वर्धा शिक्षा योजना

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महात्मा गांधी की भारत को जो देन है उसमें बुनियादी शिक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण एवं बहुमूल्य है। इसे वर्धा योजना, नयी तालीम, 'बुनियादी तालीम' तथा 'बेसिक शिक्षा' के नामों से भी जाना जाता है। गांधीजी ने १९३७ में 'नयी तालीम' की योजना बनायी जिसे राष्ट्रव्यापी व्यावहारिक रूप दिया जाना था। उनके शैक्षिक विचार शिक्षाशास्त्रियों के तत्कालीन विचारों से मेल नहीं खाते, इसलिये प्रारम्भ में उनके विचारों का विरोध हुआ।

गांधीजी ने कहा था कि नयी तालीम का विचार भारत के लिए उनका अन्तिम एवं सर्वश्रेष्ठ योगदान है। गांधीजी के जीनव-पर्यन्त चले सत्य के अन्वेषण एवं राष्ट्र के निर्माण हेतु सक्रिय प्रयोगों के माध्यम से लम्बे समय तक विचारों के गहन मंथन के परिणामस्वरूप नयी तालीम का दर्शन एवं प्रक्रिया का प्रादुर्भाव हुआ जो केवल भारतवर्ष ही नहीं, अपितु सम्पूर्ण मानव समाज को एक नयी दिशा देने में सक्षम था। परन्तु दुर्भाग्यवश इस सर्वोत्तम कल्याणकारी शिक्षा-प्रणाली का राष्ट्रीय स्तर पर भी समुचित प्रयोग नहीं हो पाया जिसके फलस्वरूप आजतक यह देश गांधीजी के सपनों के अनुरूप सार्थक और सही स्वराज प्राप्त करने में असमर्थ रहा। बल्कि इसके विपरीत आज तो आलम यह है कि शैक्षणिक, सामाजिक एवं आर्थिक दृष्टि से भारत पुनः पाश्चात्य साम्राज्यवाद के अधीन निरन्तर सरकता चला जा रहा है।

आज भारत की अधिकांश शिक्षा-व्यवस्था राज्याश्रित अथवा पूंजीपतियों पर आश्रित है। अधिकांश राज्याश्रित शिक्षण-संस्थाएँ संसाधन एवं अनुशासन के अभाव में निष्क्रिय हैं। इसलिए गुणवत्ता से युक्त शिक्षा देने में असमर्थ हैं। इसी प्रकार पूजीपतियों पर आश्रित सभी शिक्षण-संस्थाएं व्यावसायिक रूप में सक्रिय हैं, जो गरीबों की पहुंच से बाहर हैं। उनमें सिर्फ सम्पन्न लोगों के बच्चे ही पढ़ सकते हैं। भारत की स्वाधीनता के ६० से अधिक वर्ष बीतने के पश्चात् भी ऐसे बच्चों की संख्या काफी अधिक है, जिन्होंने विद्यालय के द्वार तक नहीं देखे हैं। जो विद्यालय जाने का सामर्थ्य रखते हैं, उन्हें लॉर्ड मैकाले की परम्परा से चली आ रही अंग्रेजी शिक्षा के अतिरिक्त कुछ भी प्राप्त नहीं होता। कुल मिलाकर उनमें भारतीय मौलिक शिक्षा को ग्रहण करनेवाले शायद ही कोई मिले। यह बात नहीं कि भारतीय शिक्षा देनेवालों का अभाव है। परन्तु इसलिए कि सभी अभिभावकों में यह इच्छाशक्ति एवं साहस नहीं है कि अपने बच्चों को सरकारों अथवा पूंजीपतियों द्वारा निर्धारित अंग्रेजी शिक्षा को त्यागकर भारतीय शिक्षा दिलावें। जब तक जनसाधारण की इस कायरतापूर्ण मानसिकता में परिवर्तन न किया जायेगा, तबतक नयी तालीम सहित कोई भी भारतीय शिक्षण-प्रणाली इस देश में पनप नहीं सकती।

इतिहास[संपादित करें]

