राजस्थान की आधुनिक कला का इतिहास

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भूमिका[संपादित करें]

कुछ सुस्पष्ट ऐतिहासिक कारणों से राजस्थान में परम्परागत-कला-शैलियों का असर इतना प्रच्छन्न था कि पांचवें दशक के अंतिम बरसों में जा कर कहीं ‘प्रयोगवाद‘ के नाम पर कला में आधुनिक या नई संवेदनाओं ने जगह बनाई और वह भी लगभग डरते-डरते, एक साफ-साफ आत्म-संदेह के साथ !

यही वह वक्त था जब कि तत्कालीन आधुनिक भारतीय कला में कई बेहद बड़े परिवर्तन घटित हो चुके थे। आजादी के आसपास सन् सैंतालीस में मुम्बई में ‘प्रौग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप‘ बना था और वहीं 1948 में इसकी पहली समूह प्रदर्शनी भी हो चुकी थी। फ्रांसिस न्यूटन सूज़ा ने एक जगह कहा है- ‘‘....प्रौग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप की स्थापना और भारत की स्वतंत्रता लगभग एक ही वक्त में हुई; यह बात सांकेतिक तो जरूर थी, पर थी बिल्कुल अनायास...‘‘

सर्वविदित है कि ‘पैग‘ के सदस्य चित्रकारों ने समूह के तौर पर (और व्यक्तिगत रूप से भी) भारतीय चित्रकला के उस मुहावरे को और आगे ले जाने और रूपांतरित करने में कितनी बड़ी भूमिका निबाही, जो कभी अमृता शेरगिल जैसे कुछ तत्कालीन भारतीय रचनाकारों ने रचा था। बहरहाल, राजस्थान में कला में नई सम्वेदना का दाखिला सन् साठ के बाद ही कहना चाहिए। जैसा कि हमने पहले कहा- परम्परा के बहुत गहरे और अक्षुण्ण असर के कारण राज्य में ‘नएपन‘ को ग्रहण करने का आवेग या परंपरा को पूरी तरह अस्वीकृत करने का ‘साहस‘ अपेक्षाकृत देर से जागा, तो वह सकारण था और इसमें ज्यादा कुछ भी आश्चर्यपूर्ण नहीं। यही वह दौर था, जब एक तरफ तो परम्परावादी चितेरे अपने कला-आग्रहों या व्यावसायिक तकाजों से परम्परा की लीक को मिटने से बचाने के लिए काम कर रहे थे, तो दूसरी ओर ‘अन्तर्राष्ट्रीयतावाद‘ के परिणामस्वरूप कला में नई संवेदना प्रवेश कर रही थी। बंगाल घराने की कला ने राजस्थान के अपेक्षाकृत वरिष्ठ चित्रकारों पर गहरा असर डाला, पर यह प्रभाव, प्रकारांतर से परम्परागत कला-मूल्यों का ही पोषक रहा।

सन १९६० से पहले सक्रिय कलाकर्मी[संपादित करें]

सन् साठ से कहीं पहले यहाँ रामगोपाल विजयवर्गीय (1905-2003), बी.सी.गुई (1910-1988), एल.आर.पेंढारकर, (1910-1994), मोनी सान्याल (1912-1989), भूरसिंह शेखावत (1914-1966), गोवर्धन लाल जोशी ‘बाबा‘ (1914-1998), आर.वी. साखलकर (1918-), देवकीनंदन शर्मा (1917-2005), द्वारकाप्रसाद शर्मा (1922- 2003) कृपालसिंह शेखावत (1922-2008) और पी.एन.चोयल (1924-) जैसे चित्रकार थे, जो परम्परा की राह से दाखिल हुए थे। किन्तु इन सब में अपवाद रहे- आर.वी. साखलकर (1918-) जिनके योगदान की बात किए बिना शायद यह चर्चा अधूरी रहे।

साखलकर ने कला-सम्बन्धी आलोचनात्मक-लेखन और आधुनिक-चित्रकला, दोनों क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य किया। ‘आधुनिक चित्रकला का इतिहास‘ और ‘कला-कोश‘ उनकी लोकप्रिय पुस्तकों में से हैं। यों सन् पचास के दशक में उनके चित्र कभी भी विषयमुक्त नहीं थे, पर अपनी कुल निष्कृति के आधार पर आर.वी. साखलकर की कला ‘अमूर्तन‘ की दिशा में सफर करती संवेदना का उदाहरण कही जा सकती है। सौभाग्य से वह हमारे बीच हैं और अपने चित्रकार रहे पुत्र सचिन साखलकर के साथ अजमेर में रहते हें।

आर.वी. साखलकर के चित्रों में हम जलरंगों के कुछ बेहतरीन संयोजन देखते हैं। इन चित्रों में उन्होंने अर्द्ध-अमूर्त आकृतियों का चित्रांकन किया है। रंगों के आकर्षक प्रयोग, विशेष रूप से गहरे रंगों में, आकृतियों को यहाँ बाहरी गतिमान काली रेखाओं के माध्यम से उभारा गया है। उनके कुछ प्रसिद्ध चित्रों में ‘चरागाह‘, ‘प्रातः-किरणें‘, ‘आवारा‘ और ‘वापसी‘ जैसे बहुत से चित्र शामिल हैं। 1989 में राज्य अकादमी ने इन्हें ‘कलाविद्‘ की सर्वोच्च उपाधि से भी सम्मानित किया।

द्वारकाप्रसाद शर्मा (1922-2003) परम्परागत चित्रकला के दरवाजे से कला में आए थे। उन्होंने कला की प्रेरणा एवं शिक्षा बीकानेर दरबार में रहे अत्यंत प्रतिभाशाली यथार्थवादी जर्मन चित्रकार ए. एच. मूलर से ली और बाद में मेडिकल कॉलेज, जयपुर में सेवा में आने के बाद से वह पूर्णकालिक कलाकार के रूप में रचनारत बने रहे। उनके रेखांकनों और तैलचित्रों में यथार्थवादी कला की खूबियों का सजीव प्रतिफलन है। द्वारकाप्रसाद शर्मा के युद्ध-विषयक चित्र, गाड़िया-लुहारों के रेखांकन और घोड़ों तथा ऊँटों का 'अध्ययन' विशेष रूप से उल्लेखनीय है, जिनमें वह चित्रांकन की रूढ़-शैलीबद्धता से अलग हुए जान पड़ते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि स्व. हुसेन के बहुचर्चित घोड़ों से कहीं पहले द्वारकाप्रसाद शर्मा ने भागते हुए घोड़ों के कई जानदार चित्र और काली-स्याही के रेखांकन बनाये थे।

रेखांकनों के संसार में लक्ष्मण राव पेंढारकर की कलम अनूठी थी। उन जैसे प्रतिभाशील सिद्धहस्त 'स्केचिस्ट' विरल होते हैं। राजस्थान की जनगणना के प्रकाशनों और लोक संगीत पर केंद्रित अपनी पुस्तकों में वरिष्ठ कलाविद-प्रशासक विजय वर्मा ने पेंढारकर से राजस्थान के जन-जीवन से संबद्ध अत्यंत जीवंत, काली स्याही के कई रेखांकन करवाए और छापे थे। पेंढारकर अंग्रेज़ी में समकालीन कला-गतिविधियों पर यदा-कदा ' लिंक' और 'महाराष्ट्र टाइम्स' आदि में टिप्पणियां भी लिखते रहे थे।

पिघलता हुआ गांव

वयोवृद्ध पी.एन.चोयल के तैलचित्र हमें ले जाते हैं- स्त्री की मनोदशाओं की उदासी, पसीजी हुई दीवारों और धुन्धमय भवन-आकृतियों में, जो पिघलते रंगों के टैक्सचर में जैसे भीग सी रही हैं। ‘उदयपुर-बोध‘ नामक इस श्रंखला में पी.एन. चोयल की रचनाओं का तेवर, हालाँकि पूरी तरह आकारविहीन या अमूर्त नहीं है, पर उन जैसे कलाकार से, जो सन् ‘50 के दशक में पौराणिक और धार्मिक विषयों को लेकर चित्र-रचना करता रहा था, बदले हुए अंदाज की उम्मीद बहुत जायज भी नहीं। ‘उदयपुर-बोध‘ इस समीक्षक की राय में, इनकी पर्याप्त सृजनशीलता श्रंखला है, जो ‘भैंसों‘ की तरह उतनी प्रसिद्ध तो नहीं, किन्तु फिर भी उसमें एक वरिष्ठ रचनाकार के बदले हुए चित्र-मिजाज की छवि देख पाना कठिन नहीं है। 1956 से 1960 के बीच पी.एन. चोयल ने भैंसों का गहरा ‘अध्ययन‘ किया था और भारत की भैंसों को लेकर बनाए गए चित्रों और रेखांकनों ने इन्हें पर्याप्त ख्याति भी दी। एक हृदयाघात के बाद उनकी चित्र-रचना के ढंग में आए बदलाव रेखांकनीय हैं। चेहरे खोते स्त्रियों के उनके कई चित्र उसकी सामाजिक पहचानविहीनता पर विचारशील कलाकार की सार्थक टिप्पणी जैसे हैं। वह केनवास पर धूसर और कभी गर्म रंगों से पिघले हुए दृश्य के बड़े प्रभावशाली रचनाकार हैं। कबंध मानव आकृतियाँ भी उनके यहां कई बार अलग तरह की संवेदना जगा देती हैं! वह आज भी सक्रिय हैं और अपने कलाकार पुत्र शैल चोयल के साथ उदयपुर में रहते हुए बराबर काम करते हैं।

सन् साठ के दशक का कला-परिदृश्य[संपादित करें]

राजस्थान ललित कला अकादमी

आधुनिक चित्रकला के विकास में और बातों के साथ-साथ जिसका योगदान उल्लेखनीय रहा, वह थी 1958 में 'राजस्थान ललित कला अकादमी' की स्थापना, जिसकी वार्षिक प्रदर्शनियों के जरिए बहुत से चित्रकारों और मूर्तिकारों को रचनाएँ करने और उन्हें प्रदर्शित करने का अवसर मिला। युवतर और सम्भावनाशाली छात्रों को प्रोत्साहित करने के लिहाज़ से कई बरस अकादमी ने अलग सालाना पुरुस्कार दिए और जयपुर के रवींद्र मंच पर समकालीन भारतीय कलाकृतियों की एक स्थाई कला दीर्घा स्थापित की, जिसकी ज़्यादातर कृतियाँ आधुनिक मुहावरे की हैं।

1958 में अकादमी के तत्त्वाधान में ‘आधुनिक‘ शैली के चित्रों और मूर्तिशिल्पों की एक समूह प्रदर्शनी आयोजित की गई, जिसमें 168 कृतियाँ शामिल थीं। मार्च, 1958 में ही 181 चित्रों तथा 42 मूर्तिशिल्पों की महत्त्वपूर्ण वार्षिकी भी जयपुर में आयोजित की गई, जिस में अपेक्षाकृत वरिष्ठ और परम्परागत शैली में काम करने वाले चित्रकारों के अलावा रणजीत सिंह, नारायण आचार्य जैसे चित्रकार और ऐयाज मोहम्मद जैसे मूर्तिकार भी थे। तिलकराज, सरला, राजेन्द्र मेहता और रमेश गर्ग आदि चित्रकार भी उसी दौरान सामने आए। यह देखना रोचक होगा कि इन्हीं वर्षों के आसपास अपेक्षाकृत छोटे शहरों में भी युवा कलाकारों में कुछ ‘नया‘ कहने का अनुराग जागने लगा, जहाँ कुछ बरसों पहले तक कला की दुनिया ठहरी-ठहरी और रूढ़ नजर आती थी।

पी.एन.चोयल ने लन्दन-प्रवास के दौरान और बाद में उदयपुर में ओमदत्त उपाध्याय की तरह, आबू के पी. मनसाराम ने मुम्बई के अपने छात्र-जीवन में, आर.वी. साखलकर ने अजमेर में, बीकानेर में द्वारकाप्रसाद शर्मा, नारायण आचार्य, प्रकाश परिमल, प्रेमचन्द गोस्वामी, आर.बी. गौतम और रंजन गौतम अदि ने नई संवेदना एवं शैलियों का काम रचने में पहल की। यद्यपि उस दौर में कई चित्रकर्मियों की रचनाओं पर समकालीन भारतीय एवं विदेशी चित्रकारों के ‘प्रख्यात‘ काम का सीधा असर था, पर इसकी आड़ में उनकी नई कला-पहल को नकारा जाना उनके साथ ‘ज्यादती‘ ही होगी।


