रामविलास शर्मा
डा रामविलास शर्मा![]() हिन्दी के महान आलोचक डॉ रामविलास शर्मा |
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| जन्म: | १० अक्तूबर, १९१२ उचगांव सानी, उन्नाव जिला, उत्तर प्रदेश |
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| मृत्यु: | मार्च, २०००[1] |
| कार्यक्षेत्र: | हिन्दी भाषा |
| राष्ट्रीयता: | भारतीय |
| भाषा: | हिन्दी |
| विधा: | आलोचना, विवेचना |
डा० रामविलाश शर्मा (१० अक्तूबर, १९१२- ३० मई, २०००) आधुनिक हिन्दी साहित्य के सुप्रसिद्ध आलोचक, निबंधकार, विचारक एवं कवि थे। व्यवसाय से अंग्रेजी के प्रोफेसर, दिल से हिंदी के प्रकांड पंडित और महान विचारक, ऋग्वेद और मार्क्स के अध्येता, कवि, आलोचक, इतिहासवेत्ता, भाषाविद, राजनीति-विशारद ये सब विशेषण उन पर समान रूप से लागू होते हैं।
अनुक्रम |
जीवन परिचय
उन्नाव जिला के उच्चगाँव सानी में जन्मे डॉ. रामविलास शर्मा ने लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी में एम.ए. तथा पी-एच.डी. की उपाधि सन् १९३८ में प्राप्त की। सन् १९३८ से ही आप अध्यापन क्षेत्र में आ गए। १९४३ से १९७४ तक आपने बलवंत राजपूत कालेज, आगरा में अंग्रेजी विभाग में कार्य किया और अंग्रेजी विभाग के अध्यक्ष रहे । इसके बाद कुछ समय तक कन्हैयालाल माणिक मुंशी हिन्दी विद्यापीठ, आगरा में निदेशक पद पर रहे।[2]
डॉ. रामविलास शर्मा का साहित्यिक जीवन का आरंभ १९३३ से होता है जब वे सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' के संपर्क में आए। १९३४ में उन्होंने ‘निराला’ पर एक आलोचनात्मक आलेख लिखा, जो उनका पहला आलोचनात्मक लेख था। यह आलेख उस समय की चर्चित पत्रिका ‘चाँद’ में प्रकाशित हुआ। इसके बाद वे निरंतर सृजन की ओर उन्मुख रहे। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद डॉ. रामविलास शर्मा ही एक ऐसे आलोचक के रूप में स्थापित होते हैं, जो भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं।[3] उनकी आलोचना प्रक्रिया में केवल साहित्य ही नहीं होता, बल्कि वे समाज, अर्थ, राजनीति, इतिहास को एक साथ लेकर साहित्य का मूल्यांकन करते हैं। अन्य आलोचकों की तरह उन्होंने किसी रचनाकार का मूल्यांकन केवल लेखकीय कौशल को जाँचने के लिए नहीं किया है, बल्कि उनके मूल्यांकन की कसौटी यह होती है कि उस रचनाकार ने अपने समय के साथ कितना न्याय किया है।[4]
प्रकाशित कृतियाँ
रामविलासजी निरंतर सृजन की ओर उन्मुख रहे। अपनी सुदीर्घ लेखन यात्रा में उन्होंने लगभग 100 महत्वपूर्ण पुस्तकों का सृजन किया, जिनमें 'हिंदी जाति का साहित्य', 'भारतीय साहित्य के इतिहास की समस्यायें', 'भारतीय नवजागरण और यूरोप',‘गाँधी, आंबेडकर, लोहिया और भारतीय इतिहास की समस्याएँ’, ‘भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश’, ‘निराला की साहित्य साधना’, ‘महावीरप्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नव-जागरण’, ‘पश्चिमी एशिया और ऋग्वेद’, ‘भारत में अँग्रेजी राज और मार्क्सवाद’, ‘भारतीय साहित्य और हिन्दी जाति के साहित्य की अवधारणा’, ‘भारतेंदु युग’, ‘भारत के प्राचीन भाषा परिवार और हिन्दी’ जैसी कालजयी रचनाएँ शामिल हैं।
