसूस हो रही है।

“शहर में कर्फ्यू” को प्रकाशन के बाद मिश्रित प्रतिक्रियाएँ मिलीं। एक छोटे से साहित्यिक समाज ने इसे साहित्यिक गुण-दोष के आधार पर पसंद या नापसंद किया पर पाठकों के एक वर्ग ने धर्म की कसौटी पर इसे कसने का प्रयास किया। हिंदुत्व के पुरोधाओं ने इसे हिंदू विरोधी और पूर्वाग्रह ग्रस्त उपन्यास घोषित कर इस पर रोक लगाने की माँग की और कई स्थानों पर उपन्यास की प्रतियाँ जलाईं। इसके विपरीत उर्दू के पचास से अधिक अखबारों और पत्रिकाओं ने “शहर में कर्फ्यू” के उर्दू अनुवाद को समग्र या आंशिक रूप में छापा। पाकिस्तान की “इतरका” और “आज” जैसी प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिकाओं ने भी पूरा उपन्यास अपने अंकों में छापा। उर्दू पत्र पत्रिकाओं ( यदि अन्यथा न लिया जाए तो मुसलमानों) की प्रतिक्रियाएँ कुछ-कुछ ऐसी थीं गोया एक हिंदू ने भारत के मुसलमानों पर होने वाले अत्याचारों का पर्दाफाश किया है। बुरी तरह से विभक्त भारतीय समाज में यह कोई बहुत अस्वाभाविक भी नहीं था। पर इन दोनों एक दूसरे से इतनी भिन्न प्रतिक्रियाओं ने मेरे मन में भारतीय समाज के इस विभाजन के कारणों को समझने के लिए तीव्र उत्सुकता पैदा की। संयोग से भारतीय पुलिस अकादमी की एक फेलोशिप मुझे मिल गई जिसके अंतर्गत मैंने 1994-95 के दौरान इस विषय पर काम किया और इस अकादमिक अध्ययन के दौरान भारतीय समाज की कुछ दिलचस्प जटिलताओं को समझने का मौका मुझे मिला।

भारत में सांप्रदायिक दंगों को लेकर देश के दो प्रमुख समुदायों- हिंदुओं और मुसलमानों के अपने-अपने पूर्वाग्रह हैं। एक औसत हिंदू दंगों के संबंध में मानकर चलता है कि दंगे मुसलमान शुरू करते है और दंगों में हिंदू अधिक संख्या में मारे जाते है। हिंदू इसलिए अधिक मारे जाते हैं क्यों कि उसके अनुसार मुसलमान स्वभाव से क्रूर, हिंसक और धर्मोन्मादी होते हैं। इसके विपरीत, वह मानता है कि हिंदू धर्मभीरु, उदार और सहिष्णु होते हैं।

दंगा कौन शुरू करता है, इस पर बहस हो सकती है पर दंगों में मरता कौन है इस पर सरकारी और गैरसरकारी आँकड़े इतनी प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं कि बिना किसी संशय के निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। उपलब्ध आँकड़ों के अनुसार स्वतंत्रता के बाद दंगों में मरने वालों में 70 % से भी अधिक मुसलमान हैं। राँची-हटिया (1967), अहमदाबाद (1969), भिवंडी (1970), जलगाँव (1970) और मुंबई (1992-93) या रामजन्मभूमि बाबरी मस्जिद विवाद के सिलसिले में हुए दंगों में तो यह संख्या- 90 % के भी ऊपर चली गई है। यही स्थिति संपत्ति के मामलों में भी है। दंगों में न सिर्फ मुसलमान अधिक मारे गए बल्कि उन्हीं की संपत्ति का अधिक नुकसान भी हुआ। दंगों मे नुकसान उठाने के बावजूद जब राज्य मशीनरी की कार्यवाही झेलने की बारी आई तब वहाँ भी मुसलमान जबर्दस्त घाटे की स्थिति में दिखाई देता है। दंगों में पुलिस का कहर भी उन्हीं पर टूटता है। उन दंगों में भी जिनमें मुसलमान 70-80 प्रतिशत से अधिक मरे थे पुलिस ने जिन लोगों को गिरफ्तार किया उनमें 70-80 प्रतिशत से अधिक मुसलमान थे, उन्हीं के घरों की तलाशियाँ ली गईं, उन्हीं की औरतें बेइज्जत हुईं और उन्हीं के मोहल्लों में सख्ती के साथ कर्फ्यू लगाया गया।