कला में आधुनिक होने की पहल[संपादित करें]

राजस्थान की आधुनिक कला के छः दशक[संपादित करें]

सन् 1960 से 2010 के छः दशक राजस्थान की आधुनिक कला के लिए दो कारणों से महत्त्वपूर्ण कहे जा सकते हैं। एक तो यह कि इस अन्तराल में बहुतेरे उल्लेखनीय चित्रकारों का काम सामने आया और दूसरे यह कि यहाँ के कुछ चित्रकारों ने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाने के लिए निहायत मौलिक, अपनी निजी चित्रभाषा भी ईजाद की। इन्हीं वर्षों के दौरान विश्वविद्यालय-स्तर पर कला के अध्ययन-अध्यापन की भी शुरुआत हुई। कला के क्षेत्र में शोध और अनुसन्धान भी इसी अवधि में ज्यादा सामने आ पाए। आज राजस्थान में छोटे-बड़े ‘आधुनिक‘ शैली के शायद तीन सौ से भी अधिक चित्रकार हैं, किन्तु सरसरे तौर पर ऐसे कलाकारों का उल्लेख किया जा सकता है, जिनकी रचनाओं में अपनी चैत्रिक-निजता है अगर 'कथ्य' में नहीं, तो अंकन में तो अवश्य ही।

परम्परा का नवोन्मेष[संपादित करें]

सुमहेन्द्र ‘विषय‘ के तौर पर पर्याप्त नए भावों की सर्जना करते रहे हैं। उनके चित्रों में परम्परागत लघुचित्रों की खूबसूरती और अंकन-शैली को अति आधुनिक और बदले हुए जीवन-संदर्भों में प्रयुक्त करने का साहस देखने योग्य है।

हम आम तौर पर आधुनिक-कला से किसी किस्म के स्पष्ट राजनैतिक या सामाजिक संदेश को व्यक्त करने की अपेक्षा नहीं करते, इसलिए पहली बार में सुमहेन्द्र (जन्मः नायन-अमरसर। जयपुर, 1943) की कला से साक्षात्कार करते हुए उसमें निहित कथा के व्यंग्य भाव से रू-ब-रू होते हैं, तो उसे देख कर हम में समय की असंगतियों और गलीजपन का अहसास ही बरबस जाग उठता है। इनकी कला में सर्वत्र किसी न किसी तरह की आम्लिक-प्रतिक्रिया दिखलाई देती है-जो उन्होंने सामाजिक और नैतिक जीवन के अन्तर्विरोधों पर की है। इस मामले में उनकी कला 'सुझाववादी' है कि इसके माध्यम से सुमहेन्द्र हमें अक्सर अपने जमाने की विकृत असलियत के सामने ले जाने की कोशिश करते रहे हैं। कहीं-कहीं उनकी यह कोशिश सायास है, तो कभी प्रतीकात्मकता और निहित व्यंग्यार्थ के जरिए, इसी धारणा को गाढ़ा करने की इच्छा उपस्थित है। कभी-कभी हमें इनके चित्रों में एक सतही और अंगभीर टिप्पणीकार के उस मन का आभास भी मिलता है जो वर्तमान जिन्दगी के दोगलेपन और मान्यताओं के अवमूल्यन को ले कर बहुत कुछ बेलाग और सपाट ढंग से अपनी कला में कुछ कहने का प्रयास कर रहा है, पर विषय को ले कर इनमें जो नयापन है, वही इन्हें समकालीन चित्रकारों में एक अलग सा स्वर देता है।

निश्चत ही सुमहेन्द्र की कला में कोई ऐसे तत्व नहीं हैं, जो उसे ’प्रयोग’ के स्तर पर कोई वृहत्तर अर्थवत्ता देते हों, उनके चित्रों के कथानक से हमें अन्ततः सामयिक स्थितियों पर ’शिकायती’ शैली में टिप्पणी करने वाली एक सजग विनोदप्रियता का ही पता चलता है। परम्परागत चित्रांकन में निष्णात् होने के कारण सुमहेन्द्र के लिए कला में वैसे तो ’व्यावसायिकता’ के दरवाजे खुले हुए हैं ही, पर सिर्फ ऐसा ही न कर उन्होंने एक जागरूक और सम्वेदनशील कलाकार के रूप में कसैले यथार्थ पर जो चोट की है वह उनके कलाकार के भीतर की ’आदर्शवादिता’ की ओर भी इशारा करती है। ऐसा शायद इसलिए है क्योंकि स्थितियों की कड़वाहट के माध्यम से ऐसा संसार रच रहे हैं जो उन्हें मान्य नहीं है। सुमहेन्द्र की रचनाएँ कुरूप यथार्थ की अस्वीकृति में उठे हाथ की तरह हैं। इनके बावजूद इन कृतियों में प्रकारान्तर से एक ऐसा अचेतन स्वप्न भी तैर रहा है जो आदमी, संबंधों और चीजों के रिश्तों को उनके वास्तविक या ’आदर्श’ रूप में देखना चाहता है।

सुमहेन्द्र की एक खासियत यह है कि उन्होंने राजस्थान के परम्परागत लघुचित्रों ’मिनिएचरों’ की खूबसूरती और अंकन शैली को नए या बदले हुए जीवन-संदर्भों में प्रयोग करने का साहस संजोया है। एक परम्परागत चित्रकार का अपनी चित्र-रूढ़ि से निकलना काफी मुश्किल है, पर वह लघुचित्र-शैली की विशेषताओं का कुशलतापूर्वक ’उपयोग’ करते हैं। सुमहेन्द्र की कला में पारम्परिक-कला कोई साध्य नहीं, बल्कि साधन है। संयोजन, रंग-समझ और आकृतियों के नैन-नक्श यहाँ लगभग वैसे ही हैं जैसे किशनगढ़-कलम में बनते हैं, पर उनके पीछे जीवन-दर्शन की भिन्नता है। उनका उद्देश्य केवल लघुचित्रों का सुन्दर-संयोजन हमारे लिए नमूदार करना नहीं, बल्कि इन चित्रों के पारम्परिक पात्र भी आधुनिक जीवन के दंश से जैसे डंसे हुए से हैं। वे हमें सुन्दर होते हुए भी लगातार एक समसामयिक ’कुरूपता’ तक ले जाने की कोशिश करते हैं। वह हमारे भीतर या आसपास की कोई भी कुख्यात समसामयिकता हो सकती है- वर्तमान जीवन की विकृतियों का कोई भी बिम्ब। सुमहेन्द्र की सारी कला हमारे इसी समकालीन बदशक्ल यथार्थ से सीधी मुठभेड़ है।

जैसा हमने पहले कहा, किशनगढ़-शैली की विशेषताओं का क्रियाशील इस्तेमाल वह अपनी कृतियों में करते हैं। यहाँ नागरीदास और राधा जैसे पात्र भी मौजूद हैं, पर उनके पीछे भाव-भूमि की भिन्नता है। कहीं राधा लिपस्टिक से होंठ रंग रही हैं, तो लजाते हुए कहीं कृष्ण को ’निरोध’ का पैकट थमा रही हैं! इनकी कृतियों में वृद्ध और कृशकाय नागरीदास आपनी जगप्रसिद्ध प्रियतमा राधा की देह किसी धनाढ्य विलासी को बेचने को विवश हैं। यहाँ कामदग्ध रूपवती स्त्रियाँ और आदमी भी हैं, जो चट्टानों की ओट में छिप कर काम-ज्वर का इलाज ढूंढ रहे हैं। इनके कुछ चित्रों में नवधनाढ्यों, सैक्स-विकृतियों, शिक्षा की विसंगतियों और फैशन पर भी व्यंग्य कसा गया है। वर्ग-भेद और युद्ध को ले कर भी उन्होंने चित्र बनाए हैं, पर कुल मिला कर सुमहेन्द्र हमें एक सांस्कृतिक-धक्का जैसा कुछ ही देते हैं और अक्सर खिल्ली उड़ा कर खामोश हो जाने से आगे हमें इनकी ऐसी कलाकृतियाँ नहीं ले जातीं।

अस्वीकृति में उठा हाथ

सुमहेन्द्र की एक और सीरीज है-'रागमाला', जिसमें विभिन्न रागों और रागनियों को आधार बना कर चित्रों की रचना की गई है। यहाँ केसरिया, नीले, काले, बैंगनी और गहरे भूरे रंगों और पृष्ठभूमि का रचाव संबंधित राग की मूल प्रकृति को ध्यान मे रख कर किया गया है। सुमहेन्द्र ने इस शृंखला में आसावरी, भैरवी, मालकौंस और वसंत आदि जैसी कई रागों को प्रकृति के बिम्बों के माध्यम से व्यक्त किया है। ये चित्र, मात्र कैलीग्राफी या दृश्यों का अंकन नहीं है, अपितु इस सबको आधार बनाकर ‘रागमाला‘ जैसे परम्परागत विषय को लगभग अलग तरह से रचने की कोशिश की गई है। उनके इन चित्रों में चट्टानों या विशालकाय शिलाखंडों का अस्तित्व जैसे आवश्यक है। चाहे वह रागमाला हो या कोई अन्य शृंखला, पहाड़ कुछ इस तरह बनाए गए हैं कि वे सामने खड़े पात्रों की गतिविधियों को और उजागर कर देते हैं। चट्टानें और पर्वत तो जे. स्वामीनाथन् (1928-1994) के कुछ तैलचित्रों में भी अनिवार्य रूप से हैं-(पर उनसे यहाँ प्रभावित होने के बावजूद) चट्टानें उतनी लयात्मक और कथ्यात्मक नहीं हैं- वे केवल चित्र-पृष्ठभूमि के निर्माण की प्रक्रिया का ही अविभाज्य हिस्सा हैं। उनके टैक्सचर और प्रयोजन भी स्वामीनाथन् के शिलाखंडों से भिन्न हैं। सुमहेन्द्र के यहाँ न तो उतना सरलीकरण है, न ही उतनी रहस्यवादिता। इनके चित्रों में चट्टानों के अलावा उन पर उगे महीन टहनियों वाले चित्रोपम वृक्ष इस दृश्यावली को सरस अवश्य बनाते हैं। हाँ, मानव आकृतियाँ उनके कथानक का एक जरूरी हिस्सा हैं। ये पात्र प्रकृति की विराट निर्जनता के बीच संभोग जैसे ‘सांसारिक‘ क्रिया-कलापों में उलझे हुए हैं। सुमहेन्द्र ने अपने चित्रों में परम्परागत भवन-सरंचनाओं और नगर-बोध के संकेतों का भी उपयोग किया है, पर प्रकृति की ही तरह मकानों या परकोटों के रूपाकार भी चित्र के कथानक को ‘सहारा‘ देने के लिए ही हैं।

राजस्थान की चित्रकला की एक अति समृद्ध परम्परा रही है और दुनिया की चित्रकला में उसका सम्मानजनक स्थान है। यहाँ आज भी परम्परागत विभिन्न चित्र शैलियों में काम करने वाले हजारों कलाकार सक्रिय हैं और उसे अपनी जीविका का साधन बनाए हुए हैं। परन्तु इनमें से अधिकांश कलाकार अनुकृतियाँ करने वाले यांत्रिक-कलाकार ही हैं, किसी भी शैली का ऐसा रचनाशील कलाकार विरला है, जो परम्परा की विरासत को जीवन के नए संवेदों के लिए काम में ले रहा हो।

सुमहेन्द्र की सारी कला परम्परा की भित्ति पर टिकी होने पर भी परम्परागत नहीं है। उस में नए और समकालीन संदर्भों का प्रवेश है। आधुनिक जीवन के ये अनुभव, जो बदले हुए संसार के बिम्ब हमारे सामने खोलते हैं- उन्हें (कथानक के स्तर पर) परम्परा से विद्रोह करने वाले एक सजग कलाकार के रूप में अपनी जगह बनाने में मदद देते हैं। चाहे सुमहेन्द्र की कला में कहीं-कहीं नारेबाजी, पोस्टरीय सपाटता या विद्रूप या मुंहफट खुलापन हो- उनकी कला के मंतव्य, अन्यों से बहुत कुछ भिन्न हैं और शायद यही हो राजस्थान के समकालीन कला-परिदृश्य में उनकी विशिष्टता की वजह।


मौलिक और स्थानिक

जिन और चित्रकारों ने अपनी मौलिक कला-प्रतिभा का प्रमाण दिया है, उनमें दो चित्रकारों का नामोल्लेख यहाँ प्रसंगवश आवश्यक है। ये दो प्रमुख कलाकर्मी हैं- बसंत कश्यप और रामेश्वर सिंह ‘राजपूत‘।