- आलोचना ग्रन्थ -
- प्रेमचंद और उनका युग(१९५३),
- निराला (१९४६),
- भारतेंदु हरिश्चन्द्र,
- प्रगति और परम्परा,
- भाषा, साहित्य और संस्कृति (१९५४),
- भाषा और समाज (१९६१),
- आचार्य रामचंद्र शुक्ल और हिन्दी आलोचना,
- निराला की साहित्य साधना (तीन-भाग) - (१९६९),
- महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण,
- भारतीय साहित्य की भूमिका,
- परम्परा का मूल्यांकन
आदि उनके प्रसिद्ध आलोचना ग्रंथ हैं। रूप तरंग तथा सदियो के सोये जाग उठे आदि उनकी कविता संग्रह हैं। चार दिन उनके लिखे उपन्यासों, अपनी धरती अपने लोग व घर की बात आत्मकथात्मक रचनाओं तथा आस्था और सौन्दर्य व विराम चिह्न उनके निबंध साहित्य के चुने हुए उदाहरण हैं। अज्ञेय द्वारा संपादित तारसप्तक (१९४३ ई०) के एक कवि के रूप में आपकी रचनाएँ बहुत चर्चित हुई हैं।
हिंदी जाति की अवधारणा
हिंदी जाति की अवधारणा रामविलास शर्मा के जातीय चिंतन का केंद्रीय बिंदु है। भारतीय साहित्य के तुलनात्मक अध्ययन तथा वैश्विक साहित्य से अन्तर्क्रिया के द्वारा रामविलास जी ने साहित्य के जातीय तत्वों की प्रगतिशील भूमिका की पहचान की है।
डॉ. रामविलास शर्मा और भारत का इतिहास
आचार्य रामचंद्र शुक्ल के बाद डॉ. रामविलास शर्मा ही एक ऐसे आलोचक के रूप में स्थापित होते हैं, जो भाषा, साहित्य और समाज को एक साथ रखकर मूल्यांकन करते हैं। उनकी आलोचना प्रक्रिया में केवल साहित्य ही नहीं होता, बल्कि वे समाज, अर्थ, राजनीति, इतिहास को एक साथ लेकर साहित्य का मूल्यांकन करते हैं। अन्य आलोचकों की तरह उन्होंने किसी रचनाकार का मूल्यांकन केवल लेखकीय कौशल को जाँचने के लिए नहीं किया है, बल्कि उनके मूल्यांकन की कसौटी यह होती है कि उस रचनाकार ने अपने समय के साथ कितना न्याय किया है।
इतिहास की समस्याओं से जूझना मानो उनकी पहली प्रतिज्ञा हो। वे भारतीय इतिहास की हर समस्या का निदान खोजने में जुटे रहे। उन्होंने जब यह कहा कि आर्य भारत के मूल निवासी हैं, तब इसका विरोध हुआ था। उन्होंने कहा कि आर्य पश्चिम एशिया या किसी दूसरे स्थान से भारत में नहीं आए हैं, बल्कि सच यह है कि वे भारत से पश्चिम एशिया की ओर गए हैं। वे लिखते हैं - ‘‘दूसरी सहस्त्राब्दी ईसा पूर्व बड़े-बड़े जन अभियानों की सहस्त्राब्दी है।
इसी दौरान भारतीय आर्यों के दल इराक से लेकर तुर्की तक फैल जाते हैं। वे अपनी भाषा और संस्कृति की छाप सर्वत्र छोड़ते जाते हैं। पूँजीवादी इतिहासकारों ने उल्टी गंगा बहाई है। जो युग आर्यों के बहिर्गमन का है, उसे वे भारत में उनके प्रवेश का युग कहते हैं। इसके साथ ही वे यह प्रयास करते हैं कि पश्चिम एशिया के वर्तमान निवासियों की आँखों से उनकी प्राचीन संस्कृति का वह पक्ष ओझल रहे, जिसका संबंध भारत से है। सबसे पहले स्वयं भारतवासियों को यह संबंध समझना है, फिर उसे अपने पड़ोसियों को समझाना है।
