राजा रायसल दरबारी

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राजा रायसल दरबारी
Rajaraisal.jpg
पिता राव सुजाजी

जन्म और परिचय[संपादित करें]

रायसल जी का जन्म महाराव शेखाजी की वंश परम्परा में अमरसर के शासक राव सुजाजी की रानी रतनकंवर राठौड़ के गर्भ से फाल्गुन बदी ८ वि. १५९५ को हुआ | राव सुजाजी की मृत्युपरांत रायसल को अपने भाइयों की तरह सात गांवों की जागीर मिली थी| और वे अपनी जागीर के गांव लाम्या में वि.स. १६११ में आकर रहने लगे | कुछ ही दिनों बाद अमरसर के शासक उनके बड़े भाई राव लूणकरण जी का अपने दीवान देवीदास से किसी बात पर विवाद हो गया और नाराज होकर दीवान देवीदास रायसल जी के पास लाम्या आ गया| दीवान देवीदास बहुत बुद्धिमान, दूरदर्शी और चतुर व्यक्ति था उसने रायसल को कुछ शक्ति जुटाकर अकबर की सेवा में जाने की सलाह दी | रायसल ने रेवासा के शासक चंदेल रासोजी से बीस घोड़े उधार लेकर आगरा जाने की योजना बनायीं| और वे दीवान देवीदास के साथ अकबर के पास आगरा आ गए| और शीघ्र ही कई महत्त्वपूर्ण युद्धों में वीरता दिखाने के चलते अकबर के दरबार में दरबारी का ख़िताब पा लिया| साथ ही उन्हें रेवासा व कासली के परगने भी मिल गए|और फाल्गुन वि.स. १६२४ में उन्होंने खंडेला पर आक्रमण पर उसे जीत लिया|अकबर के दरबार में रायसल जी को राजा का ख़िताब दिया गया था और वे राजा रायसल दरबारी के नाम से प्रसिद्ध थे|

राणियां और संताने[संपादित करें]

१- रानी "बड़गुजर अमरती " देवती के लखधीर सिंह की पुत्री थी | जिनके लाडाजी (जिन्हें अकबर लाडखान कह कर पुकारता था) लाडाजी के वंशज लाडखानी शेखावत कहलाये|भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति स्व.श्री भैरोंसिंह शेखावत जी का जन्म इन्हीं लाडाजी के वंश में हुआ| इस रानी के अन्य पुत्रों में ताजाजी (जिन्हें अकबर ताजखान कह कर पुकारता था) ताजाजी के वंशज ताजखानी शेखावत कहलाये|व परसराम हुए| यह परसरामजी शेखावत कहलाये|
२- राजकुमारी "कृष्णावती निर्वाण" (रानी किसनावती)| जो खंडेला के चौहान राजा पीठा निर्वाण की पुत्री थी| इनके गर्भ से युवराज हरिरामजी व बिहारीदास का जन्म हुआ| हरिरामजी के वंशज हरिरामजी का शेखावत (हरिरामपोता) कहलाये | मुंडरू (मुद्रिका या मुंदरी) आदि ठिकाने जागीर समाप्ति से पहले इनके आधीन थे |[1]
३- रानी "मेड़तणी जी" यह मेड़ता के स्वामी इतिहास प्रसिद्ध वीर राव जयमल, मेड़ता के पुत्र बिठ्ठलदास मेड़तिया की पुत्री थी | इस रानी के गर्भ से त्रिमल व गिरधरदास हुए| त्रिमल के वंशज राव जी का शेखावत व गिरधरदास के वंशज गिरधरदास जी का शेखावत कहलाये|
४- रानी "मेड़तणी हंस कुंवरी" | जो मेड़ता के स्वामी राव विरमदेव, मेड़ता के पुत्र जगमालजी की पुत्री थी| इनके गर्भ से भोजराज का जन्म हुआ| भोजराज के वंशज भोजराजजी का शेखावत कहलाये|
५- रानी "गौड़जी लाडकँवर| ये मारोठ के स्वामी कुम्भा जी गौड़ की पुत्री थी| इनके वीरभान नाम का पुत्र हुआ|

युद्ध[संपादित करें]

१- वि.स. १६१४ में अकबर के अफगानों के साथ हुए संघर्ष में रायसल जी एक सैनिक के तौर पर शामिल हुए और उन्होंने उस युद्ध में अद्भुत शौर्य दिखाते हुए शत्रु पक्ष के सेनापति को मार गिराया| इस तरह उनकी वीरता के चलते अकबर की सेना लाहौर विजय अभियान में सफल हुई और इसी वीरता के लिए कुछ समय बाद रायसल जी को रेवासा व कासली के परगने दे दिए गए|
२ -वि.स.१६२२ के खैराबाद युद्ध में राजा रायसल चंदावल (युद्ध की एक पंक्ति) में मुख्य व्यक्तियों में से एक थे|यह युद्ध दो उजबेग बंधुओं अलीकुलीखां और बहादुर खां के खिलाफ लड़ा गया था|जो बहुत भयंकर युद्ध था और इस युद्ध में भी बादशाह अकबर की विजय हुई थी|
३-खंडेला विजय -वि.स. १६२४ में रायसलजी ने खंडेला के शासक निर्वाणों पर आक्रमण कर उन्हें हराकर खंडेला जीता|
४-उदयपुर पर अधिकार- खंडेला जितने के बाद रायसल जी ने निर्वाणों के अधिकार क्षेत्र के अन्य ठिकानों पर हमले किये और अंत में एक बड़ी लड़ाई के बाद निर्वाणों से उदयपुर आदि भी जीत लिए|
५- अकबर के गुजरात अभियान में- वि.स.१६२९ में गुजरात के मिर्जा बंधुओं ने अकबर से विद्रोह कर दिया जिसे दबाने के लिए अकबर ने फतेहपुर सीकरी से एक बड़ी सेना के साथ प्रस्थान किया| और युद्ध में अपने साथ रहने के लिए अकबर ने विशेष रूप से रायसलजी, ख्वाजा अब्दुल्ला, आसफ खां को चुना| पाटन पर कब्ज़ा करने के बाद अकबर व मिर्जा इब्राहीम की सेना के बीच २ दिसम्बर १५७२ को सरनाल नामक स्थान पर युद्ध हुआ| इस युद्ध में रायसल जी अकबर के साथ साये की तरह रहे|
६- वि.स.१६४२ में बिलोचों ने अकबर के विरुद्ध विद्रोह कर था जिसे दबाने के लिए बादशाह अकबर ने रायसल दरबारी व शाहकुलीखां महरम को भेजा जिन्होंने विद्रोह को दबाया| इनके अलावा भी राजा रायसल दरबारी ने ५२ युद्धों में विजय प्राप्त कर अपनी वीरता का डंका बजाया|