रामेश्वर सिंह ने राजस्थान की परम्परागत लोक चित्रकला शैली ’पड़’ को कैनवास पर नए संदर्भों में प्रस्तुत किया है। यह पांरपरिक रूपाकारों से बनाई गई ’पड़’ कहीं-कहीं पर सावधानीपूर्वक जलाई या ’ब्लो’ की गई है। ’अग्निदग्धता’ सुनहरी कालिमा में लिपटी अवसान की देहरी पर खड़ी इस लोक-कथा-परम्परा के लिए शायद बहुत सटीक प्रतीक हो। अतीत की समस्त परम्पराएँ, आज निष्क्रमण के जिस ऐतिहासिक दौर से गुजर रही हैं, उसमें मूल्यों, मान्यताओं और लोक-विश्वासों का बदलाव या विलोप नितान्त स्वाभाविक है। रामेश्वर सिंह की कला में जो ‘पड़‘ अंकित की गई है- वह ’साध्य’ नहीं अपितु एक ’साधन’ है, संक्रमण के इस निर्णायक काल-चक्र की पृष्ठभूमि, जो हमें निरन्तर अपने संदर्भ-परिवर्तन के सच से साक्षात्कार करवाती जान पड़ती है। लोक-कला-परम्परा के अनुरूप वह फलक पर क्रमवार अंकित भी नहीं है। ‘पड़‘ के कुछ कथा-खंड अपने लिए रामेश्वर सिंह चुन लेते हैं, जिन्हें वह चित्रावकाश के अलग-अलग हिस्सों में अंकित करते हैं। परम्परागत कैलीग्राफी या चित्रलिपि भी इस सब के साथ जुड़ी है। रामेश्वर सिंह की कला में परम्परा बदलने का एक प्रबल बोध है, जब कि बसन्त कश्यप की कला के सबसे प्रमुख तत्त्व हैं- शिल्पाग्रह और लोक-चेतना।

बसन्त कश्यप के चित्र (जिन्हें चित्र न कह कर शिल्प-चित्र ही कहना अधिक ठीक होगा) सहज और सामान्य विषयों का आकृतिपरक लोक-बुनावट के साथ इतना भिन्न चित्रण है कि बहु-प्रचलित से नया भाव तुरन्त जाग उठता है। कठपुतली-कला से प्रभावित इनकी शिल्प रचनाओं की आकृतियाँ अपने रंग-बोध में भी लोक-कला की समृद्ध स्मृति जगाती हैं। किन्तु कथानक के चित्र-संदर्भ यहाँ सारे नए हैं। रेलगाडी़ के डिब्बे में यात्रारत-युगल उनका अपेक्षाकृत अधिक प्रिय विषय है। त्रिआयामी रचना के तौर पर इनके काम में बहुत दर्शनीयता है। तीखे और मूल वर्णां के उपयोग में उनकी दिलचस्पी गहरी है। वह चित्र की अन्तर्वस्तु को अधिकाधिक ‘दिखनौट‘ बनाने के लिए चीजें का कोलाज भी रचते हैं।

राजस्थान की परम्परागत चित्रकला, जैसा कि हमने पहले कहा, आज भी चित्रकारों की रचना की प्रेरणा बनी हुई है। नाथूलाल वर्मा, कन्हैयालाल वर्मा, शहजाद अली शीरानी, घनश्याम शर्मा, बी.पी. शर्मा, तेजसिंह, वीरेन्द्र शर्मा, रमेश ग्रामीण, ललित शर्मा, चन्दूलाल चौहान, हरीश वर्मा, लालचंद मारोठिया, रमेश वर्मा, छोटूलाल, फूलचंद वर्मा और हेमन्त ’चित्रकार’ (उदयपुर) आदि ऐसे ही कलाकार हैं, जिन ने पारम्परिक चित्रांकन को अपनाते हुए भी कुछ परिवर्तित ढंग से रचनाएँ बनाई हैं। यद्यपि इन सभी चित्रकारों में सुमहेन्द्र की तरह कुछ ’बोल्ड’ विषयों का अंकन नहीं है, पर पारम्परिक कला-शैलियों की ’सुन्दरता’ इनकी रचनाओं में अवश्य देखी जा सकती है। हालांकि यह भी सही है कि ये चित्रकार लगभग ’व्यावयायिक’ आग्रहों को ही लेकर कृतियाँ बनाते रहे हैं, पर राजस्थान की लघु-चित्र शैलियों की विशेषताएँ इनमें से कुछ कलाकारों की कृतियों में दृष्टव्य हैं। ये कलाकर्मी अलंकारिता, सजावटीपन और आकृतियों के अंकन में राजस्थान की प्राचीन कला-परम्परा से गहरे प्रभावित दिखलाई देते हैं।

ज्यामिति का रचनात्मक उपयोग[संपादित करें]

ज्यामिति का रचनात्मक उपयोग समकालीन कला की खासियत कही जा सकती है, जिसके प्रतिनिधि चित्रकारों में लक्ष्मीलाल वर्मा, चन्द्रमोहन शर्मा, रामावतार शर्मा और चम्पालाल मीणा जैसे कुछ कलाकर्मियों का नाम प्रमुख हैं। वर्मा ने ग्राफिक माध्यम में और मीणा ने रेखांकन में चित्र-रचना की है। तैलचित्रों में देवीलाल पुरोहित एवं विष्णुदत्त सोनी कभी केवल ज्यामिति में ही काम करने वाले कलाकार रहे हैं।

ग्राफिक चित्रांकन के क्षेत्र में राजस्थान के थोड़े से कलाकारों ने ही उल्लेखनीय काम किया है। लक्ष्मीलाल वर्मा (उदयपुर, 1944) का स्थान ऐसे ही गंभीर ग्राफिक कलाकारों में प्रमुख रहा है। वह पिछले कई वर्षों से अपने ग्राफिक छापों में कथ्य और उसके विविध प्रयोजनों को ले कर काम कर रहे हैं। उनका रास्ता सिर्फ ज्यामिति की उंगली थाम कर ही तय हुआ है, पर अपने छापों के लिए यदा-कदा वह उससे इतर विषय भी चुनते हैः कभी अर्द्ध-आकृति या फिर कोई अमूर्त दृश्य-चित्र।

प्रधान बात यह है कि लक्ष्मीलाल वर्मा अपनी रचनाओं में जिस बात को पैदा करते हैं वह अकस्मात् हमारे सपास के भौतिक जगत के किन्हीं जाने-पहचाने ज्यामिति पैटर्न की याद जगाती चलती है। ज्यामिति को ले कर जो बहुरूपता इनके काम में है वही इनकी एकमात्र खूबी है और लक्ष्मीलाल वर्मा के छापे देखते हुए हम कल्पना और स्ट्रक्चर के मेल से बने एक अलग स्वाद तक जा सकते हैं। इनके छापों में आयताकार, वर्गाकार, वृत्ताकार, त्रिकोणात्मक और दूसरी कई ज्यामितिक या केन्द्रीय-सरंचनाएँ मिलती है: कभी एक दूसरे पर हावी होती, कभी एक दूसरे को स्वीकार या ‘एकोमोडेट‘ करती, कभी एक साथ पास-पास गुंथीं और जमी। चित्रावकाश में व्यवस्थित होना इनका एक अलग गुण है। गहरे रंगों और उनकी रंगतों को काली रेखाएँ अनुशासित बनाती हैं और उनकी जगह छापे की मूल-संरचना में निर्धारित करती हैं। रंगों के आपसी अतिक्रमण से जो रंगतें वह कागज पर पैदा करते हैं- दृष्टि को परिप्रेक्ष्य की गहराई देती है। इससे न केवल ठस रूपाकारों की एकरसता ही भंग होती है, अपितु यह माध्यम पर उनके नियंत्रण की सूचना भी है।

कई दफा लक्ष्मीलाल रेखाओं का इस्तेमाल सतह के टैक्सचर की तरह करते हैं। रेखाएँ-जिनको गणितीय तरीकों से कागज पर बिछा कर उनके निहित सौन्दर्य को पहचानना और उनका प्रयोग अपनी ज्यामिति के निमित्त कर लेना अक्सर उन्हें आता है। अमूर्त अभिव्यंजनाओं के ये स्वरूप इन्हें कई बार तंत्र चित्रांकन की चेतना के बगल में ला खड़ा करते हैं- उस ‘शास्त्रीय‘ अर्थ में तो नहीं, जिस में तंत्र-परम्परा को व्याख्यायित किया जाता रहा है- पर पदार्थ और चेतना के सम्मिलित प्रभावों के सहारे केसरिया और काले रंग-आयोजनों की मदद से शायद हम इस नतीजे पर पहुंचना चाहें। कथ्य को अधिकाधिक विरल बना कर उसे ‘महत्त्वहीन‘ बना डालने की प्रवृत्ति भी लक्ष्मीलाल वर्मा में है। इसके छापों में बहुधा कथ्य इतना संकेतात्मक है या घट कर साधारण महत्त्व का रह गया है कि वह किसी ‘वृहत्तर‘ अर्थ को हमारे लिए प्रस्तुत नहीं करता। केवल कुछ श्लथ स्पंदनों के अमूर्त टुकड़े एक अजीब बिखराव और गुन्थाव में तैरते से नजर आते हैं, ऐसा लगने लगता है कि वह ज्यादा वजन केवल ज्यामितिक आकारों की अलग-अलग परिधियाँ नापने पर ही देते रहे हैं, क्योंकि हैं भी वह मूलतः ज्यामितिक कल्पनाओं को साकार करने वाले कलाकार ही। ऐचिंग, वुडकट, लिथोग्राफ और दूसरी तकनीकों से बनाए गए छापों में लक्ष्मीलाल वर्मा अपनी रचना-दुनिया को भरने के लिए कई स्तरों पर ज्यामितिक रूपों को उभारते हैं। अगर उनके यहाँ छापे का आधार आयत है, तो उस पर हल्की वर्गाकार आकृतियाँ और गोलाकार रेखाओं से उस स्पेस को अधिक भीड़ भरा बनाया गया है। कहीं-कहीं वर्मा के छापों में ज्यामिति का आग्रह इतना प्रबल है कि वे ‘डिजाइन‘ होने का भ्रम देने लगते हैं। वैसे ज्यामिति का यह एक गोपन खतरा ही है कि उसके असावधान प्रयोग से बनती हुई बात ‘बिगड़‘ सकती है और पेन्टिंग सिर्फ एक रूपांकन या डिजाइन भर बन कर रह जाती है। बहुधा इन्होंने केन्द्रीय संयोजन में ही रचनाएँ की हैं- जिसमें आकारों को काफी सोच-समझ कर जमाया-जन्माया गया है। लक्ष्मीलाल वर्मा के छापों में एक रैखिक शिल्पी की सी चेतना है। वह मेहनत और लगन के साथ अपनी बात कहना चाहते हैं। उनमें एक प्रयत्नसाध्य कसावट है। इसीलिए लक्ष्मीलाल वर्मा हमें रेखाओं के एक अनगढ़ सौन्दर्य से नहीं, बल्कि पूर्व नियोजित रचना-विन्यास से जोड़ते हैं। ज्यामिति की सृजनशीलता का उपयोग करते हुए इनके छापे हमें किंचित भिन्न दृश्यात्मक प्रभावों की तरफ खींच ले जाते हैं, इसलिए लक्ष्मीलाल वर्मा का काम राजस्थान के ग्राफिक कलाकारों की वर्णमाला में एक अलग हिज्जे की तरह है।

चम्पालाल मीणा के स्याही रेखांकन इसके विपरीत अधिक ‘गणितीय‘ तरीके से आकृतियों के दोहराव और उनकी पुर्नरचना का उदाहरण हैं। व्यावसायिक तौर पर की जाने वाली डिजाइनिंग से अगर इनकी कला अपना स्वतंत्र कद विकसित कर सकती, तो चम्पालाल एक सशक्त ज्यामिति रचनाकार होते, पर वह चित्रांकन-यात्रा में अब थम गये हैं।

विष्णुदत्त सोनी के कैनवासों में प्रमुख रूप से वृत्ताकार रूपों का सतरंगा उपयोग रहा है। मूल और गर्म रंगों के प्रयोग से वह फलक की पूरी-पूरी स्पेस को भरते हैं। ‘तनाव‘ शीर्षक से चित्र-शृंखला में अब्दुल करीम एक असाधारण खिंचाव का कौशलपूर्ण बिम्ब जगाते आ रहे हैं।