'अखिल भारतीय शैक्षिक सम्मेलन' जो वर्धा में आयोजित हुआ, उसकी अध्यक्षता गांधीजी ने की। उसके उद्घाटन भाषण में गांधीजी ने अपने शिक्षादर्शन के महत्वपूर्ण पहलुओं पर प्रकाश डाला। उसके बाद उनकी 'नई तालीम' योजना के अनेक पहलुओं पर खुली चर्चा हुई। इस चर्चा में प्रसिद्ध गांधीवादी शिक्षाशास्त्री जाकिर हुसैन, विनोबा भावे तथा काका कालेलकर सहित अनेक विद्वानों ने भाग लिया। सम्मेलन के अन्तिम दिन निम्नलिखित प्रस्ताव पारित किये गये-

(१) बच्चों को ७ वर्ष तक राष्ट्रव्यापी, निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा दी जाय।

(२) शिक्षा क मध्यम मातृभाषा हो ।

(३) इस दौरान दी जाने वाली शिक्षा हस्तशिल्प या उत्पादक कार्य पर केंद्रित हो। अन्य सभी योग्यताओं और गुणों का विकास, जहाँ तक सम्भव हो, बच्चों के पर्यावरण को ध्यान में रखते हुए बालक द्वारा चुनी हुई हस्तकला से सम्बन्धित हो।

इन प्रस्तावों के पारित हो जाने के बाद डॉ जाकिर हुसैन की अध्यक्षता में विशेषज्ञों की एक समिति का गठन किया गया जिसे इन प्रस्तावों के आधार पर व्यावहारिक पाठ्यक्रम तैयार करने का काम दिया गया। इन प्रस्तावों के आधार पर एक राष्ट्रीय शैक्षिक योजना तैयार की गयी जो देश भर में 'नई तालीम', 'बुनियादी शिक्षा' या 'वर्धा योजना' के नाम से प्रसिद्ध हुई।

परिचय[संपादित करें]

सन्‌ 1935 ई. के गवर्नमेंट ऑव इंडिया ऐक्ट की घोषणा के फलस्वरूप ब्रिटिश भारत के सात प्रांतों में जब कांग्रेसी सरकारों ने राष्ट्रीय पुनर्निर्माण के लिये कार्यक्रम बनाया तो उसकी चौदह आधारशिलाओं में बुनियादी शिक्षा भी एक आधारशिला थी। गांधी जी बुनियादी शिक्षा को सामाजिक परिवर्तन का एक साधन समझते थे। वे इसे शांत सामाजिक क्रांति का एक प्रमुख आधार मानते थे। वे व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक पक्षों के पुनर्निर्माण द्वारा सामाजिक क्रांति का एक प्रमुख आधार मानते थे। वे व्यक्ति के शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक पक्षों के पुनर्निर्माण द्वारा सामाजिक क्रांति लाना चाहते थे। आत्मविश्वास एवं आत्मनिर्भरता को ही उन्होंने मनुष्य के पूर्ण विकास का आधार माना। वे शिक्षा को प्रत्येक व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार मानते थे। इसीलिये उन्होंने सात से चौदह वर्षवाले वर्ग के सभी बालकों एवं बालिकाओं को नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा देना आवश्यक समझा।

भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हरिपुर अधिवेशन में बुनियादी राष्ट्रीय शिक्षा योजना की स्वीकृति के बाद सन्‌ 1938 से ही बुनियादी शिक्षा में अनेक प्रयोग आरंभ हो गए थे किंतु वे अलग अलग और सीमित स्तर पर किए गए। सन्‌ 1939 ई. में द्वितीय महायुद्ध के छिड़ जाने से एक और कठिनाई उपस्थित हो गई। कांग्रेस मंत्रिमंडल को राजनीतिक कारणों से इस्तीफा देना पड़ा। उनसे यह आशा की जाती थी कि वे बुनियादी शिक्षा के विकास में सहायक होंगे। किंतु उनके इस्तीफे के परिणामस्वरूप, कुछ प्रांतों में प्रयोग बिलकुल बंद कर दिए गए और अन्य प्रांतों में प्रयोग के प्रति उदासीनता दिखाई देने लगी। स्वतंत्रताप्राप्ति के बाद ही बुनियादी शिक्षा को शिक्षा की राष्ट्रीय पद्धति के रूप में गंभीरतापूर्वक स्वीकार किया गया।

