लोठू निठारवाल

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लोठू निठारवाल (१८०४-१८५५) राजस्थान के सीकर जिले में पैदा हुए एक क्रन्तिकारी समाज सुधारक थे। उन्होंने गुलामी की आदतन जनता में स्वाभिमान पैदा किया। उनका मत था कि अमीर एवं उच्च वर्ग कभी जनता व देश के स्वाभिमान का ध्यान नहीं रखते हैं। अंगरेजों की इज्जत को मिटटी में मिलाने वाले लोठू निठारवाल क्रांतिकारियों के प्रेरक बने, इस वजह से १८५७ की क्रांति के हीरो तात्या टोपे सीकर की धरती पर पधारे, लेकिन तब तक लोठू धरती माँ के लिए शहीद हो चुके थे।

बचपन[संपादित करें]

राजस्थान के सीकर जिले के गाँव रींगस में १८०४ में लोठू का जन्म हुआ। लोठू ने चोरी छिपे पढ़ना सिखा क्योंकि उस समय किसानों के बच्चों के लिए पढ़ाई वर्जित थी। उनके लिए वेद-पुराण को छूने पर दंड का प्रावधान था। लोठू को सामंत की गुलामी करना पसंद नहीं था। एक दिन रींगस के ठाकुर का बेटा कुंवर घोडे पर चढा जा रहा था। लोठू ने उसे दुआ सलाम नहीं किया। कुंवर को गुस्सा आ गया। वह घोडे से नीचे उतरा व लोठू को थपड़ मार दिया. लोठू ने बिना गुस्सा किए एक हाथ से कुंवर को उठा कर फैंक दिया व कनपटी पर लात मारी. कुंवर के प्राण पखेरू उड़ गए।

लोठू ने घर जाकर साड़ी घटना बताई. लोठू के माता-पिता ठाकुर से पंगा नहीं लेना चाहते थे सो पूरे परिवार सहित बठोट गाँव के लिए प्रस्थान कर गए। बठोट में लोठू की बहिन ब्याही थी अतः वे वहां रहने लगे. रींगस ठाकुर की हिम्मत न थी कि वे बठोट जाकर दण्डित करते.

अंगरेजों के विरुद्ध विद्रोह[संपादित करें]

लोठू ने बठोट के ठाकुर डूंगर सिंह एवं जवाहर सिंह के साथ मिलकर शेखावाटी में अंगरेजों के विरुद्ध विद्रोह की आग शुरू की. इनके साथ सांवता मीणा भी थे। अंगरेजों के उस समय सबसे बड़े दुश्मन बठोट और पटोदा के ठाकुर थे। विद्रोहियों को पैसे की दरकार थी। उन्होंने पैसे पाने के लिए रामगढ के सेठों को संदेश भेजा. उनके द्वारा मना करने पर लोठू, डूंगर सिंह और करना मीणा ने वेश बदलकर सेठों के काफिले की जानकारी ली और काफिले पर हमला कर अरावली की घटी में जाते हुए लूटा. अंग्रेज सरकार ने इस लूट को गंभीर माना और डूंगर सिंह, लोठू, संवत मीणा को डाकू करार दिया गया।

डूंगर सिंह एक दिन अपने ससुराल झदवास में रुके थे कि उनके साले ने विश्वास घात किया और अंगरेजों को पकड़ा दिया. डूंगर सिंह को आगरा के किले में कैद किया गया।


लोठू के पिता घुड़ सवारी व ऊंट की सवारी के शोकीन थे। लोठू भी घुड़ दौड़ में कहीं भी बाजी मरने में सक्षम था। लोठू की कद काठी मजबूत थी। उसकी ऊंचाई ६ फ़ुट ११ इंच थी। वजन था १६० किलो.

लोठू बड़े न्याय प्रिय थे। गावों में कोई भी झगड़ा होने पर अन्तिम न्याय लोठू ही करते थे। सीकर के गांवों में आज भी लोग उन्हें मुख्य न्यायाधिपति के नाम से पुकारते हैं।

वे महाराणा प्रताप, वीर तेजाजी, छत्रपति शिवाजी, गोकुला और महाराजा सूरज मल को अपना प्रेरणा स्रोत मानते थे।

आगरा किले से डूंगर सिंह को छुड़ाना[संपादित करें]

आगरा किले से डूंगर सिंह को छुड़ाने की कहानी बड़ी रोचक और बहादुरी पूर्ण है। लोठू ने साधू वेश धारण कर सांवता मीणा को साथ ले गए और आगरा किले के नजदीक धुना लगाया. सांवता मीणा ने बाबाजी के चमत्कारों की कहानी लोगों को सुनाई. साधू वेश में लोठू की प्रसिद्धि दूर-दूर तक फ़ैल गई। लोग उपचार के लिए आने लगे. कुछ दिन बाद एक अंगरेज अफसर आए और बाबाजी को आदेश दिया कि अपना धूना यहाँ से उठाओ. अंगरेज अफसर के साथ आया सिपाही बोला कि बाबाजी बड़े चमत्कारी हैं इन्होने मेरी बीबी को झाड़-फूंक से ठीक कर दिया. अंग्रेज अफसर को विश्वास नहीं था। संयोग से अफसर के बंगले पहुंचते ही दस्त हो गए। दस्त रुकने का नाम न ले रहे थे। अंगरेज अफसर सुबह साधू के धूने पर पहुँचा और गलती के लिए माफ़ी मांगी बाबा ने भभूत दी और लोठू बोलेजा ठीक हो जाएगा. अफसर ठीक होगया और दूसरे दिन नमस्कार करने आया और फीस पूछी. लोठू बाबा बोले हम साधू हैं हमें कोई माया मोह नहीं है। कुछ देना ही चाहते हो तो हमें आगरे का किला दिखादो.

सन्दर्भ[संपादित करें]

मनसुख रणवा मनु (२००१) :अमर शहीद लोठू जाट, जे.सी. रणवा प्रकाशन सीकर, राजस्थान