भूखमरी, अशिक्षा, अंधविश्वास और नए-नए रोग फैलाने वाली वर्तमान समाज व्यवस्था को बदलना है। इसके लिए भारत और उसके पड़ोसियों का सम्मिलित प्रयास आवश्यक है। यह प्रयास जब भी हो, यह अनिवार्य है कि तब पड़ोसियों से हमारे वर्तमान संबंध बदलेंगे और उनके बदलने के साथ वे और हम अपने पुराने संबंधों को नए सिरे से पहचानेंगे। अतीत का वैज्ञानिक, वस्तुपरक विवेचन वर्तमान समाज के पुनर्गठन के प्रश्न से जुड़ा हुआ है।’’ (पश्चिम एशिया और ऋग्वेद पृष्ठ 20)
भारतीय संस्कृति की पश्चिम एशिया और यूरोप में व्यापकता पर जो शोधपरक कार्य रामविलासजी ने किया है, इस कार्य में उन्होंने नृतत्वशास्त्र, इतिहास, भाषाशास्त्र का सहारा लिया है। शब्दों की संरचना और उनकी उत्पत्ति का विश्लेषण कर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि आर्यों की भाषा का गहरा प्रभाव यूरोप और पश्चिम एशिया की भाषाओं पर है।
वे लिखते हैं - ‘‘सन् 1786 में ग्रीक, लैटिन और संस्कृत के विद्वान विलियम जोंस ने कहा था, ‘ग्रीक की अपेक्षा संस्कृत अधिक पूर्ण है। लेटिन की अपेक्षा अधिक समृद्ध है और दोनों में किसी की भी अपेक्षा अधिक सुचारू रूप से परिष्कृत है।’ पर दोनों से क्रियामूलों और व्याकरण रूपों में उसका इतना गहरा संबंध है, जितना अकस्मात उत्पन्न नहीं हो सकता। यह संबंध सचमुच ही इतना सुस्पष्ट है कि कोई भी भाषाशास्त्री इन तीनों की परीक्षा करने पर यह विश्वास किए बिना नहीं रह सकता कि वे एक ही स्त्रोत से जन्मे हैं। जो स्रोत शायद अब विद्यमान नहीं है।
इसके बाद एक स्रोत भाषा की शाखाओं के रूप में जर्मन, स्लाव, केल्त आदि भाषा मुद्राओं को मिलाकर एक विशाल इंडो यूरोपियन परिवार की धारणा प्रस्तुत की गई। 19वीं सदी के पूर्वार्द्ध में तुलनात्मक और ऐतिहासिक भाषा विज्ञान ने भारी प्रगति की है। अनेक नई-पुरानी भाषाओं के अपने विकास तथा पारस्परिक संबंधों की जानकारी के अलावा बहुत से देशों के प्राचीन इतिहास के बारे में जो धारणाएँ प्रचलित हैं, वे इसी ऐतिहासिक भाषा विज्ञान की देन हैं। आरंभ में यूरोप के विद्वान मानते थे कि उनकी भाषाओं को जन्म देने वाली स्रोत भाषा का गहरा संबंध भारत से है। यह मान्यता मार्क्स के एक भारत संबंधी लेख में भी है।’’
अँग्रेजों के प्रभुत्व से भारतीय जनता की मुक्ति की कामना करते हुए उन्होंने 1833 में लिखा था, ‘‘हम निश्चयपूर्वक, न्यूनाधिक सुदूर अवधि में उस महान और दिलचस्प देश को पुनर्जीवित होते देखने की आशा कर सकते हैं, जहाँ के सज्जन निवासी राजकुमार साल्तिकोव (रूसी लेखक) के शब्दों में इटैलियन लोगों से अधिक चतुर और कुशल हैं, जिनकी अधीनता भी एक शांत गरिमा से संतुलित रहती है, जिन्होंने अपने सहज आलस्य के बावजूद अँग्रेज अफसरों को अपनी वीरता से चकित कर दिया है, जिनका देश हमारी भाषाओं, हमारे धर्मों का उद्गम है, और जहाँ प्राचीन जर्मन का स्वरूप जाति में, प्राचीन यूनान का स्वरूप ब्राह्यण में प्रतिबिंबित है।’’ (पश्चिम एशिया और ऋग्वेद पृष्ठ 21)
डॉ. रामविलास शर्मा मार्क्सवादी दृष्टि से भारतीय संदर्भों का मूल्यांकन करते हैं, लेकिन वे इन मूल्यों पर स्वयं तो गौरव करते ही हैं, साथ ही अपने पाठकों को निरंतर बताते हैं कि भाषा और साहित्य तथा चिंतन की दृष्टि से भारत अत्यंत प्राचीन राष्ट्र है। वे अँग्रेजों द्वारा लिखवाए गए भारतीय इतिहास को एक षड्यंत्र मानते हैं।