बुनियादी शिक्षा निरंतर प्रगति करती रही है क्योंकि बेसिक स्कूलों की संख्या बराबर बढ़ती रही है। किंतु साधारण प्रारंभिक और मिडिल स्कूलों की अपेक्षा बेसिक स्कूलों की संख्या की वृद्धि की गति में कमी रही है। बेसिक स्कूलों में प्रवेश का जहाँ तक संबंध है स्थिति संतोषजनक नहीं रही है। लक्ष्य तो यह था कि बेसिक शिक्षा में 6 से 14 वर्ष के वर्गवाले सभी लड़कों एवं लड़कियों के लिये बुनियादी शिक्षा का प्रबंध किया जाए। किंतु प्रथम दो योजनाओं में कोई महत्वपूर्ण प्रगति इस शिक्षा में नहीं हुई। इस काल में बुनियादी शिक्षा के प्रसार की प्रगति उतनी भी नहीं हुई जितनी साधारण प्रारंभिक शिक्षा के प्रसार की, यद्यपि साधारण प्रारंभिक शिक्षा की प्रगति भी संतोषजनक नहीं है।

अध्यापक शिक्षण की स्थिति भी बिल्कुल संतोषजनक नहीं है। भारत में प्रारंभिक शिक्षकों की शिक्षा के बारे में प्रथम राष्ट्रीय विचारगोष्ठी की 1960 ई. की रिपोर्ट और हाल में अध्यापक प्रशिक्षण के संबंध में प्लान प्रोजेक्ट्स की समिति की 1963 ई. की रिपोर्ट से सिद्ध होता है कि अध्यापक प्रशिक्षण कार्यक्रम में अनेक त्रुटियाँ हैं। इसमें न केवल उचित एवं योग्य कर्मचारियों, भवनों, उपकरणों और अन्य स्थूल साधनों की कमी रही है बल्कि अपर्याप्त पाठ्य विषय और शिक्षण की प्रभावहीन विधि तथा शैली का भी दोष रहा है।

बुनियादी शिक्षा की कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं है जिससे लोग साधारणतया सहमत हों। बुनियादी शिक्षा के वास्तविक मूल तत्व एवं निश्चित लक्ष्य के संबंध में बहुत ही गड़बड़ी दिखाई देती है। गांधी जी ने बुनियादी शिक्षा के सिद्धांतों को प्रतिपादित करते समय एक निश्चित सामाजिक व्यवस्था की कल्पना की थी। वह उत्पादक कार्य को शिक्षा का केंद्र मानते थे किंतु वास्तविक प्रयोग में उत्पादक कार्य द्वारा शिक्षा के सिद्धांत के भिन्न भिन्न अर्थ हो गए हैं। कुछ शिक्षाविद्, जो गांधी जी के अनुयायी होने का दावा करते हैं, विद्यालयों में प्रयोग योग्य वस्तुओं के वास्तविक उत्पादन पर जोर देते हैं। कुछ लोगों का मत है कि इसका अर्थ खेल विधि द्वारा शिक्षा के अतिरिक्त कुछ नहीं है।