इस विचित्र स्थिति के कारणों की तलाश बहुत मुश्किल नहीं है। यह धारणा कि हिंदू स्व्भाव से ही अधिक उदार और सहिष्णु होता है, हिंदू मन में इतने गहरे पैठी हुई है कि ऊपर वर्णित आँकड़े भी औसत हिंदू को यह स्वीकार करने से रोकते हैं कि दंगों में हिंदुओं की कोई आक्रामक भूमिका भी हो सकती है। बचपन से ही उसने सीखा है कि मुसलमान आनुवांशिक रूप से क्रूर होता है और किसी की जान लेने में उसे कोई देर नहीं लगती जबकि इसके उलट हिंदू बहुत ही उदार हृदय होता है और चींटी तक को आटा खिलाता है। अक्सर ऐसे हिंदू आपको मिलेंगे जो कहेंगे “अरे साहब हिंदू के घर में तो आप सब्जी काटने वाले छुरे के अतिरिक्त और कोई हथियार नहीं पाएंगे।” इस वाक्य का निहितार्थ होता है कि मुसलमानों के घरों में तो हथियारों के जखीरे भरे रहते हैं। इसलिए एक औसत हिंदू के लिए सरकारी आँकड़ों को मानना भी आसान नहीं होता। वह सरकारी आँकड़ों की सत्यता पर सवालिया निशान उठाता है बावजूद इस तथ्य के कि दुनिया की कोई भी सरकार ऐसे आँकड़े जगजाहिर नहीं करेगी जिनसे यह साबित होता हो कि उसके यहाँ अल्पसंख्यकों का जान-माल सु‍रक्षित नहीं है।

अब हम आएं दूसरे पूर्वाग्रह पर कि दंगा शुरू कौन करता है? हिंदुओं की बहुसंख्या यह मानती है कि दंगे आमतौर पर मुसलमानों द्वारा शुरू किए जाते हैं। एक हिंदू नौकरशाह, शिक्षाशास्त्री, पत्रकार, न्यायविद या पुलिसकर्मी के मन में इसे लेकर कोई शंका नहीं होती है कि दंगा शुरू कौन करता है? मुसलमान चूँकि स्वभाव से ही हिंसक होता है इसलिए यह बहुत स्वाभाविक है कि दंगा वही शुरू करता है। इस तथ्य का भी उल्लेख होता है कि दंगे उन्हीं इलाकों में होते हैं जहाँ मुसलमान बहुसंख्या में होते है।

अपनी फेलोशिप के दौरान मैंने “दंगा कौन शुरू कराता है” के पहले “दंगे में मरता कौन है” की पड़ताल की। एक हिंदू के रूप में मुझे बहुत ही तकलीफदेह तथ्यों से होकर गुजरना पड़ा। मेरा हिंदू मन यह मानता था कि दंगों में उदार, सहिष्णु और अहिंसक हिंदुओं का नुकसान क्रूर और हिंसक मुसलमानों के मुकाबले अधिक होता होगा। मैं यह जानकर चकित रह गया कि 1960 के बाद के एक भी दंगे में ऐसा नहीं हुआ कि मरने वालों में 70-80 प्रतिशत से कम मुसलमान रहे हों। उनकी संपत्ति का भी इस अनुपात में नुकसान हुआ; और यह तथ्य कोई रहस्य भी नहीं है। खासतौर से मुसलमानों और उर्दू प्रेस को पता ही है कि जब भी दंगा होगा वे ही मारे जाएँगे। पुलिस उन्हें गिरफ्तार करेगी, उन्हीं के घरों की तलाशियाँ ली जाएँगी। गरज यह है कि दंगे का पूरा कहर उन्हीं पर टूटेगा। फिर क्यों वे दंगा शुरू करना चाहेंगे? इसके दो ही कारण हो सकते हैं कि या तो एक समुदाय के रूप में वे मूर्ख हैं या उन्होंने सामूहिक रूप से आत्महत्या का इरादा कर रखा है।

