रघुराज प्रताप सिंह

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रघुराज प्रताप सिंह
रघुराज प्रताप सिंह

रघुराज प्रताप सिंह


जन्म 1969
कुंडा,प्रतापगढ़, भारत
राजनैतिक पार्टी निर्दलीय नेता
आवास "बेंती" कुंडा, प्रतापगढ़,"रामायण" लखनऊ, उत्तर प्रदेश
धर्म हिन्दू
As of ७ अगस्त, २०१२

कुँवर रघुराज प्रताप सिंह (जन्मः 31 अक्टूबर, 1967, कुंडा) एक सुप्रसिद्ध भारतीय राजनेता है, जो राजा भैया के नाम से लोकप्रिय है। अपने समर्थको के बीच भैया जी, महाराज आदि आदरसूचक शब्दो से संबोधित किए जाते है।

सन 1993 से लेकर अब तक उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिला के विधान सभा क्षेत्र कुंडा से निर्दलीय विधायक निर्वाचित किए जाते है। विधानसभा चुनाव 2012 मे भी भारी मतो से जीतकर विधानसभा सदस्य है।

राजा भैया को सन 1997 मे भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह के मंत्रीमंडल में कबानी मंत्री, वर्ष 1999 व 2000 में राम प्रकाश गुप्ता और राजनाथ सिंह के कैबिनेट मे खेल कूद एंव युवा कल्याण मंत्री बनाया गया। साल 2004 मे समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव की सरकार मे रघुराज प्रताप खाद्य एंव रसद विभाग मंत्री बने।

15 मार्च, 2012 को राजा भैया पुनः समाजवादी पार्टी के अखिलेश यादव के कैबिनेट मे कारागार एवं खाद्य आपूर्ती मंत्री बने, लेकिन 2 मार्च 2013 को कुंडा मे तीहरे हत्याकांड मामले मे डी. एस. पी. जिया उल हक के हत्या मामले राजा भैया का नाम आने पर इन्होने 4 मार्च, 2013 को मंत्री पद से इस्तिफा दे दिया।हालाकि बाद मे केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो के प्रारंभिक जाँच मे ही राजा भैया निर्दोष पाए गए और क्लोजर रिपोर्ट मे इन्हें क्लीन चिट मिल गई।सी.बी. आई . की अंतरिम रिपोर्ट में राजा भैया को पूरी तरह क्लीन चिट मिल गयी और 11 अक्टूबर को उन्हें उत्तर प्रदेश सरकार ने सम्मान सहित पुनः कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया और वर्तमान सरकार मे रघुराज प्रताप सिंह खाद्य एंव रसद विभाग मंत्री हैं। [1]


जीवन परिचय[संपादित करें]

रघुराज का जन्म 31 अक्टूबर 1967 को प्रतापगढ़ के भदरी रियासत मे पिता श्री उदय प्रताप सिंह और माता श्रीमती मंजुल राजे के यहाँ हुआ। इनके दादा राजा राय बजरंग बहादुर सिंह , स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल थे। राघुराज के पिता राजा उदय प्रताप सिंह विश्व हिंदू परिषदराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मानद पादाधिकारी रह चुके है। इनकी माता श्रीमती मंजुल राजे भी एक शाही परिवार की है। राजा भैया अपने परिवार के पहले ऐसे सदस्य थे जिन्होंने पहली बार राजनीतिक क्षेत्र में प्रवेश किया।

रघुराज प्रताप की प्राथमिक शिक्षा नारायणी आश्रम, इलाहाबाद के महाप्रभु बाल विद्यालय मे हुआ। सन 1985 मे भारत स्काउट एंड गाइड हाई स्कूल से दसवी तथा सन 1987 मे इलाहाबाद के एक इंटरमीडिएट स्कूल से बारहवी की पढ़ाई की। लखनऊ विश्वविद्यालय से इन्होंने कानून मे स्नातक की डिग्री हासिल की। घुड़सवारी और निशानेबाजी के शौकीन राजा भैया लखनऊ विश्वविद्यालय से मिलिट्री साइंस और भारतीय मध्यकालीन इतिहास में स्नातक हैं। राजा भैया के बारे में कहा जाता है कि वे साइकिल चलाने से लेकर हवाई जहाज उड़ाने तक का कारनामा करते हैं।

रघुराज प्रताप सिंह उर्फ़ राजा भैया का विवाह बस्ती रियासत की राजकुमारी भान्वी देवी से हुआ। इनके दो पुत्र शिवराज एंव ब्रृजराज, दो पुत्रियाँ राधवी और ब्रृजेश्वरी है।