बोल्ड प्रकृति रूपों का सजीव चित्रण, समदर सिंह खंगारोत ‘सागर‘ के यहाँ है। स्पष्ट तौर पर वह उभरी और ऐंठी हुई विशाल चट्टानों का अंकन करते हैं।

यथार्थवादी कला की दुनिया में स्व. बृजमोहन, सत्यपाल वर्मा और खंगारोत की सिद्धहस्तता और कौशल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। यों तो जयपुर में खेतांची जैसे ‘व्यावसायिक‘ दृष्टि से राजसी सुंदरियों का कौशलपूर्वक अंकन करने वाले चित्रकार भी हैं, पर सत्यपाल वर्मा और समदर सिंह खंगारोत ने राजस्थान के ऐतिहासिक किलों, अरावली की वृहदाकार चट्टानों और आंचलिक जनजीवन के रोजमर्रा दृश्यों को सधे हुए कौशल से व्यक्त किया है।

गणित के प्रोफेसर, दिलीप सिंह चौहान के चित्रों में उपस्थित रहतीं हैं- बहुधा कबंध मानवाकृतियाँ, जो बंधनशील मनुष्य के सन्ताप और पराजित जिजीविषा का प्रतीक हैं। श्लथ होते शरीराकार जैसे मानवीय संघर्ष की निरर्थकता, उसके सम्पूर्ण व्यर्थता-बोध और हमारी उद्देश्यहीन लड़ाई की अभिव्यक्ति बन जाते हैं। मानव-अस्तित्व की संवेदनाओं के प्रति सजग, ज्यामिति और ‘जीवन‘ का संयोग इनकी रचनाओं में दर्शनीय है।

'अतियथार्थवाद‘ की संचेतना

दुष्यन्त सिंह के ग्राफिक छापे और चित्र, बहुधा ‘फोटो यथार्थ‘ की मौजूदगी के जरिए सघन दृश्यात्मकता उकेरते हैं। चीजों और आकृतियों का एक अनोखा मेल इनके यहाँ है। इनकी कृतियों की अन्तर्वस्तु और उसके लिए ‘रूप‘ की खोज प्रेक्षक के लिए बड़े रोचक अनुभव खोलती है। अपने छापों में वह किसी स्वतःस्फूर्त (अनौपचारिक) अमूर्तन के नहीं, बल्कि विचारपूर्वक गढ़ी गई एक पूरी ‘दृश्यमाला‘ के पक्षकार नजर आते हैं।

लगभग इसी चेतना के दो चित्रकार हैं-सुरजीत चोयल और चन्द्रमोहन मिश्रा। अगर वर्गीकरण की भाषा में कहना लाजिमी हो, तो हम कहेंगे कि दुष्यन्त सिंह और सुरजीत चोयल दोनों ही अपने कई चित्रों या छापों में ‘अतियथार्थवाद‘ की संचेतना जगाने वाले चित्रकार हैं।

दुष्यन्त सिंह में यह आग्रह जहाँ सांकेतिक और तरल है, वहीं शैल चोयल की चित्रकार पत्नी सुरजीत चोयल में बहुत प्रकट और मुखर। सुरजीत के तैलचित्र मानव अस्मिता की आन्तरिक विडम्बनाओं के भावपूर्ण अंकन हैं। उनके यहाँ ‘विषय‘ बहुत महत्त्वपूर्ण है। कथानक की पूरी गहराई के साथ वह हमें ले जाती हैं- एक असमंजस और अधूरेपन में जहाँ अवकाश है, खालीपन है-और है एक खास किस्म की भविष्यहीनता ! इनके तैलचित्र मानव-त्रास और अकेलेपन की आत्मीय अभिव्यक्तियाँ हैं। विकास भट्टाचार्य से सीधे-सीधे प्रभावित होने के बावजूद सुरजीत चोयल पूरी संवेदनशीलता और कलात्मकता के साथ दर्शकों के लिए रचतीं हैं, मानव-अस्तित्व के शीतयुद्ध के ऐसे क्षण, जिनके सामने ठहर कर किसी भविष्यविज्ञानी की तरह अपने आपके बारे में ‘आहत‘ हुआ जा सकता है। पुरानी सीपिया रंग की तस्वीरों और ऐतिहासिक छायाचित्रों से प्रेरणा ले कर प्राचीन को नये अर्थ देने वाले इनके कई उल्लेखनीय चित्र हैं।

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युवा चित्रकार गौरीशंकर सोनी की रचना : छाया : हे. शे.

सुभाष मेहता के रेखांकनों व तैलचित्रों में रही हैं- ज़ीब्रा-धारियों से रंगमंडित सुडौल, सजीव निर्वसनाएँ, जिनके चहरों की जगह उगे हुए हैं- समुद्री-पौधे ! फर्श के किनारे पर लेटे, खड़े या इन निर्वसनाओं के उड़ते हुए शरीर कैनवास पर आलौकिक मंजर उत्पन्न करते हैं। वह अतीन्द्रिय फैन्टेसी के कलाकार रहे हैं। ‘नाटकीयता‘ का तत्त्व सुभाष मेहता की कला में अधिक प्रखर है। उनके चित्र हमसे बहुत कुछ कहते और हमारी कल्पना के लिए भी बहुत गुंजाइश छोड़ते हैं। ग्रीक और यूनानी फरिश्तों की सी ज़ीब्रा निर्वसनाएँ इनके कैनवासों में किसी न किसी हलचल और मकसद से आबद्ध जान पड़ती हैं। ‘फैशन-मॉडलिंग‘ जैसी कृत्रिमता, अगर इन नारी शरीरों में नहीं भी है, तब भी वे एक अलौलिक रचना-सृष्टि की प्रतीक जरूर हैं। स्याह-सफेद में कभी सुभाष मेहता ने इस स्वनिल कथा-लोक को एक बेहतरीन बनगट के साथ उपजाया था। शायद इसी से ‘चित्रात्मकता‘ औरों की बजाए सुभाष मेहता की कला में तब बहुत अधिक थी। अपने दूसरे कला-दौर में नाथद्वारा में जन्मे सुभाष मेहता (1950) ने श्रीनाथ जी और उनकी झांकियों का पारम्परिक चित्रण करने वाली नाथद्वारा-कलम से प्रेरणा लेते हुए, श्रीनाथ जी (कृष्ण) के विविध रूपों को एक्रिलिक ज्यामितिक संरचनाओं के भीतर कुछ अलग हट कर प्रस्तुत किया है। यहाँ कई बार श्रीनाथ जी से सम्बद्ध चिर-परिचित प्रतीक और वस्तुएँ ही कैनवास पर उभरी हैं- श्रीनाथ जी नहीं, परन्तु एक सीमित कथावस्तु का अदल बदल कर चित्र-संरचना में इस्तेमाल सुभाष मेहता की अपनी निजता तो है ही।

बनाया गया नहीं, बुना गया है चित्र

यहीं एक और विशिष्ट चित्रकार-सुरेन्द्रपाल जोशी (1958) के चित्रों के बारे में प्रयाग शुक्ल की टिप्पणी को यथावत् दिया जाना उपयुक्त होगा, जो उन्होंने इनके 1989 में आयोजित एकल प्रदर्शन पर लिखी थी- ’’चित्र-धरातल को अब वह बडी़ लगन और संवेदना के साथ तैयार करते हैं। आकृति-मुद्राएँ भी अब अधिक जीवंत लगती हैं। यहीं नहीं, वह निजी चित्र-भाषा की खोज करते हुए भी जान पड़ रहे हैं। यही उल्लेखनीय है। हर कलाकार अपनी चित्र-भाषा की खोज करते हुए कोई-न-कोई तरीका या लहजा अपनाता है। सुरेन्द्र का लहजा क्या है? जाहिर है कि वह आकृतियों की सांकेतिक भाषा से अपने अनुभवों को व्यक्त करना चाह रहे हैं। अंकन के स्तर पर कभी-कभी ये आकृतियाँ कठपुतली नाटकों के पात्रों की तरह भी लग सकती हैं। शायद ये हैं भी, वैसी ही। पर हम यह भी जानते हैं कि कोई भी कठपुतली तब प्राणरहित नहीं होती, जब किसी अनुभव को व्यक्त करने का माध्यम बन जाती है। ये आकृतियाँ भी माध्यम हैं। अकाल, बालू-कण, धूप-चांदनी-अंधेरा, रोजमर्रा का साधारण जीवन और इस जीवन के कुछ उपकरण - इस सबके अनुभव भी इन चित्रों में कहीं हैं। और आकृतियों की सांकेतिक-मुद्राओं के साथ हमें चित्र-धरातल या कुछ चित्र-स्पेस पर भी नजर रखनी है। वहाँ भी कुछ-न-कुछ घटित हो रहा है। चित्र-धरातल यहाँ जमीन की तरह ही है, वह कोई नाटकीय परदा नहीं हैं और आकृतियों का स्वरूप भी कठपुतली पात्रों जैसा भले हो, पर वे भी मंच पर न होकर इस यथार्थ जमीन पर ही हैं। अनुभवों को रखने का इस प्रकार का लहजा सुरेन्द्र को एक सम्भावनामय कलाकार बनाया है। रंगों पर भी गौर करें। पकी मिट्टी के से रंग या मद्धिम आँच में तपे हुए से ये रंग भी क्या स्वयं कलाकार के अनुभवों के तपने और पकने का संकेत ही नहीं दे रहे ? ’’

सुरेन्द्र जोशी की ताजा रचनाओं के बारे में कला समीक्षक हेमंत शेष ने ‘समकालीन-कला‘ 2005 (नई दिल्ली) में यों लिखा था- ’’ यह बात याद रखी जानी चाहिए कि स्वभाव से अत्यन्त विनम्र और संवेदनशील सुरेन्द्रपाल जोशी (जन्म: 1958) गांव मनियारवाला, उत्तरांचल) ने कैनवास और रंगों के पारम्परिक बर्ताव को बहुत पहले छोड़ दिया था, जब वह म्यूरल निर्माण के प्रशिक्षण-सृजन के काम में जुटे थे। यह सिर्फ संयोग भर नहीं कि उनके वर्तमान काम पर म्यूरल निर्माण के दौरान काम ली गयी बहुत सारी रचना-सामग्री और अनुभवों की छाप है। उनके यहाँ चित्र बनाया गया चित्र नहीं ‘बुना‘ गया चित्र ही है, जिसमें प्रयोजनपूर्वक काटे गये कपड़े, कतरनें, धागे, ऊन, बटन, वस्त्रों के छापे, कीलें, नट और बोल्ट तक बहुतेरी चीजें शामिल हैं। सामग्री की यह ‘साहसिकता‘ निश्चय ही कला में आधुनिक होने की ही पहल है-खास तौर पर तब जब कि अनगिनत जाने-माने चित्रकार भी अपने बन्धे-बन्धाये चित्र-ढर्रे और पिटी-पिटाई लीकों पर चलते जाने का लोभ नहीं छोड़ पा रहे।

मिश्रित माध्यम में सुरेन्द्रपाल जोशी की इस रचनाशील पहल से ही सम्भव हो सका है कि हम यहाँ लोक की और नागर संचेतना की याद एक साथ कर लेते हैं। पर लोक का यथार्थ यहाँ रचना के कथानक और माध्यम दोनों ही से प्रच्छन्न रूप से जुड़े होकर भी अपनी उपस्थिति का ढिंढोरा नहीं पीटता। वह मार्मिक ढंग से रोटी में नमक जैसा प्रशान्त और ‘जरूरी‘ ग्राम्य-बोध है। बहुत स्थूल ढंग से कहें तो इस चित्र-दुनिया में सुरेन्द्रपाल हमें जिस अनुभव से जोड़ना चाहते हैं, वे बुनियादी तौर पर रंग और टैक्सचर ही हैं, विविध आकृतियों और रूपों में। वे सर्वव्याप्ति का बोध हमारे भीतर जगाते हैं, पर कुछ याद रखने लायक रंग-बंदिशों के साथ। भित्तिचित्रों और लोक-कला की बहुतेरी अनुगूँजें यहाँ इसलिए भी आप देख-सुन सकते हैं कि पहाड़ के अपने पुराने दिनों की छाप चित्रकार पर गहरी है। और कविता में कहूँ तो ‘स्मृति में होना ही मनुष्य होना है‘।’’