अकबर की जीवन रक्षा[संपादित करें]

वि.स. १६४० में अपनी पुत्री के सती होने की बात पर जोधपुर के राजा उदयसिंह और अकबर के मध्य विवाद हो गया और इस विवाद में जोधपुर के राजा उदयसिंह क्रोध में इतने उत्तेजित हो गए कि उन्होंने आवेश में आकर तलवार खेंच ली और अकबर पर आक्रमण कर दिया| उसी समय राजा रायसल दरबारी व जगन्नाथ कछवाह ने राजा उदयसिंह को बीच-बचाव कर पकड़ लिया और अकबर की जान बचाई| बाद में अकबर ने भी इस घटना के बावजूद राजा उदयसिंह को माफ कर दिया|इस घटना के अलावा भी अनेक युद्धों में राजा रायसल ने अकबर की कई बार जान बचाई| अकबर युद्ध में उन्हें अपने साये की तरह साथ रखता था|

शाही प्रबंध का उत्तरदायित्व[संपादित करें]

कई युद्धों में रायसल जी ने अकबर की जान बचाई जिससे वे अकबर उन्हें अपना सबसे ज्यादा विश्वासपात्र समझता था और इसी कारण वि.स. १६४० में अकबर ने अंत:पुर,राजमहल,खजाना और गृह विभाग का प्रबंध रायसलजी के अधिकार में दे दिया| शाहजादा मुराद तथा ख्वाजा अब्दुल सैयद भी इन कार्यों के प्रबंधन में राजा रायसल के साथ थे|

वृन्दावन में गोपीनाथ जी का मंदिर बनवाना व भूमि दान[संपादित करें]

राजा रायसल वीरता के साथ दानी व धर्मशील पुरुष थे भगवान गोपीनाथ जी उनका इष्ट था| अत: रायसलजी ने अपने इष्ट देव गोपीनाथ का वृन्दावन में लाल पत्थरों से युक्त एक भव्य मंदिर का निर्माण कराया| इस मंदिर का निर्माण बैसाख शुक्ला तीज वि.स. १६४२ में पूर्ण हुआ| मंदिर में भोग के लिए आपने सेवली गांव की तेरह हजार बीघा भूमि भेंट की| रायसलजी ने लोहार्गल में भी गोपीनाथ जी का एक मंदिर बनवाया था| वे जहाँ भी जाते वहां अक्सर मंदिरों, कवियों, ब्राह्मणों, साहित्यकारों आदि को भूमि दान में देते थे| अकबर के पुरे राज्य में उन्हें जमीन के पट्टे आवंटित करने का अधिकार था|

राजा रायसल के मनसब[संपादित करें]

राजा रायसल की प्रतिभा व कर्तव्य परायणता के चलते अकबर ने उन्हें २५०० जात व १२५० सवार का मनसब दे रखा था जो अकबर के बाद शाहजादा सलीम के जहाँगीर के नाम से गद्दी पर बैठते ही तीन हजार कर दिया गया| चूँकि शाहजादा सलीम को बादशाह की गद्दी पर बैठने में राजा रायसल का महत्तवपूर्ण हाथ था|

अंतिम समय[संपादित करें]

राजा रायसल जी मृत्यु कब कहाँ हुई इस संबंध में रहस्य ही बना है| वि.स.१६६५ में राज्य विस्तार हेतु जहाँगीर ने उन्हें दक्षिण में भेज दिया था जहाँ उन्होंने कई युद्धों में भाग लेकर विजय प्राप्त की| दक्षिण में बुरहानपुर नामक स्थान पर उनकी सैनिक छावनी थी| इतिहासकार उनकी मृत्यु बुरहानपुर में ही होने का अनुमान लगाते है| "केसरी समर" में रायसल जी का समय मृत्यु वि.१७५४ में लिखा है |यह काव्य ग्रंथ उनके सौ वर्षों बाद लिखा गया था| जहाँगीर नामा के उल्लेख, केसरी सिंह समर व कुछ ताम्रपत्रों के अध्ययन से विद्वान इतिहासकार राजा रायसल जी की मृत्यु वि.स.१६७८ में मानते है| राजा रायसलजी की मृत्यु के बाद उनके बारह पुत्रों में से सबसे छोटे पुत्र गिरधरदास खंडेला की गद्दी पर बैठे|

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

हिंदी ब्लॉग ज्ञान दर्पण
ब्लॉग राजपूत वर्ल्ड

सन्दर्भ[संपादित करें]

१- शेखावाटी प्रदेश का राजनैतिक इतिहास
२- राव शेखा
३- शेखावाटी प्रकाश
४- सीकर का इतिहास

५- गिरधर वंश प्रकाश

  1. http://en.wikipedia.org/wiki/Mundru