राजनैतिक करियर[संपादित करें]

रघुराज प्रताप सिंह कुंडा की सीट से, स्वतंत्र पूर्वक सन् 1993 में राज्य स्तरीय चुनाव में भाग लिया और विजयी होकर विधायक बने। तब वह सिर्फ 26 वर्ष के थे। सन् 1999 में इण्डियन जनरल इलेक्शन में इन्होंने राजकुमारी रत्ना सिंह के खिलाफ (जो कि इसी परिवार से ही सम्बंधित हैं),अपने चचेरे भाई अक्षय प्रताप सिंह को उतार दिया। राजा भैया कद्दावर राजनेता छवि के प्रभाव से उनके भाई भी उस चुनाव में जीत गए थे |

राजा भैया ने 1993 में हुए विधानसभा चुनाव से कुंडा की राजनीति में कदम रखा था। तब से वह लगातार अजेय बने हुए हैं। उनसे पहले कुंडा सीट पर कांग्रेस के नियाज हसन का डंका बजता था। हसन 1962 से लेकर 1989 तक कुंडा से पांच बार विधायक चुने गए।

राजा भैया 1993 और 1996 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी समर्थित, तो 2002 और 2007 के चुनाव में एसपी समर्थित निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में विधायक चुने गए। राजा भैया, बीजेपी की कल्याण सिंह सरकार और एसपी की मुलायम सिंह सरकार में भी मंत्री बने।

पिछले चुनाव में राजा भैया से करीब 50 हजार मतों से हारने वाले शिव प्रकाश मिश्र को बहुजन समाज पार्टी ने कुंडा से एक बार फिर मैदान में उतारा था लेकिन यह उनके लिए कोई नफे का सौदा नहीं रह पाया। वहीं बीजेपी ने त्रिभुवन नाथ मिश्र और कांग्रेस ने रमाशंकर यादव को उम्मीदवार बनाया था जोकि कहीं आस पास भी नहीं ठहरे।

नए परिसीमन का भी राजा भैया पर कोई खास असर पड़ता नहीं दिखा। नए परिसीमन में कुंडा सीट के कुछ क्षेत्र कट गए हैं और नई सीट में पड़ोस की बाबागंज विधानसभा का कुछ हिस्सा शामिल हो गया है। बाबागंज विधानसभा क्षेत्र को राजा भैया के प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है क्योंकि पिछले तीन चुनावों से लगातार वहां राजा भैया समर्थित उम्मीदवार ही जीत दर्ज करता आ रहा है।


दबंग छवि के मसीहा[संपादित करें]

  • उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री और निर्दलीय विधायक रघुराज प्रताप सिंह उर्फ राजा भैया अपने क्षेत्र में ही नहीं बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में दबंग माने जाते हैं | दबंग होने के बावजूद उनके समर्थकों की संख्या भी कम नहीं है, कुछ लोग तो उन्हें मसीहा मानते हैं।
  • कुंडा में रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया रहते हैं प्रत्येक दिन जनता दरबार लगता है और क्षेत्र के सभी जनों की संशय एवं समस्याओ का निवारण किया जाता है और उन्हें आर्थिक सहायता भी यथावत जनता दरबार में ही प्रदान की जाती है | कुंडा प्रतापगढ़ में भैया जी जंहा से भी निकलते हैं हर चौराहे और रास्ते में पड़ने वाले गावों की जन समस्या भी सुनते हैं और उनका वंही पर निवारण भी करते हैं यही नहीं कई वजह हैं जिसके फलस्वरुप वो लाखों वोटों से विधायकी जीतते हैं | रघुराज प्रताप सिंह सत्ता में रहें या न रहें उनका यह जनता दरबार सतत ही चलता रहता है |

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राजनीतिक जीवन संघर्ष एवं आरोप[संपादित करें]