सुरेन्द्रपाल जोशी के शुरुआती काम में मनुष्य जीवन की त्रासद विडम्बनाओं का चित्रण था और कठिनतर होते जाते आसपास के प्रति एक अजीब अवसाद बोध से घिरा मन। पर बाद में क्रमशः उनके यहाँ और जीवन-स्वादों के अनुभव भी जुड़े ही। ‘काठ होते लोग‘ उनके रेखांकनों की पहली चित्र प्रदर्शनी का शीर्षक था, जो लखनऊ के फुटपाथ पर 1984 में आयोजित की गयी थी। जैसा कि एक समीक्षक ने ‘दिनमान टाइम्स‘ में लिखा था: ‘‘....1984 में ही सुरेन्द्र ने लखनऊ कला महाविद्यालय से पेन्टिंग की पढ़ाई पूरी की थी। एक दिन लखनऊ के एक व्यस्त चौराहे पर सुरेन्द्र ने एक ठेले वाले को एक दुर्घटना का शिकार होते हुए देखा। ठेले वाले को चोट तो ज्यादा नहीं लगी, पर ठेले का कचूमर निकल गया। सुरेन्द्र के संवेदनशील मन में एक दृश्य, अंकित हो गया। ठेले के टूटे हुए पहिये को ठेले वाले की आँखें अजीब तरह से देख रही थीं, जैसे उसका सब कुछ लुट गया हो। ‘काठ होते हुए लोग‘ प्रदर्शनी की रेखांकन-शृंखला की शुरुआत यहीं से हुई। अलग-अलग रंगों के कार्बन का इस्तेमाल करके चम्मच से खास तरह से घिस कर सुरेन्द्र जोशी ने आदमी और उसके पहिये की दुनिया का मार्मिक चित्रण किया।... पहिया बाद में सुरेन्द्र के कैनवास पर भी आया।....‘‘ इस टिप्पणी में जहाँ एक रचनाकार की चित्र-प्रेरणाओं की तरफ समीक्षक का इशारा स्पष्ट है, वहीं एक संवेदनशील कलाकर्मी के मन-मस्तिष्क की बनावट की ओर संकेत भी। पर मेरी धारणा यह है कि समीक्षक की उक्त बात में यह तथ्य भी छिपा है कि सुरेन्द्रपाल जोशी जैसे चित्रकार रचना-सामग्री के वैविध्य और उससे पैदा होने वाले प्रभाव के ‘नयेपन‘ को भी बराबर उचित तरज़ीह देते आ रहे हैं। सुरेन्द्रपाल जोशी के म्यूरल इसी बात के साक्ष्य हैं।

1995 में महीनों की मेहनत से बनाये 565 वर्गमीटर आकार के जयपुर के ‘इंस्टीट्यूट ऑफ हैल्थ मैनेजमेंट एण्ड रिसर्च‘ के आरम्भिक म्यूरल ‘शहर से परे‘ से लेकर बाद तक के कामों में सुरेन्द्रपाल जैसे अपने को बहुत देर न दुहराते हुए रोचक ढंग से अपनी बात कहना चाहते आ रहे हैं। शेखसराय स्थित ‘तेल भवन‘ का उनका 66 फीट लम्बा और 6 फीट चौड़ा लकड़ी में निर्मित भित्तिचित्र कलाकर्मी की मेहनत और महारथ का सबूत है। मानवाकृति को बदलने, तोड़ने और बरतने में जहाँ उनकी कुदरती दिलचस्पी है, वहीं अमूर्त के प्रति भी कोई दुराग्रह नहीं। वह बहुत कुछ लोक के सहज ढंग से रंगों, रेखाओं, आकृतियों, अनाकृतियों और टेक्सचर का मेल करते हैं। उनके पुराने चित्रों की संरचनाएँ हवा में झूलती-सी जान पड़ती थीं, तो कभी मोटी या बोल्ड रेखाएँ हुसेन सरीखे कलाकारों की याद जगाती लगती थीं, पर शुभ है कि उनका इधर किया जा रहा काम किसी और चित्रकार के काम से नहीं मिलता।

राजस्थान में रहने वाले कलाकारों-विद्यासागर उपाध्याय, शैल चोयल, अब्बास अली बाटलीवाला, अंकित पटेल, किरण मुर्डिया, सुरेश शर्मा, बसंत कश्यप, अशोक गौड़ आदि के बाद सुरेन्द्रपाल जोशी की कृति का भारत-त्रैवार्षिकी 2005 में चयन किया जाना उसी सम्मान की बात है जिसके हकदार निस्संदेह वह हैं। इस ‘सफलता‘ में सुरेन्द्रपाल जोशी की अपनी मौलिकता अर्जित करने के लिए तय की जा चुकी यात्रा के ही पदचिह्न हैं। एक ऐसा सफर जिसे एक प्रशान्त चित्रकर्मी ने बहुत धीरज, लगन और मेहनत से अब तक तय किया है। ‘‘

कोलाज और ज्यामिति[संपादित करें]

सुभाष केकरे और चन्द्रमोहन शर्मा के अलावा एक समय डॉ॰ मनोज ने कोलाज तकनीक को लेकर कुछ दिलचस्प संरचनाएँ तैयार की थीं। लम्बे समय तक चन्द्रमोहन शर्मा और सुभाष केकरे इसी तकनीक से जुडे़ रह कर चित्र-रचना करते रहे हैं।

चन्द्रमोहन शर्मा अधिकतर काली स्याही से रेखांकन भी करते रहे हैं और मिश्रित माध्यम में उनका जुड़ाव साफ-सुथरी रेखाओं से है। वह काली स्याही के प्रयोग के साथ अमूर्त भावों को उत्पत्र करने वाली वस्तुओं और आकृतियों का चित्रांकन करते हैं। यदा-कदा इनके चित्रों में तंत्र विशेष रूप से पारम्परिक भारतीय ’यंत्रों’ की प्रेरणाएं भी देखी जा सकती हैं। आधुनिक कला और परम्परा के मेल की बानगी देखनी हो तो शायद तंत्र-चित्रकला इस चीज का सर्वाधिक उपयुक्त उदाहरण होगी। यह कला-मुद्रा पश्चिम के अनुसरण की बजाए, हमारी अपनी परम्परा से चित्र-अभिप्रायों की खोज करती दिखलाई देती है। पर यह रास्ता उतना आसान नहीं। परम्परा- जो अपने संस्कार और स्वरूप दोनों में महान है, रचने की स्फूर्ति भी देती है और कथ्य-सामग्री भी; किन्तु बिना उसके दर्शन को आत्मसात् किए हम रस्मी तौर पर ही उससे जुड़ते हैं। दोहराव, उथलापन और जल्दी आ जाने वाली सीमाएँ हमें मार्ग ही में अपना शिकार बना सकती हैं। राज्य में स्व. रामचरण व्याकुल जैसे भी कई चित्रकार हुए हैं, जो तंत्र चित्रकला की बारीकियों को बूझे बिना केवल औपचारिक तंत्र-प्रतीकों का ठस इस्तेमाल करते रहे थे। पर गम्भीर कलाकर्मियों की बात करते उन्हें चर्चनीय क्यों माना जाए ?

परिप्रेक्ष्य-चेतना, आधुनिक चित्रकार के निकट एक ऐसी वस्तु-सत्ता है जिसकी बहुआयामिता बहुत से कलाकारों का ध्यान अपनी तरफ खींचती रही है। चित्र-रचना के दो-आयामी यथार्थ से कुछ चित्रकार संतुष्ट नहीं होते। वे ज्यामिति के उपयोग से कथानक को अधिक गहरा और बहुआयामी बनाना चाहते हैं। ऐसे लोगों के निकट ज्यामितिक संरचनाओं का अपना महत्त्व है। वर्ग, आयतें, समानान्तर और आडी़ या खडी़ रेखाओं के सधे हुए रचावों से चित्र के विषय को, जो कलाकार गहराई से व्यक्त कर रहे हैं, उनमें रामावतार सोनी जैसे लोगों के नाम गिनाए जा सकते हैं जो इधर निष्क्रियप्राय हैं। रामावतार अधिकतर आसमानी और नीले रंगों को ही काम में लेते रहे हैं। आधुनिक जीवन से जुडी़ हुई जो भवन-संरचनाएँ या वास्तुशिल्प हैं, उनके प्रति रामावतार का जैसे एक रागात्मक लगाव है। उनकी, ज्यामिति के प्रति यह सम्प्रक्ति देखने योग्य तीन आयामी वास्तुरचनाओं के कुछ नए दृश्य उपजाती है। सोनी के इस चित्रों में हम जैसे टाइलों से निर्मित एक निस्तब्ध और मानव-उपस्थित से पूरी तरह वंचित भवनशिल्पों, आधुनिक स्नानगृहों या दालानों और कक्षों को देख सकते हैं। यहाँ एक ही रंग प्रमुखतः नीले, की ’रंगतों’ के उपयोग से प्रकाश और छाया के कुछ अलग चाक्षुष प्रभाव उपजाए गए है।

ग्राफिक माध्यम के रचनाकार[संपादित करें]

ग्राफिक माध्यम में जो चित्रकार रचनाएँ रचते रहे हैं, उनमें पी. मनसाराम, भवानीशंकर शर्मा, विद्यासागर उपाध्याय, विनय शर्मा, (स्व.) आनन्द शर्मा, युगल किशोर, हरशिव शर्मा, हरिशंकर गुप्ता, दिलीप शर्मा, अब्दुल मजीद, आदि जैसे सक्रिय कलाकारों का नाम लिया जा सकता है। कोलोग्राफ का बहुत रचनात्मक उपयोग (तकनीक के स्तर पर) राजस्थान के कुछ युवतर चित्रकारों ने किया है।

हरशिव शर्मा (1969) ने अपने कोलोग्राफ छापों में प्रकृति के कई आकर्षक बिम्ब रचे हैं। वह अक्सर वनस्पतियों-विशेष रूप से पत्तों को लेकर छापे बनाते रहे हैं। इनके यहाँ एक सघन भीड़ भरी सृष्टि है, जिसके भीतर पत्तों और वनस्पतियों के आपस में गुंथे हुए रूपाकार बड़े अर्थवान् बन पडे़ हैं। अपनी प्राध्यापक पत्नी अर्चना जोशी के साथ वह इधर एक अनियतकालिक अंग्रेज़ी कला-पत्रिका का सम्पादन-प्रकाशन भी कर रहे हैं।

गोपाल शर्मा (1965) के छापों में सैरे चित्रित हैं, तो दक्षा पाराक्षर (1963) के कोलोग्राफ पूरे कागज पर सघनता से फैली हुई अमूर्त रूपाकृतियों को उकेरते हैं। यहाँ टैक्सचर और रंगों को तन्मयता से आकारों के साथ जोड़ा गया है। इन छापों में कहीं-कहीं बादलों और दरख्तों की उपस्थिति है।

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विनय शर्मा की एक चित्र-कृति : छाया : हे. शे.

यह पूछा जा सकता है कि विनय शर्मा के इधर के इस नए काम में ऐसा क्या है, जो इन्हें अपने समकालीनों, यहाँ तक कि खुद विनय के कुछ पुराने ग्राफिक-काम से अलग करता है, इसका जवाब है: उनके इन चित्रों में आया समय-बोध! ये सारा उपक्रम एक तरह से प्रकृति के बहाने काल-ऊर्जा को ही पकड़ने और परिभाषित करने का है- प्रकृति जैसे इस कोशिश का बहाना भर ही है। दृश्यावलियों या सैरों की रचना विनय शर्मा का अभीष्ट निःसन्देह नहीं है- बल्कि दृश्यों के पीछे छिपे दृश्यों के चित्रकार वह हैं- यहाँ पुराना भी नया किया गया है और सब कुछ परिचित होते हुए भी बहुत सा अपरिचित है। विनय उसी अपरिचय से हमारा परिचय कराते हैं- इनके छापों में ‘समय-बोध‘ के बहुत सर्जनात्मक इस्तेमाल से। इन चित्रों में अगर प्रकृति के विविध रूपाकार हैं, तो हम यहाँ प्रकृति की गति और उसकी जटिल, संश्लिष्ट, परिवर्तनकामी शक्तियों को भी देख पाते हैं: उसकी संस्थिर एकात्मकता, आन्तरिक हार्मनी और ऊर्जा को भी। यह पहचानना भी खासा दिलचस्प है कि विनय शर्मा का इधर का यह काम न किसी पूर्ववर्ती के काम से मिलता है और न ही इस मौलिकता से इधर के युवा चित्रकारों के काम से। यहाँ वास्तव में कोई नई सी बात घटित हुई है। इस लिहाज़ से विनय शर्मा की यह श्रंखला एक प्रतिभावान् संवेदनशील और अध्यवसायी कलाकर्मी की प्रयोगशीलता का विश्वसनीय प्रमाण है। एक ऐसा प्रयास जो मिश्रित माध्यम की खूबियों का सृजनात्मक उपयोग कर पाने के ‘विवेक‘ से निर्मित है। तैलरंग, स्याही, क्रेयन्स, जलरंग, सैरीग्राफ आदि माध्यमों को कुशलता से उपयोग में लेते हुए विनय सचमुच के ऐतिहासिक दस्तावेजों, जन्मपत्रियों, बहियों, फ़ारसी में लिखे स्टाम्प पेपरों, कानूनी इबारतों, अंग्रेज़ी राज के पोस्टकार्डों, वस्त्र छपाई के ब्लॉकों आदि को जिस समझदारी से चित्र-फलक पर लाते हैं वह समय-बोध के बहुतेरे अनसुने मर्मों का स्मरण है। आकस्मिक नहीं कि इन सारे चित्रों में हम काल, मनुष्य और प्रकृति तीनों की सत्ताओं के आपसी अन्तर्संबंधों का सरस, रंगमय और गहरा साक्षात्कार करते हैं।