आमतौर से दंगा कौन शुरू करता है का फैसला इस बात से किया जाता है कि उत्तेजना के क्षण में पहला पत्थर किसने फेंका। यह फैसला गलत हो सकता है। जिन्होंने सांप्रदायिक दंगों का निकट से और समाजशास्त्रीय औजारों से अध्ययन किया है वे जानते है कि हर फेंका हुआ पत्थर दंगा शुरू करने में समर्थ नहीं होता। दरअसल सांप्रदायिक हिंसा भड़कने के लिए जरूरी तनाव की निर्मिति एक पिरामिड की शक्ल में होती है। वास्तविक दंगे शुरू होने के काफी पहले से, कई बार तो महीनों पहले से अफवाहों, आरोपों और नकारात्मक प्रचार की चक्की चलाई जाती है। तनाव धीरे-धीरे बढ़ता है और अंततः एक ऐसा प्रस्थान बिंदु आ जाता है जब सिर्फ एक पत्थर या एक उत्तेजक नारा दंगा शुरू कराने में समर्थ हो जाता है। इस प्रस्थान बिंदु पर इस बात का कोई अर्थ नहीं रह जाता कि पहला पत्थर किसने फेंका!

दंगो की शुरूआत के मिथ को बेहतर समझने के लिए एक उदाहरण काफी होगा। भिवंडी में 1970 में भीषण दंगे हुए। 7 मई को दंगा तब शुरू हुआ जब शिवाजी की जयंती पर निकलने वाले जुलूस पर मुसलमानों द्वारा पथराव किया गया। पहली नजर में दंगे की शुरूआत का कारण बड़ा स्पष्ट नजर आता है। आसानी से कहा जा सकता है कि मुसलमानों ने दंगे शुरू किए। लेकिन यदि घटनाओं की तह में जाएँ तो साफ हो जाएगा कि मामला इतना आसान नहीं हैं। 7 मई 1970 से पहले भिवंडी में इतना कुछ घटा था कि जब पहला पत्थर फेंका गया तब माहौल इतना गर्म था कि एक ही पत्थर बड़े दंगे की शुरूआत के लिए काफी था। पिछले कई महीनों से हिंदुत्ववादी शक्तियाँ भड़काऊ और उकसाने वाली कार्यवाहियों में लिप्त थीं। जस्टिस मदान कमीशन ने विस्तार से इन गतिविधियों को रेखांकित किया है। जुलूस के मार्ग पर भी दोनों पक्षों में विवाद हुआ। मुसलमान चाहते थे कि जुलूस उस रास्ते से न ले जाएा जाए जहाँ उनकी मस्जिदें पड़ती थीं। हिंदू उसी रास्ते से जुलूस निकालने पर अड़े रहे। जब जुलूस मस्जिदों के बगल से गुजरा तो उसमें शरीक लोगों ने न सिर्फ भड़काऊ नारे लगाए और मस्जिद की दीवारों पर गुलाल फेंका बल्कि जुलूस को थोड़ी देर के लिए वहीं पर रोक दिया। इसी बीच मुसलमानों की तरफ से पथराव शुरू हो गया और दंगा शुरू हो गया। दंगे की शुरूआत का फैसला करते समय हमें पथराव के पहले के घटनाक्रम को भी ध्यान में रखना होगा।

