रमजान
इस्लाम धर्म में अच्छा इन्सान बनने के लिए पहले मुसलमान बनना आवश्यक है और मुसलमान बनने के लिए बुनियादी पांच कर्तव्यों (फराईज़) का अमल में लाना आवश्यक है। यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित पांच कर्तव्यों में से किसी एक को भी ना माने, तो वह मुसलमान नहीं हो सकता:
ये फराईज हैं- ईमान यानी कलिमा तय्यब, जिसमें अल्लाह के परम पूज्य होने का इकरार, उसके एक होने का यकीन और मोहम्मद साहब के आखिरी नबी (दूत) होने का यकीन करना शामिल है। इसके अलावा बाकी चार हैं -नमाज़, रोज़ा, हज और ज़कात।
इस्लाम के ये पांचों फराईज़ इन्सान को इन्सान से प्रेम, सहानुभूति, सहायता तथा हमदर्दी की प्रेरणा देते हैं। यदि कोई व्यक्ति मुसलमान होकर इस सब पर अमल न करे, तो वह अपने मजहब के लिए झूठा है।
रोज़े को अरबी में सोम कहते हैं, जिसका मतलब है रुकना। रोज़ा यानी तमाम बुराइयों से रुकना या परहेज़ करना। ज़बान से गलत या बुरा नहीं बोलना, आंख से गलत नहीं देखना, कान से गलत नहीं सुनना, हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य हिस्सों से कोई नाजायज़ अमल नहीं करना। रोज़े की हालत में किसी व्यक्ति के लिए यह आज्ञा नहीं है कि वह अपनी पत्नी को भी इस नीयत से देखे कि उसके मन में कामवासना जगे। गैर औरत के बारे में तो ऐसा सोचना ही हराम है।
रोज़े में दिन भर भूखा व प्यासा ही रहा जाता है, जिससे इन्सान में एक वक्ती कमज़ोरी आ जाती है और वह किसी भी हैवानी काम के विषय में नहीं सोचता, शोर नहीं मचाता, हाथापाई नहीं करता इत्यादि। इसी तरह यदि किसी जगह लोग किसी की बुराई कर रहे हैं तो रोज़ेदार के लिए ऐसे स्थान पर खड़ा होना मना है।
जब मुसलमान रोज़ा रखता है, भूखा-प्यासा रहता है तो उसके हृदय में भूखे व्यक्ति के लिए हमदर्दी पैदा होती है।
रमज़ान के माह में मुसलमान के हर नेक अमल यानी पुण्य के कामों का सबाव 70 गुना बढ़ा दिया जाता है। 70 गुना अरबी में मुहावरा है, जिसका मतलब होता है बेशुमार। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति अपने पुण्य के कामों में अधिक से अधिक हिस्सा लेता है।
ज़कात इसी महीने में अदा की जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपने माल की ज़कात इस महीने में निकालता है तो उसको 1 रुपये की जगह 70 रुपये अल्लाह की राह में देने का पुण्य मिलेगा। इसीलिए मुसलमान इस माह में ज़कात अदा करने का उपक्रम करते हैं। रोजा हमें झूठ, हिंसा, बुराई, रिश्वत तथा अन्य तमाम गलत कामों से बचने की प्रेरणा देता है। इसकी मश्क यानी (अभ्यास) पूरे एक महीना कराया जाता है ताकि इंसान पूरे साल तमाम बुराइयों से बचे और इंसान से हमदर्दी का भाव रखे।
कुरआन में अल्लाह ने फरमाया कि रोज़ा तुम्हारे ऊपर इसलिए फर्ज़ किया है, ताकि तुम खुदा से डरने वाले बनो और खुदा से डरने का मतलब यह है कि इंसान अपने अंदर विनम्रता तथा कोमलता पैदा करे और खुद को हर पल खुदा का मोहताज़ समझता रहे। वह समझे कि मैं तो कुछ भी नहीं, एक रोज़ फना हो जाऊंगा। यह तो सब अल्लाह ही का करम है कि सांस ले रहा हूं, चल फिर रहा हूं, कामकाज कर रहा हूं और इस काबिल हूं कि लोगों की मदद कर सकता हूं। वर्ना मेरा तो जन्म पानी की दो बूंद के माध्यम से हुआ और मरकर मिट्टी में विलीन हो जाऊंगा या राख बन जाऊंगा।
यदि तमाम इन्सान इस सोच और भावना के साथ अपना जीवन व्यतीत करें तो भला कैसे समाज में बुराई आ सकती है? यदि मनुष्य और खासतौर पर मुसलमान पूरे वर्ष इसी आस्था और तरीके के साथ अपना जीवन व्यतीत करें, जैसा कि वह रोजे में करते हैं, तो पूरी उम्मीद है कि समाज में प्रेम, सहानुभूति, हमदर्दी, नेकी, एक-दूसरे के तई मोहब्बत और प्यार का माहौल कायम होगा तथा इस नेकी का असर दूसरी तमाम कौमों पर भी पडे़गा।