यादव

मुक्त ज्ञानकोश विकिपीडिया से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

यादव कुल यदुकुल भारतीय इतिहास के सब से लम्बे लिखित इतिहास वाले कुलों में से एक है वैसे तो बहुत सारे वंश हुए और ख़त्म हो गये पर सबसे अधिक विस्तार यदु महाराजा और पुरु महाराजा के कुल का हुआ। पर प्रधान वंश यादव वंश ही माना जाता था और है। प्रसिद्ध सदस्य है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] भारत के महान सम्राट ययाति ने शुक्र की पुत्री देव्यानी और असुरों के राजा विश्वपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा से विवाह किया। प्रथम पत्नी देवयानी से यदु और तुर्वसु हुए। शर्मिष्ठा से तीन पुत्र दुहयु, अनु और पुरु हुए। यदु के पुत्र क्रोषट और उनके पुत्र यादव हुये। यादव के नाम पर इनके वंशज यादव कहलाते हैं। वेद और पुराणों में यादव जाति को पवित्र कहा गया है।[कृपया उद्धरण जोड़ें] श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है कि यादव के नाम लेने से सभी पाप मिट जाते हैं।[कृपया उद्धरण जोड़ें] यादव प्राय: 'अहीर' शब्द से भी नामांकित होते हैं, जो संभवत: आभीर जाति से संबद्ध रहे होंगे। "अहीर" शब्द संस्कृत के "आभीर " शब्द का बिगड़ा हुआ स्वरुप है जिसका अर्थ है - निर्भीक i यादव वीरों और उनकी अजेयी नारायणी सेना ने महाभारत के युद्ध में अपना बेजोड़ शौर्य प्रदर्शित किया था i प्राचीन समय में तो कई राज्यों में सेनापति का पद सिर्फ अहीरों के लिए ही आरक्षित था i नर्मदा के तट पर सर्वप्रथम समुद्रगुप्त की विजयवाहिनी को रोकने वाले वीर अहीर ही तो थे i फिर दासता का युग आया - तुर्कों का शासनi लेकिन अहीर फिर भी अपनी तलवारों का शौर्य दिखलाते रहे i करनाल के युद्ध में वो शेर का बच्चा शमशेर बहादुर राव बालकिशन , अपने 5000 अहीर रणबांकुरों के साथ उस लूटेरे नादिरशाह से जूझ गया i नादिरशाह ने अहीरवाल की तलवारों की दिल खोल कर प्रशंसा की दिल्ली के बादशाह के समक्ष i इस के बाद फिरंगियों का युग आया i 1803 में एंग्लो - मराठा युद्ध में अहीरवाल राव तेज़ सिंह जी के नेतृत्व में अपने भाई मराठों के साथ खड़ा था लेकिन मराठा पराजय ने अहीर रियासत को अंग्रेजो का बैरी बना दिया i फिर , सन 1857 में समस्त हिन्द में बदलाव की उम्मीद ने अंगडाई ली i अहीरों की तलवारे फिर चमकी रणखेतों में i राव किशन सिंह जी की "मिसरी" चारण - भाटों के वीर रस के स्वरों में समा गयी i वीर अहीर एक बार फिर नसीबपुर में रणभूमि को लाल लहू से रंगने को तैयार थे i नसीबपुर में अहीरवाल की तलवारें विजय हासिल करने ही वाली थी कि एक अनहोनी हो गई i राव किशन सिंह जी फिरंगी सेनापति जेर्राद को काट कर बैरी से जूझते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए i हिन्द के गद्दार फिरंगियों से मिल गए i नसीबपुर की पराजय अहीरों को लील गई i वीर अहीरवाल को खण्डित कर दिया गया और सेना में अहीरों की भर्ती पर विराम लगा दिया गया i अंग्रेजो ने 1857 की क्रांति के बाद जाति आधारित फौज का गठन किया, जिस की वफादारी सिर्फ अंग्रेजो और जाति विशेष के प्रति थी न की मादरे वतन के लिए i अहीरों की जगह कुछ अंग्रेजपरस्त जातियों को फौज में स्थान मिला i अहीरवाल बिखर गया क्योंकि इस अर्ध - मरुस्थल व जल - विहीन भूमि में अहीर अपनी तलवार का खाते थे i पर प्रथम विश्व - युद्ध में जब अंग्रेजो को सैनिको की जरुरत पड़ी तो फिर उन्हें अहीर कौम की याद आयी i प्रथम विश्व - युद्ध ने अहीर सैनिक परम्परा को प्राणवायु प्रदान करी i प्रथम विश्व -युद्ध में अहीरों ने अपने शौर्य का ऐसा जलवा बिखेरा कि दितीय विश्व -युद्ध में करीब 39 हज़ार यदुवंशी मोर्चे पर थे जो कि किसी भी हिन्दू जाति की संख्या व उसके सैनिको के अनुपात में सर्वाधिक थे i बर्मा के मोर्चे पर अहीर कौम के शौर्य का परचम लहरा दिया -उमराव सिंह जी , विक्टोरिया क्रॉस नेi लेकिन , 1940 में सिंगापुर में अहीर सैनिको के विद्रोह ने अंग्रेजो के मन में इस जंगजू कौम का खौफ पैदा कर दिया और इस वजह से पृथक अहीर रेजिमेंट का गठन ना हो सका i 15 अगस्त 1947 में गुलामी की जंजीरे टूटी व नये भारत का उदय हुआअहीर एक जाति है, जो उत्तरी और मध्य भारतीय क्षेत्र में फैली हुई है। इस जाति के साथ बहुत ऐतिहासिक महत्त्व जुड़ा हुआ है, क्योंकि इसके सदस्य संस्कृत साहित्य में उल्लिखित आभीर के समकक्ष माने जाते हैं। हिन्दू पौराणिक ग्रंथ 'महाभारत' में इस जाति का बार-बार उल्लेख आया है। कुछ विद्वानों का मत है कि इन्हीं ने, जो दक्षिणी राजस्थान और सिंध (पाकिस्तान) में बिखरे हुए हैं, कृष्ण को गोपालक या गोपाल बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो अब भगवान कृष्ण की कथा का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं। जाटों का इससे रक्त सम्बन्ध तथा सामाजिक सम्बन्ध मराठों और गूजरों जैसा निकटतम है।खान-पान में जाट और गूजरों में कोई भेद नहीं, वैसे ही अहीर और जाटों में भी कोई भेद नहीं। इतिहास में इनके रहने का भी स्थान निकट-निकट बतलाया गया है। भारत से बाहर भी जहां कहीं जाटों का अस्तित्व पाया जाता है, वहीं अहीरों की बस्तियां भी मिलती हैं। चीन में जहां जाट को 'यूची' नाम से याद किया गया है, वहीं अहीरों को 'शू' नाम से पुकारा गया है। ईरान में जाटाली प्रदेश के निकट ही अहीरों की बस्तियां भी पाई जाती हैं। भारत की मौजूदा आर्य क्षत्रिय जातियों में अहीर सबसे पुराने क्षत्रिय हैं। जब तक जाट, राजपूत, गूजर और मराठा नामों की सृष्टि भी नहीं हुई थी, अहीरों का अभ्युदय हो चुका था।नन्द, जिसके कि यहां श्रीकृष्ण का पालन-पोषण हुआ था अहीर थे । कुछ भी बात हो, लेकिन इससे यह सिद्ध होता है कि जाट और अहीरों के पुरखे किसी एक ही भंडार के हैं।

यादव राजा[संपादित करें]

राजमाता, जिजाऊ.