  • 1993 में राजा भैया ने राजनीति में अपना पहला कदम रखा था. तब भाजपा ने उनका समर्थन करते हुए चुनावी मैदान में उनके खिलाफ अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था । यह मंदिर आंदोलन का दौर था जब प्रदेश में भाजपा उफान पर थी । उस वक्त मुलायम सिंह ने राजा भैया का जमकर विरोध किया था. उनका आरोप था कि 1991-92 में राजा भैया ने राम मंदिर आंदोलन के दौरान प्रतापगढ़ के मुस्लिम विरोधी दंगों में सक्रिय भूमिका निभाई थी। तब मुलायम सिंह ने राजा भैया पर कार्रवाई की मांग को लेकर हफ्ते भर तक प्रदेश विधानसभा की कार्यवाही बाधित की थी। यह राजा भैया की राजनीति का एक और पक्ष है। वे राजनीति तो हिंदूवादी ही करते हैं लेकिन कभी भाजपा या हिंदूवादी संगठनों से जुड़े नहीं।
  • सिंह ने अपने पिता राजा उदय प्रताप सिंह की मर्जी के खिलाफ राजनितिक जीवन प्रारंभ किया मात्र 19 साल की उम्र में छात्र राजनीति में कूदने वाले रघुराज प्रताप सिंह ने मात्र २6 साल की उम्र में कुंडा से विधायकी का चुनाव लड़ा और भारी बहुमत के साथ सत्ता में आये | मायावती ने जब कल्याण सिंह सरकार से समर्थन वापिस लिया था तब राजा भैया ने सरकार बचाने में कल्याण सिंह को भरपूर मदद दी।
  • ग्यारह वर्ष पहले पहले मायावती सरकार से बगावत करने पर साल 2002 में भाजपा विधायक पूरन सिंह बुंदेला ने मायावती के कहने पर राजा भैया के खिलाफ अपहरण की एफआईआर दर्ज कराई। 2 नवंबर 2002 को राजा भैया को गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद राजा भैया को मायावती सरकार के राज में आतंकी घोषित कर दिया गया। पिता उदय प्रताप सिंह व भाई अक्षय प्रताप के साथ राजा को पोटा के तहत जेल भेज दिया गया। 2004 में पोटा लगने के बाद 2007 में अवैध हथियार लाइसेंस का भी केस दर्ज हुआ। आरोपों के अनुसार राजा भैया ने हथियार लाइसेंस लेने के लिए जाली कागजात पेश किए थे। इस मामले में एफआईआर दर्ज होने तक राजा भैया ने तीन लाइसेंस पा लिए थे। पंचायत चुनाव के दौरान कुंडा हुई हिंसा में एक उम्मीदवार को जान से मारने के प्रयास के आरोप में मुख्यमंत्री मायावती ने एक बार फिर उन्हें जेल में डलवाया. करीब एक साल तक राजा भैया जेल में बंद रहे|अभी हाल में ही राज्य के एक पुलिस अधिकारी ज़िया उल-हक़ की हत्या के सिलसिले में नाम आने के बाद रघुराज प्रताप सिंह ने अखिलेश यादव मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया है | यह देश का पहला मामला है जिसमे आरोपी ने सबसे पहले ही मुख्यमंत्री से सी.बी.आई. जांच की सिफारिश की है और यह बात सी.बी.आई. की तरफ सिद्ध भी हो चुकी है की हत्या में राजा भैया का किसी भी तरह का हाथ नहीं था | अंतरिम सी. बी. आई . रिपोर्ट में राजा भैया की कंही भी संलिप्तता नहीं पाई गयी थी |
  • सियासत में 'दबंग' छवि वाले कुंडा विधायक रघुराज प्रताप सिंह के करीबियों में से कई लोग बसपा सरकार से जा मिले और सिंह से दूरी बना ली।
  • सिंह के कुछ करीबी लोग उन्हें मुश्किल में डाल चुके हैं। कई विवादों में सिंह के करीबियों का नाम सामने आया है।
  • रघुराज प्रताप सिंह उत्तर प्रदेश में ठाकुरों और ब्राह्मणों की विरोधी राजनीति की एक धुरी बन चुके हैं। राजा भैया की इस हैसियत का ही एक नमूना था कि बीती छह मार्च 2013 को लखनऊ में सूबे के 60 से ज्यादा ठाकुर विधायकों ने बैठक करके उन्हें अपने तन-मन-धन का समर्थन अर्पित किया। इसमें सपा, भाजपा और कांग्रेस के ठाकुर, ब्राह्मण विधायक सम्मिलित थे। यही पिछली बसपा सरकार को छोड़ दें तो राजा भैया पिछले दो दशक के दौरान बाकी सारी ही सरकारों में शामिल रहे हैं। उनका राजनीतिक बायोडाटा बताता है कि वे अलग-अलग विचारों और संस्कारों वाले कुल छह मुख्यमंत्रियों के साथ एक सी सहजता के साथ जुड़ते-उठते-बैठते रहे हैं | इनमें कल्याण सिंह, मायावती, रामबाबू गुप्ता, मुलायम सिंह यादव, राजनाथ सिंह और अब अखिलेश यादव के नाम हैं । लेकिन आज तक उन्होंने किसी पार्टी का दामन नहीं थामा है। [4][5][6][7][8]

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संदर्भ[संपादित करें]

बाह्य सूत्र[संपादित करें]