उनका कहना है कि यदि भारत के इतिहास का सही-सही मूल्यांकन करना है तो हमें अपने प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना होगा। अँग्रेजों ने जान-बूझकर भारतीय इतिहास को नष्ट किया है। ऐसा करके ही वे इस महान राष्ट्र पर राज कर सकते थे। भारत में व्याप्त जाति, धर्म के अलगाव का जितना गहरा प्रकटीकरण अँग्रेजों के आने के बाद होता है, उतना गहरा प्रभाव पहले के इतिहास में मौजूद नहीं है। समाज को बाँटकर ही अँग्रेज इस महान राष्ट्र पर शासन कर सकते थे और उन्होंने वही किया भी है।
बाह्य सूत्र
- रामविलास शर्मा ( हिंदीकुंज में )
- राम विलास शर्मा की रचनाएँ कविता कोश में
- गद्यकोश पर डॉ रामविलास शर्मा की रचनाएँ
- डॉ. रामविलास शर्मा के आलोचना सिद्धांत (वेबदुनिया)
- हिंदी महाजाति की अवधारणा और डा. रामविलास शर्मा ('जय हिन्दी' ब्लाग)
- हिन्दी के प्रहरी : डॉ रामविलास शर्मा (गूगल पुस्तक)
- निराला की साहित्य साधना (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ राम विलास शर्मा)
- भाषा और समाज (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ राम विलास शर्मा)
- भारतीय संस्कृति और हिन्दी प्रदेश (गूगल पुस्तक ; लेखक - रामबिलास शर्मा)
- प्रेमचन्द का सौन्दर्यशास्त्र (गूगल पुस्तक ; नद किशोर नवल)
- परम्परा का मूल्यांकन (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ रामविलास शर्मा)
- मार्क्स और पिछड़े हुए समाज (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ रामविलास शर्मा)
- भारत के प्राचीन भाषा-परिवार और हिन्दी (गूगल पुस्तक ; लेखक - रामविलास शर्मा)
- ऐतिहासिक भाषाविज्ञान और हिन्दी भाषा (गूगल पुस्तक ; लेखक - रामविलास शर्मा)
- महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण (गूगल पुस्तक ; लेखक - रामविलास शर्मा)
- भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और हिन्दी नवजागरण की समस्यायें (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ रामविलास शर्मा)
- इतिहास दर्शन (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ रामविलास शर्मा)
- भारतीय साहित्य की भूमिका (गूगल पुस्तक ; लेखक - डॉ रामविलास शर्मा)
- कोई सोचे कि साहित्य खत्म हो जाएगा तो बेवकूफी है : रामविलास शर्मा
- एक विराट व्यक्तित्व की आत्मीय यादें (विश्वनाथ त्रिपाठी)
- रामविलास शर्मा का प्रतिऔपनिवेशिक चिंतन
संदर्भ
- ↑ प्रेस सूचना ब्यूरो रिलीज़।मार्च २०००
- ↑ "डॉ.रामविलास शर्मा" (एचटीएमएल). हिन्दी कुंज. http://www.hindikunj.com/2009/04/blog-post.html. अभिगमन तिथि: २००९.
- ↑ "डॉ. रामविलास शर्मा के आलोचना सिद्धांत" (एचटीएमएल). वेबदुनिया. http://hindi.webdunia.com/miscellaneous/literature/sansmatan/0710/09/1071009038_1.htm. अभिगमन तिथि: २००९.
- ↑ "डॉ.रामविलास शर्मा की आलोचना दृष्टि" (एचटीएमएल). राकेश शर्मा. http://rakeshsharmaindore.blogspot.com/2008/11/blog-post_22.html. अभिगमन तिथि: २००९.
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