बुनियादी शिक्षा में आत्मनिर्भरता का प्रश्न और भी विवादपूर्ण है। गांधी जी आत्मनिर्भरता को शिक्षा का वास्तविक मापदंड समझते थे। आत्मनिर्भरता से उनका तात्पर्य यह था कि बेसिक स्कूल इस सीमा तक स्वावलंबी हो जाएँ कि अध्यापकों का वेतन विद्यालयों में बच्चों द्वारा उत्पादित वस्तुओं को बेचकर दिया जा सके। इसलिए आरंभ में बुनियादी शिक्षा के समर्थकों का बहुत बड़ा वर्ग इस बात की आशा करने लगा कि यदि बुनियादी शिक्षा के लिए समुचित वातावरण पैदा किया जाए तो इसका अधिक मात्रा में खर्च निकल जाएगा और अवशेष खर्च सरकार दे देगी जिससे बेसिक स्कूल दक्षतापूर्वक चल सकेंगे। किंतु अनुभव से यह अनुमान गलत सिद्ध हुआ। भारत सरकार के शिक्षा मंत्रालय द्वारा नियुक्त पिरेस-लाखानी समिति ने इस समस्या का अध्ययन किया और बताया कि 1950-1951 में बिहार में, जो बुनियादी शिक्षा का प्रमुख प्रदेश समझा जाता था, कोई भी विद्यालय 41.09 प्रतिशत से अधिक स्वावलंबी नहीं था। सेवाग्राम (वर्षा) का बेसिक स्कूल, जो हिंदुस्तानी तालीमी संघ के पथप्रदर्शन एवं निरीक्षण में चल रहा था, 63 प्रतिशत तक स्वावलंबी था। इसनन इस दिशा में बेसिक विद्यालयों की सूची में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त करने का गौरव प्राप्त किया था। सन्‌ 1949-1950 में बिहार प्रदेश के 100 बेसिक स्कूल, जिनमें 18 सीनियर बेसिक स्कूल भी थे, केवल 15 प्रतिशत ही स्वावलंबी हो सके। तब से साधारण तौर से, परिस्थिति में अच्छाई की ओर कोई परिवर्तन नहीं दिखाई देता है। भारत सरकार द्वारा बुनियादी शिक्षा के लिये प्रथम पंचवर्षीय योजना के अंत में जो मूल्यांकन समिति नियुक्त हुई थी वह भी इसी निष्कर्षं पर पहुँची। भारत सरकार ने 'बुनियादी शिक्षा की संकल्पना' शीर्षक पुस्तिका में स्वावलंबन का उल्लेख तक नहीं किया। यहाँ तक कि गांधीवाद के आदर्शों के महान्‌ पोषक विनोबा भावे का भी अब यह विचार हो गया है कि बच्चों द्वारा उत्पादित वस्तुओं के विक्रय का लाभ शिक्षा पर होनेवाले उचित खर्च के कम करने पर प्रयोग न किया जाए बल्कि वह अभिभावकों (माता पिता) को मिलना चाहिए जिससे वे अपने काम में अपने बच्चों की सहायता से लाभ न उठा सकने के कारण हुई क्षति को पूरा कर सकें। ऐसा लगता है, सरकार भी सिद्धांत रूप से यह स्वीकार करती है कि बच्चों के उत्पादक कार्यं से प्राप्त लाभ उन्हीं के हित में खर्च किया जाए, जैसे विद्यालय के परिधान (यूनीफार्म) या मध्यान्ह के भोजन के प्रबंध पर।

इसलिए यह निष्कर्ष तो निकाला ही जा सकता है कि गांधी जी की कल्पना के अनुसार बेसिक स्कूलों में उत्पादक व्यवसायों को आरंभ कर देने से बुनियादी शिक्षा का खर्च बड़ी मात्रा में कम नहीं किया जा सकता। इसलिए बुनियादी शिक्षा को यदि देश भर में प्रारंभिक शिक्षा की सार्वभौम पद्धति बनाना हो तो इसके लिए प्रचुर मात्रा में बढ़ाई गई अर्थव्यवस्था आवश्यक है।

बुनियादी शिक्षा को सार्वभौम बनाने के प्रश्न को यथार्थ के स्तर पर सोचना चाहिए। भारत ने समाजवादी आदर्शवाले समाज की स्थापना का संकल्प किया है। ऐसे समाज़ की अनिवार्य बातों में से एक यह है कि इसके सभी सदस्य सुशिक्षित हों ताकि वे सामान्य हित के लिए अधिक से अधिक योगदान कर सकें और अपने सम्मिलित प्रयत्न का जो फल हो उससे उचित रूप से लाभ उठा सकें। इसलिए कम से कम समय के अंदर सार्वभौम, नि:शुल्क और अनिवार्य शिक्षाप्रदान का प्रबंध सबसे पहले होना चाहिए। संविधान की 45 वीं धारा के अनुसार 1960 ई. तक 14 वर्ष की अवस्थावाले सभी बच्चों की नि:शुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का राज्य की ओर से प्रबंध हो जाना चाहिए था। यह एक विशाल समस्या है और इसके समाधान के लिए मानवीय और भौतिक दोनों प्रकार के महान्‌ साधनों की आवश्यकता है। यह अनुमान है कि यदि देश अपनी राष्ट्रीय आय का दो प्रतिशत केवल प्रारंभिक शिक्षा पर खर्च करे तो आवश्यक साधन इतनी मात्रा में प्राप्त किए जा सकते है कि छड़ से 14 वर्षवाले वर्ग के सभी बच्चों को शिक्षा की सुविधाएँ 1980-1981 तक प्राप्त हो जाएँ।