संख्या में विपुल रचना करने वाले राज्य के एक और, लगभग उपेक्षित और कम चर्चित कलाकार के संबंध में लिखा जाना चाहिए था, वह हैं-जगमोहन माथोड़िया, जिनके चित्रों और रेखांकनों के विषय हैं-प्रकृति के रूप, चाहे वे कुत्ते हों या हंस, नर-नारी आकृतियों का रूपायन, जगमोहन इधर अमूर्त अंकन की तरफ़ भी झुके हैं- और ड्राइ पेस्टल रंगों में उनके नए चित्रों की शृंखला रंगमय अमूर्त रूपाकारों से बनाई गई है। यह याद करना दिलचस्प है अपनी चित्र यात्रा की शुरूआत जगमोहन ने स्याही रेखांकनों द्वारा शहरी भवनों, बहुमंज़िला इमारतों और महानगरीय आकाश-रेखा पर अक्सर दिखते दृश्यों से की थी, बाद में वही महानगर-बोध उनकी बाद की चित्र-श्रंखलाओं में पक्षियों के रूप में उभरा। जगमोहन माथोड़िया (1959, बाराँ) की दीर्घ कला-यात्रा का साक्ष्य उनके द्वारा बरते गए कई माध्यमों से भी मिलता है। उन्होंने तैलचित्रों, स्याही, पैंसिल, ड्राई-पेस्टल और जलरंगों में रचनाएँ की हैं। खास तौर पर कुत्तों को लेकर विपुल संख्या में बनाए गए उनके चित्रों की हैरतंगेज़ रूप से बड़ी संख्या का उल्लेख‘लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड‘ में भी किया गया है। ज्यामितिक रूपों से अपनी कला-यात्रा का प्रारंभ करने वाले इस चित्रकार की रचनाएं, प्रकृति के विविध रूपों पशु-पक्षियों, मनुष्यों, स्त्रियों, युगल-दम्पतियों, मेले और त्यौहारों और देवी-देवताओं पर केन्द्रित रही हैं और बेहतरीन क्षमताओं के बावजूद उन जैसे लगनशील की उपेक्षा समकालीन कला-समीक्षा की दयनीयता ही दर्शाती है। कुत्तों को लेकर बनाई गई अपनी बहुप्रशंसित शृंखला में जगमोहन माथोड़िया ने ‘कुत्ते‘ के माध्यम से बहुत से सामाजिक-सांस्कृतिक-राजनैतिक पक्षों, विशेषतः मानवीय क्रियाकलापों और सरोकारों पर सशक्त टिप्पणी की है।

कम्प्यूटर पर कला[संपादित करें]

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हेमन्त शेष की एक कंप्यूटर चित्रकृति







आधुनिक रचना माध्यम कम्प्यूटर पर सफलता से रचनाएं करने वाले नेशनल स्कूल ऑफ फैशन टेक्नोलोजी, दिल्ली के स्नातक पारिजात देवर्षि जयपुर मूल के अलबेले और अनूठे युवा कलाकर्मी हैं। उनकी दिल्ली में आयोजित एक बडी साइबर कला प्रदर्शनी में परिजात ने हिन्दू देवताओं की रूपवादिता को गहरे सांस्कृतिक और वर्तमान आशयों के साथ मूर्त किया है। वह 21वीं सदी की भविष्यगामी कला के ऐसे प्रतिनिधि कहे जा सकते हैं, जो चित्रकारों के बीच मान्य और लोकप्रिय होने की अब भी बाट जो रहे माध्यम, कम्प्यूटर की अनगिनत संभावनाओं के प्रति गम्भीरता से उत्सुक दिखलाई पडते हैं। पारिजात का डिजिटल-संसार संश्लिष्ट है: वहां आने वाली दुनिया के अनदेखे दृश्यों के चित्रावकाश में रंगों, आकृतियों और कैलीग्राफी का साधवपूर्ण उपयोग है! कोटा की युवा चित्रकार मुक्ति पराशर ने भी इस दिशा में उल्लेखनीय काम किया है। वह कोटा में अपने कम्प्यूटर चित्रों का प्रदर्शन भी आयोजित कर चुकीं हैं।

राजस्थान के दूसरे प्रमुख सक्रिय रचनाकार[संपादित करें]

स्व. पी पी एस कोटावाला, स्व. रघुनन्दन शर्मा, स्व. वेदपाल शर्मा ‘बन्नू’, स्व.मालाराम शर्मा, स्व. घनश्याम शर्मा और स्व. ब्रजमोहन ('मोर') आदि यथार्थवादी शैली के चितेरे थे तो किसी न किसी भिन्न मुहावरे की खोज में निरत रमेश सत्यार्थी, रणजीत सिंह, सुनीत घिल्डियाल, प्रकाश परिमल, अशोक आत्रेय, कृष्णचन्द्र जोशी, सुब्रतो मंडल, वीरेंद्र शर्मा, चन्द्रप्रकाश चौधरी, एकेश्वर हटवाल, हेमंत शेष, हर्ष छाजेड़, अशोक हाजरा, शैलेन्द्र भटनागर, प्रफुल्ल कुमार सिन्हा, राकेश कुमार सिंह, अनुपम भटनागर, सुशील निंबार्क, युगलकिशोर शर्मा, राजेन्द्रपाल सिंह राठौड़, ब्रजसुन्दर शर्मा, शिवकुमार गाँधी, अब्बास अली बाटलीवाला, सी.एस. मेहता, श्याम मालव, चिमन डांगी, दीपक खंडेलवाल, मुकेश शर्मा, कुमार अशोक, ओम चौहान, त्रिलोक श्रीमाली, भंवरसिंह राठौड़, आर.डी.पुरोहित, धर्मेन्द्र राठौड़, डॉ॰ अमित राजवंशी, देवेन्द्र कुमार खारोल, अनिल मोहनपुरिया, लोकेश जैन, आशीष श्रंगी, लक्ष्यपाल सिंह, निरंजन कुमार, प्रहलाद शर्मा, प्रमोद सिंह, मदन मीणा, अम्बालाल दमामी, नरेन्द्र अमीन, आनंदीलाल वर्मा, कान्तिचन्द्र भारदवाज, किशोर सिंह, कैलाशचंद शर्मा, गौरीशंकर सोनी, सुरेश जोशी, चेतन पाटीदार, तेजसिंह, त्रिलोक श्रीमाली, दीपक भट्ट, फूलचंद वर्मा, बंशीलाल शर्मा, मनीष शर्मा, मोहम्मद सलीम, युगलकिशोर शर्मा, रघुनाथ, राजाराम व्यास, रामानुज पंचोली, रामावतार शर्मा, ललित शर्मा, विजय शर्मा, विनोद कुमार गोस्वामी, विष्णु प्रकाश माली, वीरेंद्र नारायण शर्मा, शिवशंकर शर्मा, सी पी चौधरी, सुधीर वर्मा, सुरेश पाराशर, प्रणय गोस्वामी, प्रेम सिंह चारण, पी.सी. किशन, रूपेश भावसार, किशन मीना आदि के काम भी देखे जाते रहे हैं। इनमें से प्रायः सभी ने समय-समय पर आयोजित समूह प्रदर्शनियों और बहुतों ने अपने एकल चित्र प्रदर्शनों के अलावा विभिन्न कला दीर्घाओं में संकलित अपने कामों के माध्यम से अपनी कलाकृतियों से प्रेक्षकों को परिचित करवाया है। यहाँ स्थानाभाव के कारण इन सबके वैयक्तिक योगदान का विस्तृत विवरण दे पाना कठिन है, पर इन सभी के अपने काम से राज्य का कला क्षितिज किसी न किसी रूप में सम्पन्नतर ही हुआ है!

प्रमुख महिला चित्रकार[संपादित करें]

दीपिका हाजरा, उषा डी. सिंह, आभा मुर्डिया, मीना बया, संगीता जुनेजा, सपना शर्मा, मंजु शर्मा, रेखा पंचोली, आदि के अलावा कृष्णा महावर, किरण सोनी गुप्ता, ममता चतुर्वेदी, मीनू श्रीवास्तव और जॉली भंडारी, कुछ अन्य प्रमुख महिला-चित्रकार हैं। नीरजा सूद, वीनू कुमार, ऋतु जौहरी, रीता वैश्य, कुक्कू माथुर, शीला शर्मा, मोनिका चौधरी, अर्चना कुलश्रेष्ठ, नीलकमल, शैला शर्मा, पुष्पा भारद्वाज, युगप्रभा, अनुपमा जैन, दक्षा पाराशर, मणि भारती, सुरभि बिरमीवाल, शालू सक्सेना, अर्चना जोशी, ऋचा भारद्वाज, रेखा भटनागर आदि भी कलाकर्म में कभी सक्रिय थीं।


देखने की बात है कि जिस तरह उषा रानी हूजा ने मूर्तिशिल्प के क्षेत्र में ख्याति अर्जित की थी, उतना ही उल्लेखनीय काम राजस्थान में ’माध्यम’ को लेकर कुछ अन्य महिला चित्रकारों ने भी किया है। मंजु मिश्रा ने पेपरमैशी के उपयोग से ग्राम्य-प्रतीकों, लोक कला और अन्य आकृतियों का त्रिआयामी अंकन किया है। वीरबाला भावसार ने नदी की रेत और जया व्हीटन ने थर्मोकोल का रचनाशील उपयोग किया था।

वीरबाला भावसार की कला इस अर्थ में महत्त्वपूर्ण है कि माध्यम के प्रति एक विशिष्ट लगाव और रचाव इनके यहाँ है। स्मृतियों, भवनों के भग्नावशेष और ग्राम्य-गंध इनके चित्रों में मुखर है। यहां लोक-प्रतीकों को अपेक्षाकृत अलग माध्यम से रूपायित किया गया है। वह लोक और ग्राम्य-कला के मांडनों या अल्पनाओं, गुफाचित्रों की लिपियों और दूसरे आदिवासी प्रतीकों को नदी की रेत और संगमरमर के मिश्रण के सहारे उपजाती हैं। वह आदिवासी अंचल के अनेकानेक बिम्ब रेत के माध्यम से रचती रहीं हैं।

सुन्दरता की खोज ही कला का असल अभिप्राय है

जया व्हीटन के चित्र हालाँकि पहली बार में तकनीक या कथानक के कोई अनजान समीकरण नहीं खोलते, किन्तु फिर भी यहाँ किसी न किसी रूप में आकृतियों का होना और उनका प्राणवान बने रहना अवश्यम्भावी है। वह रूढ़ अर्थों में कोई ‘अमूर्त’ चित्रकार नहीं हैं। इनकी रचनाओं में सर्वत्र आई हैं- कुछ मूर्त, दर्शनीय आकृतियाँ, जिनकी खूबसूरती ही जया व्हीटन के चित्रों की प्रेरणा है। ये आकृतियाँ हैं-ऊँटों और घोड़ों की, या थिरकते हुए 'लाल' मोरों की। भारतीय देवी-देवताओं में गणेश इन्हें बड़े प्रिय हैं।

‘‘ ....गणेश -पूजा किसी भी नए काम की शुरुआत में जैसे शुभ होती है, उसी तरह हर नई सीरीज शुरू करने से पहले में 10-15 कैनवासों पर लगातार गणेश तो पेन्ट करती ही हूँ।....’’ वह बतलाती हैं। अपनी नवीनतम श्रृंखला में तो कुछ समय से वह केवल ‘स्त्री’ का ही चित्रण करती आ रही थीं।