बहस के लिए हम पहले पत्थर फेंके जाने के पीछे के घटनाक्रम को भुला भी दें तब भी हमें उस मुस्लिम मानसिकता को ध्यान में रखना ही पड़ेगा जिसके तहत पहला पत्थर फेंका जाता है। सबसे पहले इस तथ्य को ध्यान में रखना होगा कि मुसलमान जानते हैं कि अगर दंगा होगा तो वे ही पिटेंगे। फिर क्यों बार-बार वे पहला पत्थर फेंकते हैं? कहीं ऐसा तो नहीं है कि पहला पत्थर एक ऐसे डरे हुए समुदाय की प्रतिक्रिया है जिसे लगातार अपनी पहचान और अस्तित्व संकट में नजर आता है। गरीबी, शिक्षा का अभाव और मुसलमानों का अवसरवादी नेतृत्व भी इस डर को मजबूत बनाता है। सरकारी नौकरी में भर्ती के समय किया जाने वाला भेदभाव और हर दंगे में उनकी सुरक्षा में राज्य की विफलता से भारतीय राज्य में उनकी हिस्सेदारी नहीं बन पा रही है। बहुत सारे कारण है, स्थानाभाव के कारण जिन पर यहाँ विस्तृत चर्चा संभव नहीं है, जो एक समुदाय को निरंतर भय और असुरक्षा के माहौल में जीने के लिए मजबूर रखते हैं और अक्सर उन्हें पहला पत्थर फेंकने पर मजबूर करते है।

ऊपर मैंने जानबूझकर बहुसंख्यक समुदाय के मनोविज्ञान की बात की है क्योंकि मेरा मानना है कि बिना इसे बदले हम देश में सांप्रदायिक दंगे नहीं रोक सकते। बहुसंख्यक समुदाय के समझदार लोगों को यह मानना ही पड़ेगा कि उनकी धार्मिक बर्बरता के शिकार अल्पसंख्यक समुदायों के लोग ही रहे हैं और इस देश की धरती तथा संसाधनों पर जितना उनका अधिकार है उतना ही अल्पसंख्यक समुदायों का भी है। इसके साथ ही हमें यह भी मानना होगा कि सांप्रदायिक दंगों के दौरान पुलिस और फौज का काम देश के सभी नागरिकों की हिफाजत करना है, हिंदुत्व के औजार की तरह काम करना नहीं।

मुझे लगता है दंगों के साथ-साथ भारतीय मुसलमानों को भी दूसरे बड़े मुद्दों पर भी सोचना होगा। सबसे पहले तो यह मानना होगा कि दो राष्ट्रों के सिद्धांत के आधार पर हुआ देश का विभाजन सर्वथा गलत था। न तो धर्म के आधार पर राष्ट्रों का निर्माण हो सका है और न ही हिंदू और मुसलमान दो अलग राष्ट्र हैं। भारत के हिंदू और मुसलमान जिनकी समान सामाजिक, आर्थिक, भाषिक पृष्ठभूमि है, एक दूसरे के ज्यादा करीब हैं बनिस्बत उन लोगों के जिनका सिर्फ धर्म समान है पर संस्कृतियाँ भिन्न हैं।

इस सवाल में उलझने का अब समय नहीं है कि देश का विभाजन किसने कराया। विभाजन एक बड़ी गलती थी और उसका बहुत बड़ा खामियाजा हमने भुगता है। समय आ गया है जब इस उपमहाद्वीप के लोग बैठें और इससे जुड़े प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करें।

इसी के साथ-साथ मुसलमानों को उस मनोविज्ञान का भी संज्ञान लेना होगा जिसके तहत निजामें- मुस्तफा या शरिया आधारित समाज व्यवस्था की चर्चा बनी रहती है। धर्म निरपेक्षता एक विश्वास की तरह स्वीकार की जानी चाहिए। किसी फौरी नीति की तरह नहीं। लोकतंत्र में धर्मनिरपेक्षता की लड़ाई खानों में बँटकर नहीं बल्कि मिलकर लड़ी जा सकती है।

- विभूति नारायण राय इलाहाबाद 15 अगस्त, 2002

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