अब यदि बुनियादी शिक्षा सभी बच्चों को दी जाए तो सार्वभौम शिक्षा के स्तर तक पहुँचने में बहुत अधिक समय लगेगा। बुनियादी शिक्षा उच्च कोटि की होने के कारण अधिक महंगी है। बुनियादी शिक्षा की राष्ट्रीय समिति द्वारा नियुक्त सहायक समिति (1963) की सिफारिशों से स्पष्ट है कि एक साधारण प्रारंभिक विद्यालय को बेसिक स्कूल में परिवर्तित करने में कम से कम जितने साधनों की आवश्यकता है उन्हें ध्यान में रखते हुए प्रारंभिक शिक्षा के साथ साथ ही बुनियादी शिक्षा का विकास होना आवश्यक प्रतीत होता है। आवश्यकता इस बात की है कि एक दूरदर्शी योजना बनाई जाए जिसके अनुसार बुनियादी शिक्षा का विस्तार बराबर होता रहे ताकि अंत में यह राष्ट्रीय स्तर पर प्रारंभिक शिक्षा की सुधरी हुई पद्धति के रूप में विकसित हो जाए। कुछ बातें जिनके करने की आवश्यकता है, नीचे प्रस्तावित की जाती हैं :

परंपरागत सिद्धांतों पर ही काम कर रहे बेसिक स्कूलों को कम से कम अनिवार्य शर्तों की पूर्ति करते हुए सच्चे बेसिक स्कूल बनाना चाहिए। जिन विद्यालयों का पूर्ण विकास नहीं हो सका है उनको अधिक से अधिक सहायता देनी चाहिए ताकि वे आदर्श बेसिक स्कूल बन सकें और दूसरे उनका अनुकरण करें।

बुनियादी शिक्षा के विस्तार को लगातार बढ़ाते रहें। साधारण विद्यालयों को बेसिक स्कूलों में बदलें और नए बेसिक स्कूल खोलें। अधिकांश प्रदेश बेसिक स्कूलों की संख्या को प्रतिवर्ष कम से कम 5 प्रतिशत तो बढ़ा हो सकते हैं।

बेसिक स्कूलों के लिए उद्योग चुनते समय यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि उद्योग शक्षा की दृष्टि से समृद्ध हों तथा सामाजिक वातावरण और बच्चों की अवस्था के अनुकूल हों। कच्चे माल की बरबादी को रोकने के लिए बेसिक स्कूलों की निम्न श्रेणियों में उद्योग संबंधी कार्य उस समय तक न कराया जाए जब तक बच्चे इतने परिपक्व न हो जाएँ कि वे इसका प्रयोग लाभपूर्वक कर सकें। मिट्टी का काम, प्रारंभिक बागवानी या कुछ कम खर्चवाले हाथ के काम नीचे की कक्षाओं में कराए जा सकते हैं। बुनियादी शिक्षा के पाठ्यक्रम में इस आधार पर परिवर्तन करने की आवश्यकता है।

सभी प्रारंभिक विद्यालयों में बुनियादी शिक्षा के कुछ तत्व सरलतापूर्वक अपनाए जा सकते हैं, जैसे स्वास्थ्य संबंधी क्रियाएँ, सामाजिक सेवा के कार्यक्रम, सांस्कृतिक कार्यकलाप इत्यादि। ऐसा विद्यालय, जिसके पास पर्याप्त मात्रा में भूमि हो और सिंचाई की सुविधाएँ पर्याप्त हों, फल और तरकारियों के उत्पादन का कार्य कर सकता है। यह आवश्यक है कि जिन विद्यालयों में ये क्रियाएँ आरंभ की जाएँ, उनका भली भाँति नियोजन किया जाए और साथ ही, उनसे पूरा पूरा शैक्षिक लाभ उठाया जाए। उत्तर बुनियादी विद्यालय को बहुद्देशीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की एक शाखा समझना चाहिए जहाँ उस उद्योग में योग्यता प्राप्त करने पर बल दिया जाए जिसे एक छात्र बेसिक स्कूल से करता चला आया है। 1957 में सेंट्रल एडवाइज़री बोर्ड ऑव एजुकेशन की राय से केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय द्वारा इस मामले में सविस्तार अध्ययन के लिए नियुक्त की गई समिति ने उत्तर बुनियादी शिक्षा के देश की प्रचलित माध्यमिक शिक्षा पद्धति का एक अंग बने रहने पर जोर दिया है।