इनके सब कैनवासों पर तैलरंग हैं। पर 1966 से यहाँ तक आने के लिए उन्होने लम्बा रास्ता तय किया है। टैक्सटाइल-डिजाइनिंग, आन्तरिक साज-सज्जा तथा बातिक जैसे व्यावसायिक काम करने के अलावा, क्रिंकल-ग्लास पर म्यूरलों का निर्माण भी वह कर चुकी हैं। सिल्क-पेंटिंग और सैरेमिक्स में भी जया व्हीटन की दिलचस्पी रही है। इतने माध्यमों में काम कर लेने के बाद भी नवीन तैलरंगों में वह बहुत सीमित, किन्तु सार्थक कोणों से वह अपनी बात कहती हैं। उनके चित्रों में किसी भी किस्म की फैषनेबल ‘उद्देष्यवादिता‘ नहीं है और न ही रचनाओं के माध्यम से चित्रकार सुमहेन्द्र की तरह वह हमारे लिए कोई सामाजिक या राजनैतिक सन्देश ही देना चाहती हैं, पर ‘सुन्दरता’ की अविकल खोज ही इन कैनवासों का असल अभिप्राय है। यहाँ खूबसूरती किसी भी मनोहर आकृति, दृश्य या रंग मात्र से उपज सकती है। जरूरी नहीं कि इसके लिए कैनवास पर सुन्दर स्त्री का होना अपरिहार्य हो। इसलिए यह आकस्मिक नहीं है कि अब तक के उनके कला-सफर के तीन बड़े पड़ाव रहे हैं: पशु पक्षी, देवी-देवता और स्त्रियाँ। ध्यान से देखें तो इन तीनों में स्वयं ही किसी न किसी तरह के चाक्षुष सौन्दर्य की खूबी अन्तनिर्हित है। गणेश अपनी विशिष्ट देहाकृति या मुखाकृति को लेकर कर कला-अर्थों में जितने सरस और सम्पन्न हैं, उसी तरह मोरों या ऊंटों के झुण्ड भी हमें एक खूबसूरत नैसर्गिक छवि से मुखातिब करते हैं। और एक सुन्दर स्त्री अपनी देह-आकृति, सम्वेदना और भावों की आन्तरिकता में तो सदैव दर्शनीय है ही। कहने का भाव यही है कि एक व्यावसायिक प्रशस्तता और आकृतिमूलकता के उपरान्त भी जया व्हीटन के चित्र हमें सहजता और 'सौन्दर्यपूर्ण यथार्थ' से मिलवाते हैं।

स्त्रियाँ, जया व्हीटन का प्रियतर विषय हैं। यहाँ नितान्त पारम्परिक परिधानों से सजी-धजी स्त्रियों को उनकी निजता और स्वायत्तता के साथ चित्रित किया गया है। उनकी स्त्रियों की मृखाकृतियों या आँखों में कहीं कौतूहल की चमक है, तो कहीं बेचैनी और विषाद की घनी छायाएँ। जया व्हीटन के ये चित्र स्त्री की बदलती हुई मनोदशाओं के रंगीन आईने हैं। उनमें हम आभूषणों से लकदक एक पारम्परिक स्त्री की उदासी और स्मित-हास्य को साथ-साथ महसूस कर सकते हैं। यहाँ औरतों की आभूषणों और वस्त्रों से सुसज्जित आकृतियों में एक किस्म के छायांकन-यथार्थ का जो भाव है, वह पहली बार में शुद्ध व्यावसायिक है, पर लावण्यमयी नारी की मनोदषाओं की अभिव्यक्ति की कोशिश इस श्रंखला में की गई है, इसलिए अंततः इसे हम सौन्दर्य और टैक्सचर से भरी हुई एक समान्तर मार्मिक चित्रसृष्टि के रूप में भी पहचान सकते हैं।

वह अपने चित्रों में रंगों और रंगतों के अलावा टैक्सचर पर भी विषेष बल देती आई हैं। यहाँ चीजों को उभारा ही टैक्सचर के सहारे गया है। यहाँ तक कि आकृतियों की बाहरी-रेखाओं को भी सीधे टयूब रंगों के रिलीफ प्रभाव से उकेरा गया है। इन रेखाओं में आत्मविश्वास, अल्हड़पन और स्फूर्ति है। अक्सर उनके अंकन में हमें जिस अलंकरणप्रियता और सजावट के दर्शन होते हैं- शायद उनका उद्देश्य कथानक की ‘रूपवादिता’ में इजाफा करना ही रहा हो।

‘‘ .....सुन्दरता की खोज ही मेरी कला का असल अभिप्राय है, कला देखने वाले पर किसी न किसी तरह का कोई भी प्रभाव डालती है तो वह सफल है, पर खूबसरती की कीमत पर मैं कोई समझौता नहीं करती....’’ जया व्हीटन कहती हैं।

जहाँ तक उनकी इस बात का सवाल है कि कला की सार्थकता किसी न किसी तरह की चाक्षुष-सुन्दरता में ही निहित है, हम उनकी रचनाओं के माध्यम से ही इस बात को और सफाई से समझ सकते हैं। वह अपने पात्रों के अलंकरणों और आभूषणों को भी उस तत्परता और सचेत प्रयत्न द्वारा चिन्हित करती हैं जितनी कि पात्रों की मुखाकृतियों या उनके भावों को। चित्र में सुन्दरता की उनकी अवधारणा षायद यही है कि चित्र के हर हिस्से पर बराबर ध्यान दिया जाए और कैनवास पर आई स्त्री का हर हिस्सा 'सौन्दर्यमंडित और अलंकृत' हो। इसलिए यह अकस्मात् नहीं है कि जया व्हीटन कहीं-कहीं इस आग्रह में व्यावसायिकता के निकट पहुँच जाने वाले अति-अलंकरण से नहीं बच पातीं और नारी-सुलभ-पच्चीकारी ही ऐसे चित्रों की निष्कृति बन जाती है, लेकिन अपने कई तैलचित्रों में इस ‘खतरे’ से बची भी रह सकी हैं, इसलिए जया व्हीटन में अपनी समूची ‘स्थूल’ दृश्यात्मकता के बावजूद कथ्य को रूपायित करने का संकल्प है। लाल रंग के मोरों, ऊँटों और घोड़ों को ले कर बनाए गए चित्रों में जया व्हीटन इनकी आकृतियों को उनकी गतिपूर्णता में चित्रित करती हैं। यहाँ भी रंग-उभार के द्वारा मूल आकार उकेरे गए हैं जिनकी पृष्ठभूमि में दमकते हुए लाल, नीले और रंग हैं।

जया व्हीटन की सारी कला में एक व्यावसायिक ‘मूर्तभाव’ है जो रूढ़िगत अर्थ में उन्हें अमूर्तन से नहीं, बल्कि आकृतियों की खोज से सम्बद्ध करता चल रहा है। इसी दिशा में उनकी कला-निरन्तरता को देखते हुए यह अस्वाभाविक नहीं लगता कि सुन्दर आकारों के इसी तकाजों को लेकर जया व्हीटन अपने आगे आने वाले काम में कुछ ऐसी अनछुई धारणाओं तक पहुँचने की कोशिश करें जो उन्हें कभी वरिष्ठ महिला कलाकारों में एक अलग अर्थवत्ता दे।

दुर्भाग्य से पिछले दो तीन दशकों से उनका कोई काम सार्वजनिक-प्रदर्शन के रूप में नहीं आया है और यही एक वजह है कि एक समय ‘स्वांतः सुखाय’ सक्रिय वयोवृद्ध जया व्हीटन अब राजस्थान के कला-संसार की विस्मृति के अंधेरे में खो सी गई हैं।

वनस्थली में चित्रकला का अध्यापन कर रही इला यादव के तैलचित्रों में हम अत्यन्त विरल और लगभग पारदर्शी रंगतों की एक ऐसी दुनिया देखते हैं, जहाँ रंग और आकृतियाँ एक दूसरे में जैसे खो रही हों। इनके यहाँ बहुत ही हल्के और पारभासक वर्णों का कुशलतापूर्वक ’उपयोग’ करते हुए खिड़कियों, अचल-जीवन और मनुष्य के आसपास के वस्तु-लोक का ’अप्रचलित’ अंकन दिखलाई देता है। ऐसा लगता है जैसे वह सवेरे की धूप में नहाई हुई चीजों को अपनी रचनाओं में निरन्तर सामने लाती रही हैं। इनके यहाँ गहरे रंग नितान्त अनुपस्थित हैं। सौम्य रंगों का स्वभाव पहचानते हुए चीजों को एक-दूसरे में मिलाना इला के इन चित्रों की अपनी विशेषता है।

इला की तरह ही, वनस्थली की दूसरी कला-प्राध्यापक चित्रकार, इन्दु सिंह ग्राफिक छापों में बेहतरीन काम करती रही हैं। इनके यहाँ आकृतियां अनुपस्थित नही हैं, पर वे इतनी मूर्त भी नहीं कि हम तुरन्त उन्हें आकृतिपरक चित्रकार के रूप में पहचान लें। इन्दु सिंह के इन ग्राफिक छापों में, जो ऐचिंग-तकनीक की प्रायः सभी खूबियों से सम्पन्न हैं, इला यादव ही की तरह रोजमर्रा जीवन की परिचित वस्तुएँ अभिव्यक्त हुई हैं। वह रंगतों और उष्ण रंगों को खुल कर काम लेती हैं। यहाँ यदा-कदा ज्यामिति भी है। किन्तु वह लक्ष्मीलाल वर्मा जैसे चित्रकारों की ज्यामिति से अलग है। हवा में झूलती हुई लालटेन का बिम्ब इनके कुछ छापों में एक अलग तरह की संवेदना उत्पन्न करता रहा है। चीजों के गतिमय होने और निरंतर किसी परिवर्तन से जुडे़ रहने का भाव भी इन्दु सिंह के कुछ एक छापों में देखा जा सकता है।

एक अन्य चित्रकार मीनाक्षी भारती की प्रारंभिक कृतियों की सबसे बड़ी विशेषता है- सघन अंधेरा और उसमें खोती हुई संवेदना। सम्पूर्ण अवकाश को वह अंधकार की अभेद्य चादर लपेटती हैं। कभी-कभार बीच में से उभरने वाले मूर्त-अमूर्त वानस्पतिक आकार उनकी इस अंधेरी सृष्टि का क्रम भंग करते जान पड़ते हैं। मीनाक्षी भारती के बाद के कला दौर में अफ्रीका-प्रवास के अपने अनुभवों के अलावा, स्थापत्य की छवियों, रेत और पश्चिमी राजस्थान के ग्राम्य जनजीवन का अमूर्तन है। उनके प्रायः 10 वर्षों पुराने काम में परिवर्तन की एक आहट है। कला-समीक्षक मनमोहन सरल ने उनके चित्रों के विषय में लिखा था "कविता जैसे ही रागात्मक हैं मीनाक्षी के कैनवास, रेत के विभिन्न रंगों के, पत्थरों की दीवारों के और राजस्थान के लोक कला वाले चित्रों के साथ मिल कर अनोखी बुनावट की है इन चित्रों में जो ऐक्रेलिक रंगों से बने हैं।" इसी तरह एक समीक्षक विनोद भारद्वाज का कहना है "मीनाक्षी अपनी कला में कभी ‘लाउड‘ नहीं रही हैं। एक बहुत कोमल और बारीक संवेदना है उनकी। काले-सफेद और धूसर रंगों से वह चटख रंगों की ओर भी बहुत धीरे-धीरे और एक लंबे रचनात्मक संघर्ष के बाद आई हैं। मीनाक्षी के रचना-संसार को जैसलमेर की हवेलियों, किले और उजाड़ ने नये टैक्सचर दिये, रंगों की नई और लगभग जादुई रोशनी भी दी। जैसलमेर की यात्रा के बाद रंगों का लगभग आश्चर्यजनक विस्फोट भी मीनाक्षी की कला में देखा जा सकता है।"

राजस्थान की प्रमुख कला-संस्थाएँ[संपादित करें]

राजस्थान स्कूल ऑफ आर्ट्स, (जयपुर), ’फेस’, ’तूलिका कलाकार परिषद्’, ’टखमण-28’ (उदयपुर), ’कलावृत्त’ (जयपुर), ’धोरा’ (जोधपुर), ’रंगबोध’, (कोटा), ’मयूर-6’ (वनस्थली), ’आज’, ’कैनवास’ ’आकार’ (अजमेर), ’आदर्श-लोक’ (बीकानेर) जैसी संस्थाएँ राजस्थान में सक्रिय रही हैं। इनमें ’टखमण-28’ (1968), ’तूलिका कलाकार परिषद्’ (1958), ’प्रौग्रेसिव आर्टिस्ट्स ग्रुप’ (1970), ’मयूर-6 (1980), ’आकार’ (अजमेर), प्रमुखतम हैं, जिन्होंने अपने सदस्य चित्रकारों के माध्यम से समसामयिक कला-चेतना को विकसित करने में उपयोगी भूमिका अदा की है।

