रिचर्ड डॉकिन्स

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रिचर्ड डॉकिन्स

रिचर्ड डॉकिन्स ऑस्टिन के टेक्सास विश्वविद्यालय में (2008)
जन्म क्लिन्टन रिचर्ड डॉकिन्स
26 मार्च 1941 (1941-03-26) (आयु 73)
नैरोबी
राष्ट्रीयता यूनाइटेड किंगडम
शिक्षा एम ए, पीएचडी (दर्शन)
अल्मा मेटर बेलिओल कॉलेज, ऑक्सफोर्ड
व्यवसाय जीवविज्ञानी और लेखक
नियोक्ता यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, बर्कले
ऑक्सफ़र्ड विश्वविद्यालय
संस्था रॉयल सोसाइटी के फैलो
जाने–जाते हैं जीन-केन्द्रित क्रम-विकास मत, "मीम" परिकल्पना, नास्तिकता और विज्ञान की वकालत
उल्लेखनीय काम द सॅल्फ़िश जीन (1976)
द गॉड डिलुज़न (2006)
प्रभावित चार्ल्स डार्विन, बर्ट्रेन्ड रसेल
जीवनसाथी मैरिएन स्टाम्प डॉकिन्स (1967–1984)
ईव बर्हम (1984–?)
लाला वार्ड (1992–वर्तमान)
संतान जूलियट एम्मा डॉकिन्स (born 1984)
माता - पिता क्लिन्टन जॉन डॉकिन्स
जीन मैरी
पुरस्कार फैराडे पुरस्कार (1990)
किस्ट्लर प्राइज़ (2001)
जालपृष्ठ
द रिचर्ड डॉकिन्स फाउन्डेशन

रिचर्ड डॉकिन्स जन्म 26 मार्च 1941) एक ब्रिटिश क्रम-विकासवादी जीवविज्ञानी और लेखक हैं। 1995 से 2008 के दौरान वे ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय में प्रफ़ेसर थे।[1]

1976 में प्रकाशित हुई किताब द सॅल्फ़िश जीन" ("स्वार्थी जीन") के ज़रिये उन्होंने जीन-केन्द्रित क्रम-विकास मत और "मीम" परिकल्पना को लोकप्रिय बनाया। इस किताब के अनुसार जीव-जंतु जीन को ज़िदा रखने का एक ज़रिया हैं। उदाहरण के लिए: एक माँ अपने बच्चों की सुरक्षा इसलिए करती है ताकि वह अपनी जीन ज़िन्दा रख सके।[2]

रिचर्ड डॉकिन्स एक नास्तिक हैं और "भगवान ने दुनिया बनाई" मत के आलोचक के रूप में जाने जाते हैं। 2006 में प्रकाशित द गॉड डिलुज़न ("भगवान का भ्रम") में उन्होंने कहा है कि किसी दैवीय विश्व-निर्माता के अस्तित्व में विश्वास करना बेकार है और धार्मिक आस्था एक भ्रम मात्र है। जनवरी 2010 तक इस किताब के अंग्रेज़ी संस्करण की 2,000,000 से अधिक प्रतियाँ बेची जा चुकी हैं और 31 भाषाओं में इसके अनुवाद कियी जा चुके हैं।

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