बेसिक स्कूल की शैक्षिक योजना को सुचारु रूप से चलाने के लिए यह आवश्यक है कि अध्यापकों की शैक्षिक पृष्ठभूमि उच्च कोटि की हो और वे अपने कार्य में प्रवीण हों। प्रारंभिक विद्यालयों के लिए अध्यापक तैयार करनेवाली सभी प्रशिक्षण सस्थाएँ बेसिक ढंग की होनी चाहिए। प्रत्येक प्रदेश के प्रत्येक जिले में एक आदर्श प्रशिक्षण विद्यालय स्थापित किया जाए। इस प्रशिक्षण विद्यालय के साथ चार पाँच बेसिक स्कूल संलग्न होने चाहिए। इस केंद्र में पर्याप्त रूप से अध्यापक एवं उपकरण हों और बुनियादी शिक्षा का संपूर्ण कार्यक्रम इसी के द्वारा पूरा किया जाए। यह एक प्रशिक्षण के बहुग्राही महाविद्यालय (कांप्रीहेंसिव कालेज ऑव एजुकेशन) का अभिन्न अंग हो जिसमें कई प्रशिक्षण संस्थाएँ हों जो शिक्षा के सभी स्तरों एवं विद्यालय के कार्यक्रम की भिन्न भिन्न शाखाओं के लिए अध्यापक तैयार करें। 1938 में बुनियादी शिक्षा की मौलिक योजना जाकिर हुसैन समिति ने तैयार की थी। इसमें यह सिफारिश की गई थी कि प्रत्येक प्रांत में शिक्षा की एक समिति स्थापित होनी चाहिए जिसके कार्यों में बुनियादी शिक्षा में खोज और संगठन का कार्य भी सम्मिलित किया जाए। प्रत्येक प्रदेश में स्थापित शिक्षा की प्रदेशीय संस्था (स्टेट इंस्टिट्यूट ऑव एजुकेशन) बुनियादी शिक्षा की विविध समस्याओं का अध्ययन तथा अनुसंधान कार्य करे। राष्ट्रीय शैक्षणिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद (नैशनल काउंसिल ऑव एजुकेशनल रिसर्च ऐंड ट्रेनिंग) को राष्ट्रीय स्तर के महत्व वाली समस्याओं का अनुसंधान करना चाहिए। अनुसंधान द्वारा समवाय (कोरीलेशन) पद्धति को अध्यापक के लिए सुबोध तथा सुगम बना दिया जाए। बुनियादी शिक्षा संबंधी कुछ ऐसी मुख्य समस्याएँ हैं जिन्हें सुलझाने के लिए शीघ्र ध्यान दिया जाना आवश्यक है, जैसे एक ही शिक्षक द्वारा अनेक कक्षाओं के पढ़ाने की समस्य, ऐसी कक्षाओं को पढ़ाने की समस्या, जिनमें बच्चों की संख्या बहुत अधिक हो, भिन्न भिन्न उद्योगों की शैक्षिक संभावनाओं का पता लगाने और उनकी पद्धति तथा उत्पादन क्षमता का विकास करना जिनके द्वारा जाँच की जा सके कि कहाँ तक बुनियादी शिक्षा की प्रगति उसके उद्देश्यों के अनुसार हो रही है ताकि इन विधियों और उपकरणों से बुनियादी शिक्षा के अध्याक एवं प्रशासक आवश्यकतानुसार लाभ उठा सके, बेसिक स्कूलों के लिए अध्यापक तैयार करनेवाली प्रशिक्षण संस्थाओं की समस्याओं की ओर ध्यान देना ताकि प्रशिक्षण कार्यक्रम को प्रभावशाली बनाया जा सके, और छात्राध्यापकों के लिए उपयुक्त साहित्य की तैयारी पर ध्यान देना इत्यादि।

इन्हें भी देखें[संपादित करें]

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