सन सत्तर के दशक में इंदुभूषण गोस्वामी द्वारा संयोजित बीकानेर की संस्था ’आदर्शलोक’ तो सिर्फ बच्चों की चित्रकला प्रदर्शनियों और तत्स्थलीय बालचित्र प्रतियोगिताओं का आयोजन करने की दिशा में अपने तरह की पहली और एकमात्र कला-संहति थी। वनस्थली विद्यापीठ की कला के विकास में अपनी भूमिका है- खास तौर पर भित्ति-चित्रों को लेकर प्रायः हर बरस आयोजित किये जाते रहे फ्रेस्को शिविरों के सन्दर्भ में।

इन कला-इकाइयों की वार्षिकी प्रदर्शनियों और कलाकार-शिविरों के आयोजनों के अलावा बीच बीच में चित्रकला विभाग, राजस्थान विश्वविद्यालय, कानोडिया महिला महाविद्यालय, इंडिया इंटरनेशनल कोलेज फॉर गर्ल्स, महिला पोलिटेक्नीक, नीरजा मोदी इंटरनेशनल स्कूल, जयपुर आदि शिक्षण-संस्थाओं ने भी समूह प्रदर्शनियां आयोजित करते हुए राजस्थान में कला-परिवेश को सक्रिय बनाया है।

एक समय बीकानेर में चित्रकार किरण सोनी गुप्ता और कोटा में वीनू कुमार ने आधुनिक कला के प्रति सामान्यजन में उत्सुकता जगाने की दृष्टि से चित्रकार-शिविरों और कला-प्रदर्शनियों का सफल आयोजन किया था। इसी तरह के प्रयास ‘आज’ और ‘आकार’ कला-समूहों द्वारा द्वारा अजमेर जैसी जगह में भी हुए हैं, जहाँ आज तक भी कोई कला-दीर्घा नहीं है! अनेक कलाकारों ने इस बीच अपने काम के दर्शक और संग्राहक (क्रेता) पैदा किये हैं और कई कलाकारों की अपनी वेबसाइट हैं।

कला-दीर्घाएँ[संपादित करें]

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व्योम कला दीर्घा, जयपुर: छाया :हेमन्त शेष

जयपुर में राजस्थान ललित कला अकादमी और जवाहर कला केंद्र के अलावा कोटा में राजकीय स्तर की बेहतरीन कला दीर्घाएं बनाई गयी हैं, परन्तु बीकानेर अजमेर और जोधपुर जैसे बड़े शहरों में चित्र प्रदर्शनियां आज भी 'सूचना केंद्र' में लगाई जाती हैं! उदयपुर में पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र की एक कला-वीथिका है जिसके एक भाग में चित्रों की स्थाई प्रदर्शनी है। व्यावसायिक कला-दीर्घाएं चला कर बहुआयामी कला-गतिविधियां संचालित करने की गरज से आरम्भ कुछ पुरानी कला-वीथिकाएँ बंद हो चुकी हैं वहीं इस दिशा में जयपुर में संगीता जुनेजा की (‘जुनेजा आर्ट गेलेरी’) नीरजा कुदाल की (‘समन्वय’ आर्ट गेलेरी), सौम्या शर्मा की 'कलानेरी' कलादीर्घा और विनय शर्मा की (‘व्योम आर्ट गेलेरी’) का नाम प्रमुखतम है जो अभी चल रहीं हैं! कुछ निजी कला दीर्घाएं उदयपुर में भी सक्रिय हैं। प्रतिभाशाली चित्रकार संगीता जुनेजा की आमेर में एक समय जोर शोर से शुरू की गयी दूसरी दीर्घा ‘आर्ट-चिल’ अज्ञात कारणों से बंद की जा चुकी है!

कला-समीक्षा और पत्रकारिता[संपादित करें]

समकालीन कलाकारों के काम की चर्चा करते हुए यहाँ प्रसंगवश कला-आलोचना की स्थिति के बारे में टिप्पणी करना भी शायद उपयुक्त हो। यह सही है कि राजस्थान में चित्रकारों की संख्या तो अच्छी-खासी है, पर कला-समालोचना के क्षेत्र में उतना उत्साहवर्धक काम नहीं हुआ। यहाँ कला से सम्बन्धित पुस्तक-प्रकाशनों की हाल भी चिन्ताजनक है।

किन्तु ऐसे निस्पन्द प्रकाशन-परिवेश में जिस सम्पादक की ऐतिहासिक भूमिका कही जा सकती है, वह थे- स्व. श्रीगोपाल पुरोहित। ललित कलाओं और संस्कृति के अन्यान्य पक्षों से गहरी सम्प्रक्ति रखने वाले श्रीगोपाल पुरोहित, एक समय में जैसे सारे राजस्थान की कलाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों के प्रचारक और पोषक थे। राज्य के प्रसिद्ध पत्र ‘राजस्थान पत्रिका‘ (दैनिक) और बाद में ‘इतवारी पत्रिका‘ (साप्ताहिक) में प्रकाशित होने वाली संस्कृति-सम्बन्धी-सामग्री के नियमित प्रकाशन का श्रेय स्व. श्रीगोपाल पुरोहित को ही है, जिन्होंने सबसे पहले 1974 में सुप्रसिद्ध कला समीक्षक हेमंत शेष से कला पर साप्ताहिक स्तम्भ-लेखन करवाया, जो बरसों तक जारी रहा। राजस्थान में पहली बार शुरू किए गए इस नियमित कला-स्तम्भ के माध्यम से यहाँ की चित्रकला सम्बन्धी गतिविधियों के प्रचार-प्रसार और प्रोत्साहन में मदद मिली।

कोटा जैसे औद्योगिक शहर में रहते हुए रामकुमार जैसे लोगों ने भले हाडौती पर ही सही, एक क्षेत्र की कला प्रतिभाओं पर यथावसर लिखा। रामकुमार अन्ग्रेजी में भी कभी कभार लिखते रहे, हाडौती जैसे क्षेत्र के लिए समीक्षा में उनकी अपनी जगह थी।

प्रो॰ आर. वी. साखलकर ने यहाँ प्रारम्भ में आधुनिक चित्रकला पर आलोचनात्मक लेखन की पहल की थी। वह स्वयं एक अच्छे चित्रकार रहे हैं और उनका योगदान राज्य में आधुनिक कला-आलोचना का विकास करने के संदर्भ में विषेष महत्व का है। प्रारम्भ में हम कह चुके हैं कि प्रो॰ साखलकर की पुस्तक ‘आधुनिक चित्रकला का इतिहास‘ (राजस्थान हिन्दी ग्रन्थ अकादमी से प्रकाशित) बहुत उपयोगी प्रकाशनों में से एक है। इसमें उन्होंने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर कला में घटित हुए प्रमुख आंदोलनों और धाराओं के अलावा ऐसे प्रायः सभी चित्रकारों की चर्चा की है, जिनका समकालीन विश्व चित्रकला की शक्ल बदलने में ऐतिहासिक योगदान रहा है।

यहाँ यह भी देखना दिलचस्प होगा कि कुछ चित्रकार कला-समीक्षा की स्थिति से ‘असंतुष्ट‘ हो कर इस क्षेत्र में उतरे। ऐसे लोगों में प्रकाश परिमल, प्रेमचन्द्र गोस्वामी, अशोक आत्रेय और हेमंत शेष का नाम शामिल किए जाने लायक है। यों, यह सर्वविदित ही है कि अखिल भारतीय स्तर पर भी कला-समालोचना, खास तौर पर हिन्दी में कला पर लेखन, अपेक्षाकृत देर से शुरू हुआ, पर ‘धर्मयुग', ‘मार्ग‘, ‘वृश्चिक‘, ‘दिनमान‘, ‘ललित-कला-कन्टैम्प्रेरी‘, ‘समकालीन-कला‘, ‘कलावार्ता ‘, ‘कला-प्रयोजन‘, ‘कला-दीर्घा‘ और ‘क‘ जैसी पत्र पत्रिकाओं की उपस्थिति से कला पर राजस्थान में आलोचनात्मक लेखन की प्रक्रिया को बल मिला।

राजस्थान ललित कला अकादमी की पत्रिका ‘आकृति‘ विगत 30-35 वर्षों से भी ज्यादा समय से प्रकाशित होती रही, हालाँकि सम्पादन, विषयवस्तु और आकार-प्रकार में इसमें समय-समय पर बदलाव आता रहा, पर इसके कुछ विशेषांक अब भी उपयोगी हैं। बाद में यह पत्रिका ‘ कला-समाचार-बुलेटिन‘ के रूप में प्रकाशित की जाती थी, अब बन्द है।

दूसरी सच्चाई यह भी है कि राजस्थान में हेमंत शेष द्वारा सम्पादित ‘कला-प्रयोजन‘ (त्रैमासिक) के अलावा, जो पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, उदयपुर की द्विभाषी कला-संस्कृति पत्रिका है, साहित्य व ललित कलाओं पर केन्द्रित कोई पत्र या पत्रिका है ही नहीं। ‘कला-प्रयोजन‘ अपने १८वें प्रकाशन वर्ष में है और इस पत्रिका में हिन्दी के सारे बड़े लेखक ससम्मान प्रकाशित हुए हैं, जिन में से अनेक ने कला और संस्कृति पर स्थाई महत्व का सर्जनात्मक योगदान किया है।

कला-सम्बन्धी सामग्री यदा-कदा ‘कलावृत्त‘ (सम्पादक: सुमहेन्द्र), ‘नवभारत टाइम्स‘ (दैनिक) और ‘नवज्योति-हैरल्ड‘ (अब बन्द) आदि पत्र-पत्रिकाओं में भी प्रकाशित होती रही है।

परम्परागत और आधुनिक चित्रांकन के विषय में स्व. जयसिंह नीरज, स्व.मोहन शर्मा, स्व. कुँवर संग्राम सिंह, स्व. विजयशंकर श्रीवास्तव, स्व. रामकुमार, स्व.लक्ष्मण राव पेंढारकर, प्रेमचन्द गोस्वामी, हर्षवर्धन, सुमहेन्द्र, डॉ॰ नीलिमा वशिष्ठ, आर.बी. गौतम, रीता प्रताप, विद्यासागर उपाध्याय, चंद्रमणि सिंह, विजय वर्मा, डॉ॰ अन्नपूर्णा शुक्ल, दिलीप सिंह चौहान, ममता चतुर्वेदी आदि आदि भी पुस्तकों में या पत्र-पत्रिकाओं में परम्परागत या आधुनिक चित्रकला के विभिन्न पक्षों पर लिखने वालों में रहे हैं। परन्तु आधुनिक कला के विभिन्न शास्त्रीय-पक्षों पर गम्भीर सामग्री तैयार करने वाले में कवि-कला-आलोचक प्रकाश परिमल और हेमंत शेष का नाम उल्लेखनीय आधुनिक समीक्षकों में अग्रगण्य है।

उम्मीदों का आसमान

हम यह मानते हैं कि समकालीन भारतीय कला आलोचना में, राजस्थान के बहुतेरे अर्थ-सम्पन्न और सशक्त चित्रकारों की बहुत उपेक्षा हुई है। इसलिए इस लंबे आलेख में हम जान-बूझ कर अपनी बात राजस्थान के चित्रकारों तक ही सीमित रखना चाहते हैं। इसके पीछे यह आश्वस्ति है कि राजस्थान के बाहर के कलाकारों व समीक्षकों का ध्यान भी यहाँ के कला-परिदृश्य में हो रहे नए रचनात्मक बदलावों की तरफ जाएगा और हिन्दी के ऐसे पाठक, जो भारतीय कला-परिवेश के संदर्भ में, राजस्थान के क्रियाशील चित्रकारों के योगदान को व्यवस्थित रूप से समझना चाहते हैं, हमारी इस छोटी सी कोशिश से शायद कुछ सूत्र, थोड़ी बहुत सहायता प्राप्त कर सकेंगे।

अभी भी राजस्थान में आधुनिक कला की बुनियाद, उसके विकास, चुनौतियों और नई सृजनात्मकता को ले कर की जाने वाली बहसों और खोजों के लिए हिन्दी में पर्याप्त अवकाश है। (समाप्त)

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