वार्षिकी (वित्त)

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वित्त सिद्धांत में वार्षिकी (annuity) का मतलब ऐसे भुगतान से है जो एकसमान मात्रा में निश्चित अन्तराल पर एक निश्चित अवधि तक किया जाता है।

उदाहरण के लिये बचत खाता में नियमित अन्तराल पर कोई निश्चित राशि जमा करना; घर की खरीदी पर मासिक किस्त की अदायगी; मासिक बीमा प्रिमियम जमा करना आदि। वार्षिकी (एनुइटी) का भुगतान साप्ताहिक, मासिक, त्रिमासिक, वार्षिक या किसी अन्य अन्तराल पर किया जाता है।

अनुक्रम

साधारण वार्षिकी [संपादित करें]

साधारण वार्षिकी उसको कहते हैं जो आवर्तकाल की समाप्ति पर किया जाता है (जैसे महीने या वर्ष) । साधारण वाषिकी के राशि की गणना निम्नलिखित प्रकार से की जा सकती है-

माना:

r = वार्षिक ब्याज की दर
t = वर्षों की संख्या
m = प्रत्त्येक वर्ष में आवर्तकालों (periods) की संख्या
i = प्रति आवर्तकाल ब्याज दर
n = आवर्तकालों की कुल संख्या

टिप्पणी:

 i = \frac{r}{m}
 n = t\cdot m

तथा,

P = मूलधन (या वर्तमान मूल्य) (the principal (or present value))
S = वार्षिकी का भविष्य में मूल्य (the future value of an annuity.)
R = आवर्ती भुगतान (the amortized payment).
S \,=\,R\left[\frac{\left(1+i\right)^n-1}{i}\right] \,=\,R\cdot s_{\overline{n}|i} (annuity notation)

तथा:

P \,=\,R\left[\frac{1-\left(1+i\right)^{-n}}{i}\right] = R\cdot a_{\overline{n}|i}

Clearly, in the limit as n increases,

\lim_{n\,\rightarrow\,\infty}\,P\,=\,\frac{R}{i}

इससे स्प्ष्त है कि सीमित राशि के अनन्त भुगतानों का भी वर्तमान मूल्य सीमित (अनन्त नहीं) ही होगा।

उपपत्ति [संपादित करें]

अगला भुगतान, जो एक आवर्तकाल बाद होना है, इसका वर्तमान मूल्य होगा-

P = \frac{R}{1+i} + \frac{R}{(1+i)^2} + \cdots + \frac{R}{(1+i)^n} = \frac{R}{1+i} \left( 1 + \frac{1}{1+i} + \frac{1}{(1+i)^2} + \cdots + \frac{1}{(1+i)^{n-1}}\right).

यहाँ दूसरा गुणक (factor) गुणोत्तर श्रेणी में है जिसक सर्वनिष्ठ अनुपात \frac{1}{1+i} है। इसलिये

P = \frac{R}{1+i} \cdot \frac{1 - \frac{1}{(1+i)^n}}{1-\frac{1}{1+i}}.

अन्ततः, कुछ सरलीकरण के पश्चात निम्नलिखित प्राप्त होता है-

 P = \frac{R}{i} \left(1 - \frac{1}{(1+i)^n} \right) = \frac{Rm}{r} \left(1 - \frac{1}{(1+\frac{r}{m})^{(tm)}} \right).

इसी तरह से हम भविष्य मूल्य का व्यंजक भी निकाल सकते हैं। अन्तिम भुगतान पर कोई ब्याज नहीं लगेगा जबकि प्रथम बर्ष के अन्त में दिये गये भुगतान के लिये कुल (n−1) वर्षों का ब्याज लगेगा। इस प्रकार,

S = R + R(1+i) + R(1+i)^2 + \cdots + R(1+i)^{n-1} = R \left(1 + (1+i) + (1+i)^2 + \cdots + (1+i)^{n-1}\right).

अतः

S = R  \frac{(1+i)^n-1}{i} .

अतिरिक्त सूत्र [संपादित करें]

यदि किसी P राशि ऋण के रूप में ली गयी है और उसे ब्याज सहित वार्षिकी के रूप में चुकता करना है तो n भुगतानों के बाद शेष ऋण का मान

\frac{R}{i}- \left( 1+i \right) ^n \left( \frac{R}{i} - P \right) होगा।

बाहरी कड़ियाँ [संपादित करें]